Part-4 हिंदी भाषा एवं साहित्य का वास्तुंनिस्ट इतिहास बाय सरस्वती पांडे गोविंद पांडे बुक इन हिंदी (बुक, सरस्वती पांडे गोविंद पांडे)
भक्तिकाल
पूर्वपीठिका
मोनियर विलियम्स के अनुसार 'भक्ति' शब्द की व्युत्पत्ति 'भज्' धातु से हुई है।
' भक्ति' शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख श्वेताश्वेतर उपनिषद में मिलता है। भक्ति आन्दोलन के उदय के सम्बन्ध में कुछ विद्वानों का अभिमत निम्नलिखित है-
विद्वान/प्रस्तोता
अभिमत
ग्रियर्सन
ईसाइयत की देन
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
इस्लामी आक्रमण की प्रतिक्रिया
हजारी प्रसाद द्विवेदी
भारतीय चिन्तनधारा का स्वाभाविक विकास
गजानन माधव मुक्तिबोध
ऐतिहासिक-सामाजिक शक्तियों के रूप में जनता के
दुःख व कष्टों से हुआ।
रामविलास शर्मा
भक्ति आन्दोलन एक जातीय और जनवादी आन्दोलन है।
भक्ति आन्दोलन के उद्गम स्थल के सम्बन्ध में कुछ विद्वानों के मत निम्न हैं-
"भक्ति का जो सोता दक्षिण की ओर से धीरे-धीरे उत्तर भारत की ओर पहले से ही आ रहा था उसे राजनीतिक परिवर्तन के कारण शून्य पड़ते हुए जनता के हृदय क्षेत्र
में फैलने के लिए पूरा स्थान मिला।" - रामचन्द्र शुक्ल
"भक्ति द्राविड उपजी, लाये रामानन्द।
परगट किया कबीर ने, सात दीप नौ खण्ड ॥" - कबीरदास
"उत्पन्ना द्राविड़े साहं वृद्धि कर्णाटके गता।
क्वचित्क्वचिन्महाराष्ट्र गुर्जरे जीर्णतां गता ।" श्रीमद्भागवत
आचार्य शुक्ल ने दक्षिण में भक्ति का उद्भव स्वीकार किया है।
भक्ति आन्दोलन के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों के कथन निम्नलिखित है-
"बिजली की चमक के समान अचानक समस्त पुराने धार्मिक मतों के अन्धकार के ऊपर एक नयी बात दिखायी दी। कोई हिन्दू यह नहीं जानता कि यह बात कहाँ से आयी और कोई भी इसके प्रादुर्भाव का कारण निश्चित नहीं कर सकता।" महत्वपूर
- ग्रियर्सन
"देश में मुसलमानों का राज्य प्रतिष्ठित हो जाने पर हिन्दू जनता के हृदय में गौरव,
गर्व और उत्साह के लिए वह अवकाश न रह गया। उसके सामने ही उसके देव मन्दिर गिराए जाते थे, देव मूर्तियाँ तोड़ी जाती थी और पूज्य पुरुषों का अपमान होता था और वे कुछ भी न कर सकते थे। ऐसी दशा में अपनी वीरता के गीत न तो वे गा हो सकते थे और न बिना लज्जित हुए सुन ही सकते थे। आगे चलकर जब मुस्लिम साम्राज्य दूर तक स्थापित हो गया तब परस्पर लड़ने वाले स्वतंत्र राज्य भी नहीं रह गए। इतने भारी राजनीति उलटफेर के पीछे हिन्दू जन समुदाय पर बहुत दिनों तक उदासी सी छाई रही। अपने पौरुष से हताशा जाति के लिए भगवान की शक्ति और करुणा की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था ?"
- रामचन्द्र शुक्ल
"लेकिन जोर देकर कहना चाहता हूँ कि अगर इस्लाम नहीं आया होता तो भी इस साहित्य को बारह आना वैसा ही होता जैसा आज है।" -
हजारी प्रसाद द्विवेदी
"म्लेच्छाक्रान्तेषु देशेषु, पापैकनिलयेषु च। सत्पीड़ाव्यग्रलोकेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥"
- वल्लभाचार्य (कृष्णनामाश्रयस्त्रोत से)
जार्ज ग्रियर्सन ने भक्तिकाल को हिन्दी साहित्य का 'स्वर्ण युग' कहा था।
डॉ० रामविलास शर्मा ने भक्तिकाल को 'लोक जागरण काल' नाम से पुकारा है।
आचार्य हजारी प्रसाद ने भक्ति आन्दोलन को 'लोक जागरण' की संज्ञा दी।
(क) निर्गुणधारा (ज्ञानाश्रयी शाखा)
निर्गुण धारा के ज्ञानाश्रयी शाखा को विद्वानों ने कई नाम दिया, जो निम्न है-
हिन्दी साहित्य एवं भाषा का वस्तुनिष्ठ इतिहास
प्रस्तोता
नामकरण
रामचन्द्र शुक्ल
ज्ञानाश्रयी शाखा
हजारी प्रसाद द्विवेदी
निर्गुण भक्ति
रामकुमार वर्मा
संत काव्य
परशुराम चतुर्वेदी
संत काव्य
गणपतिचन्द्र गुप्त
संत काव्य
संत काव्य धारा के प्रथम कवि और प्रस्तोता निम्नलिखित हैं-
प्रस्तोता
प्रथम कवि
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
कबीरदास
हजारी प्रसाद द्विवेदी
कबीरदास
गणपतिचन्द्र गुप्त
नामदेव
रामकुमार वर्मा
नामदेव
रामस्वरूप चतुर्वेदी
कबीर
रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा, "निर्गुण मार्ग' के निर्दिष्ट प्रवर्तक कबीरदास ही थे।"
हिन्दी में भक्ति साहित्य की परम्परा का प्रवर्तन नामदेव ने किया।
महाराष्ट्र के संत परम्परा के आदि कवि मुकुंद राज को माना जाता है। इन्होंने सन् 1190 ई० में मराठी का पहला काव्य ग्रन्थ 'विवेक सिन्धु' लिखा।
महाराष्ट्र में 'महानुभाव' और 'बारकरी' नामक दो सम्प्रदाय प्रचलित है।
'महानुभाव' सम्प्रदाय के प्रवर्तक चक्रधर और 'बारकरी' सम्प्रदाय के मूल प्रवर्तक संत पुण्डलिक माने जाते हैं। किन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से बारकरी सम्प्रदाय के प्रथम उन्नायक संत ज्ञानेश्वर हैं।
महाराष्ट्र के भक्त संत नामदेव का संक्षिप्त परिचय निम्न है-
सम्प्रदाय
जन्म-मृत्यु
जाति
गुरु का नाम
रचना
मराठी
हिन्दी
वारकरी
1135-1215 ई०
दरजी
विसोवा खेचर
अभंग
गुरुग्रन्थ
साहिब में
नामदेव को हिन्दी रचनाओं की भाषा निम्नलिखित है-
(1) सगुण भक्ति के पदों की भाषा ब्रज है।
(2) निर्गुण पदों की भाषा नाथ पंथियों द्वारा गृहीत खड़ी बोली या सधुक्कड़ी भाषा।
प्रमुख संत कवियों का संक्षिप्त जीवन-वृत्त निम्न है-
संत कवि
जन्म-मृत्यु
जन्मस्थल
गुरु का नाम
जाति
माता-पिता
रैदास
1388-1518
कबीरदास
1398-1518
काशी
रामानन्द
चमार
जंभनाथ
1451-1523
काशी
रामानन्द
जुलाहा
हरिदास निरंजनी
1455-1543
डीड़वाण
नागौर
प्रागदास
बाबा गोरखनाथ
राजपूत
नीरु-नीमा
भक्तिकाल
97
संत कवि
जन्म-मृत्यु
जन्मस्थल
गुरु का नाम
जाति
माता-पिता
गुरुनानक
1469-1538
ननकाना
सोंगा
मनरंगीर
कालूराम-तृप्ता
खत्री
लालदास
1519-1659
खजूर (म.प्र.)
ग्वाला
दादू दयाल
1540-1648
अलवर
गदन चिश्ती
मेव
धुनिया
मलूक दास
1544-1603
अहमदाबाद
वृद्ध भगवान
या मोची
बावा लाल
1574-1682
इलाहाबाद
पुरुषोत्तम
खत्री
सुन्दरदास
सुन्दरदास
1590-1655
पंजाब
दादू दयाल
रचना
बनिया
परमानन्द-सती
1596-1689
जयपुर
क्षत्रिय
डॉ० बच्चन सिंह ने लिखा है, 'हिन्दी भक्ति काव्य का प्रथम क्रान्तिकारी पुरस्कर्ता कबीर है।'
मुसलमानों के अनुसार कबीर के गुरु का नाम सूफी फकीर शेख तकी था। ये सिकन्दर लोदी के पीर (गुरु) थे।
कबीर की वाणी का संग्रह उनके शिष्य धर्मदास ने 'बीजक' नाम से सन् 1464 ई० में किया। बीजक के तीन भाग किए गए हैं- (1) रमैनी, (2) सबद और (3) साखी।
कबीर की रचनाओं में प्रयुक्त छंद एवं भाषा निम्न है-
रमैनी
अर्थ
प्रयुक्त छंद
भाषा
सबद
रामायण
चौपाई + दोहा
ब्रजभाषा और पूर्वी बोली
साखी
शब्द
गेय पद
ब्रजभाषा और पूर्वी बोली
साक्षी
दोहा
राजस्थानी, पंजाबी मिली खड़ी बोली
कबीरदास की भाषा को 'पंचमेल खिचड़ी', सधुक्कड़ी आदि नाम से अभिहित किया जाता है।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर को 'भाषा का डिक्टेटर' कहा है।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार, "कबीर की वचनावली की सबसे प्राचीन प्रति सन् 1512 ई० की लिखी है।"
कबीरदास के भाषा के सम्बन्ध में विद्वानों ने निम्नलिखित मत प्रस्तुत किये-
विद्वान
श्याम सुन्दर दास
रामचन्द्र शुक्ल
हजारी प्रसाद द्विवेदी
कबीर की भाषा
पंचमेल खिचड़ी
सधुक्कड़ी
भाषा के डिक्टेटर
२ कबीर की बानियों का सबसे पुराना नमूना 'गुरु ग्रन्थ साहिब' में मिलता है।
कबीर के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण कथन अग्रांकित हैं-
(1) "इसमें कोई सन्देह नहीं कि कबीर ने ठीक मौके पर जनता के उस बड़े भाग को सँभाला जो नाथ पंथियों के प्रभाव से प्रेमभाव और भक्ति रस से शून्य शुष्क पड़ता जा रहा था।"- रामचन्द्र शुक्ल
(2) "उन्होंने भारतीय ब्रह्मवाद के साथ सूफियों के भावात्मक रहस्यवाद, हठयोगियों के साधनात्मक रहस्यवाद और वैष्णवों के अहिंसावाद तथा प्रपत्तिवाद
भाषा का वस्तुनिष्ठ इतिहास
का मेल करके अपना पंथ खड़ा किया।"- रामचन्द्र शुक्ल (3) "भाषा बहुत परिष्कृत और परिमार्जित न होने पर भी कबीर की उक्तियों में कहीं-कहीं विलक्षण प्रभाव और चमत्कार है। प्रतिभा उनमें बड़ी प्रखर थी इसमें
सन्देह नहीं है।" - रामचन्द्र शुक्ल कबीरदास की मृत्यु मगहर में हुई थी।
कबीर की पत्नी का नाम लोई था तथा पुत्र-पुत्री का नाम कमाल तथा कमाली था।
संत रैदास (रविदास) मीराबाई और उदय के गुरु माने जाते हैं।
रैदास के 40 पद 'गुरु ग्रन्थ साहब' में संकलित हैं।
गुरुनानक देव सिख सम्प्रदाय के मूल प्रवर्तक एवं आदि गुरु थे।
गुरुनानक देव की पत्नी का नाम सुलक्षणी था तथा उनके दो पुत्र थे- (1) श्रीचन्द और (2) लक्ष्मीचन्द ।
गुरुनानक देव की प्रमुख रचनाएँ- 'जपुजी', 'आसदीवार', 'रहिरास' और 'सोहिला'- गुरु ग्रन्थ साहिब में संकलित हैं।
'जपुजी' नानक दर्शन का सार तत्त्व है।
नसीहतनामा' नानकदेव की महत्वपूर्ण रचना है।
प्रमुख संत कवियों से सम्बन्धित प्रसिद्ध स्थल निम्नलिखित है-
प्रसिद्ध स्थल
संभराथल (समाधि स्थल)
अलखदरीबा (सत्संग-स्थल)
बाबा लाल का शैल (बड़ौदा)
मगहर (मृत्यु-स्थल)
सांगानेर (मृत्यु-स्थल)
भराने (राजस्थान) (मृत्यु-स्थल)
द्वारका (मृत्यु-स्थल)
सम्बन्धित संत कवि
जम्भनाथ
दादू दयाल
बाबा लाल
सुन्दरदास
दादू दयाल
मीराबाई
संत कवियों द्वारा प्रवर्तित सम्प्रदाय, मुख्य केन्द्र और उनके प्रमुख शिष्य इस प्रकार हैं-
कवीरदास
सम्प्रदाय
कबीर पंथ
सिख
उदासी
श्रीचन्द
विश्नुई
प्रवर्तक
कबीर
गुरुनानक
जंभनाथ
केन्द्र
काशी पंजाब
बीकानेर
निरंजनी
लालपंथ
हरिदास निरंजनी
डीडवाणा
लालदास
अलवर
दादू पंथ
दादू दयाल
राजस्थान (1)
प्रमुख शिष्य
धर्मदास
(1) हावली पावजी,
(2) लोहा पागल,
(3) दत्तनाथ, (4) मालदेव
(1) नारायणदास, (2) रूपदास
रज्जब,
(2) सुन्दरदास,
(3)
प्रागदास, (4) जनगोपाल
बाबा लाली
बावरी
सत्यनामी
बाबा लाल
बावरी साहिबा
जगजीवनदास
गुरुदासपुर
नरलोन
(1) गोविन्द साहब,
साधो
वीर भानु
फर्रुखाबाद
(2) भीखा साहब
भक्तिकाल
दादू दयाल के सम्प्रदाय को 'ब्रह्म सम्प्रदाय' या 'परब्रह्म सम्प्रदाय' नाम से भी जाना जाता है।
'निरंजनी सम्प्रदाय' उड़ीसा में प्रचलित है।
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दादू पंथ के उत्तराधिकारी दादू के पुत्र 'गरीबदास' तथा 'मिस्कीनदास' थे।
कबीरदास के उत्तराधिकारी 'कमाल' व 'धर्मदास' थे।
प्रमुख संत कवियों द्वारा रचित ग्रन्थ एवं भाषा इस प्रकार है-
संत कवि
पुस्तक एवं भाषा
हरिदास निरंजनी
(1) अष्टपदी जोग ग्रन्थ, (2) ब्रह्म स्तुति, (3) हंस प्रबोध ग्रन्थ, (4) निरपख मूल ग्रन्थ, (5) पूजा जोग ग्रन्थ, (6) समाधिजोग ग्रन्थ, (7) संग्राम जोग ग्रन्थ । (भाषा: सरल ब्रजभाषा)
सींगा
: (1) सींगाजी का दृढ़ उपदेश, (2) सींगाजी का आत्मबोध, (3) सींगाजी का दोष-बोध, (4) सींगाजी का नरद, (5) सींगाजी का शरद, (6) सींगा जी की वाणी, (7) सींगाजी की वाणीवली, (8) सींगाजी का सातवार, (9) सींगाजी की पन्द्रह तिथि, (10) सींगाजी की बारहमासी, (11) सींगाजी के भजन । (भाषा: निमाड़ी)
दादू दयाल
: (1) हरडे बानी, (2) अंग बंधू, (3) काया बोली। (भाषा: राजस्थानी खड़ी बोली मिश्रित ब्रज)
मलूक दास
: (1) रत्नखान, (2) ज्ञानबोध, (3) ज्ञान परोछि, (अवधी भाषा) (4) भक्तवच्छावली, (5) भक्ति विवेक, (6) बारह खड़ी, (7) रामावतार लीला, (8) ब्रजलीला, (9) ध्रुवचरित, (10) सुखसागर, (11) शब्द। (भाषा: ब्रजभाषा)
बाबा लाल
: (1) असरारे-मार्फत, (2) नादिरून्त्रिकात।
सुन्दरदास
: (1) ज्ञान समुद्र, (2) सुन्दर विलास (भाषा : परिष्कृत ब्रजभाषा)
रज्जब
: (1) सब्वंगी
गुरु अर्जुन सिंह
(1) सुखमनी, (2) बावन अखरी, (3) वारहमासा। (भाषा : ब्रजभाषा)
निपट निरंजन
: (1) शान्त सरसी, (2) निरंजन-संग्रह
अक्षर अनन्य
: (1) राजयोग, (2) विज्ञान योग, (3) ध्यान योग, (4) सिद्धान्त बोध, (5) विवेकदीपिका, (6) ब्रह्म ज्ञान, (7) अनन्य प्रकाश।
दादू दयाल की वाणियों का सर्वप्रथम सम्पादन उनके दो शिष्य संतदास और जगन्नदास ने 'हरड़े बानी' शीर्षक से किया था पुनः रज्जब ने 'अंगबंधू' शीर्षक से इसका सम्पादन किया।
बाबालाल कृत 'असरारे-मार्फत' में उनका और दाराशिकोह का वार्तालाप संगृहीत है।
बाबालाल के विचारों का संग्रह 'नादिरुन्निकात' पुस्तक है।
हिन्दी के अन्य प्रमुख संत कवि निम्नलिखित हैं-
की वस्तुनिष्ठ इतिहास
संत कवि
जन्म-मृत्यु
जन्मस्थल
गुरु का नाम
जाति
धर्मदास
बाधोगढ
कबीरदास
बनिया
धन्ना
1415
धुवान
रामानन्द
जाट
पीपा
1425
गगरौनगढ़
रामानन्द
नाई
सेन
बाधोगढ
रामानन्द
शेख फरीद
कोठीवाल
उदयदास
मुसलमान
वीरभान
1543
बावरी साहिबा
1542-1605
राजस्थान
मायानंद
रज्जब सदना
1567-1689
दौलताबाद
दादूदयाल
मुसलमान
कसाई
निपट निरंजन
1531
दतिया
कायस्थ
गौड़ ब्राह्मण
अक्षर अनन्य
भीषन
संत कवियों में बावरी साहिबा महिला संत साधिका थी।
अक्षर अनन्य प्रसिद्ध छत्रसाल के गुरु थे।
संत रज्जब का पूरा नाम 'रज्जब अली खाँ' था
संत शेख फरीद का दूसरा नाम 'शाह ब्रह्म' या 'इब्राहीम शाह' या 'शंकरगंज' था।
हिन्दी में रचना करने वाले प्रमुख सिख गुरु निम्नलिखित हैं-
संत सिख कवि
जन्म-मृत्यु
ग्रन्थ
गुरु अंगद
1504-1552
आदि ग्रन्थ साहब में कुछ श्लोक या दोहा संकलित
गुरु अमरदास
1479-1574
तीसरे गुरु हैं, गुरु ग्रन्थ साहब में संकलित है
गुरु राम दास
1514-1581
चौथे गुरु हैं, आदिग्रन्थ के चौथे महला में संकलित
गुरु अर्जुनदेव
1563-1606
पाँचवें गुरु हैं, आदि ग्रन्थ के पाँचवें महला में संगृहीत
गुरुतेग बहादुर सिंह
1622-1675
नौवें गुरु हैं, नौवें महला में संकलित हैं।
गुरु गोविन्द सिंह
1664-1718
अन्तिम गुरु हैं। (1) चण्डी चरित्र, (2) विचित्र नाटक
संत कवियों की महत्वपूर्ण काव्य पंक्तियाँ
क) कबीरदास
(1) "झिलमिल झगरा झूलत बाकी रही न काहु । गोरख अटके कालपुर कौन कहावै साहु ॥"
भक्तिकाल
(2) "बहुत दिवस ते हिंडिया, सुन्नि समाधि लगाइ। करहा पडिया गाड़ में दूरि परा पछिताइ ॥"
(3) "माधों में ऐसा अपराधी तेरी भगति होत नहीं साधी।
(4) "तंत्र न जानूँ, मंत्र न जानूँ, जानूँ सुन्दर काया।
(5) "हरि रस पीया जानिए, जे कबहूँ न जाय खुमार। मैंमंता घूमत फिरै, नाहीं तन की सार ॥
(6) "दसरथ सुत तिहुँ लोक बखाना। रामनाम का मरम है आना।"
(7) "आपुहि देवा आपुहि पाती। आपुहि कुल आपुहि जाती ॥
(8) "तत्त्व मसि इनके उपदेसा। ई उपनीसद कहें संदेसा ॥
(9) "जागबलिक और जनक सवादा। दत्तात्रेय वहै रस स्वादा ॥
(10) "गहना एक कनक ते गहना, न मह भाव न दूजा। कहन सुनन कोई दुई करि पापिन, इक मिजाज इक पूजा ॥"
(11) "दिन भर रोजा रहत हैं रात हनत हैं गाय। यह तो खून वह बंदगी, कैसे खुसी खुदाय ॥"
(12) "नैया बिच नदिया डूबति जाय। मुझको तूं क्या ढूँढ़े बंदे मैं तो तेरे पास में ॥"
(13) मसि कागज छुयौ नहीं, कलम गह्यौ नहि हाथ।
(14) तुम जिन जानो गीत है, यह निज ब्रह्म-विचार।
(15) मैं कहता हूँ आखिन देखी, तू कहता कागद की लेखी।
(16) हरि जननी मैं बालक तोरा
(17) "सतगुरु हमसूँ रीझ कर, कह्या एक प्रसंग। बादर बरसा प्रेम का भीजी गया सब अंग ॥"
(18) जे तँ बाभन बभनीं जाया। तो आन बाट होइ काहे न आया ॥
(19) हरि मोरा पिउ मैं हरि की बहुरिया
(20) हमनं है इश्क मस्ताना हमन को होशियारी क्या ?
(21) साई के सब जीव हैं कीरी कुंजर दोय।
(22) रस गगन गुफा अजर झरै।
(23) माया महा ठगनी हम जानी।
(24) जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजिए ज्ञान।
(25) मोरि चुनरी में परि गयो दाग पिया।
(26) मेरा तेरा मनुआ कैसे एक होई रे।
(27) नैना अंतरि आव तू ज्यूं तो नैन झंपेऊँ पलकों की चिक डारिकै, पिया को लिया रिझाय।
इतिहास
(28) भीजे चुनरिया प्रेम रस बूँदन।
(29) गुरु मोहि घंटिया अजर पियाई
(30) दुलहिन गावहु मंगल चारु। हमरे घर आये राजा राम भरतार
(31) पीछे लागा जाई था, लोक वेद के साधि। आगे थै सतगुरु मिल्या, दीपक दीया हाथि ॥
(32) घूँघट के पट खोल बहुरिया।
(33) सपने में साँई मिले, सोवत लिये जगाय।
(34) संतो आई ज्ञान की आंधी।
(35) पूजा-सेवा-नेम-ब्रत, गुडियन का-सा खेल।
(36) गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागू पाय।
(37) तरसै बिन बालम मोर जिया।
1) संत नामदेव
(1) मन मेरी सुई, तन तेरा धागा। खेचरजी के चरण पर नामा सिपी लागा ॥
(2) सुफल जन्म मोको गुरु कीना। दुःख बिसार सुख अन्तर कीना ॥ ज्ञान दान मोको गुरु दीना। राम नाम बिन जीवन हीना ॥
(3) किस हूँ पूजूँ दूजा नजर न आई एकै पाथर किज्जे भाव। दूजे पाथर धुरिए पाँव जो वो देव तो हम बी देव। कहै नामदेव हम हरि की सेव ॥
(4) भगत हेत मारयो हरिना कुस, नृसिंह रूप हवै देह धरयो। नामा कहै भगति बस के सव, अजहूँ बलि के द्वार खरो ॥
(5) दसरथनंद राजा रामचन्द्र। प्रणवै नामातत्त्व रस अमृत पीजै ॥
(6) धनि धनि मेधा रोमावली, धनि धनि कृष्ण ओढ़े काँवली धनि धनि तू माता देवकी, जिह गृह रमैया कँवलापति ॥
(7) माइ न होती, बाप न होते, कर्म्म न होता काया। हम नहिं होते, तुम नहिं होते, कौन कहाँ ते आया ॥
(8) पाण्डे तुम्हारी गायत्री लोधे का खेत खाती थी। लैकरि ठेंगा टँगरी तोरी लंगत लंगत लाती थी।
(9) हिन्दू पूजै देहरा, मुसलमान मसीद। नामा सेविया जहँ देहरा न मसीद ॥
) रैदास (संत रविदास)
(1) जाके कुटुंब सब ढोर ढोवंत। फिरहि अजहुँ बानारसी आसपासा ॥
आचार सहित विप्र करहि डंडउति। तिन तिनै रविदास दासानुदास ॥
भक्तिकाल
(2) ऐसी मेरी जाति विख्यात चमार।
(3) पावर जंगम कीट पतंगा पूरि रह्यो हरिराई।
(4) गुन निर्गुन कहियत नहि जाके।
(5) अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी।
प्रभुजी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग अंग वास समानी ॥
(6) जाति ओछा पाती ओछा, ओछा जनमु हमारा।
(7) दूध त बछरै थनह विडारेउ। फुलू भँवर, जलु मीन विगारेउ ॥ माई, गोबिन्द पूजा कहा लै चढ़ावउँ। अवरु त फूल अनुपू न पावऊँ ॥ मलयागिरिवै रहै है भुअंगा। विषु अमृत बसहीं इक संगा ॥ तन मन अरपउँ पूज चढावउँ। गुरु परसादि निरंजन पावउँ ॥
(8) अखिल खिलै नहि, का कह पण्डित, कोई न कहै समुझाई। अबरन बरन रूप नहिं जाके कहँ लौ लाइ समाई ॥ चंद सूर नहिं, राति दिवस नहिं, धरनि अकास न भाई। करम अकरम नहिं सुभ असुभ नहिं का कहि देहुँ बडाई ॥
(9) जब हम होते तब तू नाहीं, अब तू ही, में नाहीं। अतल अगम जै लहरि मइ उदधि, जल केवल जलमाहीं ॥
(10) माधव क्या कहिए प्रभु ऐसा, जैसा मानिए होइ न तैसा। नरपति एक सिंहासन सोड्या, सपने भया भिखारी ॥ अछत राज बिछुरत दुखु पाइया, सो गति भई हमारी।
(11) मन चंगा तो कठौती में गंगा।
(घ) गुरुनानक देव
(1) इस दम दा मैंनूँ कीबे भरोसा, आया न आया न आया। यह संसार रैन दा सुपना, कही देखा, कहीं नाहि दिखाया ॥
(2) जो नर दुख में दुख नहि मानै सुख सनेह अरु भय नहिं जाके, कंचन माटी जानै ॥
(3) आवै जाणै आपे देई आखहि सिभि केई कई। जिसनौ बखसे सिफति सालाह, नानक पाति साही पातिसाहुँ ॥
(4) सुरखान खमसान कीआ हिन्दुस्तान डराइया। आपै दोस न देई करता जपु करि मुगल चढाइया। एकती मार पई कुर लागै तै की दरदु न आइया।
(5) जिन सिर सोहन पटीआ मांगी पाइ संधूर। ते सिर काती मुनी अहि गल विधि आपै धूड़ ॥
(ङ) दादू दयाल
(1) भाई रे! ऐसा पंथ हमारा। है पख रहित पंथ गह पूरा अबरन एक अधारों।
एव भाषा का वस्तुनिष्ठ इतिहास
(2) घीव दूध से रमि रह्या व्यापक सब ही ठौर।
(3) यह मसीत यह देहरा सत गुरु दिया दिखाइ। भीतर सेवा बंदगी बाहिर काहे जाइ।
(4) असत मिलइ अंतर पडइ, भाव भगति रस जाइ। साथ मिलइ सुख ऊपजई, आनन्द अंग नवाइ ॥
(5) अपना मस्तक काटिकै वीर हुआ कवीर।
(च) मलूक दास
(1) अब तो अजपा जपु मनमेरे। सुर न असुर टहलुआ जाके मुनि गंध्रव हैं जाके चेरे।
(2) नाम हमारा खाक है, हम खाकी बंदे। खाकहि से पैदा किए अति गाफिल गंदे।
(3) अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम।
(छ) सुन्दरदास
संत सुन्दरदास श्रृंगार रस के कट्टर विरोधी थे। वे लिखते हैं-
(1) रसिक प्रिया रसमंजरी और सिंगारहि जानि। चतुराई करि बहुत विधि विर्षे बनाई आनि ॥
सुन्दरदास ने विभिन्न प्रदेशों की रीति-नीति पर अनेक व्यंग्यपूर्ण उक्तियाँ कही हैं जो निम्न है-
(2) आभउछीत अतीत सों होत विलार और कूकर चाटत हांडी- गुजरात पर
(3) बृच्छ न नीरन उत्तम चीर सुदेसन में गत देस है मारू - मारवाड़ पर
(4) गंधत प्याज, विगारत नाज न आवत लाज, करै सब भच्छन- दक्षिण पर
(5) ब्राह्मन क्षत्रिय वे सरु सूदर चोराइ वर्न के मच्छ बधारत - पूरब
(6) है यह अति गम्भीर उठति लहरि आनंद की मिष्ठ सु याकौ नीर, सकल पदारथ मध्य है।
(7) बोलिए तौ तब जब बोलिवे की बुद्धि होय, ना तौ मुख मौन गहि चुप होय रहिए।
(8) पति ही सूं प्रेम होय, पति' ही सूँ नेम होय, पति ही सूँ छेम होय, पति ही सूँ रत है।
(9) ब्रह्म तें पुरुष अरु प्रकृति प्रकट भई, प्रकृति तें महत्तत्त्व, पुनि अहंकार है।
(ज) बाबा लाल
(1) आशा विषय विकार की, बध्या जा संसार। लख चौरासी फेर में, भरमत बारंबार ॥
(2) देहा भीतर श्वास है, श्वासे भीतर जीव। जीवे भीतर वासना, किस विधि पाइये पीव ॥
L
(झ) रज्जब (रज्जब अली खाँ)
(1) धुनि ग्रभे उत्पन्नो, दादू योगेन्द्रा महामुनि
(2) वेद सुवाणी कूपजल, दुखसू प्रापति होय। शब्द साखी सरवर सलिल, सुख पोवै सब कोय ॥
(3) संतो, मगन भया मन मेरा। अह निसि सदा एक रस लागा, दिया दरीवै डेरा ॥
(ञ) हरिदास निरंजनी
गुणग्राही गोविन्द गुण गावा, भजि भजि राम परम पद पावा
(ट) जंभनाथ
गगन हमारा बाजा वाजे, मतर फल हाथी। संसै का बल गुरु मुख तोड़ा, पाँच पुरुष मेरे साथी।
(ठ) सींगा
जल विच कमल, कमल विच कलियाँ, जहं वासुदेव अविनाशी। घर में गंगा घर में जमुना, नहीं द्वारका काशी ॥
(ड) मन रंगीर
समुझि ले औरे मन आई, अंत न होय कोई अपणा। यही माया के फंदे में, नर आन भुलाणा ॥
(ड) धर्मदास
(1) बरनौ मैं साहेब तुम्हरे चरना, संतन सुखलायक दायक प्रभु दुःख हरना ॥
(2) झरि लागै महलिया गगन घहराय मितऊ मडैया सुनि करि गैलो।
1
(ण) संत भीषन
हरि का नामु अमृत जलु निरमल इहु अउखध जगि सारा। गुरु परसादि कहै जनु भीखनु पावठ मोख दुबारा ॥
(त) अक्षर अनन्य
परलोक लोक दोउ सधै जाय। सोइ राजयोग सिद्धान्त आय ॥ निज राजयोग ज्ञानी करंत। हठि मूढ धर्म साधत अनंत ॥
विविध
संत कवियों ने नारी के 'कामिनी रूप' की आलोचना की है।
(ख) निर्गुणधारा [ प्रेममार्गी (सूफी) शाखा]
भारत में सूफी धर्म का प्रचार-प्रसार 12वीं शताब्दी में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ने किया था।
सूफी धर्म की संक्षिप्त रूपरेखा निम्न है-
इस्लाम
हित्य एवं भाषा का वस्तुनिष्ठ इतिहास
शरा (सनातनी)
↓
बेशरा (सूफी)
चिश्ती सम्प्रदाय
सुहरावर्दी सम्प्रदाय
↓
कादरी सम्प्रदाय
नक्शबंदी सम्प्रदाय
साबिरी
जलाली
वहाबिया
निजामी
→ मखदूमी
रजाकिया
→ मीरन शाही
→ दौला श्गही
इस्माइशाही
प्रमुख सूफी सम्प्रदाय की संक्षिप्त रूपरेखा निम्नांकित है-
सम्प्रदाय
आदि प्रवर्तक
भारत में प्रवर्तक
समय
चिश्ती सम्प्रदाय
सुहरावर्दी सम्प्रदाय
आबू अब्दुल्लाह चिश्ती
मुईनुद्दीन चिश्ती जलालुद्दीन सुर्खपोश बंदगी मुहम्मद गौस
12वीं शताब्दी का उत्तरार्ध
कादरी सम्प्रदाय
अब्दुल कादिर जीलानी
मुहम्मद बाकी
13वीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध
15वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध
नक्शबंदी सम्प्रदाय
वहा अलदीन नक्शबंद
गिल्लाह बैरंग
16वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध
'सूफी' दर्शन को 'तसव्वुफ' कहते हैं। 'सूफी' शब्द की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में निम्नलिखित मत है-
मूल शब्द
सूफ
सफ
सूफा
सोफिया
सफा
अर्थ
ऊन
पंक्ति
चबूतरा
विद्या
पवित्र, निर्मल
सूफी या प्रेममार्गी शाखा के प्रथम कवि और प्रस्तोता निम्न हैं-
प्रस्तोता
रचना
वर्ष ई०
रचनाकार/कवि
गणपतिचन्द्र गुप्त
हंसावली
1370
असाइत
रामकुमार वर्मा
चंदायन
1379
मुल्ला दाऊद
हजारी प्रसाद द्विवेदी
सत्यवती कथा
1501
ईश्वरदास
रामचन्द्र शुक्ल
मृगावती
1501
कुतुबन
असाइत कृत 'हंसावली' का रचना स्रोत विक्कम वैताल की कथा है। इसमें पाटण की राजकुमारी हंसावली की कहानी है।
रामकुमार वर्मा ने मुल्ला दाऊद को अपने इतिहास ग्रन्थ में संधिकाल के अन्तर्गत रखा है।
डॉ० माता प्रसाद गुप्त ने 'चंदायन' को 'लोर कहा' या 'लोर कथा' नाम से अभिहित किया है।
हिन्दी के प्रमुख सूफी कवि और काव्य निम्नलिखित है-
रचना/कव्य
वर्ष (ई०)
कवि
प्रयुक्त भाषा
प्रयुक्त छंद
हंसावली
1370
असाइत
राजस्थानी
चौपाई-दोहा
चंदायन
1379
मुल्ला दाऊद
अवधी
चौपाई-दोहा
लखमसेन पद्मावती
1459
दामोदर कवि
राजस्थानी
चौपाई दोहा, सोरठा
कथा
सत्यवती कथा
1501
ईश्वरदास
अवधी
दोहा-चौपाई
मृगावती
1501
कुतुबन
अवधी
दोहा-चौपाई
माधवानल कामकंदला
1527
गणपति
राजस्थानी
सिर्फ दोहा छंद प्रयुक्त है
पद्मावत
1540
जायसी
अवधी
चौपाई-दोहा
मधुमालती
1545
मंझन
अवधी
दोहा-चौपाई
माधवानल कामकंदला
1556
कुशललाभ
राजस्थानी
चौपाई दोहा, सोरठा
चौपाई
प्रेमविलास प्रेमलता
1556
जरमल
राजस्थानी
की कथा
रूपमंजरी
1568
नंददास
ब्रजभाषा
दोहा-चौपाई
माधवानल कामकंदला
1584
आलम
अवधी
चौपाई-दोहा,
सोरठा
छिताई वार्ता
1590
नारायणदास
राजस्थानी
दोहा-चौपाई
ब्रजभाषा
चित्रावली
1613
उसमान
अवधी
चौपाई-दोहा
रस रतन
1618
पुहकर
अवधी
दोहा-चौपाई
ज्ञानदीप
1619
शेख नबी
अवधी
दोहा-चौपाई
नल-दमयंती
1625
नरपति व्यास
अवधी
दोहा-चौपाई
हंस जवाहिर
1731
कासिम शाह
अवधी
दोहा-चौपाई
नलचरित्र
1641
मुकुंद सिंह
अवधी
दोहा-चौपाई
इंद्रावती
1744
नूर मुहम्मद
अवधी
दोहा-चौपाई
अनुराग बाँसुरी
1764
नूर मुहम्मद
अवधी
बरवै-चौपाई
हिन्दी साहित्य एवं भाषा का वस्तुनिष्ठ इतिहास
सत्रहवीं शती के मध्य संख्या की दृष्टि से सर्वाधिक प्रेमाख्यानकों की रचना जान कवि ने की है जिनका रचना-काल 1612-1664 ई० माना जाता है।
जान कवि ने 78 ग्रन्थों की रचना की थी, जिसमें 29 प्रेमाख्यानक है। इनमें से प्रमुख हैं- (1) कथा रतनावली, (2) कथा कनकावती, (3) कथा मोहिनी, (4) कथा कंवलावती, (5) कथा नल दमयंती, (6) कथा कलावन्ती, (7) कथा रूपमंजरी, (8) कथा पिजरषां साहिजा दैवा देवलदे, (१) कथाकलन्दर, (10) ग्रन्थ लैलै मंजनू ।
जान कवि प्रथम हिन्दी कवि हैं जिन्होंने फारसी के लैला-मजनू आख्यान को लेकर 'लै लै मंजनूं' काव्य की रचना की है।
जान कवि को भाषा राजस्थानी प्रभावित ब्रजभाषा है।
दामोदर कवि ने अपनी रचना 'लखनसेन पद्मावती कथा' को 'वीर कथा' कहा है।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ईश्वरदास कृत 'सत्यवती कथा' को भक्तिकाल के किसी धारा में स्थान नहीं दिया।
'मृगावती' के रचयिता कुतुबन चिश्ती वंश के शेखबुरहान के शिष्य थे और जौनपुर के बादशाह हुसैन शाह के आश्रित कवि थे।
'मृगावती' में चन्द्रनगर के गणपति देव के राजकुमार और कंचनपुर की रानी रूपमुरारि की कन्या 'मृगावती' की प्रेमकथा का वर्णन है।
मंझन कृत 'मधुमालती' हिन्दी का प्रथम प्रेमाख्यानक काव्य है जिसमें बहुपत्नीवाद का सर्वथा अभाव है।
'मधुमालती' में नायक 'मनोहर' और महारस नगर की राजकुमारी 'मधु मालती' की प्रेम कथा के अनन्तर प्रेमा और ताराचंद की भी प्रेमकथा समानान्तर रूप से चलती है।
बनारसीदास ने अपनी आत्मकथा 'अर्ध कथानक' में दो प्रेमाख्यानक- (1) मृगावती और (2) मधु मालती का उल्लेख किया है जो निम्नांकित है-तब घर में बैठे रहें, नाहिन हाट बाजार। मधुमालती, मृगावती पोथी दोय उचार ॥
सन् 1643 (सं० 1700) में दक्षिण के शायर नसरती ने 'मधुमालती' के आधारपर दक्खिनी उर्दू में 'गुलशने इश्क' के नाम से एक प्रेमकथा लिखी।
जायसी कृत 'पद्मावत' में कुल 57 खण्ड है और इनका प्रिय अलंकार उत्प्रेक्षा' है।
मलिक मुहम्मद जायसी ने अपने पूर्व लिखे गये चार प्रेमाख्यानकों का उल्लेख किया है- (1) मधुमालती, (2) मृगावती, (3) मुग्धावती और (4) प्रेमावती ।
जायसी प्रसिद्ध सूफी फकीर शेख मोहिदी (मुहीउद्दीन) के शिष्य थे और शेरशाह के समकालीन कवि थे तथा अमेठी के निकट जायस में रहते थे।
जायसी द्वारा रचित महत्वपूर्ण ग्रन्थ और उनके विषय में निम्न हैं-
रचना
विषय
पद्मावत अखरावट
नागमती, पद्मावती और रत्नसेन की प्रेम कहानी है। वर्णमाला के एक-एक अक्षर को लेकर सिद्धान्त सम्बन्धी तत्वों से
भरी चौपाई है।
भायत क
आखिरी कलाम
कयामत का वर्णन तथा मुगल बादशाह बाबर की प्रशंसा है
चित्ररेखा
लघु प्रेमाख्यानक।
कहरानामा
आध्यात्मिक विवाह का वर्णन है। यह कहरवा शैली में लिखी है।
मसलानामा
ईश्वर भक्ति के प्रति प्रेम निवेदन है।
कन्हावत
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने जायसी के द्वारा रचित तीन ग्रन्थों- (1) पद्मावत, (2) अखरावट तथा (3) आखिरी कलाम का ही उल्लेख किया है।
आचार्य शुक्ल के अनुसार 'पद्मावत' की कथा का पूर्वार्द्ध 'कल्पित' और उत्तरार्द्ध का 'ऐतिहासिक' है।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है, "कबीर ने केवल भिन्न प्रतीत होती हुई परोक्ष सत्ता की एकता का आभास दिया था। प्रत्यक्ष जीवन की एकता का दृश्य सामने रखने की आवश्यकता बनी थी। यह जायसी द्वारा पूरी हुई।"
पद्मावत में प्रयुक्त प्रतीकार्थ निम्न है-
पद्मावत
रत्नसेन
सिहल
पद्मावती
सुवा या हीरामन तोता
नागमती
राघव चेतन
अलाउद्दीन
प्रतीकार्थ
मन (आत्मा)
हृदय
श्रद्धा या सात्विक बुद्धि (परमात्मा)
गुरु
दुनिया धंधा या सांसारिक बुद्धि
शैतान
माया
विजयदेव नारायण साही ने 'पद्मावत' को हिन्दी में अपने ढंग की अकेली ट्रेजिक कृति कहा है।
'पद्मावत' का 'नागमती वियोग खण्ड' हिन्दी साहित्य की अनुपम निधि है।
प्रेमाख्यानक काव्यों में पाँच चौपाई के बाद एक दोहा देने की परम्परा निम्नांकित कृतियों में पायी जाती है-
(1) मृगावती, (2) मधुमालती, (3) इन्द्रावती, (4) सत्यवती कथा, (5) चंदायन, (6) आलमकृत माधवानल कामकंदला में।
प्रेमाख्यानक काव्यों में सात चौपाई के बाद एक दोहा देने की परम्परा निम्नांकित कृतियों में पायी जाती है- (1) पद्मावत, (2) चित्रावली।
सूफी कवि उसमान चिश्ती वंश परम्परा में 'हाजीबाबा' के शिष्य थे और बादशाह जहाँगीर के समकालीन थे।
उसमान कृत 'चित्रावली' में नेपाल के राजकुमार 'सुजान' और रूपनगर की राजकुमारी 'चित्रावली' की प्रेमकथा का वर्णन है।
'चित्रावली' में अंग्रेजों के द्वीप का भी वर्णन किया गया है।
नूर मुहम्मद दिल्ली के बादशाह मुहम्मदशाह के समकालीन थे।
नूर मुहम्मद ने फारसी भाषा में 'रौजतुल हकायक' नामक ग्रन्थ की रचना की।
नूर मुहम्मद कृत 'इंद्रावती' में कालिंजर के राजकुमार राजकुँवर और आगमपुर की राजकुमारी इंद्रावती की प्रेम कहानी है।
आचार्य शुक्ल ने नूर मुहम्मद कृत 'अनुराग बासुरी' की निम्न विशेषताओं का उल्लेख किया है-
(1) इसकी भाषा सूफी रचनाओं से बहुत अधिक संस्कृतगर्भित है।
(2) हिन्दी भाषा के प्रति मुसलमानों का भाव।
(3) शरीर, जीवात्मा और मनोवृत्तियों को लेकर पूरा अध्यवसित रूपक (एलेगरी) खड़ा करके कहानी बाँधी है।
(4) चौपाइयों के बीच-बीच में इन्होंने दोहे न लिखकर बरवै रखे हैं।
आचार्य शुक्ल ने नूर मुहम्मद कृत 'इन्द्रावती' को सूफी आख्यान काव्यों की अखण्डित परम्परा की समाप्ति माना है।
आचार्य शुक्ल ने सूफी या प्रेममार्गी शाखा का एकमात्र हिन्दू कवि सूरदास नामक एक पंजाबी को माना है जो शाहजहाँ का समकालीन था तथा 'नल-दमयंती' नामक प्रेम कथा लिखी।
महत्वपूर्ण प्रेमाख्यानक काव्य और उसके नायक-नायिका निम्न हैं-
काव्य
नायक-नायिका
चन्दायन
लोर (लोरिक)-चन्दा
सत्यवती कथा
राजकुमारी सत्यवती और राजकुमार ऋतुपर्ण
मृगावती
राजकुमार-मृगावती
पद्मावत
रत्नसेन - पद्मावती और पत्नी नागमती
मधुमालती
मधुमालती-मनोहर और प्रेमा-ताराचन्द
माधवानल कामकंदला
कामकंदला-माधव
रूपमंजरी
विवाहिता रूपमंजरी कृष्ण
रतनसेन
रम्भा-सोमा
सूफी कवियों की महत्वपूर्ण काव्य पंक्तियाँ
(अ) कुतुबन
रूकमिनि पुनि वैसहि मरि गई। कुलवंती सत सों सति भई ॥ बाहर वह भीतर वह होई। घर बाहर को रहै न जोई ॥ विधि कर चरित न जानै आनू। जो सिरजा सो जाहि नियानू ॥
(ब) मंझन
(1) देखत ही पहिचानेठ तोहीं। एही रूप जेहि छंदर्यो मोही ॥
एही रूप बुत अहै छपाना। एही रूप रब सृष्टि समाना ॥
एही रूप सकती और सीऊ। एही रूप त्रिभुवन कर जीऊ ॥ एही रूप प्रकटे बहु भेसा। एही रूप जग रंक नरेसा ॥
(2) बिरह अवधि अवगाह अपारा। कोटि माहिं एक परै त पारा॥ बिरह कि जगत अविरथा जाही। बिरह रूप यह सष्टि सबाही ॥
भक्तिकाल
नैन बिरह अंजन जिन सारा। बिरह रूप दरपन संसारा ॥ कोटि माहिं बिरला जग कोई। जाहि सरीर बिरह दुख होई ॥ रतन की सागर सागरहिं, जगमोतो जग कोइ। चंदन की बन बन उपजै, बिरह की तन तन होई ?
(स) मलिक मुहम्मद जायसी
(1) विक्रम धँसा प्रेम के बारा। सपनावती कहँ गयठ पतारा ॥
(2) आदि अंत जसि कथ्था अहै। लिखि भाषा चौपाई कहै।
(3) औ मन जानि कवित्त अस कीन्हा। मकु यह रहे जगत मह चीन्हा॥
(4) तन चितउर मन राजा कीन्हा। हिय सिंहल बुद्धि पदमिनी चीन्हा ॥ गुरु सुवा जेहि पंथ देखावा। बिनु गुरु जगत को निरगुनपावा ॥ नागमती यह दुनिया धंधा। बांचा सोइ नएहि चित बंधा ॥
(5) प्रेम कथा एहि भाँति विचारहु। बूझि लेउ जो बूझै पारहु ॥
(6) सरवर तीर पद्मिनि आई। खोंपा छोरि केस मुकलाई ॥
(7) वरुनिबान अस ओपहँ, बेधे रन बन दाख । सौजहि न सब रोवाँ, पंखिहि तन सब पाँख ॥
(8) ओहि मिलान जो पहुँचै कोई। तब हम कहब पुरुष भल होइ ॥ है आगे परबत कै बाटा। विषम पहार अगम सुठि घाटा ॥
(१) मानुस प्रेम भयउ बैकुंठी। नाहित काह छार भई मूठी ॥
(10) छार उठाय लीन्ह एक मूँठी। दीन्ह उड़ाइ पिरिथिमी झूठी ॥
(11) मुहमद जीवन जल भरन रहट घरी के रीति। घरी सो आई ज्यों भरी ढरी जनम गा नीति ॥
(12) होतहि दरस परस भा लोना। धरती सरग भयउ सब सोना ॥
(13) साजन लेइ पठावा आयसु जाइ न भेंट। तन मन जोबन साजि कै देह चली लेइ भेंट ॥
(14) पिउ सो कहहु संदेसड़ा हे भौंरा हे काग ! सो धनि विरहे जरि मुई तेहिक धुँआ हम लाग।
(15) जौहर भइ इस्तिरी पुरुष गये संग्राम। पातसाहि गढ चूरा, चितउर भा इस्लाम ॥
(16) नयन जो देखा कँवल भा निरमल नीर सरीर। हँसत जो देखा हंस भा, दसन जोति नग हीर ॥
(17) फिर फिर रोइ कोइ नहीं बोला। आधी रात विहंगम बोला ॥
(18) बरसै मघा झंकोरी झंकोरी। मोर दोउ नयन चुवइ जनु ओरी ॥
(19) मुहम्मद कवि कहि जोरि सुनावा। सुना जो प्रेम पीर गा पावा ॥
(20) जे मुख देखा तेई हँसा। सुना तो आये आसु ॥
(21) कवि विआस रस कँवला पूरी। दूरिहि निअर निअर भा दूरी ॥
(22) जेहि के बोल बिरह के धाया। कहु केहि भूख कहाँ ते छाया ॥
एवं भाषा का वस्तुनिष्ठ इतिहास
(23) भयउँ बिरह जलि कोइलि कारी। डार डार जो कूकि पुकारी ॥
(24) प्रेम पहार कठिन विधि गढ़ा। सो पे चढि जो सिर सौ चढा ॥ पंथ सूरि कर उठा अंकूरू। चोर चढ़े की चढ़ मंसूरू ॥
विविध
सूफी कवियों ने 'परमात्मा' को 'स्त्री' तथा 'आत्मा' को 'पुरुष' रूप में स्वीकार किया जबकि संत कवियों ने इसके विपरीत साधना की।
सूफी कवियों की प्रेम-पद्धति में 'इश्क मजाजी' (लौकिक प्रेम) से 'इश्क हकीकी' (अलौकिक प्रेम) तक पहुँचने की कोशिश है।
सूफी सिद्धान्त में 'इश्क हकीकी' तक पहुँचने के लिए साधक को निम्नलिखित चरण एवं अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है-
मनुष्य के चार विभाग
चार जगत
साधक की चार अवस्था
नफ्स (विषय भोगवृत्ति इन्द्रिय)
आमलेनासूत (भौतिक)
शरीअत (धमग्रन्थों का विधि निषेध)
रूह (आत्मा या चित्त)
आमले मलकूत (चित्त जगत)
तरीकत (हृदय की शुद्धता)
कल्ब (हृदय)
आमलेजबरूत (आनंदमय जगत)
हकीकत (भक्ति उपासना से सत्यवोध)
अक्ल (बुद्धि)
आमले लाहत (ब्रह्म जगत)
मारफत (सिद्धावस्था या आत्मा-परमात्मा मिलन)
सगुण धारा
सगुण भक्ति: उद्भव एवं विकास
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार, "श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है।"
भक्ति साहित्य में प्रस्थानत्रयी 'उपनिषद', 'गीता' तथा 'ब्रह्मसूत्र' को कहा गया है।
'नारद भक्ति सूत्र' में भक्ति के ग्यारह (11) भेद माने गये हैं, जो निम्न है- (1) गुणमाहात्म्यासक्ति, (2) रूपासक्ति, (3) पूजासक्ति, (4) स्मरणासक्ति, (5) दास्यासक्ति, (6) सख्यासक्ति, (7) कांतासक्ति, (8) वात्सल्यासक्ति, (9) आत्मनिवेदनासक्ति, (10) तन्मयतासक्ति, (11) परम विरहासक्ति।
भागवत पुराण में नवधा भक्ति का उल्लेख है। जो निम्नलिखित है- (1) श्रवण, (2) कीर्तन, (3) स्मरण, (4) पादसेवन, (5) अर्चन, (6) वंदन, (7) दास्य, (8) सख्य और (9) आत्मनिवेदन।
। वैष्णव धर्म में सर्वप्रथम भागवत धर्म आता है। भागवत धर्म के बाद क्रमशः सात्वत, पंचरात्र तथा नारायणी धर्म का उदय होता है।
सात्वत धर्म के प्रवर्तक वासुदेव माने जाते हैं।
पोचरात्र में 'रात्र' शब्द का अर्थज्ञान है। परमतत्त्व, मुक्ति, भुक्ति, योग तथा विषय (संसार) - इन पंचविध ज्ञान-वचन को पांचरात्र धर्म कहते हैं।
भक्तिकाल
113
वैष्णव भक्ति का उदय दक्षिण भारत में हुआ। दक्षिण भारत में ही सगुण भक्ति की उत्पत्ति स्वीकार की जाती है।
वैष्णव भक्ति का आधार ग्रन्थ 'भागवत महापुराण' माना जाता है।
वैष्णव भक्ति के आदि आचार्य रामानुजाचार्य माने जाते हैं।
वैष्णव भक्ति के सम्प्रदाय, आचार्य, दर्शन निम्नलिखित हैं-
सम्प्रदाय
प्रवर्तक
जन्म-मृत्यु
गुरु
दर्शन
जन्मस्थान
श्री
रामानुजाचार्य
1016-1127 ई०
यादव प्रकाश
विशिष्टय
कांचीपुरम्
द्वैतवाद
ब्रह्म
मध्वाचार्य
1199
द्वैतवाद
(द० भा०)
रूद्र
विष्णु स्वामी
1300
शुद्धाद्वैतवाद
बेलिग्राम
सनकादि
निम्बार्काचार्य
1114-1162
ई०
नारद मुनि
द्वैताद्वैतवाद
निम्बापुर
रूद्र
बल्लभाचार्य
1478-1530 ई०
विष्णु स्वामी
शुद्धाद्वैतवाद
(वेल्लरीजिला)
चंपारन (रायपुर जि०)
'रुद्र' सम्प्रदाय के आदि प्रवर्तक विष्णु स्वामी हैं किन्तु कई विद्वान इसका प्रवर्तक वल्लभाचार्य को मानते हैं।
दक्षिण भारत के वैष्णव भक्तों को आलवार कहते हैं। आलवारों ने कृष्ण और राम दोनों की आराधना की है।
आलवारों का सम्बन्ध दक्षिण भारत के केरल प्रान्त से था। इनकी संख्या 12 है, जो अग्रांकित है।
तमिल नाम
1. मोयगै आलवार
2. भूतन्तालवार
3. पैयालवार
4. नम्न आलवार
5. नम्मालवार
6. मधुर कवि आलवार
7. कुलशेख आलवार
8. पेरो आलवार
9. आंडाल आलवार (महिला)
10. तोडर डिप्पोडो आलवार
11. तिरुप्पान आलवार
12. तिरुमंगै आलवार
संस्कृत नाम
सरोयोगिन्
भूतयोगिन्
मह्योगिन या भ्रांतियोगिन
भक्तिसार
शुठकोपाचार्य
मधुर कवि
कुल शेखर
विष्णु चरित
गोदा
भक्ताघ्रिरेणु
योगिवाहन
परकाल
आलवार संतों में सर्वाधिक लोकप्रिय शठकोप थे। इन्होंने निम्न पुस्तकों की रचना की है- (1) तिरुवायमोलि, (2) तिरुविरुतम, (3) तिरुवर्ग शरियम तथा (4)
पेरियतिरुवन्दादि, (5) सहस्त्रगीति।
स्तुनिष्ठ इतिहास
सातवें आलवार संत केरल के चेरवंशी राजा कुलशेखर ने 'पेरुमाल तिरुभोवि' नामक ग्रन्थ की रचना की।
आलवार सन्तों के लोक प्रचलित चार हजार पदों को 'नलियार दिव्य प्रबन्धम' शीर्षक से चार भागों में रंगनाथ मुनि या रघुनाथाचार्य ने संकलित किया।
रघुनाथाचार्य या रंगनाथ मुनि को श्री सम्प्रदाय का प्रथम आचार्य माना जाता है। इनका जन्म सन् 824 ई० में तथा मृत्यु 924 ई० में हुआ।
रंगनाथ मुनि ने 'न्यायतत्व' नामक एक दार्शनिक ग्रन्थ संस्कृत में लिखा।
श्री सम्प्रदाय के प्रवर्तक रामानुजाचार्य के पूर्ववर्ती आचार्य काल क्रमानुसार निम्नलिखित हैं-रंगनाथमुनि पुण्डरीकाक्ष
राम मिश्र
यामुनाचार्य रामानुजाचार्य
श्री सम्प्रदाय के चतुर्थ आचार्य यमुनाचार्य (916-1040 ई०) ने 'सिद्धि त्रय', 'आगम प्रामाण्य', 'गीतार्थ संग्रह' आदि दार्शनिक ग्रन्थों की रचना की।
'श्री सम्प्रदाय' में राम को आराध्य माना जाता है तथा 'ब्रह्मः', 'रूद्र' एवं 'सनकादि' में कृष्ण को आराध्य स्वीकार किया जाता है।
अहिंसावाद और प्रपत्तिवाद वैष्णव सम्प्रदाय का वैशिष्ट्य है।
प्रपत्तिवाद को शरणागति भी कहा जाता है। वैष्णव सम्प्रदाय में प्रपत्ति या शरणागति के छह अंग माने गये हैं, जो निम्न हैं-
(1) अनुकूल का संकल्प,
(2) प्रतिकूल का त्याग,
(3) रक्षा का विश्वास,
(4)
गोतृत्ववरण,
(5) आत्म निक्षेप तथा
(6) कार्पण्यता।
शंकराचार्य का जन्म 8वीं शती के आसपास केरल में हुआ था।
शंकराचार्य ने 'अद्वैतवेदान्त' की स्थापना की तथा प्रस्थानत्रयी का भाष्य किया।
शंकराचार्य के गुरु का नाम गोविन्द योगी था। शंकराचार्य ने स्मार्त सम्प्रदाय का प्रवर्तन किया जो पंचदेवोपासना पर आधारित है।
कुछ विद्वान शंकराचार्य को 'प्रच्छन्न बौद्ध' भी कहते हैं क्योंकि इनके गुरु के गुरु गौड़पाद बौद्ध थे।
दक्षिण के शैव भक्तों को 'नयनार' कहा जाता है जिनकी संख्या 63 बताई जाती है।
दक्षिण के आल्वार संतों की भाषा तमिल थी।
आलावारों में प्रसिद्ध एकमात्र महिला आन्दाल (गोदा) को दक्षिण की मीरा कहा जाता है।
सगुणधारा [ रामभक्ति शाखा]
आलवार भक्तों में शठकोप को रामभक्ति का प्रथम कवि माना जाता है। इनकी पुस्तक 'सहस्रगीत' में राम की उपासना का उल्लेख है।
सातवें आलवार कुलशेखर भी राम के अनन्य भक्त थे।
'श्री सम्प्रदाय' के आदि आचार्य रंगनाथ मुनि को रामभक्ति परम्परा का प्रथम आचार्य माना जाता है।
। 'श्री सम्प्रदाय' में विष्णु और लक्ष्मी की उपासना मान्य है।
भक्तिकाल
रामानुजाचार्य ने 'अद्वैत वेदान्त' का खण्डन कर 'विशिष्टाद्वैतवाद' की स्थापना की जिसके अनुसार ब्रह्म के ही अंश जगत के सारे प्राणी हैं।
आलवार शठकोप के पाँच पीढ़ी के पीछे रामानुजाचार्य हुए।
७-रामानुजाचार्य को शेष या लक्ष्मण का अवतार माना जाता है।
'श्री सम्प्रदाय' की प्रधान गद्दी तोताद्रि में स्थापित है।
रामानुजाचार्य की 14वीं या 15वीं शिष्य-परम्परा में सुप्रसिद्ध स्वामी रामानन्द हुए।
हिन्दी में रामकाव्य के पुरस्कर्ता रामानन्द माने जाते हैं।
हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है- "मध्य युग की समग्र स्वाधीन चिन्ता के गुरु रामानन्द ही थे।"
रामानन्द के गुरु का नाम राघवानंद था।
हजारी प्रसाद द्विवेदी ने रामानन्द को आकाश धर्मा गुरु कहा है।
राघवानन्द ने उत्तर भारत में रामभक्ति का प्रवर्तन किया परन्तु इसे प्रतिष्ठित और प्रसारित रामानन्द ने किया।
रामानन्द 14वीं शती में वर्तमान थे। इनके रचित प्रमुख ग्रन्थ हैं- (1) वैष्णवमताब्ज भास्कर, (2) श्री रामार्चन पद्धति, (3) योगचिंतामणि, (4) रामरक्षास्तोत्र, (5) आनन्दभाष्य आदि।
रामानन्द रचित प्रमुख काव्य पंक्ति निम्नांकित है-
(1) आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की। जाके बल भर ते महि काँपै। रोग सोग जाकी सिमा न चांपै ॥ (2) कहाँ जाइए हो धरि लागो रंग। मेरो चंचल मन भयो अपंग ॥
रामानन्द ने रामावत सम्प्रदाय' की स्थापना की। इस सम्प्रदाय के लोग 'वैरागी' नाम से प्रसिद्ध हुए।
रामानन्द कृत 'वैष्णवमताब्जभास्कर' में उनके शिष्य सुरसुरानंद ने तौ प्रश्न किए हैं जिनके उत्तर में रामतारक मंत्र की विस्तृत व्याख्या, अहिंसा का महत्व इत्यादि विषय है।
रामानन्द के 12 शिष्य थे। आचार्य शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी एवं रामकुमार वर्मा के अनुसार ये निम्नलिखित हैं-
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
अनन्तानन्द
सुखानन्द
सुरसुरानन्द
नरहर्यानन्द
भावानन्द
पीपा
कबीरदास
सेन
धना
हजारी प्रसाद द्विवेदी
आशानन्द
सुखानन्द
सुरसुरानन्द
परमानन्द
भवानंद
पीपा (राजपूत)
कबीर (जुलाहा)
सेना (नाई)
धन्ना (जाट)
डॉ० रामकुमार वर्मा
अनन्तानन्द
सुखानन्द
सुरेश्वरानन्द
नरहरियानन्द
भावानन्द
योगानन्द
पीपा
कबीर
सेन
रैदास
रैदास (चमार)
धना
पद्मावती
महानन्द
रैदास
सुरसरी
का वस्तुनिष्ठ इतिहास
श्री आनन्द
पद्मावती
अनन्तानन्द के शिष्य कृष्णदास पयहारी सर्वप्रथम गलता (अजमेर राज्य) में रामानन्द सम्प्रदाय की गद्दी स्थापित की।
रामानन्दी सम्प्रदाय में गलता को उत्तर भारत का 'उत्तर तोताद्रि' कहा जाता है।
गलता में पहले नाथपंथी योगियों का अधिकार था।
अजमेर के राजा पृथ्वीराज पयहारीजी के शिष्य बने। पयहारी के दो प्रसिद्ध शिष्य हुए- (1) अग्रदास और (2) कील्हदास।
कील्हदास ने रामभक्ति में योगाभ्यास का मेल कर एक 'तपसी शाखा' की स्थापना की।
कील्हदास के शिष्य द्वारकादास थे। इनके सम्बन्ध में नाभादास ने भक्तमाल में लिखा है-"अष्टांग जोग तन त्यागियो द्वारकादास, जानै दुनी"
अग्रदास ने रामभक्ति परम्परा में रसिक भाव का समावेश कर 'रसिक सम्प्रदाय' की स्थापना की।
रसिक सम्प्रदाय के प्रमुख कवि निम्न हैं- (1) बालकृष्ण 'बाल अली', (2) रसमाला, (3) रामशरण 'प्रेमकली', (4) प्रयागदास, (5) रामगुलाम द्विवेदी, (6) रीवाँ नरेश महाराज रघुराज सिंह।
अग्रदास ने अपनी गद्दी जयपुर के पास रैवास में स्थापित किया। रसिक सम्प्रदाय में इन्हें 'अग्रअली' भी कहा जाता है।
अग्रदास द्वारा रचित प्रमुख ग्रन्थ निम्नलिखित है-
पुस्तक
विषयवस्तु .
हितोपदेश उपखाणा बावनी
ध्यान मंजरी
रसिकोपासना का सिद्धान्त ग्रन्थ
रामध्यानमंजरी
कुंडलिया
नीतिपरक
अष्टयाम या रामाष्टयाम
संस्कृत भाषा में रचित सीतावल्लभ राम की दैनिक लीला का चित्रण
अग्रदास के शिष्य नाभादास जी माने जाते हैं।
विष्णुदास ग्वालियर नरेश डूंगरेन्द्र के राजकवि थे। इनके द्वारा लिखे ग्रन्थ निम्नांकित है- (1) महाभारत कथा, (2) रूक्मिणी मंत्र, (3) स्वर्गारोहण, (4) रामायण कथा।
विष्णुदास कृत 'रामायण कथा' रामकथा सम्बन्धी हिन्दी का प्रथम प्रबन्ध काव्य है।
ईश्वरदास ने 'सत्यवती कथा' (1501 ई०), 'भरत मिलाप' और 'अंगदर्पज' नामक ग्रन्थों की रचना की।
गोस्वामी तुलसीदास रामभक्ति शाखा के प्रतिनिधि कवि हैं। इनका सामान्य विवरण निम्नांकित है-
भक्तिकाल
जन्म-मृत्यु
माता-पिता
पत्नी
दीक्षा गुरु नरहर्यानन्द
शिक्षा गुरु
1532-1623 ई०
आत्माराम दूबे हुलसी
रत्नावली
शेष सनातन
तुलसीदास के जन्म स्थान के विषय में मतभेद है, जो निम्न है-
सूकर खेत (सोरों)
लाला सीताराम
गौरीशंकर द्विवेदी
हजारी प्रसाद द्विवेदी
(जिला एटा)
रामनरेश त्रिपाठी
रामदत्त भारद्वाज
गणपतिचन्द्र गुप्त
बेनीमाधव दास
राजापुर
महात्मा रघुवर दास
शिव सिंह सेंगर
(जिला बाँदा)
रामगुलाम द्विवेदी
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल तुलसीदास को 'स्मार्त वैष्णव' मानते हैं।
आचार्य शुक्ल के अनुसार 'हिन्दी काव्य की प्रौढ़ता के युग का आरम्भ' गोस्वामी तुलसीदास द्वारा हुआ।
و
तुलसीदास के महत्त्व के सन्दर्भ में विद्वानों की कही गई उक्तियाँ निम्न हैं-
विद्वान
प्रमुख कथन
नाभादास
कलिकाल का वाल्मीकि।
स्मिथ
मुगलकाल का सबसे महान व्यक्ति।
ग्रियर्सन
बुद्धदेव के बाद सबसे बड़ा लोक-नायक।
मधुसूदन सरस्वती
आंनन्दकानने कश्चिज्जडगमस्तुलसी तरुः ।
रामचन्द्र शुक्ल
कवितामंजरी यस्य रामभ्रमर भूषिता ॥
इनकी वाणी की पहुँच मनुष्य के सारे भावों व्यवहारों तक है। एक ओर तो वह व्यक्तिगत साधना के मार्ग में विरागपूर्ण शुद्ध भगवदभजन का उपदेश करती है दूसरी और लोक पक्ष में आकर पारिवारिक और सामाजिक कर्त्तव्यों का सौन्दर्य दिखाकर मुग्ध करती है।
रामचन्द्र शुक्ल
यह एक कवि ही हिन्दी को प्रौढ़ साहित्यिक भाषा सिद्ध करने के लिए काफी है।
रामचन्द्र शुक्ल
तुलसीदासजी उत्तरी भारत की समग्र जनता के हृदय मन्दिर में पूर्ण प्रेम-प्रतिष्ठा के साथ विराज रहे हैं।
हजारीप्रसाद द्विवेदी
भारतवर्ष का लोकनायक वही हो सकता है जो समन्वय करने
रामविलास शर्मा
का अपार धैर्य लेकर आया हो।
अमृतलाल नागर
मानस का हंस।
जातीय कवि।
गोस्वामी तुलसीदास रामानुजाचार्य के 'श्री सम्प्रदाय' और विशिष्टाद्वैतवाद से प्रभावित थे। इनकी भक्ति भावना 'दास्य भाव' की थी।
की वस्तुनिष्ठ इतिहास
गोस्वामी तुलसीदास की गुरु परम्परा का क्रम इस प्रकार है-
राघवानन्द रामानन्द अनन्तानन्द नरहर्यानंद (नरहरिदास) तुलसीदास 'रत्नावली' के निम्न कथन पर तुलसीदास ने वैराग्य धारण किया-
"लाज न लागत आपको दौरे आयहु साथ। धिक धिक ऐसे प्रेम को कहा कहाँ मैं नाथ ॥ अस्थि चर्म मय देह मम तामे जैसी प्रीति। तैसी जौ श्री राम महँ होति न तौ भवभीति ॥"
गोस्वामी तुलसीदास के स्नेही मित्रों में नवाब अब्दुर्रहीम खानखाना, महाराज मानसिंह, नाभादास, मधुसूदन सरस्वती और टोडरमल का नाम प्रसिद्ध है। टोडर की मृत्यु पर तुलसीदास ने कई दोहे लिखे थे जो निम्न है-
"चार गाँव को ठाकुरो मन को महामहीप। तुलसी या कलिकाल में अथए टोडर दीप ॥ रामधाम टोडर गए, तुलसी भए असोच। जियबो गीत पुनीत बिनु, यहै जानि संकोच ॥"
रहीमदास ने तुलसी के सन्दर्भ में निम्न दोहा लिखा है-सुरतिय, नरतिय, नागतिय, सब चाहति अस होय। - तुलसीदास गोद लिए हुलसी फिरें, तुलसी सो सुत होय ॥ - रहीमदास
गोस्वामी तुलसीकृत 12 ग्रन्थों को ही प्रामाणिक माना जाता है। इसमें 5 बड़े और 7 छोटे हैं।
डॉ० उदायभानु सिंह के अनुसार गोस्वामी तुलसीदास की रचनाएँ काल क्रमानुसार निम्नलिखित हैं-
(1) वैराग्य संदीपनी
(2) रामाज्ञा प्रश्न (दोहावली रामायण)
(3) रामललोनहछू
(4) जानकी मंगल
(5) रामचरित मानस
(6) पार्वती मंगल
(7) कृष्ण गीतावली
(8) गीतावली (पदावली रामायण)
(9) विनय पत्रिका (विनयावली, रामगीतावली)
(10) दोहावली
(11) बरवै रामायण (बरवा)
(12) कवितावली या कवित्तावली (हनुमानबाहुक समेत)
मंगल', 'पार्वती मंगल' और 'बरवै रामायण' को 'पंचरल' कहा जाता है। तुलसी की पाँच लघु कृतियों- 'वैराग्य संदीपनी', 'रामलला नहछू', 'जानकी
सं० 1626-27
सं० 1627-28
सं० 1628-29
सं० 1629-30
सं० 1631
सं० 1643
सं० 1643-60
सं० 1630-70
सं० 1631-79
सं० 1626-80
सं० 1630-80
सं० 1631-80
अष्टांगयोग' का उल्लेख किया है। ये आठ अंग निम्न हैं- (1) रामगीतावली, कृष्णदत्त मिश्र ने अपनी पुस्तक 'गौतम चन्द्रिका' में तुलसीदास की रचनाओं के
भक्तिकाल
(2) पदावली, (3) कृष्ण गीतावली, (4) बरवै, (5) दोहावली, (6) सुगुनमाला,
(7) कवितावली और (8) सोहिलोमंगल।
तुलसीदास की प्रथम रचना 'वैराग्य संदीपनी' तथा अन्तिम रचना 'कवितावली' को माना जाता है। 'कवितावली' के परिशिष्ट में 'हनुमानबाहुक' भी संलग्न है। किन्तु अधिकांश विद्वान 'रामलला नहछू' को प्रथम कृति मानते हैं।
गोस्वामी तुलसीदास की रचनाओं का संक्षिप्त परिचय निम्न है-
पुस्तक
काव्यरूप
भाषा
प्रयुक्त छंद
छंद सं०
मुख्य रस
काण्ड (सर्ग)
वैराग्य संदीपनी रामाज्ञा प्रश्न रामलला नहछू जानकी मंगल
मुक्तक
मुक्तक
प्रबन्ध
ब्रजभाषा अवधी
ठेठ अवधी
प्रबन्ध
अवधी
दोहा-सोरठा दोहा सोहर छंद सोहर (हंसगति) दोहा-चौपाई मंगल, हरि-गीतिका
रामचरितमानस पार्वती मंगल
प्रबन्ध
प्रबन्ध
164
अवधी अवधी
216 1074 दोह्म
भक्तिरस
7 काण्ड
कृष्णगोतावली गीतावली
गीतिकाव्य गीतिकाव्य
ब्रजभाषा ब्रजभाषा
61
वात्सल्य भक्ति भक्तिरस
7 काण्ड
विनय पत्रिका
दोहावली बरवै रामायण कवितावली
गीतिकाव्य
ब्रजभाषा
279
मुक्तक
मुक्तक
ब्रजभाषा अवधी ब्रजभाषा
दोहा-सोरठा बरवै छंद कवित्त, छप्पय
573
69
7 काण्ड
मुक्तक
7 काण्ड
'रामचरितमानस' की रचना संवत् 1631 "मैं चैत्र शुक्ल रामनवमी (मंगलवार) को हुआ। इसकी रचना में कुल 2 वर्ष 7 महीना 26 दिन लगा।
'रामाज्ञा प्रश्न' एक ज्योतिष ग्रन्थ है।
'कृष्ण गीतावली' में गोस्वामीजी ने कृष्ण से सम्बन्धी पदों की रचना की तथा 'पार्वती मंगल' में पार्वती और शिव के विवाह का वर्णन किया।
'रामचरितमानस' और 'कवितावली' में गोस्वामीजी ने 'कलिकाल' का वर्णन किया है।
कवितावली' में बनारस (काशी) के तत्कालीन समय में फैले 'महामारी' का वर्णन 'उत्तरकाण्ड' में किया गया है।
तुलसीदास ने अपने बाहु रोग से मुक्ति के लिए 'हनुमानबाहुक' की रचना की।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने 'रामचरितमानस' को 'लोकमंगल की साधनावस्था' का काव्य माना है।
'मानस' में सात काण्ड या सोपान हैं जो क्रमशः इस प्रकार हैं- (1) बालकाण्ड, (2) अयोध्याकाण्ड, (3) अरण्यकाण्ड, (4) किष्किन्धाकाण्ड, (5) सुन्दरकाण्ड,
(6) लंकाकाण्ड,
(7) उत्तरकाण्ड।
अयोध्याकाण्ड' को 'रामचरितमानस' का हृदयस्थल कहा जाता है। इस काण्ड को 'चित्रकूट सभा' को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने 'एक आध्यात्मिक घटना' की संज्ञा प्रदान की।
'चित्रकूट सभा' में 'वेदनीति', 'लोकनीति' एवं 'राजनीति' तीनों का समन्वय दिखाई देता है।
'रामचरितमानस' की रचना गोस्वामीजी ने 'स्वान्तः सुखाय' के साथ-साथ 'लोकहित' एवं 'लोकमंगल' के लिए किया है।
'रामचरितमानस' के मार्मिक स्थल निम्नलिखित है- (1) राम का अयोध्या त्याग और पथिक के रूप में वन गमन, (2) चित्रकूट में राम और भरत का मिलन, (3) शबरी का आतिथ्य, (4) लक्ष्मण को शक्ति लगने पर राम का विलाप, (5) भरत की प्रतीक्षा आदि।
तुलसी ने 'रामचरितमानस' की कल्पना 'मानसरोवर' के रूपक के रूप में की है। जिसमें 7 काण्ड के रूप में सात सोपान तथा चार वक्ता के रूप में चार घाट हैं।
सप्तसोपान 'मानस' के चारों घाटों का संक्षिप्त विवरण निम्न है-काकभुशुडि-गरुड़-संवाद उपासना घाट पनघट
शिव-पार्वती-संवाद ज्ञानघाट राजघाट (प्रथम वक्ता: श्रोता)
रामयश जल से परिपूर्ण रामचरितमानस
तुलसी-संत-संवाद प्रपत्तिघाट : गायघाट
याज्ञवल्क्य-भरद्वाज-संवाद कर्मघाट : पंचायती घाट
'मानस रूपक' तुलसी साहित्य का सबसे बड़ा रूपक है।
अलंकार-योजना के सम्बन्ध में तुलसी को प्राप्त उपाधियाँ निम्न है-
उपाधि के प्रस्तोता
प्राप्त उपाधि
लाला भगवानदीन और बच्चन सिह
रूपकों का बादशाह
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
अनुप्रास का बादशाह
डॉ० उदयभानु सिह
उत्प्रेक्षाओं का बादशाह
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है, "तुलसी का सम्पूर्ण काव्य समन्वय की विराट चेष्टा है।"
'रामचरितमानस' पर सर्वाधिक प्रभाव 'अध्यात्म रामायण' का पड़ा है।
तुलसीदास ने सर्वप्रथम 'मानस' को रसखान को सुनाया था।
'रामचरितमानस' की प्रथम टोका अयोध्या के बाबा रामचरणदास ने लिखो।
'रामचरितमानस' के सन्दर्भ में रहीमदास ने लिखा है-रामचरित मानस विमल, सन्तन जीवन प्रान। हिन्दुवान को वेद सम, यवनहि प्रकट कुरान ॥
भिखारीदास ने तुलसी के सम्बन्ध में लिखा है-तुलसी गंग दुवौ भए सुकविन के सरदार। इनके काव्यन में मिली भाषा विविध प्रकार ॥
अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' ने इनके सम्बन्ध में लिखा है-'कविता करके तुलसी न लसे, कविता पा लसी तुलसी की कला'
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है- "भाषा पद्य के स्वरूप को लेते हैं तो गोस्वामीजी के सामने कई शैलियाँ प्रचलित थीं जिनमें से मुख्य हैं- (क) वीरगाथा काल की छप्पय पद्धति, (ख) विद्यापति और सूरदास की गीत पद्धति, (ग) गंग आदि भाटों की कवित्त सवैया पद्धति, (घ) कबीरदास की नीति सम्बन्धी बानी की दोहा पद्धति जो अपभ्रंश से चली आती थी और (ङ) ईश्वरदास की दोहे चौपाई वाली प्रबन्ध पद्धति। इस प्रकार भाषा के दो रूप (अवधी और ब्रज) और रचना की पाँच प्रमुख शैलियाँ साहित्य क्षेत्र में गोस्वामीजी को मिली।"
नाभादास गोस्वामी तुलसीदास के समकालीन रामभक्त कवि हैं। इनका जन्म अनुमानतः 1570 के आस-पास हुआ था।
नाभादास ने हिन्दी में भक्तमाल की परम्परा का सूत्रपात किया। इनके गुरु का नाम 'अग्रदास' था।
डॉ० ग्रियर्सन ने नाभादास का उपनाम 'नारायणदास' बताया है।
नाभादास ने सन् 1585 ई० (सं० 1642) के आसपास ब्रजभाषा में 'भक्तमाल' की रचना की।
'भक्तमाल' में 200 कवियों का जीवनवृत्त और उनको भक्ति की महिमासूचक बातों को 316 छप्पयों में लिखा गया है।
सन् 1712 ई० में प्रियादास ने 'भक्तमाल' की टीका 'रसबोधिनी' शीर्षक से ब्रजभाषा के कवित्त सवैया शैली में लिखी।
नाभादास ने रामचरित से सम्बन्धित दो अष्ट्यामों की रचना को जो संस्कृत के चम्पूकाव्य शैली में रचित है।
नाभादास ने 'अष्टयाम' की रचना श्रृंगार भक्ति अथवा रसिक भावना लेकर की है। इसकी अन्य विशेषता निम्न है-
पुस्तक
भाषा
विशेषता
अष्टयाम
ब्रजभाषा
गद्य में राम और सीता के आठों पहरों का वर्णन
अष्टयाम
अवधी
दोहा चौपाई शैली में राम-सीता का वर्णन
नाभादास द्वारा विभिन्न कवियों के सन्दर्भ में 'भक्तमाल' में कही गई महत्त्वपूर्ण पंक्तियाँ निम्नलिखित हैं-
कवि
महत्वपूर्ण काव्य पंक्ति
कबीरदास
कबीर कानि राखी नहीं वर्णाश्रम षट्दरसनी
मीराबाई
तुलसीदास
निरअंकुश अति निडर, रसिक जस रसना गायो त्रेता काव्य निबन्ध करी सत कोटि रसायन।
इक अक्षर उच्चरै ब्रह्महत्यादि परायन। अब भक्तन सुख दैन बहुरि लीला बिस्तारी। रामचरन रस मत्त रहत अहनिसि व्रतधारी ॥ संसार अपार के पार को सुगम रूप नौका लियो।
सूरदास
कलि कुटिल जीव निस्तारहित वाल्मीकि तुलसी भयो ॥
उक्ति, चोज, अनुप्रास, वरन, अस्थिति अति भारी। वचन, प्रीति निर्वाह, अर्थ अद्भुत तुकधारी। विमल बुद्धि गुन और को, जो वह गुन स्वननि धेरै। 'सूर' कवित सुनि कौन कवि जो नहि सिर चालन करै ॥
नन्ददास
लीला-पद-रस-रीति-ग्रन्थ-रचना में नागर।
सरस-उक्ति-युत-युक्ति, भक्ति-रह-गान-उजागर चंद्रहास-अग्रज-सुहृद, परम प्रेम-पथ में पगे। नन्ददास आनन्दनिधि, रसिक सुप्रभु-हित-रंगमगे ॥
'अष्टयाम' में नाभादास ने लिखा है-
अवधपुरी की शोभा जैसी। कहि नहि सकहि शेष श्रुति तैसी ॥
केशवदास का जन्म बुन्देलखण्ड के ओरछा नामक नगर में सन् 1555 ई० में और
मृत्यु सन् 1617 ई० में हुआ।
केशवदास का उपनाम वेदान्ती मिश्र था और ये निम्बार्क सम्प्रदाय में दीक्षित थे।
केशवदास ओरछा नरेश महाराज रामसिंहके भाई इन्द्रजीत सिंह के गुरु और
राज्याश्रित कवि थे।
केशवदास की रचनाओं का काल क्रमानुसार संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है-
पुस्तक
वर्ष ई.
अध्याय
प्रकार
विशेषता/विषय
रसिक प्रिया
1591
16 प्रभाव
रीतिग्रन्थ
रस (श्रृंगार) का वर्णन
रामचन्द्रिका
1601
39 प्रकाश
प्रवन्ध
राम के चरित्र पर आधारित
कविप्रिया
1601
16 प्रकाश
रीतिग्रन्थ
अलंकारों का वर्णन
रतन बावनी
1607
53 छंद
प्रवन्ध
डिंगल शैली का एक राजनीतिक ग्रन्थ
वीरसिंह देव चरित
1607
33 प्रकाश
प्रबन्ध
वीरसिह देव पर आधारित ऐतिहासिक काव्य
विज्ञान गीता
जहाँगीर जस चन्द्रिका
1610
21 प्रभावः
प्रबन्ध
प्रबोधचन्द्रोदय का अनुवाद
नखशिख
रीतिग्रंथ
1612
प्रवन्ध
जहाँगीर के दरबार का वर्णन
छंदमाल
रीतिग्रंथ
राधा के अंगों-उपांगों का वर्णन
छन्दों का वर्णन
आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, डॉ० नगेन्द्र और गणपतिचन्द्र गुप्त प्रभृति विद्वानों ने केशवदास को हिन्दी में रीतिकाव्य का प्रवर्तक माना है।
'कविप्रिया' रीति ग्रन्थ की रचना इन्द्वजीत सिंह की एकनिष्ठ प्रेमिका गणिका (वेश्या) 'प्रवीण राय' को शिक्षा देने के लिए की गयी थी।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल केशव को अलंकारवादी मानते हैं। केशवदास ने स्वयं लिखा है-
जदपि सुजति सुलच्छनी, सुवरन सरस सुवृत्त। भूषन बिनु न विराजई, कविता वनिता मित्त ॥
केशवदास भामह, दंडी और उद्भट के अनुयायी थे।
ऐसा माना जाता है कि केशवदास ने 'रामचन्द्रिका' की रचना तुलसीदास के 'रामचरितमानस' की प्रतिस्पर्धा में एक रात में की।
गुमान कवि ने 'रामचन्द्रिका' की प्रतिस्पर्धा में 'कृष्णचन्द्रिका' लिखी।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने केशवदास की कटु आलोचना करते हुए लिखा है, "केशव को कवि हृदय नहीं मिला था। उनमें वह सहृदयता और भावुकता न थी जो एक कवि में होनो चाहिए। वे संस्कृत साहित्य से सामग्री लेकर अपने पाण्डित्य और रचना कौशल की धाक जमाना चाहते थे।"
डॉ० विजयपाल सिंह ने केशवदास को 'कोर्ट का कवि' कहा है।
केशवदास कृत रामचन्द्रिका पर प्रसन्नराघव, हनुमन्नाटक, अनर्घराघव कादम्बरी तथा नैषधचरित का प्रभाव पड़ा है।
आलोचकों के केशवदास व रामचन्द्रिका के सम्बन्ध में निम्नांकित कथन हैं-
आलोचक
प्रमुख कथन
कवि को दीन न चहै विदाई।
पूछे केसव की कविताई ॥
नाभादास
उडगन केशवदास
रामचन्द्र शुक्ल
कठिन काव्य का प्रेत
रामस्वरूप चतुर्वेदी
रामचन्द्रिका छन्दों का एक अजायबघर है।
सेनापति का जन्म सन् 1589 ई० के आसपास माना जाता है। इनके गुरु का नाम 'हीरामणि दीक्षित' था।
सेनापति द्वारा रचित दो ग्रन्थ है-
(1) कवित्त रत्नाकर- इसमें पाँच तरंग और 394 छंद में राम कथा का वर्णन है।
(2) काव्य कल्पद्रुम- इसे एक रीति ग्रन्थ माना जाता है।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने सेनापति के सन्दर्भ में लिखा है- 'ये बड़े ही सहृदय कवि थे। ऋतु वर्णन तो इनके जैसा और किसी श्रृंगारी कवि ने नहीं किया।'
सेनापति ब्रजभाषा के कवि हैं और इनका सर्वाधिक प्रिय अलंकार 'श्लेष' है।
अन्य राम भक्त कवि निम्नांकित हैं-
कवि
रचनाएँ
प्राणचन्द चौहान
रामायण महानाटक (1610 ई०)
माधवदास चरण
(1) रामरासो (1618),
(2) अध्यात्म रामायण (1624 ई०)
हृदय राम
हनुमन्नाटक (1623 ई०)
रायमल्ल पांडे
हनुमच्चरित (1639 ई०)
नरहरि बारहट
पौरुषेय रामायण
लालदास
अवध विलास (1643 ई०)
कपूर चन्द्र त्रिखा
रामायण (1646 ई०)
'रामायण महानाटक' एक संवादात्मक प्रबन्ध काव्य है जिसमें दोहा-चौपाई की प्रधानता है।
हृदयराम कृत 'हनुमन्नाटक' पर संस्कृत के 'हनुमन्नाटक' का सर्वाधिक प्रभाव है। इसका एक नाम 'रामगीत' भी है।
'पौरुषेय रामायण' नरहरिकृत 'चतुर्विशति अवतार चरित्र' नामक विशाल ग्रन्थ का एक अंश है।
कपूरचन्द्र त्रिखा कृत 'रामायण' गुरुमुखी लिपि में लिखी 145 छंदों की ब्रजभाषा की कृति है।
रामभक्ति शाखा के कवियों की प्रमुख काव्य पंक्तियाँ
(क) रामानन्द
(1) आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्टदलन रघुनाथ कला की ॥
(2) जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥
(ख) अग्रदास
(1) कुण्डलललित कपोल जुगल अस परम सुदेसा।
(2) मेचक कुटिल विसाल सरोरुह नैन सुहाये, मुख पंकज के निकट मनौ अलि छौन छाये ॥
(3) पहरे राम तुम्हारे सोवत। मैं मतिमंद अंध नहि जोवत ॥
(ग) गोस्वामी तुलसीदास
'दोहावली' से
(1) हिय निर्गुन नयनन्हि सगुन, रसना राम सुनाम । मनहुँ परट-संपुट लसत, तुलसी ललित ललाम ॥
(2) एक भरोसे एक वल एक आस विस्वास । एक राम घन श्याम हित चातक तुलसीदास ॥
(3) साखी सबदी दोहरा, कहि किहनी उपखान। भगति निरूपहि भगत कलि निंदहि बेद पुरान ॥
(4) का भाखा का संस्कृत प्रेम चाहिए साँचु। का जुआवै कामारी का लै करै कमाचु।
'कवितावली' से
(5) गोरख जगायो जोगु, भगति भगायो लोगु। निगम नियोगते, सो केलि ही छरो सो है ॥
(6) धूत कहो अवधूत कहौ, रजपूत कहाँ जुलहा कहौ कोऊ। काहू की बेटी सौं बेटा न ब्याहब काहू की जाति बिगार न सोऊ ॥
(7) खेती न किसान को भिखारी को न भीख भली।
(8) माँगी के खइबी मसीत को सोइबो, लेवे को एक न दैबे को दोऊ ॥
(9) आगि बडवागि ते बड़ी है आगि पेट की
(10) अवधेस के द्वारे सकारें गई सुत गोद कै भूपति लै निक से।
(11) पुरतें निकसी रघुवीर बधू धरि धीर दए मग में डग द्वै ॥
(12) बालधी विसालबिकराल, जवाल जाल मानो, लंक लोलिबे को काल रसना पसारी है ॥
(13) झूठो है, झूठो है, झूठो सदा जुग, संत कहंत जे अंतु लहा है।
(14) मातु-पिता जग जाइ तज्यो बिधि हूँ न लिखी कछु भाल भलाई ॥
(15) अंतर जामिहुतें बड़े बाहेरजामि हैं राम जे नाम लियेतें।
(16) लालची ललात, बिललात द्वार-द्वार दीन बदन मलीन, मन मिटै ना बिसूरना ॥
(17) प्यासेहूँ न पावै बारि, भूखे न चनक चारि, चाहत अहारन पहार, दारि घूरना ॥
(18) आश्रम-बरन कलि बिबस बिकल भए निज-निज मरजाद मोटरी-सी डार दी ॥
'विनय पत्रिका' से
(19) अबलों नसानी, अब न नसैहाँ। राम कृपा भव निसा सिरानी, जागे फिरि न डसैहाँ ॥
(20) ऐसो को उदार जग माहीं। बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर राम सरिस कोउ नाहीं ॥
(21) कबहुँक अंब, अवसर पाइ। मेरिऔं सुधि धाइबी कछु करुन कथा चलाइ ॥
(22) कबहुँक हौ यहि रहनि रहौंगो। परुष बचन अति दुसह श्रवन सुनि तेहि पावक न दहीँगो ॥
(23) केसव! कहि न जाइ का कहिये। सून्य भीति पर चित्र रंग नहिं, तनु बिनु लिखा चितेरे ॥
(24) जाके प्रिय न राम बैदेही। तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही ॥
(25) माधव ! मो समान जग माहीं। सब बिधि हीन, मलीन, दीन अति, लीन-बिषय कोउ नाहीं ॥
(26) श्रीराम चन्द्र कृपालु भजु मन हरण भय भव दारुणं ॥
(27) सुनि सीतापति-सील सुभाउ ।
'रामचरितमानस' से
(28) वर्णानामर्थ संघानां रसानां छन्दसामपि। मंगलानां च कर्तारौ वन्दे वाणी विनायकौ ॥
(29) नानापुराणनिगमागम सम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा भाषा निबन्धमतिमञ्जुलमात नोति ।
(30) बंदउगुरु पद पदमु परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा ॥
(31) सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी ॥
(32) निज कवित्त केहि लाग न नीका। सरस होउ अथवा अति फीका ॥
(33) कवित बिवेक एक नहिं मोरें। सत्य कहउँ लिखो कागद कोरे ॥
(34) गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।
(35) मैं पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकर खेत ॥
(36) कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई ॥
(37) अगुन सगुन दुई ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा ॥
(38) पुरइनि सघन चारु चौपाई। जुगुति मंजु मनि सीप सुहाई ॥ छंद सोरठा सुन्दर दोहा। सोइ बहुरंग कमल कुल सोहा ॥
(39) कामिहि नारि पियारी जिमि लोभहि प्रिय जिमि दाम ॥
(40) कत विध सृज नारी जग माही। पराधीन सपनेहु सुख नाहीं ॥
(41) जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू। सो तिन्ह मिलई न कछु संदेहू ॥
(42) भगतिह ग्यानहि नहिं कछु भेदा। उभय हरहिं भव संभव खेदा ॥
(43) ढोल गँवार सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी ॥
(44) वरनाश्रम निज निज धरम निरत बेदपथ लोग। चलहि सदा पावहि सुख नहि भय सोक न रोग ॥
(45) विधिहु न नारि हृदय गति जानी।
(46) मैं सुकुमारि नाथ वन जोगू, तुमहि उचित तप मो कहं भोगू ॥
(47) श्रुति सम्मत हरि भगत पथ संजुत विरति विवेक ।
(48) बादहि शुद्र द्विजन सन हम तुमते कछु घाटि। जानहिं ब्रह्म सो विप्रवर आँखि दिखावहि डाँटि ॥
(49) जे न मित्र दुख होहि दुखारी। तिनहिं बिलोकत पातक भारी ॥
(50) सब नर करहिं परस्पर प्रीति। चलहि स्वधर्म निरतिश्रुति रीती।
(51) ईश्वर अंस जीव अविनासी। चेतन, अमल, सहज सुख रासी ॥
(घ) केशवदास
(1) भाषा बोलि न जानहिं जिनके कुल के दास। भाषा कवि भो मंदमति तेहि कुलकेसवदास ॥
(2) केसव केसनि अस करी बैरिहु जस न कराहि चन्द्रवदनि मृगलोचनी 'बाबा' कहि-कहि जाहि ।।
(3) जदपि सुजाति सुलक्षनी, सुबरन सरस सुवृत्त। भूषन बिनु न बिराजई, कविता बनिता मित्त ॥
(4) देखे मुख भावै, अनदेखेई कमल चंद ताते मुख मुखै, सखी कमलौ न चंद री ॥
(5) केशव केशवराय मनौ कमलासन के सिर ऊपरे सोहै।
(6) बासर की सम्पति उलूक ज्यों न चितवत।
(7) मातु ! कहाँ नृपतात ? गए सुरलोकहि, क्यों? सुतसोक किए।
(8) राम को काम कहाँ रिपु जीतहि कौन कबै रिपु जीत्यों कहा ॥
(१) अरुण गात अति प्रात पद्मिनी प्राननाथ भय। मानहु केशवदास कोकनद कोक प्रेम मय ॥
(ङ) सेनापति
(1) दूरि जदुराई, सेनापति सुखदाई देखौ, आई रितु पाउस, न पाई प्रेम पतियाँ ॥
(2) सेनापति उनए नये जलद सावन के चारिहू दिसान घुमरत भरे तोयकै ॥
(3) वृष को तरनि तेज सहसौ करनि तपै, ज्वालनि के जाल विकराल बरसत है।
(4) सेनापति सोई, सीतापति के प्रसाद जाकी, सब कवि कान दै सुनत कविताई है ॥
विविध
रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है, "वाल्मीकि ने सर्वप्रथम नर-काव्य का प्रवर्तन किया।"
मीराबाई के एक पत्र के जवाब में गोस्वामी तुलसीदास ने निम्नांकित पद कही थी, जो 'विन्य पत्रिका' में संकलित है-
जाके प्रिय न राम बैदेही। तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही ॥
अंग्रेज भाषा वैज्ञानिक बिम्स ने तुलसी की भाषा को 'पुरानी बैसवाड़ी' कहा है।
सगुण धारा (कृष्ण भक्ति शाखा)
'कृष्ण' का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद के 8वें मंडल में 85 सूक्त के रचयिता के रूप में मिलता है।
संस्कृत साहित्य में सर्वप्रथम कृष्ण के अलौकिक कर्मों का वर्णन ई०पू० प्रथम शताब्दी के कवि अश्वघोष के 'बुद्ध चरित' में मिलता है।
राधा का प्रथम वर्णन हाल की प्राकृत रचना 'गाथा सतसई' या 'गाथा सप्तशती' में हुआ जो प्रथम शताब्दी की रचना है।
कृष्ण भक्त कवियों का आधार ग्रन्थ 'भागवत महापुराण' है।
कृष्ण काव्य परम्परा के प्रमुख सम्प्रदाय एवं आचार्य प्रवर्तकों का संक्षिप्त विवरण कालक्रमानुसार निम्न है-
आचार्य
जन्म-मृत्यु (ई०)
जन्म स्थान
गुरु
सम्प्रदाय
दार्शनिक मत
निम्बाकाचार्य
1114-1162
निम्बापुर
नारद मुनि
सनकादि रूद्र
द्वैताद्वैतवाद शुद्धाद्वैतवाद
आसधीर
वल्लभाचार्य
1478-1530
चंपारन
विष्णु स्वामी
सखी
अचिन्त्य
स्वामी हरिदास
1478-1578
वृन्दावन राजपुर नवद्वीप बंगाल बाँदगाव मथुरा
केशव भारती
गौड़ीय
भेदाभेदवाद
चैतन्य महाप्रभु
1486-1533
1502-1552
गोपालभट्ट
राधावल्लभ
हितहरिवंश
कवि हाल का वास्तविक नाम शालिवाहन था जो प्रथम शताब्दी में प्रतिष्ठानपुर के राजा थे।
भागवत पुराण' का रास 'शरद रास' है तथा 'गीत् गोविन्द' का 'वसंत रास' है।
बंगाल के अन्तिम शासक राजा लक्ष्मण सेन के सभा कवि जयूदेव ने 12 सगों में कोमलकान्त पदावली में 'गीत गोविन्द' की रचना की।
"भागवत महापुराण' में कुल 12 स्कन्ध है।
सनकादि या निम्बार्क सम्प्रदाय
भक्ति के निमित्त विष्णु के स्थान पर कृष्ण के सगुण रूप का सर्वप्रथम प्रतिपादन निम्बार्काचार्य ने किया था।
निम्बर्काचार्य का मूलनाम नियमानन्द था। निम्बार्क का अर्थ है 'नीम पर सूर्य के दर्शन कराने वाला'।
निम्बार्क को भगवान कृष्ण के सुदर्शन चक्र का अवतार माना जाता है। इनका एक नाम 'सुदर्शन' भी था।
निम्बार्क सम्प्रदाय में कृष्ण के वामांग में सुशोभित राधा के स्वकीय रूप का विधान है।
निम्बार्काचार्य के चार शिष्य थे- (1) श्री निवासाचार्य, (2) औदुम्बाचार्य, (3) गौर मुखाचार्य और (4) श्री लक्ष्मण भट्ट। श्री निवासाचार्य ने 'वेदान्त कौस्तुभ' ग्रन्थ की रचना की।
निम्बार्काचार्य ने पाँच ग्रन्थों की रचना की है जो निम्न है-
(1) वेदान्त पारिजात सौरभ, (2) दशश्लोकी, (3) श्रीकृष्णस्तवराज, (4)
मंतरहस्य षोडशी, (5) प्रपन्नकल्पपल्लवी।
निम्बार्क सम्प्रदाय की सबसे बड़ी गद्दी राजस्थान के सलेमाबाद स्थान पर है।
प्रमुख कवि
श्रीभट्ट का जन्म मथुरा में ध्रुवटीला में सन् 1538 में हुआ। इनके गुरु का नाम केशव कश्मीरी था।
श्री भट्ट को निम्बार्क सम्प्रदाय में 'हितू सखी' का अवतार माना जाता है।
श्रीभट्ट के लिए दो ग्रन्थ है-
(1) युगल शतक-इसमें 100 पद हैं। प्रत्येक पद के पूर्व उक्त पद के मूल भाव को व्यक्त करने वाला एक दोहा दिया है।
(2) आदि बानी।
हरिव्यास देव के गुरु का नाम श्रीभट्ट था। इन्होंने ब्रजभाषा में 'महावाणी' नामक ग्रन्थ की रचना की।
परशुराम देव के गुरु का नाम 'हरिव्यासदेव' था। इन्होंने ही निम्बार्क सम्प्रदाय की गद्दी को राजस्थान के सलेमाबाद में स्थापित किया।
परशुरामदेव ने 'परशुराम सागर' नामक एक बड़े ग्रन्थ की रचना की। इसकी भाषा राजस्थानी प्रधान सधुक्कड़ी है।
वल्लभ सम्प्रदाय
वल्लभाचार्य सुल्तान सिकन्दर लोदी तथा बाबर के समकालीन थे।
वल्लभाचार्य संक्षिप्त परिचय निम्न है-
जन्म-मृत्यु
जन्म स्थान
पत्नी
दो पुत्र
भक्ति
1478-1530 ई०
चम्पारन
मधुमंगल
(1) गोपीनाथ
पुष्टिमार्गी
(2) विठ्ठलनाथ
वल्लभ सम्प्रदाय में कृष्ण पूर्णानन्द स्वरूप पूर्ण पुरुषोत्तम परब्रह्म हैं।
पुष्टिमार्गी भक्ति में 'पुष्टि' भगवद् अनुग्रह या कृपा को कहा जाता है। भागवत महापुराण में लिखा है-
"पुष्टि किं मे ? पोषणम्। पोषणं किम्। तदनुग्रहः भगवत्कृपा।"
पुष्टि मार्गी भक्ति में तीन प्रकार के मार्ग, जीव तथा भक्त होते हैं जो निम्न हैं-
मार्ग
जीव
भक्त
मर्यादा मार्ग (वैदिक मार्ग)
प्रवाह मार्ग (लौकिक सुख भोग)
मर्यादा जीव प्रवाह जीव
मर्यादा भक्ति प्रवाह भक्ति पुष्टि या शुद्ध भक्ति
पुष्टि मार्ग (भक्ति मार्ग)
पुष्टि जीव
वल्लभाचार्य ने निम्नांकित ग्रन्थों की रचना की है-
(1) पूर्व मीमांसा भाष्य (2) उत्तर मीमांसा या ब्रह्मसूत्र भाष्य, जो अणुभाष्य के नाम से प्रसिद्ध है। इनके शुद्धाद्वैतवाद का प्रतिपादक यही प्रधान दार्शनिक ग्रन्थ है।
(3) श्रीमद्भागवत की सूक्ष्म टीका तथा सुबोधिनी टीका, (4) तत्त्वदीप निबन्ध
अणुभाष्य वल्लभाचार्य का अधूरा ग्रन्थ था जिसे उनके पुत्र विट्ठलनाथ ने पूरा किया।
वल्लभ सम्प्रदाय में अष्टयाम की सेवा का उल्लेख है-
की वस्तुनिष्ठ इतिहा
(1) मंगलाचरण, (2) श्रृंगार, (3) ग्वाल, (4) राजयोग, (5) उत्थापन, भोग, (7) संध्या-आरती और (8) शयन।
(6
पर्वत सन् 1519 ई० में वल्लभाचार्य के शिष्य पूरनमल खत्री ने गोवर्धन श्रीनाथजी का मन्दिर बनवाया जिसका प्रबन्ध दायित्व कृष्णदास पर था।
मोस्वामी विठ्ठलनाथ सन् 1565 ई० चार वल्लभाचार्य और चार अपने शिष्यों क मिलाकर 'अष्टछाप' की स्थापना की।
सूपर कृछा
वल्लभाचार्य के कुल 84 तथा विठ्ठलनाथ के कुल 252 शिष्य थे।
कालक्रमानुसार अष्टछाप कवियों का संक्षिप्त विवरण निम्न है-
कवि
जन्म-मृत्यु (ई०)
गुरु
जन्मस्थान
भनदा
1468-1583
वल्लभाचार्य
जमुनावती (उ०प्र०)
सूरदास
1478-1583
वल्लभाचार्य
मीही (उ०प्र०)
परमानंद दास
1493-
वल्लभाचार्य
कन्नौज (उ०प्र०)
कृष्णदास
1496-1578
वल्लभाचार्य
चिलोतरा (गुजरात)
गोविन्द स्वामी
1505-1585
विठ्ठलनाथ
आंतरी (राजस्थानी)
छोत स्वामी
1515-1585
विठ्ठलनाथ
मथुरा (उ०प्र०)
चतुर्भुजदास
1530-1585
विट्ठलनाथ
जमुनावती (उ०प्र०)
नंनदास
1533-1583
विठ्ठलनाथ
रामपुर (उ०प्र०)
रेदीचन
कुंभनदास प्रथम अष्टछापी कवि थे। ये जाति के क्षत्रिय थे।
कुंभनदास ने सन् 1492 ई० में वल्लभाचार्य से दीक्षा ग्रहण की।
कुंभनदास अकबर के विमन्त्रण पर पैदल ही फतेहपुर सीकरी गए जिस पर
अफसोस करके लिखते हैं-
"संतन को कहा सीकरी सों काम। आवत जात पन्हैया टूटी बिसरि गयो हरिनाम।"
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है, "सूरदास ही ब्रजभाषा के प्रथम कवि हैं और लीलागान का महान समुद्र 'सूरसागर' हो उसका प्रथम काव्य है।"
सूरदास का जन्म वैशाख शुक्ल 5. दिन मंगलवार संवत् 1535 वि० को हुआ। ये बल्लभाचार्य से 10 दिन हो छोटे थे।
सूरदास के जन्म स्थान के संबंध में दो मत है, जो निम्न है-
रूनकता (गऊघाट)
E श्याम सुन्दरदास रामचन्द्र शुक्ल
हजारी प्रसाद द्विवेदी
14785
वार्ता साहित्य
डॉ० नगेन्द्र
गणपतिचन्द्र
सीहो
वल्लभाचार्य ने सूरदास को भगवत्लीला वर्णन करने का उपदेश दिया-सूर है के धिधियात काहे कू है, कुछ भगवत्लीला वर्णन करो।
सूरदास द्वारा रचित 25 ग्रन्थ बताया जाता है जिसमें कि तीन ही उपलब्ध है जो निम्न है- (1) सूरसागर, (2) सूरसारावली और (3) साहित्य लहरी।
सूरदास की रचनाओं का सर्वप्रथम सम्पादन कलकत्ता में सन् 1841 ई० में 'रागकल्पद्रुम' नाम से हुआ।
सूरदासकृत सूरसागर का उपजीव्य 'भागवत महापुराण' का दशम स्कन्ध है।
सूरसागर में 4936 पद तथा 12 स्कन्ध है।
सूरदास ने सूरसागर में तीन भ्रमर गीतों की योजना की है।
प्रथम भ्रमरगीत (पद संख्या 4078 से 4710) ही मुख्य है। शेष दो भ्रमरगीत (क) पद संख्या 4711-4712 तथा (ख) 4713 कथात्मक है।
भ्रमरगीत का सर्वप्रथम एक पूर्ण प्रसंग के रूप में वर्णन श्रीमद्भागवत के दशम् स्कन्ध के 47वें अध्याय के 12 से 21 श्लोक में मिलता है।
हिन्दी साहित्य में 'भ्रमरगीत' काव्य परम्परा का प्रवर्तन सूरदास ने किया।
सूरसागर के काव्य रूप के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों का मत निम्न है-
विद्वान
अभिमत
डॉ० चन्दबली पाण्डेय
लीला प्रबन्धकाव्य या भाव प्रबन्ध काव्य
हजारी प्रसाद द्विवेदी
गीत काव्यात्मक मनोरागों पर आधारित विशाल महाकाव्य
ब्रजेश्वर वर्मा
कृष्णचरित का महाकाव्य
सर्वसम्मति से
गेय मुक्तक काव्य
'भ्रमरगीत' में कुल 700 पद हैं। प्रो० मैनेजर पाण्डेय ने 'भ्रमर' का तीन रूप बताया है- (1) कृष्ण का प्रतीक, (2) उद्धव का प्रतीक और (3) स्वतंत्र रूप में।
'भ्रमरगीत' को उपालम्भ काव्य भी कहते हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इसे 'ध्वनिकाव्य' कहा है।
सूरसारावली में 1107 छंद है। इसकी रचना संसार को होली का रूपक मानकर की गयी है।
'साहित्य लहरी' (1550 ई०) में अलंकार और नायिका भेदों के उदाहरण प्रस्तुत करने वाले 118 दृष्टिकूट पद हैं।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है- "वात्सल्य और श्रृंगार के क्षेत्र का जितना अधिक उद्घाटन सूर ने बन्द आँखों से किया, उतना किसी और कवि ने नहीं। इन क्षेत्रों का कोना-कोना वे झाँक आए।"
आचार्य शुक्ल ने लिखा है, "सूर की बड़ी भारी विशेषता है नवीन प्रसंगों की उद्भावना। प्रसंगोद्भावना करने वाली ऐसी प्रतिभा हम तुलसी में नहीं पाते।"
शुक्लजी ने लिखा है, "आचार्यों की छाप लगी हुई आठ वीणाएँ श्रीकृष्ण की प्रेमलीला कीर्तन करने उठी, जिनमें सबसे ऊँची, सुरीली और मधुर झंकार अन्धे कवि सूरदास की वीणा की थी।"
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है, "सूरदास जब अपने विषय का वर्णन शुरू करते हैं तो मानो अलंकार शास्त्र हाथ जोड़कर उनके पीछे दौड़ा करता है। उपमाओं को बाढ़ आ जाती है, रूपकों की वर्षा होने लगती है। संगीत के प्रवाह में कवि स्वयं बढ़ जाता है।"
सूरदास की मृत्यु पर विठ्ठलदास ने कहा था-
महत्वपूर्ण
"पुष्टि
मार्ग
की
जहाज
जात
है।
जाय
कडू
लैनों
होय
सो
लेठ॥"
राय एव भाषा का वस्तुनिष्ठ इतिहास
सूरदास का अन्तिम पद निम्नलिखित है-"खंजननयन रूप रस माते अति सै चारा चपल अनियारे, पल पिंजरा न समाते ॥"
सूरदास को वात्सल्य रस का सम्म्राट माना जाता है।
परमानन्द ने वल्लभाचार्य से अरैला (प्रयाग) में दीक्षा ग्रहण किया।
परमानन्ददास की रचनाओं में 'परमानन्दसागर' प्रमुख है जिसमें 635 पद है। इसके अतिरिक्त 'दानलीला' तथा 'ध्रुवचरित' भी इनकी रचना है।
कृष्णदास कुनबी जाति के शूद्र थे। इनके प्रमुख ग्रन्थ है- (1) जुगल मान चरित्र, J
(2) भ्रमरगीत और (3) प्रेमतत्व निरूपण।
गोविन्द स्वामी ब्रजमण्डल के महावन नामक स्थान पर रहते थे।
गोविन्द स्वामी जहाँ रहते थे वह स्थान 'गोविन्द स्वामी की कदमखंडी' नाम से प्रसिद्ध है।
अकबर के नवरत्न में तानसेन गोविन्द स्वामी से संगीत गायन की शिक्षा ग्रहण करते थे।
इनके पदों का संकलन 'गोविन्द स्वामी के पद' नाम से प्रसिद्ध है।
छीत स्वामी बीरबल के पुरोहित थे। पुष्टिमार्ग में दीक्षित होने के बाद ये गोवर्धन पर्वत के निकट 'पुंछरी' नामक स्थान पर तमाल वृक्ष की छाया में रहते थे।
इनकी स्फुट रचनाओं का संकलन 'पदावली' नाम से प्रसिद्ध है।
चतुर्भुज दास प्रसिद्ध अष्टछाप कवि कुंभनदास के कनिष्ठ पुत्र थे।
चतुर्भुजदास के स्फुटं पदों का संकलन 'चतुर्भुज कीर्तन संग्रह', 'कीर्तनावली' और 'दानलीला' नाम से प्रकाशित है।
अष्टछाप के कवियों में नंददास का स्थान काव्य सौष्ठव और भाषा की प्रांजलता में सूरदास के बाद है।
नंददास के ग्रन्थ, पद संख्या एवं कथ्य निम्न है-
ग्रन्थ
पद संख्या
अनेकार्थ मंजरी 228
कथ्य/विषय
पर्याय कोश
मानमंजरी
अमरकोश के आधार पर लिखा गया पर्यायकोश
सुदामा चरित
श्रीमद्भागवत की कथानक पर सुदामा-कृष्ण के सख्य भाव का वर्णन
रसमंजरी रूपमंजरी
270
नायिका-भेद लघु प्रेमाख्यानक काव्य
विरहमंजरी
147
नायिकाओं का विरह वर्णन। इसमें बारहमासा भी है।
प्रेमबारह खड़ी
श्यामसागाई
63
श्यामा-श्याम की सगाई
रुक्मिणी मंगल 90
विवाह काव्य
भँवर गीत
216
सगुण और निर्गुण पर गोपी और उद्धव का संवाद
रासपंचाध्यायी
कृष्ण की रासलीला का अनुप्रासादियुक्त साहित्यिक भाषा में वर्णन
सिद्धान्त पंचाध्यायी
कृष्ण की रासलीला का वर्णन
133
दशमस्कंध भाषा 1700
श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध का पद्यमय अनुवाद.
रासपंचाध्यायी' रोला छंद में लिखा गया है। वियोगी हरि ने इसे 'हिन्दी का गीत गोविन्द' कहा है। यह पाँच अध्याय में विभक्त है।
हिन्दी के समस्त भ्रमरगीतों में नंददास का 'भँवरगीत' दार्शनिक दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ है।
नंददास को 'जड़िया' कहा जाता है-
"और कवि गढ़िया, नंददास जड़िया।"
सखी सम्प्रदाय
स्वामी हरिदास ने वृन्दावन में निम्बार्क मतांतर्गत सखी सम्प्रदाय या टट्टी सम्प्रदाय की स्थापना की।
स्वामी हरिदास का ऐतिहासिक परिचय किशोरदास की रचना 'निजमत सिद्धान्त' से प्राप्त होता है।
अकबर के दरबारी गायक तानसेन स्वामी हरिदास के शिष्य थे।
सखा सम्प्रदाय में निकुंज बिहारी श्रीकृष्ण सर्वोपरि हैं।
हरिदास के दो ग्रन्थ प्राप्य हैं-
(1) सिद्धान्त के पद- इसमें रूप और प्रेम का सिद्धान्त है।
(2) केलिमाला : इसमें 110 पदों में श्री श्यामाकुंज बिहारी की लीलाओं का वर्णन है।
प्रमुख कवि
जगन्नाथ गोस्वामी स्वामी हरिदास के भाई थे। इनकी रचना 'अनन्य सेवानिधि' ही प्राप्य है।
विहारिनदास सखी सम्प्रदाय के सर्वश्रेष्ठ कवि थे। इनका मूल नाम हरिनाम था।
बिहारिनदास को सखी सम्प्रदाय में 'गुरुदेव' नाम से पुकारा जाता है। ये जगन्नाथ के पौत्र और बीठल बिपुल के शिष्य थे।
इनकी रचना 'बिहारिनदास जी की वाणी' के नाम से प्रसिद्ध है। जिसमें इन्होंने 'नित्यविहार' को सर्वोपरि स्थान दिया है।
बीठल विपुल को नाभादास ने 'रस सागर' की उपाधि दी है।
बीठल विपुल को केवल 40 पद ही मिले हैं।
नागरीदास बिहारिनदास के शिष्य थे। इनकी लिखी 20 साखियाँ, 42 चौबोले, 39 कवित्त सवैया तथा 70 पद प्राप्त है।
सरसदास नागरीदास के छोटे भाई थे। इनकी रचना कुल 66 छंदों की है जो 'अष्टाचार्यों की वाणी' में सम्मिलित है।
गौड़ीय सम्प्रदाय
गौड़ीय सम्प्रदाय के प्रवर्तक कृष्ण चैतन्य महाप्रभु है।
चैतन्य महाप्रभु का मूलनाम विश्वम्भर मिश्श्र था। घर में इन्हें 'निमाई' और 'गौर' या 'गौरांग' नाम से पुकारते थे।
चैतन्य मत का दार्शनिक सिद्धान्त 'अचिन्त्य भेदाभेद' कहलाता है।
प्रमुख कवि
रामराय प्रारम्भ में वल्लभ मतानुयायी विठ्ठलनाथ के शिष्य थे। किन्तु बाद में जगन्नाथपुरी में श्री नित्यानन्द से दीक्षा ग्रहण की।
रामराय संस्कृत तथा ब्रजभाष दोनों के ही पण्डित थे।
रामराय ने संस्कृत में ब्रह्मसूत्र के कुछ अंश पर 'गौर-विनोदिनी' नामक वृत्ति की रचना की तथा गीता पर 'गौर भाष्य', 'स्तवपंचकम्' और 'गोविन्द तत्व दीपिका' का प्रणयन किया।
व्रजभाषा में इनकी 'आदिवाणी' तथा 'गीत गोविन्द भाषा' दो रचनाएँ प्राप्य हैं।
मदनमोहन सूरदास अकबर के दीवान थे और संडीला में नियुक्त थे।
बाबा कृष्णदास ने इनके 105 पदों का 'सुहृदवानी' शीर्षक से संग्रह किया है।
गदाधर भट्ट ब्रजभाषा के सुप्रसिद्ध कवि तथा भागवत के अद्वितीय वक्ता थे।
गदाधर भट्ट रघुनाथ भट्ट गोस्वामी के शिष्य थे।
चन्द्रगोपाल रामराय के अनुज थे। इन्होंने संस्कृत तथा ब्रज दोनों भाषाओं में ग्रन्थ लिखा, जो निम्न है-
ब्रजभाषा
संस्कृत
(1) चंद्र चौरासी
(1) श्रीराधा माधव भाष्य
(2) गौरांग अष्टयाम
(2) गायत्री भाष्य
(3) अष्टयाम सेवा सुधा
(3) श्री राधामाधवाष्टक
(4) ऋतु विहार
(5) राधा विरह
'चन्द्र चौरासी' हितहरिवंशजी की 'हित चौरासी' की प्रेरणा से लिखी गयी है।
'गौरांग अष्टयाम' में चैतन्य महाप्रभु की अष्टयाम सेवा का वर्णन है।
माधवदास 'माधुरी' वृन्दावनवासी खत्री थे। इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-(1) केलि माधुरी (1630 ई०), (2) वंशीवट माधुरी (1642 ई०) और (3) वृंदावन माधुरी (1642 ई०)।
माधवदास की तीनों रचनाओं का एक साथ संकलन 'श्री माधुरी वाणी' नाम से किया गया है।
भगवत मुदित माधव मुदित के पुत्र तथा आगरा के सूबेदार शुजा के दीवान थे। इनकी एकमात्र रचना 'वृन्दावन शत' (1650 ई०.) है।
'वृन्दावन शत' श्री प्रबोधनंद सरस्वती द्वारा रचित संस्कृत ग्रन्थ 'वृन्दावन महिमामृत' का ब्रजभाषानुवाद है।
राधावल्लभ सम्प्रदाय
राधावल्लभ सम्प्रदाय का प्रवर्तन सन् 1534 ई० में आचार्य हितहरिवंश ने वृन्दावन में किया।
राधावल्लभ सम्प्रदाय में 'राधा' का स्थान सर्वोपरि है तथा इसमें 'तत्सुखीभाव' महत्व प्रदान किया गया है। 'को भक्तिकाल
हितहरिवंश का संक्षिप्त जीवनवृत्त निम्नांकित है-
माता-पिता
पत्नी
ब्रजभाषा ग्रन्थ
संस्कृत ग्रन्थ :
केशवदास मिश्र-तारावती
रुक्मिनी देवी
हित चौरासी
(1) राधासुधानिधि
(2) यमुनाष्टक
वहित हरिवंश अपनी रचना की मधुरता के कारण श्रीकृष्ण की वंशी के अवतार कहे जाते हैं।
प्रमुख कवि
हरिराम व्यास ओरछा नरेश मधुकरशाह के राजगुरु हैं।
हरिराम व्यास को वैष्णव भक्तों में 'विशाख सखी' का अवतार माना जाता है।
हरिराम व्यास की प्रमुख रचनाएँ निम्नांकित हैं-
(1) व्यासवाणी-758 पद और 148 दोहे
(2) रागमाला-604 दोहे (संगीतशास्त्र)
(3) नवरत्न और स्वधर्म पद्धति (संस्कृत ग्रन्थ)
चतुर्भुजदास अष्टछापी कवि चतुर्भुजदास से भिन्न हैं। इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं-(1)
द्वादश यश, (2) मंगलसार यश तथा (3) हितजू को मंगल।
ध्रुवदास ने स्वप्न में हित हरिवंश से शिष्यत्व ग्रहण किया।
ध्रुवदास की प्रमुख रचनाएँ निम्नांकित हैं-
पुस्तक
जीवदशा लीला
वैदक ज्ञान लीला
मनशिक्षा लीला
वृन्दावनसत लीला
ख्याल हुलास लीला
भक्तनामावली लीला
वृहदवावन पुराण की भाषा
सिद्धान्तविचार लीला (गद्य)
प्रीति चौवनी लीला
आनन्दाष्टक लीला
भजनाष्टक लीला
भजन कुंडलिया लीला
भजनसत लीला
भजन श्रृंगार सत लीला
पुस्तक
मन श्रृंगार लीला
हित श्रृंगार लीला
सभामंडल
रस मुक्तावली लीला
रस हीरावली लोला
रस रत्नावली लीला
प्रेमावली लीला
प्रियाजी नामावली लीला
रहस्यमंजरी लौला
सुखमंजरी लीला
रतिमंजरी लीला
नेह मंजरी लीला
वन विहार लीला
रंग विहार लीला
पुस्तक
रसविहार लीला
रंग हुलास लीला
रंग विनोद लीला
आनन्ददशा विनोद लीला
रहस्यलता लीला
आनन्दलता लीला
अनुराग लता लीला
प्रेमदशा लौला
रसानंद लीला
ब्रजलीला
जुगलध्यान लोला
नित्यविलास लीला
मानलीला
दान लीला
'नेही' नागरीदास ने वृन्दावन में हित हरिवंशजों के पुत्र गोस्वामी वनचन्द्र से दीक्षा ग्रहण की।
सम्प्रदाय निरपेक्ष कृष्ण भक्त कवि
मीराबाई ने श्रीकृष्ण की उपासना प्रियतम या पति के रूप में की।
मीराबाई का संक्षिप्त जीवनवृत्त निम्नांकित है-
जन्म-मृत्यु (ई०)
जन्मस्थान
पिता
पति
गुरु
भक्ति
मृत्यु स्थान
1516-1546
कुड़की
रल सिंह
भोजराज
रैदास
माधुर्य
रणछोड़ मन्दिर
मीराबाई की भाषा राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा है।
मीराबाई की प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं-
4
(1) गीत गोविन्द की टीका, (2) नरसीजी का मायरा, (3) राग सोरठा, (4) राग गोविन्द, (5) मलार राग, (6) सत्यभामा नु रूसणं, (7) मीरां की गरबी, (8)
रुक्मणी मंगल।
मीराबाई के स्फुट पद 'मीराबाई की पदावली' नाम से प्रकाशित है।
मीराबाई ने तुलसीदास को एक पत्र में लिखा था-
तुलसीबत ने जवाब में लिभा बेघर न राम बैदेही।
स्वति श्री तुलसी कुल भूषन दूषन हरन गोसाई। लजिए ताहि कोटि ठूल < बारहि बार प्रनाम करहुँ, अब हरहु सोक समुढाई॥ जैघर
रसखान का मूलनाम सैयद इब्राहीम था। इनका जन्म अनुमानतः दिल्ली में सन् 1533 में तथा मृत्यु 1618 ई० में हुआ।
सवैया छंद में कृष्णलीला का गान करने वाले प्रथम कवि रसखान हैं।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है, "और कृष्णभक्तों के समान इन्होंने 'गीति-काव्य' का आश्रय न लेकर कवित्त सवैयों में अपने सच्चे प्रेम की व्यंजना की है।"
रसखान की प्रमुख काव्य कृतियाँ निम्न हैं-
(1) सुजान रसखान - 181 सवैया, 17 कवित्त, 12 दोहा, 4 सोरठा (कुल 214 छंद)
(2) प्रेम वाटिका (1614)-53 दोहों की लघु काव्य कृति।
(3) दानलीला-11 छन्दों का खण्ड काव्य।
(4) अष्टयाम-कृष्ण की दिनचर्या का वर्णन ।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने लिखा है, "इस मुसलमान हरिजनन पर केतिन हिन्दुन वारिए।"
कृष्ण भक्ति शाखा के कवियों की प्रमुख पंक्ति
निम्बार्क सम्प्रदाय
श्रीभट्ट
(1) भोजत कब देखों इन नैना। स्यामा जू की सुरंग चूनरी, मोहन को उपरैना ॥
(2) ब्रजभूमि मोहनी में जानी। मोहनकुंज, मोहन वृन्दावन, मोहन जमुना पानी ॥
(3) बसौ मेरे नैननि में दोउ चंद
गोरे बदनि वृषभानु, नंदिनी, स्याम बरन नंद नंद ॥
(4) रस की रेलि बेलि अति बाढ़ी। दम्पति की हित बाबरि विहरनि रहो सदा मेरे चित चाढ़ी ॥
(5) स्यामा स्याम कुंजतर ठाढे, जतन कियो कछु मैं ना।
(6) आनन्द कंद श्रीनंद सुवन, श्री वृषभानु सुता भजन
वल्लभ सम्प्रदाय
सूरदास
(1) नंद जू मेरे मन आनंद भयो, हौ गोवर्धन ते आयो।
(2) है हरि भजन को परमान। नीच पावै ऊँच पढ़वी, वाजते नीसान ॥
(3) शोभित कर नवनीत लिए। घुटुरुन चलन रेनु तन मंडित मुख दधि लेप किए ॥
(4) सिखवत चलन जसोदा मैया। अरबराय कर पानि गहावति, डगमगाय धेरै पैयौ ॥
(5) पाहुनि करि दै तनक महह्यौ। आरि करै मनमोहन मेरो, अंचल आनि गह्यौ ॥
(6) मैया कबहि बढेगी चोटी ! कितिक बार माहिं दूध पियत भइ, यह अजहूँ है छोटी ॥
(7) खेलत में को काको गोसैयाँ ?
(8) धेनु दुहत अति ही रति बाढी। एक धार दोहनि पहुँचावत एक धार जहँ प्यारी ठाढ़ी ॥
(9) देखि री! हरि के चंचल नैन। खंजन मीन मूंगज चपलाई नहिं पटतर एक सैन ॥
(10) मेरे नैन बिरह की बेल बई। सींचत नैन नीर के, सजनी ! मूल पतार गई ॥
(11) मुरली तऊ गोपालहि भावति।
(12) मधुबन तुम कत रहत हरे।
(13) ऊधौ ! तुम अपनो जतन करौ।
(14) निर्गुन कौन देस को बासी ? मधुकर हँसि समुझाय सौह दै बूझति सांच, न हांसी ॥
(15) बूझत स्याम कौन तू गोरी। कहाँ रहति, काकी है बेटी, देखी नहीं कहूँ ब्रज खोरी।
(16) मानौ माई घन-घन अंतर दामिनी।
(17) प्रभु हाँ सब पतितन कौ टीकौ।
(18) रूपरेख-गुन जाति-जुगति-बुिन निरालंब कित धावै। सब विधि अगम विचारहि तातै सूर-सगुन पद गावै ॥
(19) जसोदा हरि पालनै झुलावें। हलरावै, दुलराइ, मल्हावै, जोई सोइ कछु गावै।
(20) मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ।
(21) फटि न गई बज्र की छाती कत ये सूल सहे
(22) नंद ब्रज लीजै ठोंकि बजाय
(23) लरिकाई कौ प्रेम कहौ अलि कैसे करि के छूटत ॥
(24) हरि है राजनीति पढि आए। समुझी बात कहत मधुकर जो ? समाचार कछु पाए ?
(25) सूर मिलौ मन जाहि-जाहि सों ताको कहा करै करजी।
(26) संदेसो देवकी सों कहियों।
(27) जहँ जहँ रहौं, राज करौ तहँ तहँ लेहु कोटि सिर भार। यह असीस हम देति सूर पुनुन्हात खसै नहि बार ॥
(28) निरखत अंक स्याम सुन्दर के बार-बार लावति छाती। लोचन जल कागद मसि मिलिकै वै गई स्याम-स्याम की पाती ॥
(29) बिहँसि कह्यौ हम तुम नहिं अंतर, यह कहिके उन ब्रज पठई। सूरदास प्रभु राधा माधव, व्रज बिहार नित नई-नई ॥
(30) मो सम कौन कुटिल खल कामी।
(31) प्रभु जी मेरे अवगुन चित न धरो।
(32) चरण कमल बंदौ हरि राई।
(33) काहे को गोपीनाथ कहावत ।
(34) मधुकर ! तुम रस लंपट लोग।
(35) बिनु गोपाल बैरिन भई कुंजै।
(36) अति मलिन बृषभानु कुमारी।
(37) पिया बिनु सांपिनि कारि राति ।
(38) निसि दिन बरसत नैन हमारे।
(39) हम सो कहत कौन की बातें।
(40) आयो घोष बड़ो व्यापारी।
(41) उर में माखन चोर गड़े
अब कैसहु निकसत नहिं ऊधो तिरछे हैजो अड़े ॥
(42) काहे को रोकत मारग सुधो ?
(43) आये जोग सिखावन पांडे।
(44) हम तो कान्ह केलि की भूखी।
(45) अँखियाँ हरि दरसन की प्यासी।
(46) हमारे हरि हारिल की लकरी।
(47) हम भक्तन के भक्त हमारे। सुन अर्जुन परतिज्ञा मेरी यह व्रत टरत न टारे ॥
परमानन्ददास
(1) जब ते प्रीति श्याम ते कोनी। ता दिन ते मेरे इन नैननि नेंकह नींद न लोनी ॥
(2) कहा करी बैकुंठहि जाय।
जहें नहिं नंद, जहा न जसोदा, नहि जैह गोपी ग्वाल न गाय ॥
(3) राधे जू हीरावलि टूटी।
उरज कमलदल माल मरगजी, बाम कपोल अलकलट छूटी ॥
कृष्णदास
(1)
मो मन मन गिरधर छवि पर अटक्यौ। ललित त्रिभंगी, अंगन पर चलि, गयो तंहाई टक्यौ।
(2)
कंचन मनि मरकत रस ओपी। नंद सुवन के संगम सुखकर अधिक विराजति गोपी।
नंददास
(1)
ताही छिन उडुराज उदित रस रास सहायक। कुंकुम-मंडित-बदन प्रिया जनु नागरि नायक ॥
(2)
नव मर्कत मनि स्याम कनक मनिगम ब्रजबाला। वृन्दावन को रोझि मनहुँ पहिराइ माला ॥
गौड़ीय सम्प्रदाय
गदाधर भट्ट
(1)
सखी हाँ स्याम रंग रंगी। देखि बिकाय गई वह मूरति, सूरत माहिं पगी ॥
(2)
झूलति नागरि नागर लाल मंद मंद सब सखी झुलावति, गावति गीत रसाल ॥
(3)
जयति श्री राधिके, सकल सुख साधिके, तरुन मनि नित्य नव तन किसोरी ॥
राधावल्लभ सम्प्रदाय
हितहरिवंश
(1)
रहो कोउ काहू मनहिं दिए। मेरे प्राननाथ श्री स्यामा सपथ करौ तिन छिए ॥
(2
) ब्रज नवतरुनि कदंब मुकुटमनि स्यामा आजु बनी।
(3)
स्याम स्यामा मिले सरद की जामिनी ॥
नख सिख लौ अंग अंग माधुरी मोहे श्याम धनी ॥ विपिन घन कुंज रति केलि भुज केलि रुचि।
(4)
सबसों हित निष्काम मति वृन्दावन विश्राम। राधावल्लभ लाल कौ, हृदय ध्यान मुख नाम ॥
हरिराम व्यास
/
(1) यह जो एक मन बहुत ठौर करि कहि कौन सचु पायो। जहँ तहँ विपति जार जुवती ज्यों प्रकट पिंगला गायो ॥
(2) हुतो रस रसिकन को आधार। बिन हरिवंसहि सरस रीति को कापै चलिहै भार ?
(3) आज कछु कुंजन में बरषा सी। बादल दल में देखि सखी री! चमकति है चपला सी ॥
(4) सुधर राधिका प्रवीन बीना, बर रास रच्यो, स्याम संग वर सुढंग तरनि तनया तीरे ?.
(5) प्रेम अनत या जगत में, जानै बिरला कोय। व्यास सतन क्यों परिसिहै, पचि हार्यो जग रोय ॥
सम्प्रदाय निरपेक्ष
मीराबाई
(1) बसो मेरे नैनन में नंदलाल।
(2) मन रे परसि हरि के चरन। सुभग सीतल कमल कोमल त्रिविध ज्वाला हरन ॥
(3) घायल की गति घायल जानै और न जानै कोई।
(4) जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोइ।
(5) जोगी, मत जा, मत जाइ पाइ परूँ चेरी तेरी हौ। प्रेम-भगति को पैंड़ा ही न्यारो हमको गैल बता जा।
(6) पग बाध घुँघु नाचा री।
रसखान
(1) मानुष हो तो वही रसखान बसाँ सँग गोकुल गाँव के ग्वारन।
(2) या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिनू पुर को तजि डारौं।
(3) ब्रह्म मैं ढूढ्यो पुरानन गानन, वेदरिया सुनी चौगुने चायन।
(4) मोर पखा सिर ऊपर राखिहाँ, गुंज की माल गले पहिरींगी। ओढ़ि पितांबर लै लकुटी बन गोधन ग्वालन संग फिरौंगी ॥
(5) सेस महेस गनेस दिनेस सुरेसहु जाहिं निरंतर गावें। ताहि अहीर को छोहरियां छछिया भर छाछ पै नाच नचावै ॥
(6) धूरि भरे अति सोभित स्याम जू वैसी बनी सिर सुन्दर चोटी। खेलत खात फिरै अंगना पग पैंजनि बाजति पीरी कछोटी ॥
(7) होती जू पै कूबरी हयाँ सखि भरि लातन मूका बकोटती केती। लेती निकाल हिये की सबै नक छेदि कै कौड़ी पिराई कै देती ॥
(8) कारय उपाय बास डोरिया कटाय। नाहिं उपजैगो बाँस डोरिया कटाय ॥
(9) रसखानि कीं इन आँखिन सो ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं। कोटिक हाँकल धौत के धाम करील के कुंजन ऊपर बारौं ।॥
(10) जेहि विनु जाने कछुहि नहिं जान्यों जात बिसेस। सोइ प्रेम जेहि जान के रहिन जात कछु सेस ॥
भक्तिकाल की अन्य काव्य प्रवृत्तियाँ एवं कवि
(क) वीर-काव्य
3 सन् 1454 ई० में श्रीधर कृत 'रणमल्ल छंद' डिंगल में ऐतिहासिक चरित काव्य का प्रथम ग्रन्थ है।
भक्तिकाल
'रणमल्लछंद' में ईडर के राजा रणमल्ल राठौर और पाटण के सुबेदार जफर खाँ के युद्ध का वर्णन 70 छन्दों में निबद्ध है।
भक्तिकाल के अन्य वीर काव्य और कवि निम्नांकित हैं-
ग्रन्थ
कवि
वर्ष (ई०)
छंद संख्या
विषय
विजयपाल रासो
नल्ह सिंह
1543
42
राउ जैतसी रासो
विजयपाल और पंग का युद्ध वर्णन
विरुद छिहत्तरी
दुरसाजी आढ़ा
1543
90
राव जैतसी और कामरान का युद्ध वर्णन
राणा रासो
दयाराम
1624
76 दोहा
महाराणा प्रताप का यशोगान
रतन रासो
कुम्भकर्ण
1624
875
सीसोदिया कुल के राजाओं का वर्णन
रतलाम के महाराज रतन सिंह का
प्रशस्ति वर्णन
क्याम खा रासो
न्यामत खाजान
1634
क्याम खाँ चौहान के वंशजों का युद्ध वर्णन
(ख) प्रबन्धात्मक चरित काव्य
० सन् 1354 ई० में जैन कवि सुधारु अग्रवाल द्वारा रचित 'प्रद्युम्न चरित' हिन्दी का प्रथम पौराणिक प्रबन्ध काव्य है।
भक्तिकालीन अन्य प्रबन्धात्मक चरित काव्य निम्नांकित है-
ग्रन्थ
कवि
भाषा
पंचपाण्डव चरित रास
शालिभद्र सूरी
अपभ्रंश प्रभावित राजस्थानी हिन्दी अपभ्रंश प्रभावित राजस्थानी हिन्दी
गौतम रास
हरिचन्द पुराण
जाखू मणियार
ब्रजभाषा
कुमारपाल रासो
देवप्रभ
राजस्थानी हिन्दी
कान्हड दे प्रबन्ध
पद्मनाभ
राजस्थानी हिन्दी
(ग) नीति काव्य
सन् 1486 ई० में पद्मनाभ ने सर्वप्रथम हिन्दी में विशुद्ध रूप से नीतिकाव्य की रचना की।
पद्मनाभ ने 'डूंगर-बावनी' शीर्षक से नीति काव्य की रचना की। इसमें कुल 53 छप्पय है।
भक्तिकालीन अन्य नीतिकाव्य और नीतिकार निम्न हैं-
नीतिकार
ठाकुर सिंह
नीतिकाव्य
(1) कृपण चरित्र (1523ई०), (2) पंचेन्द्री बेली
छोहल
(1528 ई०)
(1) पंच सहेली (1518 ई०), (2) बावनी (1527 ई०)
देवीदास
(1) राजनीति के कवित्त
जमाल
(1) जमाल दोहावली (1570)
उदैराज
त्य एवं भाषा का वस्तुनिष्ठ इतिहास
बान कवि
(1) उदैराज को दूहा (1603)
(1) कलि चरित्र
वाजिद (दादू के शिष्य)
(1) ग्रन्थ गुण उत्पत्तिनामा, (2) ग्रन्थ प्रेमनामा, (3) ग्रंथ गरज नामा, (4) साखी वाजिद।
बनारसीदास जैन
(1) नवरस पद्यावली, (2) समयसार नाटक, (3) बनारसी विलास, (4) अर्द्ध कथानक, (5) भाषा सूक्ति मुक्तावली ।
राजसमुद्र
(1) शालिभद्र चौपाई, (2) गजसुकमाल चौपाई, (3) प्रश्नोत्तर रत्नमाला, (4) कर्म बत्तीसी, (5) शील बत्तीसी, (6) बालावबोध ।
कुशलवीर
(1) भोज चौपाई, (2) सोलवती रास, (3) कर्म चौपाई, (4) वर्णन सम्पुट, (5) उद्दिम कर्म संवाद।
(घ) अकबरी दरबार का काव्य
भक्तिकाल के दरबारी कवियों का काल क्रमानुसार विवरण निम्न है-
कवि
जन्म-मृत्यु (ई०)
ग्रन्थ
टोडरमल
1493-1589
कुछ फुटकर छन्द
नरहरि महापात्र
1505-1607
(1) रुक्मिणी मंगल, (2) छप्पय नीति,
वीरवल 'ब्रह्म'
1528-1583
(3) कवित्त संग्रह।
तानसेन
1531-1583
कुछ फुटकर छंद।
गंग (गंगाप्रसाद)
1538-1617
(1) संगीत सार, (2) रागमाला, (3) गणेश स्तोत्र।
(1) गंग पदावली, (2) गंग पच्चीसी, (3) गंग रत्नावली।
पृथ्वीराज
1549-
(1) वेलि क्रिसन रुक्मिणी री पृथ्वीराज कथी, (2) श्यामलता, (3) दशरथ रावउत, (4) वसुदेव रावउत, (5) गंगालहरी।
रहीमदास
1553-1626
(1) दोहावली या सतसई (2) बरवै नायिका भेद, (3) नगर शोभा, (4) मदनाष्टक, (5) खेल कौतुकम्, (6) श्रृंगार सोरठा, (7) रास पंचाध्यायी।
कवि गंग बीरबल के बाल सखा तथा रहीमदास के विशेष कृपा पात्र थे।
कवि गंग ने शहजादा-खुर्रम की प्रशंसा में एक छंद लिखा जिस कारण नूरजहाँ ने ईर्ष्यावश उन्हें हाथी से कुचलवा दिया था।
कवि गंग का अन्तिम छंद निम्नलिखित है-
कबहुं न भडुंआ रन चढ़ें, कबहुं न वाजी बंग। सरस सभाहि प्रनाम करि, विदा होत कवि गंग ॥
भिखारीदास ने गंग के सन्दर्भ में लिखा था-तुलसी गंग दुवाँ भए सुकविन के सरदार।
रहीमदास का मूलनाम 'अब्दुल रहीम खानखाना' था। इनकी रचनाओं की खो सर्वप्रथम भरतपुर के मायाशंकर याज्ञिक ने किया।
रहीमदास की रचनाओं का संक्षिप्त विवरण निम्नांकित है-
रचना
छंद संख्या
भाषा
विषय
दोहावली
300
ब्रजभाषा
नीति के दोहे
नगर शोभा
144
ब्रजभाषा
विभिन्न जाति की स्त्रियों का वर्णन
श्रृंगार सोरठा
6
ब्रजभाषा
श्रृंगार का वर्णन
मदनाष्टक
8
खड़ी बोली
कृष्ण की रासलीला का वर्णन
बरवै नायिका भेद
अवधी
नायिका भेद का निरूपण
'बरवैनायिका भेद' अवधी भाषा में लिखा प्रथम रीति निरूपक ग्रन्थ है। इसकी रचना संस्कृत के भानुदत्तं की 'रसमंजरी' के आधार पर हुई है।
रहीमदास ने संस्कृत फारसी और हिन्दी मिश्रित भाषा में 'खेलकौतुक जातकम्' नामक एक ज्योतिष ग्रन्थ की रचना की।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है, "रहीम का हृदय द्रवीभूत होने के लिए कल्पना को उड़ान की अपेक्षा नहीं रखता था। वह संसार के सच्चे और प्रत्यक्ष व्यवहारों में ही द्रवीभूत होने के लिए पर्याप्त स्वरूप पा जाता था।"
(ङ) रीतिकाव्य
हिन्दी की रीति काव्य परमपरा में रचनाकाल की दृष्टि से सर्वप्रथम कवि 'कृपाराम' हैं।
सन् 1541 ई० में कृपाराम ने दोहा छंद में 'हिततरंगिणी' नामक रीति काव्य की रचना की। यह पाँच तरंगों में विभक्त है।
हिततरंगिणी ब्रजभाषा में रचित हिन्दी सतसई काव्य परम्परा का प्रथम ग्रन्थ है।
भक्ति काल के अन्य प्रमुख रीति निरूपक कवि निम्नांकित हैं-
कवि
रीति ग्रन्थ
सुन्दर कविराम
(1) सुन्दर श्रृंगार (1631 ई०)
न्यामत खाँ जान
(1) रसकोश (1619), (2) कवि वल्लभ, (3) सिंगार तिलक (1652), (4) रसमंजरी (1652 ई०)
बलभद्र मिश्र
(1) शिखनख, (2) बलभद्री व्याकरण, (3) गोवर्धन सतसई, (4) हनुमन्नाटक, (5) दूषण विचार।
मोहनलाल मिश्र
(1) श्रृंगार सागर (1589 ई०)
मुबारक
(1) तिलक शतक, (2) अलक शतक
अन्य कवि
नरोत्तमदास का जन्म सीतापुर जिले के बाड़ी नामक कस्बे में हुआ था।
नरोत्तमदास की प्रमुख कृतियाँ निम्नांकित हैं-
(1) सुदामाचरित (खण्डकाव्य), (2) ध्रुवचरित, (3) विचारमाला।
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