Part-5 हिंदी भाषा एवं साहित्य का वास्तुंनिस्ट इतिहास बाय सरस्वती पांडे गोविंद पांडे बुक इन हिंदी (बुक, सरस्वती पांडे गोविंद पांडे)

रीतिकाल पूर्वपीठिका 'रीतिकाल' का नामकरण विभिन्न विद्वानों के अनुसार निम्न है- नाम प्रस्तोता रीतिकाव्य डॉ० जार्ज ग्रियर्सन अलंकृत काल मिश्र बन्धु (श्यामबिहारी, सुखदेव बिहारी, गणेश बिहारी) रीतिकाल आचार्य रामचन्द्र शुक्ल श्रृंगारकाल आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र कला काल डॉ० रमाशंकर शुक्ल अन्धकार काल त्रिलोचन रीतिकाल के प्रवर्तक के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद है जो निम्न है- इतिहास प्रवर्तक रचनाकाल प्रस्तोता कारण कृपाराम 1541 ई० कालक्रम की दृष्टि केशवदास 1555-1617 ई० डॉ० नगेन्द्र रचनाकार-व्यक्तित्व की समृद्धि की दृष्टि से चिन्तामणि 1643 ई० रामचन्द्र शुक्ल अखण्ड परमपरा चलाने की दृष्टि से आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने 'हिन्दी साहित्य का अतीत में रीतिकाल का विभाजन निम्न ढंग से किया है- रीतिकाल (श्रृंगार काल) रीतिबद्ध धारा रीतिमुक्त या स्वच्छंद काव्यधारा लक्षण बद्ध काव्य लक्ष्यमात्र काव्य रहस्योन्मुख काव्य शुद्ध प्रेम काव्य आचार्य विश्वनाथ मिश्र ने 'श्रृंगार काल' को तीन भागों में बाँटा है- (1) रीतिबद्ध-रचना लक्षणों और उदाहरणों से युक्त होती है। (2) रीति सिद्ध-रीति की बँधी परिपाटी के अनुकूल स्वतंत्र काव्य रचनाएँ। (3) रीतिमुक्त-रीति परम्परा की साहित्यिक रूढ़ियों से मुक्त रचनाएँ आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के अनुसार जो 'रीतिसिद्ध कवि' हैं, वे डॉ० नगेन्द्र के अनुसार 'रीतिबद्ध कवि' हैं। रीतिकाल के कवियों का संक्षिप्त वर्गीकरण निम्न ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है- केशवदास सेनापति जसवंत सिंह मतिराम देव रीतिबद्ध भिखारीदास पद्माकर BHK Bitbib मिश्र रीतित्सिद्ध विहारीलाल रीतिमुक्त - रसखान शेख आलम घनानन्द ठाकुर बोधा द्विजदेव चिन्तामणि जसवंत सिंह रीतिचेतस कवि भिखारीदास प्रताप साहि ग्वाल बद्धरीति कवि बच्चन सिंह काव्य चेतस कवि मतिराम → भूषण देव पद्माकर रीतिइतर काव्य अभिजात्य वर्ग बिहारीलाल मुक्तरीति कवि स्वच्छन्द काव्यधारा आलम बनानन्द ठाकुर बोधा द्विजदेव पाका वस्तनिष्ठ इतिहास डॉ० नगेन्द्र द्वारा रीतिकालीन कवियों का कालक्रमानुसार वर्गीकरण निम्नांकित है- चिन्तामणि (1609-1685) कुलपति मिश्र कुमारमणि (1665 ई०) सोमनाथ → भिखारीदास → रसिक गोविन्द (1743-1838 ई०) देव (1673-1767 ई०) अमीरदास (1783 ई०) ग्वाल (1791-1868 ई०) प्रताप साहि सर्वांग निरूपक कवि सर्व रस निरूपक कवि श्रृंगार रस निरूपक कवि → छंदोनिरूपक कवि → अलंकार निरूपक कवि विशिष्टयंगनिरूपक कवि ति कवि नगेन्द्र डॉ० तिसिद्ध कवि तोप सुखदेव मिश्र → रसलीन (1699-1750 ई०) → पद्माकर (1753-1833 ई०) → रामसिंह → उजियारे → चन्द्रशेखर वाजपेयी याकूब खाँ बेनी प्रवीन मतिराम (1617 ई०) कृष्णभट्ट देव ऋषि भूषण (1613-1715 ई०) मतिराम (1617 ई०) → सुखदेव मिश्र माखन दशरथ रामसहाय भूषण मतिराम → जसवंत सिंह (1626-1688 ई०) गोप (1716 ई०) → रसिक सुमति रीतिमुक्त कवि → रघुनाथ बंदीजन → दूलह रसरूप प‌द्माकर (1653-1833 ई०) सेवादास गिरिधरदास रीति रोति कवि डॉ० नगेन्द्र रीतिसिद्ध कवि रीतिमुक्त कवि → शेख आलम घनानन्द (1689-1739 ई०) बोधा ठाकुर (1766-1833 ई०) द्विजदेव (1820-1869 ई०) सेनापति (1589 ई०) बिहारीलाल (1595-1663ई०) रसनिधि (1603-1660ई०) वृन्द (1643-1723 ई०) नृपशंभु (1657 ई०) नेवाज (1680 ई०) कृष्णकवि (1720 ई०) हठी जी (1780 ई०) विक्रमादित्य रामसहाय पजनेस (1815 ई०) बेनी वाजपेयी (1823 ई०) रीतिबद्ध कवि प्रमुख रीतिबद्ध कवियों का संक्षिप्त जीवन-वृत्त निम्नांकित है- कवि जन्म-मृत्यु (ई.) जन्म स्थान आश्रयदाता चिन्तामणि त्रिपाठी 1609-1685 तिकवांपुर (1) शाहजी भोसला, (2) शाहजहाँ। भूषण 1613-1715 तिकवांपुर (1) शिवाजी, (2) छत्रसाल। मतिराम 1617 तिकवांपुर (1) जहाँगीर, (2) ज्ञानचंद, (3) भाव जसवंत सिंह 1626-1688 मारवाड सिंह हाड़ा, (4) स्वरूप सिंह बुन्देला। ये मारवाड़ प्रतापी नरेश थे। सुखदेव मिश्र कंपिला (1) भगवंत राय खाची, (2) राव मर्दन सिंह, (3) देवी सिंह, (4) रायबरेली फाजिल अली शाह । तोष निधि कुलपति मिश्र देव (देवदत्त) श्रृंगवेरपुर 1673-1767 आगरा इटावा (1) रामसिंह। (1) आजमशाह, (2) भवानीदत्त वैश्य, (3) कुशल सिंह, (4) सेठ भोगीलाल, (5) उद्योत सिंह, (6) सुजान मणि, (7) अली अकबर खाँ। सैयद गुलामनबी रसलीन भिखारीदास एवं भाषा का वस्तुनिष्ठ इतिहास पद्माकर सिंह 1699-1750 | बिलग्राम (हरदोई) ट्योंगा (प्रतापगढ़) बाँदा 1753-1833 हिन्दूपति सिंह। (1) रघुराव अप्पा, (2) महाराज जैतपुर, (3) नोने अर्जुन सिह, (4) पारीक्षित, (5) अनूपगिरि (उपनाम हिम्मत बहादुर), (6) रघुनाथ राव, (7) प्रताप सिंह, (8) जगत सिंह, (9) भीम सिंह, (10) दौलत राव सिन्धिया। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने चिन्तामणि त्रिपाठी को रीतिकाव्य का प्रवर्तक माना है। चिन्तामणि त्रिपाठी सिद्धान्ततः रसवादी आचार्य थे। चिन्तामणि त्रिपाठी के सहोदर मतिराम, भूषण और जटाशंकर त्रिपाठी थे। भूषण वीर रस के कवि हैं। चित्रकूट के सोलंकी राजा रुद्र ने इन्हें 'कवि भूषण' की उपाधि दी थी। डॉ० गणपतिचन्द्र गुप्त ने भूषण का मूल नाम 'पतिराम या मनीराम' बताया है। आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इनका मूलनाम् 'घनश्याम' बताया है। महाराज छत्रसाल ने एक बार भूषण की पालकी को कन्धा लगाया था, जिस पर भूषण ने कहा था- "सिवा को बखानौं कि बखानौ छत्रसाल को।" आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है-" भूषण के वीर रस के उद्‌गार सारी जनता के हृदय की सम्पति हुए।" शिवाजी और छत्रसाल की वीरता के वर्णनों को कोई कवियों की झूठी खुशामद नहीं कह सकता।" "वे हिन्दू जाति के प्रतिनिधि कवि हैं।"" मतिराम चिन्तामणि त्रिपाठी और भूषण के सहोदर माने जाते हैं। मतिराम ने अपने ग्रन्थों को अपने आश्रयदाताओं को समर्पित किया है जो निम्नांकित है- आश्रयदाता स्थान ग्रंथ वर्ष (ई०) विषय निरूपण जहाँगीर दिल्ली फूल मंजरी 60 दोहे में किसी एक-एक फूल का वर्णन। विना आश्रयदाता के भाव सिंह हाड़ा बूंदी रसराज 1663 श्रृंगार रस निरूपण ललितललाम सेठ भोगनाथ सतसई 1664 अलंकार निरूपण ज्ञानचन्द्र कुमायूँ अलंकार 1681 बिहारी सतसई का अनुकरण स्वरूप सिंह बुंदेला अनुपलब्ध बुन्देलखण्ड पंचाशिका वृत्त कौमुदी 1690 अलंकार निरूपण छन्दों का निरूपण लक्षण श्रृंगार साहित्य सार अनुपलब्ध 1701 नायिका भेद निरूपण रातिय आचार्य शुक्ल ने 'वृत्त कौमुदी' या 'छंद सार' को महाराज शंभुनाथ सोलंकी के लिए लिखा गया माना है। मतिराम का प्रथम ग्रन्थ फूलमंजरी है। किन्तु डॉ० बच्चन सिंह ने 'रसराज' को ही प्रथम ग्रन्थ माना है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है, "मतिराम की सी रस स्निग्ध और प्रसाद पूर्ण भाषा रीति का अनुसरण करने वालों में बहुत ही कम मिलती है।" जसवंत सिंह हिन्दी साहित्य के प्रधान आचार्य या शिक्षक के रूप में प्रसिद्ध हैं। जसवंत सिंह ने साहित्यिक और आध्यात्मिक दो प्रकार की रचनाएँ लिखी हैं जो निम्नांकित हैं- ग्रन्थ विषय वस्तु भाषा भूषण 212 दोहे में अलंकारों का निरूपण प्रबोध चन्द्रोदय संस्कृत नाटक प्रबोध चन्द्रोदय का ब्रजभाषा का पद्यानुवाद अपरोक्ष सिद्धान्त अनुभव प्रकाश आनन्द विलास वेदान्त विषय का निरूपण सिद्धान्त बोध सिद्धान्त सार सुखदेव मिश्र के सन्दर्भ में आचार्य शुक्ल ने लिखा है, "छंदशास्त्र पर इनका सा विशद निरूपण और किसी कवि ने नहीं किया है।" सुखदेव मिश्र को राजा राजसिंह गौड़ ने 'कविराज' की उपाधि दी थी। इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नांकित हैं- (1) वृत्त विचार (1671 ई०), छंद विचार, (3) फाजिल अली प्रकाश, (4) रसार्णव, (5) श्रृंगार लता, (6) अध्यात्म प्रकाश (1698), (7) दशरथ राय। तोष रसवादी आचार्य है। इनका मूलनाम तोष निधि है। इनकी प्रमुख कृतियाँ हैं- (1) सुधानिधि (1634 ई०), (2) नखशिख, (3) विनयशतक । कुलपति मिश्र रस ध्वनिवादी आचार्य थे। ये प्रसिद्ध कवि बिहारी लाल के भांजे थे। कुलपति मिश्र का कविता काल 1667 ई० से 1686 ई० तक माना जाता है। कुलपति मिश्र की प्रमुख कृतियाँ निम्न हैं- ग्रन्थ वर्ष (ई०) विषयवस्तु रस रहस्य 1670 मम्मट के रस रहस्य का छायानुवाद द्रोण पर्व 1680 महाभारत के द्रोण पर्व का पद्यबद्ध अनुवाद युक्तितरंगिणी (अप्राप्य) 1686 नखशिख (अप्राप्य) संग्राम सार -डॉ० नगेन्द्र ने एक अन्य पुस्तक 'दुर्गा भक्ति चन्द्रिका' का भी उल्लेख किया है। - महाकवि देव का मूल नाम देवदत्त था। देव आचार्य और कवि दोनों रूपों में प्रसिद्ध हैं। पस्तुनिष्ट इतिहास देव हित हरिवंश के अनन्य सम्प्रदाय में दीक्षित थे। देव की प्रमुख रचनाएँ निम्नांकित हैं- ग्रन्थ विषय वस्तु/आधार भाव विलास (1689 ई०) रस एवं नायक-नायिका भेद वर्णन अष्टयाम आठ पहरों में नायक-नायिका के बीच का विलास वर्णन भवानी विलास भवानीदत्त वैश्य को समर्पित राग रत्नाकर राग-रागिनियों के स्वरूप का वर्णन कुशल विलास कुशल सिंह के नाम पर आधारित देवचरित कृष्ण के जीवन से सम्बद्ध प्रबन्ध काव्य प्रेमचंद्रिका उद्योत सिंह को समर्पित जाति विलास विभिन्न जाति एवं प्रदेशों की स्त्रियों का वर्णन रस विलास राजा मोतीलाल को समर्पित रचना शब्द या काव्य रसायन शब्द शक्ति, रसादि का वर्णन सुखसागर तरंग अनेक ग्रन्थों से लिए हुए कवित्त-सवैया का संग्रह देवमाया प्रपंच संस्कृत नाटक प्रबोध चंद्रोदय का पद्यानुवाद देवशतक अध्यात्म सम्बन्धी ग्रन्थ सुजान विनोद प्रेम तरंग 'सुख सागर तरंग' का सम्पादन मिश्र बन्धुओं के पिता बालदत्त मिश्र ने सन् 1897 ई० में किया। डॉ० नगेन्द्र ने 'सुखसागर तरंग' को 'नायिका भेद का विश्वकोश' माना है। सर्वप्रथम शिवसिंह सेंगर ने देव की रचनाओं की संख्या 72 बतायी। कुछ विद्वानों ने 52 ग्रन्थों का उल्लेख किया है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल देव की कुछ अन्य कृतियाँ भी बतायी हैं जो निम्न है- (1) वृक्ष विलास, (2) पावस विलास, (3) ब्रह्मदर्शन पचीसी, (4) तत्त्व दर्शन पचीसी, (5) आत्मदर्शन पचीसी, (6) जगदर्शन पचीसी, (7) रसानंद लहरी, (8) प्रेम दीपिका, (9) नखशिख, (10) प्रेम दर्शन। देव कविता में 'अभिधा' को महत्त्व देते हुए 'काव्य रसायन' में लिखते हैं-"अभिधा उत्तम काव्य है, मध्य लच्छना लीन। अधम व्यंजना रसबिरस, उलटी कहत नवीन ॥" डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी ने 'मध्यकालीन हिन्दी काव्यभाषा' पुस्तक में लिखा है, "देव की ध्वनि-संवेदनशीलता रीतिकालीन काव्यभाषा में अप्रतिम है।" रसलीन का मूल नाम गुलाम नबी था। ये मीर तु फैल अहमद के शिष्य थे। रसलीन की प्रमुख कृतियाँ निम्न हैं- ग्रन्थ वर्ष ई० विषय निरूपण अंग दर्पण 1737 अंगों का उपमा, उत्प्रेक्षा से चमत्कारपूर्ण वर्णन रस प्रबोध 1741 1155 दोहे में रसों का वर्णन। रौतिकाल भिखारीदास का रचनाकाल 1728-1750 ई० तक माना जाता है। भिखारीदास की प्रमुख रचनाएँ निम्नांकित हैं- ग्रन्थ वर्ष ई० विषय निरूपण नाम कोश 1738 कोश ग्रन्थ रस सारांश 1742 रस के भेदोपभेदों का वर्णन छंदार्णव पिंगल 1742 छंदों का विस्तृत वर्णन काव्य निर्णय 1746 काव्य के भेदोपभेदों का वर्णन श्रृंगार निर्णय 1750 नायक नायिका भेद वर्णन विष्णु पुराण भाषा विष्णु पुराण का दोहा-चौपाई शैली में अनुवाद शतरंजशतिका शतरंज खेलने के तौर तरीकों का वर्णन अमर कोश संस्कृत के अमरकोश का पद्यानुवाद जयपुर नरेश प्रताप सिंह ने प‌द्माकर भट्ट को 'कविराज शिरोमणि' की उपाधि दी। प‌द्माकर भट्ट की प्रमुख रचनाएँ निम्नांकित हैं- ग्रन्थ विषय निरूपण हिम्मत बहादुर विरुदावली 211 छंदों में हिम्मत बहादुर का शौर्य वर्णन (प्रवन्ध पद्माभरण जगद् विनोद प्रबोध पचासा गंगालहरी प्रताप सिंह विरुदावली कलिपच्चीसी राम रसायन अलीजाह प्रकाश काव्य) अलंकारों का वर्णन छह प्रकाश एवं 731 छंदों में नव रसों का विवेचन भक्ति निरूपण संस्कृत कवि जगन्नाथ कृत 'गंगा लहरी' का पद्यानुवाद 117 छन्दों में प्रताप सिंह का शौर्य वर्णन (प्रवन्ध काव्य) वाल्मीकि के 'रामायण' का छायानुवाद महाराज ग्वालियर के नाम लिखा गया है। प‌द्माकर भट्ट ने होली, फाग और त्यौहारों का वर्णन पूरी तल्लीनता के साथ किया है। रीतिकाल के प्रमुख अलंकार निरूपक ग्रन्थ और आचार्य निम्न हैं- जसवंत सिंह मतिराम भाषा भूषण ललित ललाम, अलंकार पंचाशिका भूषण शिवराजभूषण श्रीधर कवि भाषाभूषण रसिक सुमति अलंकार चन्द्रोदय रघुनाथ रसिक मोहन गोविन्द कवि कर्णाभरण दूलह कविकुल कण्ठाभरण ऋपिनाथ अलंकार मणि मंजरी रामसिंह अलंकार दर्पण पद्माकर पद्माभरण गिरिधरदास भारती भूषण रीतिकाल के विविध काव्यांग निरूपक ग्रन्थ निम्नांकित हैं- रचनाकार सर्वांग निरूपक ग्रन्थ चिन्तामणि कवि कुल कल्पतरु कुलपति रस रहस्य देव काव्य रसायन अथवा शब्द रसायन सूरति मिश्र काव्य सिद्धान्त कुमार मणि रसिक रसाल श्रीपति काव्य सरोज सोमनाथ (शशिनाथ) रसपीयूषनिधि भिखारीदास काव्य निर्णय रूप साही रूप विलास जनराज कविता रस विनोद जगत सिंह साहित्य सुधानिधि रणवीर सिंह काव्य रत्नाकर प्रताप साहि काव्य विलास थान कवि दलेल प्रकाश रतन कवि फतह प्रकाश रीतिकाल के छंद निरूपक ग्रन्थ निम्नांकित हैं- रचनाकार छंद निरूपक ग्रन्थ चिन्तामणि पिंगल मुरलीधर 'भूषण' छन्दो हृदय प्रकाश मतिराम छंदसार सुखदेव मिश्र वृत्त विचार माखन श्रीनाग पिंगल छंद विलास जयकृष्ण भुजंग पिंगल रूपदोष भाषा भिखारीदास छंदार्णव नारायण दास छंदसार दशरथ वृत्त विचार नंद किशोर पिंगल प्रकाश चेतन लघु पिंगल राम सहाय वृत्त तरंगिणी हरिदेव छंद पयोनिधि अयोध्या प्रसाद वाजपेयी छंदानंद पिंगल रीतिकाल के रस निरुपक कवि और ग्रन्थ निम्नांकित हैं- रचनाकार रस निरूपक ग्रन्थ तोष निधि सुधा निधि मतिराम रसराज रीतिकाल देव भाव विलास, भवानी विलास, रस विलास भिखारीदास रस सारांश, शृंगार निर्णय रसलीन रस प्रबोध पद्माकर जगत विनोद बेनीप्रवीन नवरस तरंग प्रताप साहि व्यंग्यार्थ कौमुदी सुखदेव मिश्न रसरत्नाकर, रसार्णव, श्रृंगार लता मंडन रस रत्नावली ग्वाल रस रंग श्रीपति रस सागर याकूब खाँ रसभूषण रघुनाथ काव्यकलाधर उदयनाथ कवीन्द्र रस चंद्रोदय शंभुनाथ रस कल्लोल, रस तरंगिणी समनेस रसिक विलास शिवनाथ रस सृष्टि उजियारे (दौलतराम) रस चन्द्रिका, जुगल प्रकाश राम सिंह रस निवास सेवादास रस दर्पण बेनी बंदीजन रस विलास करन कवि रस कल्लोल नवीन रंग तरंग चन्द्रशेखर रसिक विनोद सोमनाथ श्रृंगार विलास कृष्णभट्ट देवऋषि श्रृंगार रस माधुरी यशवंत सिंह श्रृंगार शिरोमणि लालकवि (गोरे लाल) विष्णु विलास २ हिन्दी के प्रमुख रोतिबद्ध कवि और उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्न हैं- रचनाकार चिन्तामणि प्रमुख रचनाएँ (1) रस विलास, (2) छन्द विचार पिंगल, (3) श्रृंगार मंजरी, (4) कविकुलकल्पतरु, (5) कृष्णचरित, (6) काव्य विवेक, (7) काव्य प्रकाश, (8) कवित्त विचार, (9) रामायण। कुलपति मिश्र (1) रस रहस्य, (2) संग्राम सार, (3) युक्ति तरंगिणी, (4) नख शिख, (5) द्रोण पर्व। कुमार मणि (1) रसिक रंजन, (2) रसिक रसाल देव (1) भावविलास, (2) भवानी विलास, (3) काव्य रसायन, का वस्तुनिष्ठ इतिहास सोमनाथ (4) जाति विलास, (5) देवमाया प्रपंच, (6) रसविलास, (7) राम रत्नाकर, (8) सुख सागर तरंग। (1) रस पीयूष निधि, (2) श्रृंगार विलास, (3) कृष्ण लीलावती, (4) पंचाध्यायी, (5) सुजान विलास, (6) माधव विनोद। भिखारीदास (1) रस सारांश, (2) काव्य निर्णय, (3) श्रृंगार निर्णय, (4) छंदार्णव पिंगल, (5) शब्दनाम कोश, (6) विष्णु पुराण भाषा, (7) शतरंजशतिका। रसिक गोविन्द (1) रसिक गोविन्दानन्दधन, (2) पिंगल, (3) रसिक गोविन्द, (4) युगल रस माधुरी, (5) समय प्रबन्ध, (6) लछिमन चंद्रिका, (7) अष्टदेश भाषा। प्रताप साहि (1) व्यंग्यार्थ कौमुदी (1825 ई०), (2) काव्य विलास (1809 ई०), (3) जयसिंह प्रकाश, (4) श्रृंगार मंजरी, (5) श्रृंगार शिरोमणि, (6) अलंकार चिन्तामणि, (7) काव्य विनोद, (8) जुगल नखशिख। अमीरदास (1) सभा मंडन (1827 ई०), (2) वृत्त चन्द्रोदय (1830 ई०), (3) व्रजविलास सतसई (1832 ई०), (4) श्रीकृष्ण साहित्य सिन्धु (1833 ई०), (5) शेर सिंह प्रकाश (1840 ई०), (6) फाग पचीसी, (7) ग्रीष्म विलास, (8) भागवत रत्नाकर, (9) दूषण उल्लास, (10) अमीर प्रकाश, (11) वैद्य कल्पतरु, (12) अश्व-संहिता प्रकाश। ग्वाल (1) यमुना लहरी, (2) भक्त भावन, (3) रसिकानन्द, (4) रसरंग, (5) कृष्ण जू को नखशिख, (6) दूषण दर्पण, (7) राधा माधव मिलन, (8) राधाष्टक, (9) कवि हृदय विनोद, (10) कवि दर्पण, (11) नेह निर्वाह, (12) बंसी बीसा, (13) कुब्जाष्टक, (14) षड्ॠतु वर्णन, (15) अलंकार भ्रम भंजन, (16) रसरूप, (17) दृग शतक। तोष निधि (1) सुधा निधि, (2) नख शिख, (3) विनय शतक। (1) रस प्रबोध (1741 ई०), (2) अंग दर्पण (1737 ई०)। रसलीन (1) हिम्मत बहादुर विरुदावली, (2) प‌द्माभरण, (3) जगत विनोद, (4) प्रबोध पचासा, (5) गंगालहरी, (6) प्रताप सिंह विरुदावली, (7) कलि पच्चीसी। पद्माकर भट्ट (1) श्रृंगार भूषण, (2) नवरस तरंग (1817 ई०), (3) नानाराव प्रकाश । बेनी 'प्रवीन' (1) वृत्त विचार, (2) छंद विचार, (3) फाजिल अली प्रकाश, (4) अध्यात्म प्रकाश, (5) रसार्णव, (6) रस रत्नाकर, (7) श्रृंगार लता। सुखदेव मिश्र रीतिकाल याकूब खाँ (1) रस भूषण (1812 ई०) उजियारे (दौलतराम) (1) रस चन्द्रिका, (2) जुगल रस प्रकाश। राम सिंह (1) जुगल विलास, (2) रस शिरोमणि, (3) अलंक दर्पण, (4) रस निवास । चन्द्रशेखर वाजपेयी (1) रसिक विनोद, (2) नख शिख, (3) वृन्दावन शतक (4) गुरु पंचाशिका, (5) ताजक, (6) माधवी वसंत (7) हरिमानस विलास, (8) हम्मीर हठ (प्रबन्ध काव्य) । मतिराम (1) फूलमंजरी, (2) लक्षण श्रृंगार, (3) साहित्य सार (4) रसराज, (5) ललित ललाम, (6) सतसई, (7) अलंकार पंचाशिका, (8) वृत्त कौमुदी। कृष्णभट्ट देव ऋषि (1) श्रृंगार रसमाधुरी (1712 ई०), कलानिधि। (2) अलंकार कालिदास त्रिवेदी (1) वारवधूविनोद, (2) राधामाधव बुध मिलन विनोद, (3) कालिदास हजारा। जसवंत सिंह (1) भाषा भूषण, (2) अपरोक्ष सिद्धान्त, (3) अनुभव प्रकाश, भूषण (4) आनन्द विलास, (5) सिद्धान्त बोध, (6) सिद्धान्त सार। (1) शिवराज भूषण (1673), (2) शिवा बावनी, (3) छत्रसाल दशक। गोप (1) रामालंकार, (2) रामचन्द्र भूषण, (3) राम- चन्द्राभरण। रसिक सुमित (1) अलंकार-चन्द्रोदय (1729 ई०)। रघुनाथ वंदीजन (1) रसिक मोहन (1739 ई०) (2) काव्य कलाधर (1745 ई०) और (3) जगत मोहन (1750 ई०)। दूलह (1) कविकुलकंठाभरण। रसरूप (1) तुलसीभूषण (1754 ई०)। सेवादास मण्डन (1) नखशिख, (2) रसदर्पण, (3) गीता माहात्म्य, (4) अलबेले लाल जू को नख शिख, (5) राधा सुधा शतक, (6) रघुनाथ अलंकार। (1) रस रत्नावली, (2) रस विलास, (3) नखशिख, (4) काव्यरत्न, (5) नैन पचासा, (6) जनक पचीसी। भूषण 'मुरलीधर' (1) भारती भूषण (1833 ई०)। (1) छन्दो हृदय प्रकाश (1666 ई०), (2) अलंकार प्रकाश (1648 ई०)। (1) वृत्त तरंगिणी (1816 ई०), (2) अलंकार प्रकाश (1648 ई०), (3) वाणी भूषण। (1) श्रीनाग पिंगल अथवा छंद‌विलास (1702 ई०)। (1) वृत्त विचार (1799 ई०)। गिरिधरदास रामसहाय माखन दशरथ भाषा का वस्तुनिष्ठ इतिहास सूरति मिश्र (1) अलंकार माला, (2) रसरत्न माला, (3) रस सरस, (4) रसग्राहक चंद्रिका, (5) नखशिख, (6) काव्य-सिद्धान्त, (7) रस रत्नाकर, (8) भक्ति विनोद, (१) श्रृंगार सागर। उदयनाथ कवीन्द्र (1) रसचन्द्रोदय, (2) विनोद चन्द्रिका, (3) जोगलीला। भिखारीदास ने सर्वप्रथम हिन्दी काव्य-परम्परा, भाषा, छंद, तुक आदि पर विचार किया। माखन ने हिन्दी में सर्वप्रथम कुम्भक, हरिमालिका, मदनमोहन, सुरस, तरलगति, सदागति, सुबल, प्रवाह और गन्धार नामक मात्रिक छन्दों का निरूपण किया। हिन्दी में रीति का अर्थ 'काव्यरचना पद्धति' है किन्तु कहीं-कहीं इसे 'पंथ' से भी अभिहित किया गया है। कुछ उदाहरण निम्नांकित हैं- केशवदास - समुझेवाला बालकन वर्णन पंथ अगाध। चिन्तामणि - रीति सु भाषा कवित की बरनत बुध अनुसार। मतिराम - सो विश्रब्ध नवोढ़ यो बरनत कवि रसरीति। भूषण-देव-सुकविन हूँ कछु कृपा, समुझि कविन को पंथ। अपनी अपनी रीति के काव्य और कवि रीति। सुरति मिश्र- बरनन मनरंजन जहाँ रीति अलौकिक होइ। निपुन कर्म कवि कौ जु तिहि काव्य कहत सब कोई ॥ सोमनाथ छंद रीति समुझे नहीं बिन पिंगल के ज्ञान। भिखारीदास (क) काव्य की रीति सिखी सुकवीन्ह सों ॥ (ख) अरु कछु मुक्तक रीति लखि, कहत एक उल्लास। (ग) बंदउ सुकविन के चरण अरु सुकविन के ग्रन्थ जाते कछु हाँ हूँ लहौ, कविताई को पंथ ॥ दूलह-थोरे क्रम क्रम ते कहीं अलंकार की रीति। प‌द्माकर - ताही को रति कहत हैं, रस ग्रंथन की रीति ॥ वेनी प्रवीन- या रस अरु नव तरंग में, नव रस रीतहि देखि। अति प्रसन्न है ललनजी, कोन्हीं प्रीति विसेखि ॥ प्रताप साहि कबित रीति कछु कहत है व्यंग्य अर्थ चित लाये ॥ डॉ० बच्चन सिंह ने लिखा है कि रीतिकालीन कवि 'कविता के सौदागर' थे। देव ने सुकेवि को कविता का सौदागर कहा है। रीति काव्य को 'यौवन की रमणीयता का काव्य' भी कहा जाता है। नलिन विलोचन शर्मा ने रीतिकालीन काव्य की आलोचना-पद्धति को "भारतीय मनीषा का ह्यसकालीन वर्गीकरण प्रेम" कहा है। रीतिसिद्ध कवि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने बिहारीलाल को रसवादी माना है जबकि डॉ० नगेन्द्र ने ध्वनिवादी स्वीकार किया है। श्रीराधा चरण गोस्वामी ने बिहारी को 'पीयूषवर्षी मेघ' की उपमा दी है। बिहारीलाल का संक्षिप्त जीवन वृत्त निम्नांकित है- जन्म-मृत्यु (३०) जन्मस्थान पिता गुरु सम्प्रदाय आश्रयदाता 1595-1663 गोविन्दपुर केशवदास नरहरिदास निम्बार्क महाराज जय सिंह बिहारीलाल की एकमात्र रचना 'बिहारी सतसई' दोहा छंद में रचित है। इसको भाषा परिनिष्ठित साहित्यिक ब्रजभाषा है। बिहारीलाल की 'सतसई' की प्रशंसा में किसी कवि ने निम्नलिखित पंक्ति लिखी है-सत सैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर। देखन में छोटे लगें, बेधैं सकल सरीर ॥ 12-डॉ० जॉर्ज ग्रियर्सन के अनुसार, "यूरोप में 'बिहारी सतसई' के समकक्ष कोई रचना नहीं है।" बिहारी सतसई' पर हिन्दी में 50 से अधिक टीका प्राप्त है। बिहारीलाल के पुत्र कृष्णलाल कवि ने बिहारी सतसई की टीका सर्वप्रथम सवैया छंद में ब्रजभाषा में लिखी। बिहारी सतसई के अन्य टीकाकार निम्नांकित हैं- टीकाकार टीका विशेषता कृष्णलाल कवि सुरति मिश्र लल्लू लाल प्रभुदयाल पाण्डेय अम्बिकादत्त व्यास कृष्णलाल की टीका अमर चंद्रिका लालचंद्रिका प्रभुदयाल पांडे की टीका (1896 ई०) बिहारी बिहार प्रत्येक दोहे का सवैया में विवेचन। टीका का प्रणयन दोहों में हुआ है। है। आधुनिक खड़ी बोली में लिखी गई दोहे के भावों का रोला छंद में पल्लवन । पद्मसिंह शर्मा संजीवनी भाष्य तुलनात्मक पद्धति में अर्थ निरूपण है। आनन्दीलाल शर्मा जगन्नाथदास रत्नाकर फिरंगे सतसई बिहारी रत्नाकर फारसी भाषा में लिखी गई है। हिन्दी खड़ी बोली में सर्वश्रेष्ठ टीका। (1921 ई०) बिहारी सतसई का अन्य भाषा में किया गया अनुवाद निम्नांकित है- अनुवादक अनुदित नाम भाषा पंडित परमानंद श्रृंगार सप्तशती संस्कृत मुंशी देवी प्रसाद 'प्रीतम' गुलदस्त बिहारी उर्दू बिहारीलाल के समस्त दोहों की संख्या 719 है। किन्तु जगन्नाथ दास 'रत्नाकर' ने इनके दोहों की संख्या 713 माना है। 'बिहारी सतसई' पर सर्वाधिक प्रभाव निम्न कवियों का पड़ा है- कवि रचना भाषा अमरुक अमरुक शतक संस्कृत हाल (शालिवाहन) गाथा-सप्तशती प्राकृत गोवर्धनाचार्य त्य एवं भाषा का वस्तुनिष्ठ इतिहास आर्या-सप्तशती संस्कृत संस्कृत के आचार्य बलदेव उपाध्याय ने लिखा है, "हाल 'गाथा' के, गोवर्धन 'आर्या' के तथा बिहारी 'दोहा' के बादशाह हैं।" (1 आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने बिहारी के सन्दर्भ में निम्न बातें लिखी हैं- ) श्रृंगार रस के ग्रन्थों में जितनी ख्याति और जितना मान 'बिहारी सतसई' का हुआ उतना और किसी का नहीं। इसका एक-एक दोहा हिन्दी साहित्य में एक-एक रत्न माना जाता है। (2 ) यदि प्रबन्ध काव्य एक विस्तृत वनस्थली है तो मुक्तक एक चुना हुआ गुलदस्ता है। (3) जिस कवि में कल्पना की समाहार शक्ति के साथ भाषा की समाहार शक्ति जितनी अधिक होगी उतनी ही वह मुक्तक की रचना में सफल होगा। यह क्षमता बिहारी में पूर्ण रूप से वर्तमान थी। (4) बिहारी की रस व्यंजना का पूर्ण वैभव उनके अनुभावों के विधान में दिखाई पड़ता है। (5 ) बिहारी की कृति का मूल्य जो बहुत अधिक आँका गया है उसे अधिकतर रचना की बारीकी या काव्यांगों के सूक्ष्म विन्यास की निपुणता की ओर ही मुख्यतः दृष्टि रखने वाले पारखियों के पक्ष से समझना चाहिए-उनके पक्षों से समझना चाहिए जो किसी हाथी दाँत के टुकड़े पर महीन बेलबूटे देख घंटों वाह-वाह किया करते हैं। पर जो हृदय के अन्तस्तल पर मार्मिक प्रभाव चाहते हैं, किसी भाव की स्वच्छ निर्मल धारा में कुछ देर अपना मन मग्न रखना चाहते हैं, उनका सन्तोष बिहारी से नहीं हो सकता। (6) भावों का बहुत उत्कृष्ट और उदात्त स्वरूप विहारी में नहीं मिलता। कविता उनकी श्रृंगारी है, पर प्रेम की उच्च भूमि पर नहीं पहुँचती नीचे ही रह जाती है। वृन्द का पूरा नाम वृन्दावन था। इनका जन्म मेडवे में हुआ तथा इनके पिता का नाम श्री रूप था। वृन्द के आश्रयदाता औरंगजेब तथा किशनगढ़ के महाराज राजसिंह थे। वृन्द की प्रमुख रचनाएँ काल क्रमानुसार निम्नांकित हैं- रचना वर्ष (ई०) विषयवस्तु बारहमासा 1668 बारहों महीनों का वर्णन। भाव पंचाशिका 1686 श्रृंगार के विभिन्न भावों का वर्णन। नयन पचीसी 1686 नेत्रों द्वारा प्रकट विभिन्न भावों का वर्णन । पवन पचीसी 1691 षड्ऋतु का छप्पय छंद में वर्णन। श्रृंगार शिक्षा 1691 आभूषण एवं श्रृंगार के साथ नायिकाओं का वर्णन। यमक सतसई 1706 715 छंदों में यमक अलंकार का वर्णन। हिन्दी के अन्य प्रमुख रीतिकालीन कवियों की रचनाएँ निम्न है- कवि रचनाएँ रसनिधि (पृथ्वी सिंह) (1) रतनहजारा, (2) विष्णुपद कीर्तन, (3) कवित्त, (4) बारहमासा, (5) रसनिधि सागर, (6) हिंडोला। नृप शंभुनाथ सिंह सोलंकी (1) नायिका भेद, (2) नखशिख, (3) सात शतक। नेवाज (1) शकुन्तल नाटक । कृष्ण कवि लाल (1) विहारी सतसई की टीका, (2) विदुर प्रजागर। हटीजी (1) श्री राधा सुधाशतक (103 छंद में)। विक्रमादित्य (1) विक्रम सतसई, (2) व्रजलीला। रामसहाय 'भगत' (1) राम सतसई, (2) वाणी भूषण, (3) वृत्त तरंगिणी, (4) ककहरा। बेनी वाजपेयी (1) फुटकर छंद पजनेस (1) पजनेस प्रकाश, (2) नखशिख, (3) मधुर प्रिया। राम सहाय 'भगत' का 'ककहरा' जायसी की 'अखारवट' की शैली में रचित है। रीति मुक्त कवि २ आलम जाति के ब्राह्मण थे किन्तु शेख नाम की रंगरेजिन से विवाह कर मुसलमान हो गए। आलम औरंगजेब के दूसरे बेटे बहादुरशाह मुअज्जम के आश्रय में रहते थे। आलम का कविता काल सन् 1683 से 1703 तक माना जाता है। इनकी प्रमुख कृतियाँ निम्न हैं- (1) आलमकेलि, (2) माधवानलकामकंदला, (3) सुदामा चरित, (4) स्याम सेनही। आलम के विषय में आचार्य शुक्ल ने लिखा है- (1) ये प्रेमोन्मत्त कवि थे और अपनी तरंग के अनुसार रचना करते थे। इसी से इनकी रचनाओं में हृदय तत्व की प्रधानता है। 'प्रेम की पोर' या 'इश्क का दुर्द' इनके एक-एक वाक्य में भरा पाया जाता है। (2) प्रेम की तन्मयता की दृष्टि से आलम की गणना 'रसखान' और 'घनानन्द' की कोटि में ही होनी चाहिए। आचार्य रामचन्द्र ने घनानंद के विषय में लिखा है, "ये साक्षात रसमूर्ति और ब्रजभाषा काव्य के प्रधान स्तम्भों में हैं।" घनानंद का संक्षिप्त जीवनवृत्त निम्न है- जन्म-मृत्यु (३०) जन्मस्थान मृत्यु स्थान सम्प्रदाय प्रेयसी आश्रयदाता 1689-1739 बुलंद शहर वृन्दावन निम्बार्क गणिकासुजान मुहम्मदशाह रंगीले घनानंद के सन्दर्भ में व्रजनाथ ने दो सवैया लिखा है, जो निम्न है- (1) नेही महाव्रज भाषा प्रवीन औ, सुंदरताहु के भेद को जानै। सेलियोरा की रीति में कोविद, भावना भेद स्वरूप को जानै ॥ की वस्तुनिष्ठ इतिहास चाह के रंग में भीज्यो हियो, बिहुरे मिले प्रीतम सांति न माने। भाषा प्रवीन सुछंद सदा रहै, सो घन जू के कवित्त बखानौ ॥ (2) प्रेम सदा अति ऊँचै लहैं, सुकहैं इहि भाँति की बात छकी। सुनि कै सब के मन लालच दौरै पै बौरे लखें सब बुद्धि चकी ॥ जग की कबिताई के धोखें रहै ह्याँ प्रबीनन की मति जाति जकी। समुझे कविता घनआँनन्द की हिय-आँखिन नेह की पीर तकी ॥ घनानन्द की प्रमुख काव्य कृतियाँ निम्नांकित हैं- (1) सुजान सार, (2) इश्कलता, (3) विरहलीला, कोकसार, (6) कृपाकंद, (7) रस केलि वल्ली, (४) यमुनायश। (4) वियोगबेलि, (5) इनकी 'विरहलीला' ब्रजभाषा में है किन्तु फारसी के छंद में है। घनानन्द के संदर्भ में आचार्य शुक्ल की निम्न पंक्तियाँ महत्वपूर्ण हैं- (1) इनकी सी विशुद्ध, सरस और शक्तिशालिनी ब्रजभाषा लिखने में और कोई समर्थ नहीं हुआ। विशुद्धता के साथ प्रौढ़ता और माधुर्य भी अपूर्व है। (2) प्रेम की पीर ही को लेकर इनकी वाणी का प्रादुर्भाव हुआ। प्रेममार्ग का ऐसा प्रवीण और धीर पथिक तथा जबाँदानी का ऐसा दावा रखने वाला ब्रजभाषा का दूसरा कवि नहीं हुआ। (3) प्रेम की अनिर्वचनीयता का आभास घनानंद ने विरोधाभासों के द्वारा दिया है। (4) घनानंदजी उन विरले कवियों में हैं जो भाषा की व्यंजकता बढ़ाते हैं। अपनी भावनाओं के अनूठे रूपरंग की व्यंजना के लिए भाषा का ऐसा बेधड़क प्रयोग करने वाला हिन्दी के पुराने कवियों में दूसरा नहीं हुआ। भाषा के लक्षण और व्यंजक बल की सीमा कहाँ तक है, इसकी पूरी परख इन्हीं को थी। (5) लाक्षणिक मूर्तिमत्ता और प्रयोगवैचित्र्य की जो छटा इनमें दिखायी पड़ी, खेद है कि वह फिर पौने दो सौ वर्ष पीछे जाकर आधुनिक काल के उत्तरार्द्ध में, अर्थात् वर्तमान काल की नूतन काव्य धारा में हो, 'अभिव्यंजनावाद' के प्रभाव से कुछ विदेशी रंग लिए प्रकट हुई। रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा है, "रीतिकाल की बौद्धिक विरहानुभूति, निष्प्राणता और कुंठा के वातावरण में घनानंद की पीड़ा की टीस सहसा ही हृदय को चीर देती है और मनसहज ही मान लेता है कि दूसरों के लिए किराये पर आँसू बहाने वालों के बीच यह एक ऐसा कवि है जो सचमुच अपनी पीडा में ही रो रहा है।" बोधा का वास्तविक नाम बुद्धिसेन था। पन्ना नरेश खेत सिंह ने बुद्धिसेन का उपनाम बोधा किया था। पन्ना के दरबार की सुभान (सुबहान) नाम की एक गणिका से बोधा प्रेम करते थे। बोधा की प्रमुख रचनाएँ हैं- (1) विरह वारीश, (2) इश्कनामा। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने तीन ठाकुर की चर्चा की है- (1) असली वाले प्राचीन ठाकुर, (2) असनी वाले दूसरे ठाकुर और (3) ठाकुर बुन्देल खंडी। रीतिकाल की रीतिमुक्त काव्यधारा से ठाकुर बुन्देलखण्डी का सम्बन्ध है। इनका मूल नाम लाला ठाकुरदास था। रीतिकाल गकर के आश्रयदाता जैतपुर नरेश राजा केसरी सिंह तथा उनके पुत्र राजा पारीछत थे। ॥ ठाकुर की प्रमुख काव्य कृतियाँ हैं- (1) टाकुर ठसक, (2) ठाकुर शतक। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ठाकुर के सम्बन्ध में लिखा है- (1) अकुर बहुत ही सच्ची उमंग के कवि थे। इनमें कृत्रिमता का लेश नहीं है। न तो कहीं व्यर्थ का शब्दाड़म्बर है, न कल्पना की झूठी उड़ान और न अनुभूति के विरुद्ध भावों का उत्कर्ष। (2) ठाकुर प्रधानतः प्रेम निरूपक होने पर भी लोक व्यवहार के अनेकांगदर्शी कवि थे। ० द्विजदेव (महाराज मानसिह) अयोध्या के महाराज थे। ० द्विजदेव प्रमुख रचनाएँ हैं- (1) श्रृंगारलतिका, (2) श्रृंगार बत्तीसी। ० आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है- (1) ब्रजभाषा के श्रृंगारी कवियों की परम्परा इन्हें अन्तिम प्रसिद्ध कवि समझना चाहिए। जिस प्रकार लक्षण ग्रन्थ लिखने वाले कवियों में प‌द्माकर अन्तिम प्रसिद्ध कवि हैं उसी प्रकार समूची श्रृंगार परम्परा में ये इनकी सी सरस और भावमयी फुटकल श्रृंगारी कविता फिर दुर्लभ हो गई। (2) ऋतु वर्णनों में इनके हृदय का उल्लास उमड़ पड़ता है। रीतिकालीन कवियों की महवत्वपूर्ण काव्य पंक्तियाँ रीतिबद्ध कवि (क) चिन्तामणि (1) रीति सुभाषा कवित्त को बरनत बुध अनुसार। (कविकुलकल्पतरु) (2) येई उधारत हैं तिन्हें जे, परे मोह महोदधि के जल फेरे। (3) इक आजु मैं कुंदन बेलि लखी, मनिमंदिर की रुचिवृंद भरें। अरविद के पल्लव इंदु तहाँ, अरविन्दन ते मकरंद झरें ॥ (4) आँखिन मुंदिबे के मिस आनि, अचानक पीठि उरोज लगावै। कैहूँ कहूँ मुसकाय चितै, अगराय अनूपम अंग दिखावै ॥ (5 ) अवलोकनि में पलकै न लगें, पलकों अवलोकि बिना ललकै। पति के परिपूरन प्रेम पगी मन और सुभाव लगै न लकै ॥ तिय की बिहं सौही विलोकनि में, 'मनि' आनंद आँखिन यो झलकै। रसवंत कवित्तन को रस ज्यों अखसन के ऊपर है छलकै ॥ (6) सगुन अलंकारन सहित दोष रहित जो होई। अर्थ शब्द ताको कवित्त कहत विवुध सब कोई। (ख) मतिराम (1) नृपति नैन कमलनि वृथा, चितवत बासर जाहि। हृदय कमल में हरि लै, कमलमुखी कमलाहि ॥ (सतसई) (2) छोडि आपनो भौन तुम, भौन कौन के जात। (२) ने धनि ले ब्रजराज लखें गृहकाज करें अरु लाज संभारें । 102 (4) कोऊ कितेक उपाय करो, कहुँ होत हैं आपुने पीव पराये। (5) कुंदन को रंग फीकौ लगै झलकै सब अंगन चारु गुराई। आँखनि में अलसानि चितौनि में, मंजु बिलासन की सरसाई ॥ को बिनु मोल बिकात नहीं मतिराम लहै मुसकानि मिठाई। ज्यों ज्यों निहारिए नेरे है नैननि त्यों त्यों खरी निकरें सी निकाई ॥ (6) क्यों इन आंखिन सो निहसंक, है मोहन को तन पानिप पीजै ? नेकु निहारे कलंक लगै यहि गाँव बसे कहु कैसे कै जीजै ॥ (7) केलि कै राति अधाने नहीं दिन ही में लला पुनि घात लगाई। (8) दोऊ अनंद सो आँगन माझ विराजै असाढ़ की साँझ सुहाई। आँखिन तें गिरे आँसुन की बूँद, सुहास गयो उड़ि हंस की नाई ॥ (ग) देव (1) अपनी-अपनी रीति के काव्य और कवि रीति। (2) भाषा प्राकृत संस्कृत देखि महाकवि पंथ। (शब्द रसायन) (3) अभिधा उत्तम काव्य है; मध्य लक्षणा लीन। अधम व्यंजना रस बिरस, उलटी कहत नवीन ॥ (4) पर रस चाहै परकीया, तजै आपु गुन गोत। (5) प्रेमहीन प्रिय वेश्या है श्रृंगाराभास। (6) दधि, धृत, मधु, पायस तजि वायसु चाम चबात । (7) साँसन ही में समीर गयो अरु आँसुन ही सब नीर गयो ढरि। (8) बेगि ही बूड़ि गई पंखियाँ अखियाँ मधु की मखिया भई मेरी। (9) साँवरै लाल को रूप मैं नैनन को कजरा करि राख्यो ॥ (10) प्रेम तो कहत ठाकुर न ऐठों सुन, बैठो, गड़ि, गहिरे ती पैठो प्रेम सर में। (11) साथ में रखियों नाथ उन्हें हम हाथ में चाहत चार चुरीये। (12) रावरो रूप भरयो अँखियान भरयो सु भरयो उनरयो सु दरयो परै। (13) बंसीवट तट नटनागर नटतु मों। (14) है उपजे रज बीजहि ते, विनसे तू सबै छिति छार के छाँड़े। एक से देखु कछू न विसेखु ज्यों एकै उन्हार कुन्हार के भाँड़े ॥ तापर ऊँच औ नीच विचारि वृथा बकियाद बढ़ावत चाँड़े। वेदन मूँद कियो इन दुंदुकि सूद अपावन, पावन पाड़े ॥ (15) पारावार पूरन अपार पारब्रह्म रासि जसुदा के कोरै एक बार ही कुरै परी। (16) बड़े-बड़े नैनन सों आँसू-भरि भरि ढरि। गोरो गोरो मुख आज ओरो सो विलानो जात ॥ (घ) भूषण (1) सुकविन हूं की कछु कृपा समुझि कविन को पंथ। (शिवराज भूषण) (2) शिवा को बखानों कि बखानौ छत्रशाल को। (3) इंद्र जिमि जंभ पर बाड़व सुअंभ पर त्यों म्लेच्छ बंस पर सेर सिवराज है। रोतिकाल (4) दारा की दौर यह रार नहीं खुजबे की। (5) सिवा जो न होत तो सुनत हो सबकी। (6) ऊँचे घोर मंदर के अन्दर रहनबारी, ऊँचे घोर मंदर रहाती हैं। कंदमूल भोग करें, कंदमूल भोग करें, तीन बेर खाती सो तीन बेर खाती हैं। (7) पच्छी पर छीने ऐसे परे परछीने बीर। तेरी बरछीने बर छीने हैं खलन के। (ङ) भिखारीदास (1) काव्य की रीति सिखी सुकबीन सों देखी सुनी बहुलोक की बाते। (2) ब्रजभाषा हेतु ब्रजबास ही न अनुमानौ, ऐसे ऐसे कबिन की बानी हूँ सों जानिए। (3) आगे के कवि रीझहै, तो कविताई न तो राधा कन्हाई सुमिरन कौ बहानौ है। (4) ब्रजभाषा भाषा रुचिर, कहै सुमति सब कोई। मिल संस्कृत पारस्यौ, पै अति प्रवाट जु होई ॥ ब्रज, मागधी मिलै अमर, नाग यवन भाखनि । सहज पारसी हूँ मिलै, षट् विधि कहत बखानि ॥ (5) जातें कछु हाँ हूँ लह्यों कविताई को पंथ। (6) श्रीमानन के भौन में भोग्य भामिनी और। तिनहूँ को सुकियाह में गर्ने सुकवि सिरमौर ॥ (7) अँखियाँ हमारी दई मारी सुधि बुधि हारी। (8) भाषा-बरनन में प्रथम, तुक चाहिए बिसेषि। उत्तम मध्यम अधम से, तीन भाँति को लेखि ॥ (१) अधर मधुरता कठिनता कुच विक्षनता त्यौर। रस कवित्त परिपक्वता जाने रसिक न और ॥ (10) एक लहै तप पुंजनि के फल ज्यों तुलसी अरु सूर गोसाई। एक लहै बहुसंपति के सब भूषन ज्यों बर बीर बड़ाई ॥ एकनि को जस हो सो प्रयोजन है रसखानि रहीम की नाई। दास कवित्तन की चरसा बुधिवर्तनी को सुख दैव सब ठाई ॥ ( 11) अलक पै अलिवृंद भाल पै अधर चंद। भ्रूपै धनु नयननि पै वारों कंजदल में ॥ (12) अरविन्द प्रफुल्लित देखि कै भौर अचानक जाई अरें पै अरें। (च) पद्माकर (1) आखर लगाय लेत लाखन की सामा हाँ। (2) फागु की भीर, अभीरिन में गहि गोविन्द लै गई भीतर गोरी। भाई करी मन की प‌द्माकर, ऊपर नाई अबीर की झोरी ॥ छीनि पितंबर कम्मर ते सु बिदा दई मीड़ि कपोलन रोरी। नैन नचाय कही मुसकाय, लला फिर आइयो खेलन होरौ ॥ (3) गवरे रंग रंगी अंखियान में ए बलबीर अबीर न मैलो। (4) ऊधम ऐसो मचो ब्रज मैं सबै रंग तरंग उमंगनि सींचें। भाषा का भरतुनिष्ठ इतिहास (5) बीर अबीर अभीरन को दुःख भायें न बनै भ थनै बिन भार्ष। (6) मीनागढ़ बंबई, समुद्र मंद राज चंग। चंदर की बंद करि बंदर व मावैगी ॥ (दौलतराम सिन्धिया की मृत्यु पर) (7) और रय और रीति और राग और रंग और तन और मन और बन गये ॥ (8) साजि चतुरंग चमू जंग भीतिये के हेतु, हिम्मत बहादुर चढत फर फैल है। (9) एक पग भीतर और एक देहरी में भरे, एक कर केज, एक कर है किवार पर ॥ (10) एक सँग भाये नंदलाल और गुलाल बीऊ, दूगनि गये जुर्मार आनन्द गर्दै नहीं। (छ) रसलीन (1) अमिय हलाहल मद भरे, सेत स्याम रतनार। जिगत, मरत, झुकि झुकि परत, जेहि चितवत एक बार ॥ (2) ब्रजबानी सीखन रची यह रसलीन रयाल। गुन युबरन नग अरथ लहि, हिय धरियो च्यीं माल ॥ (3) फूले कुंजर अलि भ्रमत, गीतल चलत समीर। भान जान काकी न मन जात भानुजा तीर ॥ (4) दूगन जोरि मुसकाय अरु, भौहें दौड नचाय। औठनि औगि बनाइ यह, प्राण उमेदत जाइ ॥ (5) तिय मैयन-जीवन मिले, भेद न जान्यो जात। प्रात यमय निधि चीर्य के दुवौ भाव दरमात ॥ (6) कत दिखाइ कामिनी दर्द, दामिनी की यह चौह। भस्थति यी तन फिी फरफरात घन पौह ॥ (7) चख चलि नवन मिल्यो चहत, कच यदि छुवन छवानि। कॉट निज दरय भद्यी चहत, वक्षस्थल में आनि ॥ तिमिन्द्र कवि क) बिहारीलाल (1) नहिं पराण नहिं मधुर मधु नहि निकाय यहि काल। अनी कली ही यी चाभी, आर्ग कौन हवाल ॥ (2) ત્રીના on 14, you un daini swagg gg lith, & વૃદ્ધ પ4 111 (3) अंग-अंग नग जगनी, नी शिखा श्री देह। ભોળા ચુછાય ॥ 1, મshi in 1 (4) २८ चिणार मंजन किये, केजन मंजन हैन। 31 Janm, છ અને સ્વઅને તૈમ 5) अनियार, भीरथ दूनि किती न तीन समान। वह चितवन और कछु, जिहि बस होत सुजान ॥ (6) चनस्य लालच लाल की मृग्नी भरी लुकाय। यौट की भीडनि हैं, दैन कई नटि जाय ॥ (7) नाया भोरि नचाय दूग, करी कका की चौह। कॉट यी कसके लिये, गड़ी कैटीची भीट ॥ (8) इति आवन पनि जानउन, चली छ मातक हाथ। चढी हिंदॉर भी रहे, लगी उयायन हाथ ॥ (१) आई है आले चयन, जाड़े हैं कि गति। याहय के के नेह बम, सखी सबै हिंग जाति ॥ (10) भूग उरात टूटत कुटुम जुरत चतुर चित प्रीति। परर्गत गाँड दूरजन लिए, दई नई यह रीनि ॥ (11) सधन कुंभ छाया सुखद, चीतल मंद समीर। मन है जान अजी वहै, वा यमुना के तीर ॥ (12) कनक कनक ने चौगुनी, मादकता अधिकाय। यह खाए बौगए नर, यह पाए, चौगय ॥ (13) लरिका जैये के मिसून, लंगरु भोग दिग आঃ। गयी अचानक आँगुरी, छानी छैल छुपाई ॥ (14) कहत नदत रीक्षन खीझन मिलन खिलत लजियात। भर भीन में करत हैं नैननि ही यी बान ॥ (15) मेरी भव बाधा हरी गथा नागर मोइ। जा तन की छाई पी श्याम हरित दुति होइ ॥ (16) अपने अंग को जानिर्क, जीयन नृपति प्रवीन। स्तन मन मैन निर्तय को बड़ी इजाफा कीन ॥ (17) कागद पर लिखत न बनन, कहन मंदेश लजात। कहिरै सब तेरी हियो, मेरे हिय की बात ॥ (18) या अनुरागी चिन की गति ममुझे नहि कोग। भी भी चूदे स्याम रंग त्यी त्यौ उन्न्चल होय ॥ (19) जी वाकै तन की दशा देख्यो चाहत आप। ती बलि नैक विलीकियत चलि औचक चुपचाप ॥ (20) चीय मुकूट कटि काछनी कर मुरली दर माल। इहि चानिक यो मन यी यदा बिहारी लाल ॥ (21) यर्म यमै चुन्दर यवै रूप करूण न कोय। मन की भूमि जैनी जिये नित नेनी मंचि होय ॥ (22) चमनमात चंचल भयन बिच घूंघट पर झीन। मानह भूत्यरिता विगल जल डाहरन जुग मीन ॥ (23) चौहत ओदै पीत पर प्याम यलीने गात। मनी नीलमनि मैल पर आतप पढ्यौ प्रभात ॥ (24) पत्रा ही तिथि पाइए, वा घर के चहुँपास। नित प्रति पून्योई रहै, आनन ओप उजास ॥ रीतिमुक्त कवि (क) शेख आलम (1) कनक छुरी सी कामनी, काहे को कटि छीन। (आलम) कटि को कंचन काटि विधि, कुचन मध्य धरि दीन ॥ (शेख) (2) प्रेम रंग-पगे जगमगे जगे जामिनी के जोबन की जोति जगी जोर उमगत है। (3) जा थल किने बिहार अनेकन ता थल काँकर बैठि चुन्यो करें। नैननि में जो सदा रहते तिनकी अब कान कहानी सुन्यौ करें ॥ (4) कैधौं मोर सोर तजि गए री अनत भाजि, कैर्धी उत दादुर न बोलत हैं, ए दई ॥ (5) रात के उनींदें अरसाते मदमाते राते, अति कजरारे दृग तेरे यों सुहात हैं ॥ (6) दाने की न पानी की, न आवै सुध खाने की, यौं गली महबूब की अराम खुसखाना है ॥ (7) दिल से दिलासा दीजै हाल के न ख्याल हूजै बेखुद फकीर, वह आशिक दीवाना है। (ख) घनानंद (1) यों घन आनन्द छावत भावत, जान सजीवन ओर ते आवत ॥ लोग है लागि कवित्त बनावत मोहि तो मेरे कवित्त बनावत ॥ (2) अति सुधीं सनेह को मारगु हैं, जहँ नैकु सयानप बाँक नहीं ॥ (3) तुम कौन सी पाटी पढ़े हो लला मन लेहु पे देहु छटांक नहीं ॥ (4) हीन भय जल मीन अधीन कहा कछु मों अकुलानि समानै ॥ (5) प्रेम की महोदधि अपार हेरि के विचार खरे अवरन भरे है उठि जानको । (6) उरजिन बसी है हमारी आँखयानी, देखो सुबस सुदेव जहाँ रावरे बसत हों। (7) जमुना के तीर केलि कोलाहल भीर ऐसी पावन पुलिन पै पतित परे रहि रे। (8) रावरे, रूप की रीति अनूप नयी नयी लागत ज्यों-ज्यों निहारिये ॥ (9) उघरो जग छाय रहे घन आनंद, चातक ज्यौं तकिए अब तो। (10) कहिए सु कहाँ, अब मौन भली, नहिं खोवते जौं हमें पावते जू ॥ (11) झूठ की सचाई छाक्यौ त्यों हित कचाई पाक्यो, ताके गुबगन घनआनंद कहा गनौ ॥ (12) अंतर की किधी अंत रहीं, दूग फारि फिरों की अभागनि भीरौ ॥ (13) झलकै अति सुन्दर आनन गौर छके दृग राजति कानन छ्‌वै। (14) तीछन ईछन बान बखान, पैनी दसाहि लै सान चढावत। (15) कबहुँ वा विसासी सुजान के आँगन मों अंसुवानि लै बरसौ। (16) अंग अंग तरंग उठै दुति की, परिहैं मनो रूप अवै धर च्वै ॥ (17) हिय में जु आरति सुजारति उजारति है मारति मरो रै जिय डारति कहा कहाँ ॥ (18) बदरा बरसै रितु में घिरकै नित ही अखियाँ उधरी बरसैं। (19) यह कैसो संजोग न बूझि परै जु वियोग न क्यों हूँ विछोहतु हैं ॥ (20) गति सुनि हारी, देखि थकनि में चली जाति, थिर चर दसा कैसी ढकी उघरति है। (21) बहुत दिनान को अवधि आसपास परे, खरे अरबरन भरे हैं उठि जानको। (22) उधर लगे हैं आनि करिकै पयान प्रान चाहत चलन ये संदेसो लै सुजान को। (23) इत बाट परी सुधि रावरे भूलनि कैसे उराहनो दीजिए जू। (24) सलोने स्याम प्यारे क्यों न आवौ। दरस प्यासी मरें तिनका जिवावाँ ॥ (25) जिन आँखिन रूप चिन्हारी भई, तिनकी नित नीरहि जागनि है। (26) जग की कठिनाई के धोखे रहे हयाँ प्रवीनन की मति जाति जकी। (27) पूरन प्रेम को मंत्र महा पन जा मधि सोधि सुधारि है लेख्यो। (28) परकारज देह को धारे फिरौ परजन्य! जथारथ है दरसौ। (29) ऐरे बीर पौन ! तेरो सबै और गौन वारि। तो सो और कौन मनै ढरकै ही बानि दै। (30) जगत के प्रान ओछे बड़ का समान, घन आनन्द निदान सुखदान दुखियानि दै। (ग) बोधा (बुद्धि सेन) (1) अति खीन मृनाल के तारहु तें नहिं ऊपर पाँव दै आवनो है। यह प्रेम को पंथ कराल महा तरवारि की धार पै धावनो है ॥ (2) एक सुभान के आनन पै कुरवान जहाँ लगि रूप जहाँ को। जान मिलै तो जहान मिलै, नहिं जान मिलै तो जहान कहाँ को। (3) कवहूँ मिलिबो, कबहूँ मिलिवो, वह धीरज ही में धरैबो करें। सेहत ही वनै, कहते न बनै, मन ही मन पीरपिरैबो करै ॥ (4) दाता कहा, सूर कहा, सुन्दर सुजान कहा, आपको न चाहै ताके बाप को न चाहिए ॥ (घ) ठाकुर (1) सीखि लीन्हों मीन मृग खंजन कमल नैन, सीखि लीन्हों जस और प्रताप को कहाना है। लोगन कवित्त कीबो खेल करि जानो है ॥ (2) भूप से लसत कवि, कवि से लसत भूप भूप और कवि से लसत सभा की गरुआनो है। (3) हम कविराज हैं, पै चाकर चतुर के। (4) वा निरमोहिनी रूप की रासिजऊ उर हेतु न ठानति हवै है। आवत है नित मेरे लिए इतनो तो विसेषकै जानति वें है। (5) सेवक सिपाही हम उन राजपूतन को। दान जुद्ध जुरिवे में नेकु जे न मुरको ॥ (6) बिधि के बनाए जीव जेते हैं जहाँ के तहाँ, खेलत फिरत तिन्हें खेलन फिरन देव ॥ रीतिकाल की अन्य काव्य प्रवृत्तियाँ एवं कवि (अ) नीतिकाव्य रीतिकाल के प्रमुख नीतिकार निम्नलिखित हैं- माषा का वस्तुनिष्ठ इतिहास कवि जन्म-मृत्यु ई० जाति रचनाएँ गिरधर कविराय 1722 भार स्फुट कुंडलिया सम्मन 1777 ब्राह्मण (1) स्फुट दोहा, (2) पिंगल काव्यभूषण वैताल 1782 बंदीजन स्फुट कुंडलिया दीनदयाल गिरि 1802-1858 गोसाई (1) अन्योक्तिकल्पद्रुम (1855 ई०), (2) अनुराग बाग (1831 ई०), (3) वैराग्य दिनेश (1849 ई०), (4) विश्वनाथ रत्न (1822 ई०), (5) दृष्टांत तरंगिणी (1822 ई०) बैताल ने सभी कुंडलियों की रचना 'विक्रम' को सम्बोधित करके लिखी है। (ब) वीर काव्य रीतिकाल के प्रमुख प्रबन्धात्मक वीर काव्य के रचनाकार निम्न हैं- कवि रचनाएँ लाल कवि (गोरेलाल) छत्र प्रकाश सूदन सुजान चरित खुमान 'मान' (1) नृसिंह चरित्र, (2) लक्ष्मण शतक जोधराज हम्मीर रासो बांकीदास (1) सूरछतीसी, (2) वीर विनोद (स) भक्तिकाव्य (1) संत-काव्य यारी साहब का मूल नाम यार मुहम्मद था। ये बावरी सम्प्रदाय के प्रसिद्ध संत थे। दरिया साहब (1664-1780 ई०) मूलतः बिहार के रहने वाले थे। इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं- (1) ज्ञानदीपक, (2) दरिया सागर। जगजीवन दास (1670-1761 ई०) दादू दयाल के शिष्य थे। ये 'सत्यनामी' (सतनामी) सम्प्रदाय के प्रवर्तक थे। जगजीवनदास के मुख्य शिष्य गोविन्द साहब, भीखा साहब, पलटू साहब थे। सतनामी सम्प्रदाय की प्रधान गद्दी बाराबंकी जिले के कोटवा नामक स्थान पर है। जगजीवनदास की प्रमुख रचनाएँ हैं- (1) प्रथम ग्रन्थ, (2) ज्ञान प्रकाश, (3 शब्द सागर, (4) आगम पद्धति, (5) महाप्रलय, (6) प्रेम पंथ, (7) अघ विनाश चरनदास (1703-1782) ने 'चरनदासी सम्प्रदाय' का प्रवर्तन किया। चरनदास अपना गुरु शुकदेव मुनि को मानते थे। चरनदासी सम्प्रदाय की 52 शाखा इनके बावन शिष्यों ने स्थापित किये। इनके प्रमुख ग्रन्थ हैं- (1) अमर लोक अखण्ड धाम वर्णन, (2) अष्टांग योग (3) ज्ञान स्वरोदय, (4) धर्म जहाज, (5) पंचोपनिषद, (6) व्रजचरित्र, (7) ब्रह्मज्ञान सागर शब्द, (8) भक्तिसागर, (9) मनविकृतिकरण गुटकासार, (10) योग सन्देह सागर, (11) भक्ति पदार्थ। शिवनारायण (1716-1791 ई०) ने 'शिवनारायणी सम्प्रदाय' का प्रवर्तन किया। शिवनारायण ने संत दुखहरनदास को अपना गुरु स्वीकार किया। शिवनारायण की सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना 'गुरु अन्यास' है। तुलसी साहब (1760-1884 ई०) का मूल नाम श्यामराव था। ये स्वयं को गोस्वामी तुलसीदास का अवतार मानते थे। तुलसी साहब ने हाथरस (अलीगढ़) में 'साहव पंथ' का प्रवर्तन किया। तुलसी साहब की प्रमुख रचनाएँ निम्नांकित हैं- (1) घट रामायण, (2) रत्नसागर, (3) शब्दावली, (4) पद्म सार (अपूर्ण)। अन्य संत कवि संत कवि ग्रन्थ गुरु तेगबहादुर - 'आदि ग्रन्थ' (गुरुमुखी लिपि में लिखी रचनाएँ) आनन्दघन (1) आनन्दघन चौबीसी, (2) आनन्दघन बहोत्तरी। अक्षर अनन्य (1) सिद्धान्तबोध, (2) ध्यान योग, (3) विज्ञान योग, (4) राजयोग, (5) विवेक दीपिका और (6) अनन्य प्रकाश। प्राणनाथ (1) मारफत सागर, (2) कयामतनामा, (3) सिद्धिभाषा, (4) सागर सिगार, (5) किरतन, (6) खुलास, (7) संबंध, (8) खेलबात, (9) षऋतु, (10) कलस, (11) रामग्रन्थ। धरणीदास (1) प्रेमप्रकाश, (2) रत्नावली बूला साहब - (1) शब्दसागर दयाबाई- सहजोबाई- (1) सहज प्रकाश शिवदयाल (1) स्वामीजी महाराज गुरु तेग बहादुर सिंह सिखों के नवें गुरु थे। दयाबाई और सहजोबाई संत चरणदास की शिष्या थीं। दोनों चचेरी बहनें थीं। शिवदयाल 'राधास्वामी सत्संग' के प्रवर्तक थे। प्रेमाख्यानक काव्य शेख निसार का मूल नाम गुलाम अशरफ था। ये मुगल बादशाह आसफुद्दौला के समकालीन थे। शेख निसार ने सन् 1790 ई० में अवधी भाषा में 'यूसुफ जुलेखा' नाम से प्रेमाख्यानक काव्य लिखा। सूरदास गुरदासपुर के निवासी थे। इनके पिता का नाम गोवर्धनदास था। सूरदास ने सन् 1657 ई० 'नलदमन' प्रेमाख्यानक काव्य की रचना की। दुखहरनदास का मूलनाम मनमनोहर था। ये संत कवि मलूकदास के शिष्य थे। दुखहरन ने सन् 1669 ई० में 'पुहुपावती' शीर्षक से प्रेमाख्यानक काव्य लिखा। अन्य सूफी कवि सूफी कवि प्रेमाख्यानक काव्य केसि माधवानल नाटक (1660 ई०) दामोदर माधवानल कथा (1680 ई०) हंस चन्द्रकुवर री बात (1693 ई०) जनकुंज उषा चरित्र (1780 ई०) चतुर्भुजदास मधुमालती (1780 ई०) सेवाराम नल दमयंती चरित्र (1796 ई०) जीवनदास नागर उषा अनिरुद्ध (1829 ई०) मुरलीदास उषा अनिरुद्ध (1831 ई०) रामदास उषा अनिरुद्ध (1837 ई०) रामकाव्य रोतिकाल में रचित महत्वपूर्ण रामकाव्य निम्नांकित हैं- कवि रामकाव्य जानकी रसिक शरण (1) अवध सागर, (2) अष्टयाम प्रसंग। भगवन्तराय खीची- (1) रामायण, (2) हनुमत्पच्चीसी (1760 ई०)। जनकराज किशोरी शरण (1) सीताराम सिद्धान्त मुक्तावली, (2) सीताराम रस तरंगिणी, (3) जानकी करुणा भरण, (4) रघुवर करुणा भरण। नवल सिंह- (1) रामचन्द्र विलास, (2) आल्हा रामायण, (3) अध्यात्म रामायण, (4) रूपक रामायण, (5) सीता स्वयंवर, (6) राम विवाह खण्ड, (7) नाम रामायण, (8) रामायण सुमिरनी, (9) मिथिला खण्ड। विश्वनाथ सिंह- (1) आनन्द रघुनंद नाटक, (2) रामचन्द्र की सवारी। रामप्रिया शरण (1) सीतायन (सीताराम प्रिया)। रसिक अली (1) प‌ऋतु पदावली, (2) होरी, (3) अष्टयाम और मिथिला विहार। सूरजराम पण्डित- जैमिनी पुराण भाषा (1748 ई०)। कृपानिवास- (1) भावना पच्चीसी, (2) समय प्रबन्ध, (3) माधुरी प्रकाश, (4) जानकी सहस्रनाम। मधुसूदन - रामाश्वमेध (1782 ई०)। जानकीशरण (1) सियाराम रसमंजरी। रीतिकाल बाल अली जू (1) नेह प्रकाश गोकुल नाथ- (1) सीताराम गुणार्णव (1813 ई०) मनियार सिंह- (1) हनुमत छब्बीसी, (2) सौन्दर्यलहरी, (3) सुन्दरकाण्ड। ललूकदास (1) सत्योपाख्यान गणेश- (1) वाल्मीकि रामायण श्लोकार्थ प्रकाश, (2) हनुमत पच्चीसी। प्रेमसखी (1) राम तथा सीताजी का नखशिख विश्वनाथ सिंह कृत 'आनन्द रघुनन्दन' को कई विद्वान हिन्दी का प्रथम नाटक मानते हैं। कृपानिवास ने 18वीं शती के अन्तिम चरण में 'रामायत सखी सम्प्रदाय' का प्रवर्तन किया। प्रेम सखी का मूलनाम 'बख्शी हंसराज श्रीवास्तव' था। कृष्णकाव्य रीतिकाल में रचित प्रमुख प्रबन्धात्मक कृष्ण काव्य और कवि निम्नांकित हैं- कवि ग्रन्थ गुमान मिश्र (1) कृष्णचंद्रिका (1781 ई०), (2) नैषध काव्य, (3) छंदाटवी। ब्रजवासीदास (1) ब्रजविलास (1770 ई०) कवि मंचित (1) कृष्णायन, (2) सुरभीदान लीला। गुमान मिश्र ने हर्षकृत 'नैषध काव्य' का अनुवाद ब्रजभाषा में किया। रोतिकाल में रचित मुक्तक शैली में रचित कृष्ण काव्य अग्रांकित हैं- कवि सम्प्रदाय गुरु रचनाएँ रूपरसिक देव निम्बार्क हरिव्यासदेव नागरीदास (सावंत सिंह) अलबेली अलि विष्णु स्वामी वंशी अली चाचा हितवृंदानदास राधावल्लभ भगवत रसिक सखी ललित मोहनीदास (1) लीलाविशति (1730), (2) हरिव्यास यशामृत, (3) नित्यविहार पदावली, (4) वृहदोत्सव मणिमाला। (1) मनोरथ मंजरी (1723 ई०), (2) इश्क चमन, (3) जुगल रस-माधुरी, (4) फाग विलास, (5) रास-रसलता, (6) फाग बिहार (1751 ई०), (7) रसिक रत्नावली (1725 ई०)। (1) श्री स्रोत, (2) समय प्रबन्ध पदावली। (1) लाड़ सागर, (2) ब्रज प्रेमानन्द सागर, (3) जुगल सनेह पत्रिका, (4) कृपा अभिलाष बेली, (5) भ्रमरगीत। (1) अनन्य निश्चयात्मका ग्रन्थ वृन्दावन देव पीताम्बरदास निम्बार्क सखी रमिकदास (1) निम्बार्क-माधुरी (कृष्णामृत गंगा) (1) केलिमाल की टीका, (2) समय प्रवन्ध, (3) सिद्धान्त और रस की माखी, (4) सिद्धान्त और रस के पद (1) नेह निधि, (2) संकेत युगल, (3) भावना प्रकाश सुंदरी कुंवरिबाई राधावल्लभ प्रेम सखी सखी विजय सखी (1) सनेह सागर, (2) विरह विलास, (3) कृष्ण जू की पाती, (4) बारह-मासा, (5) विरह पत्रिका, (6) फागतरंगिनी। सहचरि सरन सखी (1) ललित प्रकाश, (2) सरस मंत्रावली। (1) माधुर्य लहरी (1796 ई०)। कृष्णदास रत्नकुँवरि दामोदर चौधरी उरदाम (1) प्रेमरत्न (1800) (प्रबन्धकाव्य) (1) उरदाम प्रकाश, (2) कूवरी किलोल, (3) कान्हा की वंशी, (4) मनमौज सागर, (5) कोरदार बत्तीसी। वृन्दावनदेव प्रसिद्ध कवि घनानन्द के गुरु थे। सुन्दरी कुंवरिबाई पीताम्बरदास की उपपत्नी थीं। रत्नकुंवरि राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द की दादी थीं। हास्य-व्यंग्य अली मुहिय खाँ 'प्रीतम' ने 'खटमल वाईसी' नामक एक हास्य रस की पुस्तक लिखी।

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