Part-1 हिंदी भाषा एवं साहित्य का वास्तुंनिस्ट इतिहास बाय सरस्वती पांडे गोविंद पांडे बुक इन हिंदी (बुक, सरस्वती पांडे गोविंद पांडे)
दो शब्द
साहित्य एवं भाषा का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। शब्द एवं अर्थ के सहभाव को साहित्य कहते हैं। साहित्य सृजनशील एवं रचनात्मक प्रक्रिया है जबकि भाषा सृजनशील एवं रचनात्मक प्रक्रिया की अभिव्यक्ति का साधन है। आचार्य भर्तहरि का कथन है कि भाषा ज्ञान को प्रकाशित करती है-
"वाग्रूपता चेन्निष्क्रामेदवबोधस्य शाश्वती। न प्रकाशः प्रकाशेत साहि प्रत्यवमशिनी।।"
साहित्य ज्ञान का संचित कोश होता है और भाषा ज्ञान संचयन का माध्यम। साहित्य एवं भाषा के हजार वर्षों के इतिहास के तथ्यात्मक अध्ययन की यात्रा काफी दिलचस्प है।
इतिहास लेखन कठिन एवं श्रमसाध्य प्रक्रिया है। वस्तुनिष्ठता एवं प्रामाणिकता इसकी अनिवार्य शर्त है। इतिहास में बिना तथ्यों को निर्गत किये विचारों एवं सिद्धान्तों की लकीर खींचना सर्वथा कठिन है। वस्तुतः साहित्य एवं भाषा का इतिहास भी इन्हीं कठिनाइयों से विकसित हुआ है। हिन्दी साहित्य के इतिहास सम्बन्धी तथ्यों की प्रामाणिकता के सन्दर्भ में हमने अपनी प्रथम पुस्तक 'हिन्दी साहित्य: एक वस्तुनिष्ठ इतिहास' की भूमिका में संक्षेप में चर्चा की है। जिसका उल्लेख करना यहाँ समीचीन प्रतीत हो रहा है-
(1) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने 'प्लेग की चुड़ैल' (1902 ई०) कहानी को मास्टर भगवानदास का लिखा बताया है जबकि डॉ० नगेन्द्र द्वारा सम्पादित इतिहास में इसका लेखक लाला भगवानदीन को माना गया है। शुक्लजी ने 'नई धारा प्रथम उत्थान' में खड़ी बोली की कविता 'दशरथ-विलाप' को अम्बिकादत्त व्यास का लिखा बताया है परन्तु डॉ० नगेन्द्र इसे भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का मानते हैं। इसी क्रम में शिवमंगल सिंह 'सुमन' कृत 'मिट्टी की बारात' को डॉ० नगेन्द्र ने त्रिलोचन की रचना होने की बात लिखी है। तथ्यगत विसंगतियों के साथ-साथ रचना के प्रकाशन वर्ष, लेखकों की जन्म-मृत्यु सम्बन्धी तिथियों में भी अनियमितता है।
(2) हजारी प्रसाद द्विवेदी के 'हिन्दी साहित्य की भूमिका' और 'हिन्दी साहित्य: उद्भव और विकास' पुस्तक में अलग-अलग ढंग से तथ्य प्रस्तुत किये गये हैं। जैसे, रामानन्द के बारहों शिष्यों के नाम में अन्तर, नामदेव की जन्मतिथि में अन्तर, नूर मुहम्मद की रचना तिथि क्रम में अन्तर इत्यादि।
(3) डॉ० बच्चन सिंह के 'हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास' में कई तथ्यों को दूसरे ढंग से ही प्रस्तुत किया गया है। जैसे इन्होंने अपनी पुस्तक में एक दोहा उद्धृत किया है, जो निम्न है-
"सजन सकारे जाएँगे, नैन मरेंगे रोय। बिधना ऐसो रैन कर, भोर कभी ना होय।।"
इस दोहे को बच्चन सिंह ने अमीर खुसरो का बताया है। देश की मानक परीक्षा यू०जी०सी० दिसम्बर, 2012 के तृतीय प्रश्न-पत्र के 7वें प्रश्न में उक्त दोहे के रचनाकार का नाम पूछा था। यू०जी०सी० द्वारा जारी किये गये उत्तर कुंजिका (आंसर की) के अनुसार भी इसका लेखक अमीर खुसरो ही सिद्ध होता। किन्तु यह तथ्य पूर्णतः संदिग्ध है।
डॉ० इकबाल अहमद और डॉ० हरदेव बाहरी ने उक्त दोहे को शेख शरफुद्दीन बू अली कलन्दर का बताया है जो अमीर खुसरो का समकालीन था। डॉ० इकबाल ने पर्याप्त तथ्य देकर इस बात की पुष्टि भी की है।
(4) डॉ० गोपाल राय के 'हिन्दी उपन्यास का इतिहास' और 'हिन्दी कहानी का इतिहास' में दिये गये रचना प्रकाशन तिथियों को अन्य इतिहास ग्रन्थों से मिलाने पर तमाम अन्तर्विरोध दिखाई पड़ते हैं।
(5) भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित 'सप्तक' तथा प्रचलित इतिहास ग्रन्थों में कवियों की जन्मतिथि, नाम आदि में भी अन्तर मिलता है। 'दूसरा सप्तक' में जो शंकूत माथुर हैं उसे अन्य इतिहासकारों ने शकुन्तला माथुर बना दिया। नाम परिवर्तन का प्रवर्तन किस इतिहासकार ने किया यह कहना कठिन है।
(6) विभिन्न इतिहास ग्रन्थों में पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन वर्ष, सम्पादकों के नाम आदि में भी बहुत अन्तर पाया जाता है। आचार्य शुक्ल ने राजा लक्ष्मण सिंह के पत्र 'प्रजाहितैषी' की प्रकाशन वर्ष सं० 1919 (संवत् 1861 ई०) माना है तथा डॉ० नगेन्द्र, रामचन्द्र तिवारी प्रभृति विद्वानों ने इसका प्रकाशन वर्ष 1855 ई० माना है। इसी प्रकार डॉ० नगेन्द्र और डॉ० रामचन्द्र तिवारी के 'हिन्दी का गद्य साहित्य' में ढेरों अन्तर्विरोध हैं। डॉ० तिवारी ने चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की पत्रिका 'समालोचक' का प्रकाशन वर्ष 1924 लिखा है जो वास्तविकता से 22 वर्ष आगे है।
प्रस्तुत पुस्तक में साहित्य एवं भाषा के इतिहास व स्वरूप की तथ्यात्मक असंगतता को दूर करने का सार्थक प्रयास किया गया है। भाषा, साहित्य एवं व्याकरण के ऐतिहासिक तथ्यों को रोचक शैली के साथ वैज्ञानिक एवं क्रमबद्ध ढंग से निरूपित किया गया है। भाषा के अर्थ, उत्पत्ति एवं आदिकाल से लेकर समकालीन हिन्दी के विकास व स्वरूप को यथासम्भव प्रामाणिक ढंग से प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है। साथ ही भाषा विज्ञान व काव्यशास्त्र को भी पुस्तक में समाविष्ट किया गया है। हिन्दी भाषा की संविधानिक स्थिति, व्याकरणिक स्वरूप, नागरी लिपि एवं बोलियों को सुव्यवस्थित व सुसंगठित रूप में व्यक्त किया गया है। हमें पूर्ण विश्वास है कि पुस्तक विज्ञ पाठकों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी। साथ ही यह भी आशा है कि हमारी त्रुटियों व कमियों को विज्ञपाठक हमारी अल्पज्ञता समझकर क्षमा करेंगे और अपने अमूल्य सुझाव देने की कृपा करेंगे।
इस पुस्तक के लेखन में उन सभी विद्वानों का आभार व्यक्त करते हैं जिनकी पुस्तकों से हमें सहायता प्राप्त हुई है। अपने मित्र श्री आनन्द कुमार पाण्डेय एवं श्री हेमन्त कुमार शुक्ला को उनके महनीय सहयोग के लिए हम धन्यवाद ज्ञापित करते हैं।
हम अपने बड़े भैया डॉ० राम किशोर पाण्डेय भाभी डॉ० नीलम पाण्डेय, दीपक कुमार पाण्डेय, विशाल पाण्डेय, गौतम पाण्डेय, भाभी मंशा पाण्डेय एवं दीदी श्रीमती लक्ष्मी तिवारी द्वारा प्रदत्त आशीर्वचन, आत्मिक सम्बल एवं प्रेरणा के लिए उनके प्रति श्रद्धावनत है। साथ ही प्रांजलि तिवारी (रोली), आयुषी तिवारी (पिन्टू), वेदान्त तिवारी (उज्ज्वल), श्रद्धा पाण्डेय एवं खुशी पाण्डेय के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करते हैं जिन्होंने अपने बाल सुलभ चेष्टाओं से हम सदैव अभिसिंचित किया है।
भाषा
'भाषा' शब्द संस्कृत 'भाष्' धातु से निष्पन्न है जिसका अर्थ है 'भाष व्यक्तायां वाचि' अर्थात् व्यक्त वाणी। 'भाष्यते व्यक्तवाग् रूपेण अभिव्यज्यते इति भाषा' अर्थात् भाषा उसे कहते हैं जो व्यक्त वाणी के रूप में अभिव्यक्ति की जाती है।
है-भारतीय तथा पाश्चात्य विद्वानों ने भाषा की परिभाषा निम्न ढंग से प्रस्तुत की
भारतीय विद्वान-
(1) "व्यक्ता वाचि वर्णा येषा त इमे व्यक्तवाचः" अर्थात् जो वाणी वर्णों में व्यक्त हो उसे भाषा कहते हैं। - पतंजलि
(2) "भाषा वह साधन है, जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचार दूसरों पर भली भाँति प्रकट कर सकता है और दूसरों के विचार आप स्पष्टतया समझ सकते हैं।"- कामता प्रसाद 'गुरु'
(3) "मनुष्य और मनुष्य के बीच वस्तुओं के विषय में अपनी इच्छा और मति का आदान-प्रदान करने के लिए व्यक्त ध्वनि संकेतों का जो व्यवहार होता है उसे भाषा कहते
हैं।" - डॉ० श्याम सुन्दरदास
(4) "भाषा मनुष्यों की उस चेष्टा या व्यापार को कहते है, जिससे मनुष्य अपने उच्चारणोपयोगी शरीरावयवों से उच्चारण किये गये वर्णात्मक या व्यक्त शब्दों द्वारा अपने विचारों को प्रकट करते हैं।" डॉ० मंगलदेव शास्त्री
(5) "जिन ध्वनि चिह्नों द्वारा मनुष्य परस्पर विचार-विनिमय करता है, उनको समष्टि रूप से भाषा कहते हैं।"- बाबू राम सक्सेना
(6) "अर्थवान, कण्ठोद्गीर्ण ध्वनि-समष्टि ही भाषा है।" - सुकुमार सेन
(7) "भाषा निश्चित प्रयत्न के फलस्वरूप मनुष्य के मुख से निःसृत वह सार्थक ध्वनि समष्टि है, जिसका विश्लेषण और अध्ययन हो सके।" - डॉ० भोलानाथ तिवारी
(8) "भाषा यादृच्छिक, रूढ़ उच्चारित संकेत की वह प्रणाली है जिसके माध्यम से मनुष्य परस्पर विचार-विनिमय सहयोग अथवा भावाभिव्यक्ति करते हैं।" - आचार्य देवेन्द्र नाथ शर्मा
(9) "ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा हृद्गत भावों तथा विचारों का प्रकटीकरण ही भाषा है।" - डॉ० पाण्डुरंग दामोदर गुणे
पाश्चात्य विद्वान
(1) "भाषा और कुछ नहीं है, केवल मानव की चतुर बुद्धि द्वारा आविष्कृत एक ऐसा उपाय है जिसकी मदद से हम अपने विचार सरलता और तत्परता से दूसरों पर प्रकट कर सकते हैं और जो चाहते हैं कि इसकी व्याख्या प्रकृति की उपज के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्य कृत पदार्थ के रूप में करना उचित है।- मैक्समूलर
(2) "ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा विचारों का प्रकटीकरण ही भाषा है। हेनरी स्वीट
(3) "भाषा उस स्पष्ट, सीमित तथा सुसंगठित ध्वनि को कहते है जो अभिव्यंजना के लिए नियुक्त की जाती है।"-क्रोचे
(4) "भाषा एक प्रकार का चिह्न है, चिह्न से तात्पर्य उन प्रतीकों से है, जिनके द्वारा मनुष्य अपना विचार दूसरों पर प्रकट करता है। ये प्रतीक भी कई प्रकार के होते हैं। जैसे नेत्रग्राह्य, श्रोतग्राह्य एवं स्पर्शत्राङा। वस्तुतः भाषा की दृष्टि से श्रोतग्राहा प्रतीक ही सर्वश्रेष्ठ हैं।" वांद्रेये
(5) "मनुष्य ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा अपना विचार प्रकट करता है। मानव मस्तिष् वस्तुतः विचार प्रकट करने के लिए ऐसे शब्दों का निरन्तर उपयोग करता है। इस प्रकार के कार्य-कलाप को ही भाषा की संज्ञा दी जाती है।"- ओत्तो बेस्पर्सन
(6) "विचारों की अभिव्यक्ति के लिए जिन व्यक्त एवं स्पष्ट ध्वनि संकेतों का व्यवहार किया जाता है, उन्हें भाषा कहते हैं।"- गार्डिनर
(7) "भाषा यादृच्छिक ध्वनि-संकेतों की वह प्रणाली है जिसके माध्यम से मानद परस्पर विचारों का आदान-प्रदान करता है।" ब्लॉख तथा ट्रेगर
(8) "भाषा यादृच्छिक ध्वनि-संकेतों की वह पद्धति है जिसके द्वारा मानव समुदाय परस्पर सहयोग एवं विचार-विनिमय करते हैं।" खुतेवाँ
भाषा की उत्पत्ति के प्रमुख सिद्धान्त तथा उसके प्रवर्तक निम्नलिखित है-
सिद्धान्त प्रवर्तक
(1) दिव्योत्पत्ति (Divine Theory) प्राचीन धर्म ग्रन्थ
(2) संकेत (Agreement Throry) रूसो
(3) रणन (Ding-Dong Theory) प्लेटो, हेस एवं मैक्समूलर
(4) इंगित (Gesture Theory) डॉ० राये
(5) धातु (Root Theory) हेज और मैक्समूलर
(6) श्रम ध्वनि (Yo-He-Ho Theory) न्वारे (Noire)
(7) सम्पर्क (Contect Theory) जी० रेवेज
(8) समन्वय हेनरी स्वीट
सन् 1866 ई० में पेरिस में भाषा-विज्ञान की एक समिति 'ला सिसिएते दें लेगिस्तीक' (La Societe de linguistique) ने अपने अधिनियम में निर्देश दिया कि 'भाश की उत्पत्ति और विश्वभाषा निर्माण' इन दो विषयों पर विचार नहीं किया जाएगा।
भाषा की विशेषताएँ एवं प्रवृत्तियाँ निम्नांकित है-
(1) भाषा सामाजिक सम्पत्ति है।
(2) भाषा सतत प्रवहमान, सहज और नैसर्गिक होता है।
(3) भाषा अर्जित सम्पत्ति है।
(4) भाषा परिवर्तनशील है।
(5) भाषा भाव-सम्प्रेषण का माध्यम है।
(6) भाषा अर्जित सम्पत्ति है।
(7) भाषा अनुकरण से सीखी जाती है।
(8) भाषा जटिलता से सरलता तथा संयोगात्मकता से वियोगात्मकता की ओर उन्मुख होती है।
(9) भाषा परम्परागत वस्तु है।
(10) प्रत्येक भाषा की संरचना पृथक होती है।
भाषा विकास के प्रमुख चरण क्रमशः निम्न है
(1) आंगिक
(2) वाचिक
(3) लिखित
(4) यान्त्रिक।
भाषा के विविध रूप होते हैं जो निम्न है-
(1) मानक या परिनिष्ठित भाषा (STANDARD LANGUAGE),
(2) विभाषा, उपभाषा, प्रान्तीय भाषा या बोली (DIALECT)
(3) अपभाषा, अपभ्रष्ट भाषा, या अमानक भाषा (SLANG)
(4) व्यक्ति बोली (Idiolect)
(5) विशिष्ट भाषा (Professional Language)
(6) कूट भाषा (Secret Language)
(7) कृत्रिम भाषा (Artificial Language)
(8) राष्ट्रभाषा (National Language)!
विश्व की भाषाएँ और वर्गीकरण
कुछ विद्वानों ने गणना करके विश्व की सभी भाषाओं की संख्या 2796 बताई है। किन्तु कुछ विद्वान अनुमानतः इसकी संख्या 3000 बताते हैं।
संसार की भाषाओं के दो प्रकार के वर्गीकरण है-
(1) आकृति मूलक वर्गीकरण और (2) पारिवारिक वर्गीकरण।
आकृतिमूलक वर्गीकरण को रूपात्मक, रचनात्मक, व्याकरणिक वाक्यात्मक, पदात्मक, पदाश्रित के नाम से भी जाना जाता है।
वाक्य रचना एवं रूप (पद) रचना को आधार मानकर जो वर्गीकरण किया है उसे आकृतिमूलक वर्गीकरण कहते हैं।
जाता
विश्व की भाषाओं का आकृतिमूलक वर्गीकरण सर्वप्रथम प्रो० श्लेगल ने किया
आकृतिमूलक वर्गीकरण का वंशवृक्ष निम्न ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है
भाषा
(1)
अयोगात्मक
(2) योगात्मक
(क)
अश्लिष्ट
(ख) श्लिष्ट
(ग)
प्रश्लिष्ट
(i) पूर्वयोगात्मक
- (ii) मध्ययोगात्मक
(iii) अन्तयोगात्मक
(iv) पूर्वान्त योगात्मक
(i)
अन्तर्मुखी
(अ) संयोगात्मक
(ब) वियोगात्मक
(ii) बहिर्मुखी
(अ) संयोगात्मक
(ब) वियोगात्मक
(ग)
प्रश्लिष्ट
(i) पूर्ण प्रश्लिष्ट
(ii) आंशिक प्ररिलह
आकृतिमूलक भाषाओं की महत्वपूर्ण विशिष्टताएँ एवं उदाहरण निम्नलिखि
भाषा
विशिष्टताएँ
उदाहरण
(1) अयोगात्मक भाषा (एकाक्षर, निरवयव या स्थान प्रधान भाषा)
इसमें प्रकृति और प्रत्यय या अर्थतत्व और सम्बन्धतत्व का संयोग नहीं होता है। यह स्वतन्त्र शब्दात्मक भाषा है।
चीनी, बर्मी, सुदामी आदि
(2) योगात्मक भाषा
इसमें प्रकृति और प्रत्यय या अर्थतत्व और सम्बन्ध तत्व का संयोग होता है।
(क) अश्लिष्ट
यह प्रत्यय प्रधान भाषा है।
तुर्की
(i) पूर्वयोगात्मक
इसमें प्रत्यय प्रकृति के पूर्व लगाता है। इसमें प्रत्यय प्रकृति के बीच में लगता है।
काफिर, जुलू
(ii) मध्य योगात्मक
संथाली
(iii) अन्तयोगात्मक
इसमें प्रत्यय प्रकृति के अन्त में जोड़ा जाता है।
कन्नड़
(iv) पूर्वांत योगात्मक
इसमें प्रत्यय प्रकृति के पूर्व व अन्त में जोड़ते हैं
मफोर
भौगोलिक क्षेत्र भाषा-परिवार
(क) यूरेशिया (यूरोप-एशिया) (1) भारोपीय (भारत-यूरोपीय), (2) द्रानिङ परिवार, काकेशी परिवार, (4) बुरुशस्की, (5) उराल अल्ताई परिवार (6) चीनी परिवार, (7) जापानी-कोरियाई परिवार, (8 अत्युत्तरी (हाइपस्वोरी) परिवार, (9) बास्क परिवार, (10) सार्व हामी परिवार।
(ख अफ्रीका भूखण्ड (1) सुदानी परिवार, (2) बन्तू परिवार, (3) होतेंतोत-बुशर्मन परिवार।
(ग) प्रशान्त महासागीरी भूखण्ड (1) मलय-पोलिनेशियाई परिवार, (2) पापुई परिवार, (3)आस्ट्रेलियन परिवार, (4) दक्षिण पूर्व एशियाई परिवार।
(घ) अमेरिका भूखण्ड (1) अमेरिकी परिवार।
भारोपीय परिवार
भारोपीय परिवार को इण्डो-जर्मनिक, आर्य परिवार, भारत-हित्ती परिवार के ना से भी जाना जाता है।
भारोपीय परिवार की 10 शाखाएँ हैं जिन्हें ध्वनि के आधार पर शतम' (सम और 'केन्तुम' दो वर्गों में बाँटा जाता है-
सत्तम वर्ग
केतुम वर्ग
(1) भारत-ईरानी (आर्य)(2) बाल्टो-स्लाविक (3) आमींनी (4) अल्बानी (इलीरियन) (5) जानिक (ट्यूटानिक)
(6) केल्टिक (7) ग्रीक (8) तोखरी (9) हिटाइट (10) इटालिक।
डॉ० बियर्सन ने 'भारत-ईरानी (आर्य)' की तीन उपवर्गों का उल्लेखि
(1) ईरानी, (2) दरद और (3) भारतीय आर्यभाषा।
ईरानी साहित्य का प्राचीनतम धर्मग्रन्थ 'अवेस्ता' (7वीं सदी ई० पू०) 'अवेस्ता' का अर्थ 'शास्त्र' है।
अवेस्ता को बैक्ट्रिया की राजभाषा होने के कारण प्राचीन बैक्ट्रियम भी जाता है। कुछ लोग भूलवश 'अवेस्ता' को 'जिन्द' भी कहते हैं।
महाकवि फिरदौसी का 'शाहनामा' ईरान का राष्ट्रीय महाकाव्य है।
ईरानी भाषाओं का वंशवृक्ष निम्न ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता।
ईरानी भाषाएँ
पश्चिमी
पूर्वी
मीडियन
प्राचीन फारसी
अवेस्ता
मोन्दियन-पामीर
वर्गिस्ता
पश्तो
पहलवी
देवारी
बलूची
ओसेटिक कुर्दी
हुज्वारेश
पाजद
आधुनिक फारसी
'दरद' शब्द का अर्थ 'पर्वत' होता है। इसका प्राचीन नाम 'पैशाची प्राकृत' भी
दरद भाषाओं का क्षेत्र पामीर और पश्चिमोत्तर पंजाब है।
आदि है। दरद उपवर्ग की प्रमुख भाषाएँ कश्मीरी, शीना, चित्राली, काफिर, कोहिस्तानी
भारतीय आर्यभाषाएँ
भारतीय आर्य-भाषा-समूह को काल क्रम की दृष्टि से निम्न वर्गों में बाँटा गया है-
(अ) प्राचीन भारतीय आर्य-भाषा-2000 ई० पू० से 500 ई० पू० तक। (1) वैदिक संस्कृत-2000 ई० पू० से 800 ई० पू० तक।
(2) संस्कृत अथवा लौकिक संस्कृत-800 ई० पृ० से 500 ई० पू० तक।
(ब) मध्य कालीन आर्य-भाषा-500 ई० पू० से 1000 ई० पू० तक। ।
1) पालि (प्रथम प्राकृत) - 500 ई० पू० से । ई० तक
( (2) प्राकृत (द्वितीय-प्राकृत) - 1 ई० से 500 ई० तक।
(3) अपभ्रंश (तृतीय प्राकृत) - 500 ई० से 1000 ई० तक।
(स) आधुनिक भारतीय आर्य-भाषा-1000 से अब तक।
(अ) प्राचीन भारतीय आर्य-भाषा
(1) वैदिक संस्कृत-प्राचीन भारतीय आर्य भाषा का प्राचीनतम नमूना
वैदिक-साहित्य में दिखाई देता है। वैदिक साहित्य का सृजन वैदिक संस्कृत में हुआ वैदिक संस्कृत को वैदिकी, वैदिक, छन्दस, छान्दस आदि भी कहा जाता है। वैदिक साहित को तीन विभागों में वर्गीकृत किया जा सकता है-
(1) संहिता
, (2) ब्राह्मण एवं
(3) उपनिषद्
संहिता-विभाग में 'ऋक् संहिता', 'यजुः संहिता', 'साम संहिता' एवं 'अथर्व संहित आते हैं। महत्व को दृष्टि से प्रधान 'अऋक् संहिता' है। 'ऋक्' का शाब्दिक अर्थ है सू करना। ऋग्वेद में 10 मण्डल, 1028 सूक्त एवं 10580 ऋचाएँ है। इसके सूक्त प्रायः क के अवसरों पर पढ़ने के लिए देवताओं की स्तुतियों से सम्बन्ध रखने वाले गीतात्य काव्य हैं। 'यजुः संहिता' में यज्ञों के कर्मकाण्ड में प्रयुक्त मन्त्र पद्य एवं गद्य दोनों में संगृहीत है। 'यजुः संहिता', कृष्ण एवं शुक्ल इन दो रूपों में सुरक्षित है। 'कृष्ण बजे संहिता में मंत्र भाग एवं गद्यमय व्याख्यात्मक भाग साथ-साथ संकलित किये गये हैं। पर शुक्ल यजुर्वेद संहिता में केवल मन्त्र भाग संगृहीत है। 'सामवेद' में सोम यागों में की के साथ गाये जाने वाले सूक्तों को गेय पदों के रूप में सजाया गया है। 'सामवेद' केवल 75 मन्त्र ही मौलिक हैं शेष ऋग्वेद से लिए गए है। 'अथर्ववेद संहिता' जन साधा में प्रचलित मन्त्र-तन्त्र, टोने-टोटको का संकलन है।
ब्राह्मण-भाग में कर्मकाण्ड की व्याख्या की गई है। प्रत्येक संहिता के अपने-अप ब्राह्मण ग्रंथ हैं। इनमें ऋग्वेद का 'ऐतरेय ब्राह्मण', सामवेद का 'ताण्डव अथवा पंबंधि ब्राह्मण', शुक्ल यजुर्वेद का 'शतपथ ब्राह्मण', कृष्ण यजुर्वेद का तैत्तिरीय ब्राह्मण' महत्वपूर्ण है।
ब्राह्मण ग्रन्थों के परिशिष्ट या अन्तिम भाग उपनिषदों के नाम से प्रसिद्ध हुए। वैदिक मनीषियों के आध्यात्मिक एवं पारमार्थिक चिन्तन के दर्शन होते हैं। उपनिषदों संख्या 108 बताई गई है किन्तु 12 उपनिषद ही मुख्य है- (1) ईश, (2) केन, (3) (4) प्रश्न, (5) बृहदारण्यक, (6) ऐतरेय, (7) छान्दोग्य, (8) तैत्तरीय, (9) मुण्डक, ( माण्डूक्य,
(11) कौषीतकी,
(12) श्वेताश्वेतर उपनिषद।
ऋषियों द्वारा निर्मित सूक्त दीर्घकाल तक श्रुति-परम्परा में ऋषि-परिवारों में सु रखे जाते रहे। परन्तु शनैः शनैः बोलचाल की भाषा से सूक्तों की भाषा (साहित्यिक भा की भिन्नता बढ़ती गई। सूक्तों के प्राचीन रूप को सुरक्षित रखने के लिए संहिता प्रत्येक पद को सन्धि रहित अवस्था में अलग-अलग कर 'पद-पाठ' बनाया गया तया पाठ से संहिता पाठ बनाने के नियम निर्दिष्ट किये गये और इस प्रकार वेद की विशि शाखाओं के 'प्रातिशाख्यों' की रचना हुई। वेद की 1130 शाखाएँ मानी गयी है नि वर्तमान में छह प्रातिशाख्य ग्रन्थ ही उपलब्ध है-
(2) कात्यायन (1) शौनक कृत ऋक्-प्रातिशाख्य, शुक्ल यजुः-प्रातिशाख्य, (3) तैत्तिरीय संहिता का तैत्तिरीय-प्रातिशाख्म, मैत्रायणी-संहिता का मैत्रायणी-अतिशाख्य (कृष्ण यजुर्वेद के प्रातिशाख्य), सामवेद का पुष्प सूत्र, (6) अथर्ववेद का शौनक कृत अथर्व प्रातिशाख्या प्रातिशाख्यों में अपनी-अपनी शाखा से सम्बन्धित वर्ण विचार, उच्चारण, पद
आदि पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। ये ग्रन्थ वैदिक काल के सैद्धान्तिक एवं प्रायोगिक ध्वनि विज्ञान के ग्रन्थ है।
वैदिक संस्कृत ध्वनियाँ डॉ० धीरेन्द्र वर्मा, डॉ० उदय नारायण तिवारी, डॉ
कपिल देव द्विवेदी प्रभृति विद्वानों ने वैदिक ध्वनियों की संख्या 52 मानी है जिसमें 13 स्वर तथा 39 व्यंजन है। डॉ० हरदेव बाहरी ने वैदिक स्वरों की संख्या 14 मानी है। वैदिक ध्वनियों का वर्गीकरण निम्न ढंग से किया जा सकता है-
वैदिक स्वर (संख्या 13)
मूल स्वर-अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, अ. भा. तृ
संयुक्त स्वर-ए, ओ, ऐ, औ
वैदिक व्यंजन (संख्या 39)
अघोष
घोष
अघोष
अर्थस्वर
स्थान
अल्पप्राण
महाप्राण
अल्पप्राण
महाप्राण
अल्पप्राण
ऊष्म/महाप्राण
अन्तस्थ
इण्ठ
तालव्य
मूर्धन्य
दन्त्य
ओष्ठ
वैदिक संस्कृत की विशेषताएँ
अल्यूप्राण 1.3.5. मराशन-24 अधोष -12, समाय-3A,5
(1) वैदिक संस्कृत श्लिष्ट योगात्मक है।
(2) वैदिक संस्कृत में संगीतात्मक एवं बलात्मक दोनों ही स्वराघात मौजूद है।
(3) वैदिक संस्कृत में तीन लिंग (पुलिग, स्त्रीलिंग एवं नपुंसक लिंग), तीन वचन (एकवचान, द्विवचन एवं बहुवचन), तीन वाच्य (कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य एवं भाववाच्य) एवं आठ विभक्तियों (कर्ता, सम्बोधन, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, सम्बन्ध, अधिकरण) का प्रयोग मिलता है।
(4) वैदिक संस्कृत में धातुओं के रूप आत्मने एवं परस्मै दो पदों में चलते थे। कुछ एक धातुएँ उभयपदी थी।
(5) डॉ० भोलानाथ तिवारी के अनुसार वैदिक संस्कृत में केवल तत्पुरुष, कर्मधारय, बहुब्रीहि एवं द्वन्द्व ये चार ही समास मिलते हैं।
(6) वैदिक संस्कृत में काल एवं भाव (क्रियार्थ) मिलाकर क्रिया के 10 सा रूपों का प्रयोग मिलता है-
बार-काल-(1) लट् (वर्तमान), (2) लिट् (परोक्ष या सम्पन्न), (3) (अनद्यतन या सम्पन्न), (4) लुङ् (सामान्य भूत)।
छह भाव-(1) लोट् (आज्ञा), (2) विधि लिइ (सम्भावनार्थ), (3) आओ (इच्छार्थ), (4) लुङ् (हेतुहेतु समुद्भाव या निर्देश), (5) लेट (अभिप्राय) और (6 (निर्बन्ध)।
क्रिया के 10 काल और भाव भेद को ही लकार कहते हैं।
(7) वैदिक संस्कृत में विकरण की भिन्नता के अनुसार धातुओं को 10 विभिक्त किया गया था जो निम्न है-
गण
विकरण
गण
विकरण
(2) लौकिक संस्कृत 'प्राचीन-भारतीय-आर्य भाषा' का वह रूप जिसका की 'अष्टाध्यायी' में विवेचन किया गया है, वह 'लौकिक संस्कृत' कहलाता है। के में 48 ध्वनियाँ ही शेष रह गई। वैदिक संस्कृत की 4 ध्वनियों ळ, छह, जिल्हामूर्तर उपध्मानीय के लुप्त होने से लौकिक संस्कृत की 48 ध्वनियाँ शेष बच्च गयी।
(ब) मध्यकालीन आर्य भाषा
(1) पालि (प्रथम प्राकृत)- 'पालि' का अर्थ 'बुद्ध वचन' (पा रक्खतीति बु
इति पालि) होने से यह शब्द केवल मूल त्रिपिटक ग्रन्थों के लिए प्रयुक्त हुआ। ही त्रिपिटक ग्रन्थों की रचना हुई। त्रिपिटकों की संख्या तीन है- (1) सूत्त पिटक विनय पिटक एवं (3) अभिधम्म पिटका बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से अशोक के पुत्र कुमार महेन्द्र त्रिपिटकों के साथ लंका गए। वहाँ लंका नरेश 'वह (ई० पू० 291) के संख्क्षण में थेरवाद का त्रिपिटक (बुद्ध के उपदेशों का संग्रह) बद्ध हुआ। 'पालि' भारत की प्रथम 'देश भाषा' है।
'सुत् पिटक' साधारण बातचीत के ढंग पर दिये गये बुद्ध के उपदेशों है। इस पिटक के अन्तर्गत पाँच निकाय आते हैं जो निम्न हैं (1) दीघ निकार मज्झिम निकाय, (3) संयुक्त निकाय, (4) अंगुत्तर निकाय और (5) खुद्दक निकाया निकाय में पन्द्रह ग्रन्थ है- (1) खुद्दक पाठ, (2) धम्म पद, (3) उदान, (4) (5) सुत्तनिपात, (6) विमानवत्यु, (7) पेतवत्यु, (8) थेरगाथा, (9) थेरीगाथा, जातक, (11) निदेस, (12) पटिलम्भिदामग्ग, (13) अपदान, (14) बुद्धदर्वस एवं चरियापिटक।
'विनय-पिटक' में बुद्ध की उन शिक्षाओं का संकलन है जो उन्होंने समय-समय पर संघ-संचालन को नियमित करने के लिए दी थी। 'विनय-पिटक' में निम्नलिखित ग्रन्थ है- (1) महावग्ग, (2) चुल्लवग्ग, (3) पाचित्तिय, (4) पाराजिक, (5) परिवार।
'अभिधम्म-पिटक' में चित्त, चैतसिक आदि धमों का विशद् विश्लेषण किया गया है। 'सुत्तपिटक' के उपदिष्ट सिद्धान्ती के आधार पर ही वस्तुतः 'अभिधम्म पिटक' का विकास हुआ है। 'अभिधम्म पिटक' में सात प्रन्थ है- (1) धम्म संगणी, (2) विभंग,
(3) धातुकथा, (4) पुग्गल पत्ति, (5) कथावत्यु (6) यमक,
(7) पट्ठाम।
'पालि' में त्रिपिटक साहित्य के अलावा 'अट्ठकथा साहित्य, 'मिलिन्दपञ्हो', 'दीपवंश', 'महावंश' आदि ग्रन्थ भी अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इन ग्रन्थों के अनुशीलन से पता चलता है कि पालि का प्रचार न केवल उत्तरी भारत में था अपितु बर्मा, लंका, तिब्बत, चीन आदि देशों तक विस्तारित था।
'अट्ठकथा-साहित्य' के प्रणेता आचार्य बुद्धघोष बतलाये जाते है, जिनका समय ईसा की पाँचवी शताब्दी निश्चित है।
बुद्धघोष कृत 'विसुद्धि मग्ग' (विशुद्धमार्ग) को बौद्ध सिद्धान्तों का कोश भी कहा जाता है।
पालि भाषा के तीन व्याकरण ग्रन्थ उपलब्ध है जो निम्नलिखित हैं- (1) कच्चान व्याकरण, (2) मोग्गलान व्याकरण तथा (3) सहनीति।
'कच्चान व्याकरण' (7वीं शती) के रचयिता महाकच्चायन माने जाते हैं। कालक्रम में यह सर्वप्राचीन पालिव्याकरण है।
'कच्चान व्याकरण' को 'कच्चान गन्ध' या 'सुसन्धिकप्प' भी कहा जाता है।
'कच्चायन व्याकरण' में चार कप्प (सन्थि कप्प, नाम कप्प, आख्यात कप्प तथा किच्विधानकप्प), 23 परिच्छेद तथा 675 सूत्र है।
'मोग्लान व्याकरण' के रचयिता मोग्गलान है। इन्होंने ही इस पर वृत्ति और पंचिका लिखी है।
मोग्गलान श्रीलंका के अनुराधपुर के यूपाराम बिहार में रहते थे तथा वे अपने समय के संघराज थे।
'मोग्लान व्याकरण', पालि व्याकरण में पूर्णता तथा गम्भीरता में सर्वश्रेष्ठ व्याकरण है। इस व्याकरण में 817 सूत्र हैं।
'सदनीति व्याकरण (1154 ई०) के रचयिता चर्मी भिक्षु अग्गवंश थे, ये 'अग्गपण्डिता तृतीय' भी कहलाते थे।
'सद्दनीति व्याकरण' तीन भाग (पदमाला, घातुमाला और सूत्तमाला)। 27 अध्याय तथा 1391 सूत्रों में निबद्ध है।
विभिन्न विद्वानों द्वारा 'पालि' शब्द की व्युत्पत्ति निम्नलिखित ढंग से बताई गई
विद्वान
आचार्य विधुशेखर
मैक्स वालंमर
भिक्षु जगदीश काश्यप
भण्डारकर व वाकर नागल
भिक्षु सिद्धार्थ
कोमाम्बी
उदयनारायण तिवारी
व्युत्पत्ति
पन्ति पनि पट्टि पलिन पालि
पाटवि पुत्र या पाऽलि
परियाय पलियाय पालियायपालि
प्राकृत पाकट पाद पादल पति
पाठ पाळ पाळि पालि
पाल पालि
पाणिन लि पारिन
पालि भाषा के प्रदेश को लेकर विद्वानों में काफी मतभेद है। विभिन्न विष्ण द्वारा वर्णित पालि भाषा का प्रदेश निम्नांकित है-
विद्वान
पालि भाया प्रदेश
श्रीलंकाई बौद्ध तथा चाइल्डर्स
मगध
वैस्टरगार्ड तथा स्टेनकांनो
उज्जयिनी या विन्ध्य प्रदेश
प्रियर्सन व गहुन
मगध
लडेन वर्ग
कलिग
रीत्र डेविद्दण
कोसल
सुनीतिकुमार गटर्जी
मध्यदेश की बोली
देवेन्द्रनाथ शर्मा
मयुग के आगपाय का भू-भाग
उदयूनागयण तिवारी
मध्यदेश को बोली
सर्वसम्मति से विद्वानों ने पालि भाषा का प्रदेश, मध्य प्रदेश की बोली के डीकार किया है।
पालि की वर्ण संघटना या ध्वनियाँ पालि के प्रसिद्ध वैयाकरण कच्चायन के नुसार पालि में 41 ध्वनियों होती है तथा मोग्गलान के अनुसार पालि में कुल 43 ध्वनिर्ण तो है।
कच्यायन के अनुसार पालि में 8 स्वर तथा 33 व्यंजन होते हैं तथा मोग्गलर अनुसार 10 स्वर तथा 33 व्यंजन होते हैं।
पालि में वर्षों का वर्गीकरण निम्न ढंग से किया जा मकता है-
स्वर-
ह्रस्व-अ, इ, उ, ए, ओ
दीर्घ आ, ई, ऊ, ए, ओ
व्यंजन-
क वर्ग क, ख, ग, घ, ङ
व वर्ग-न, छ, ज, झ, अ
८ वर्ग-ट, ठ, ड, ढ, ण
त वर्ग-त, थ, द, ध, न
प वर्ग-प, फ, च, भ, म
८. र, ल, व, स. ह, ह, अं
पारिन भाषा की महत्वपूर्ण विशेषताएँ निम्नलिखित है-
(1) अनुग्यार (ॐ) पालि में स्वतन्त्र ध्वनि है जिसे पालि वैयाकरण ने निग्गहीत नाम से अभिहित किया है। (बिन्दु निग्गहीत)।
(2) टर्नर के अनुसार पालि में वैदिकी की भाँति ही संगीतात्मक एवं बलात्मक, दोनी स्वगपात थीं। ग्रियर्सन तथा भोलानाथ तिवारी पालि में बलात्मक स्यगपात मानते हैं। जबकि जूल यंताक किसी भी स्वराघात को नहीं स्वीकार करते हैं।
(3) पालि में तीन लिग, तीनयान्य तथा दो वचन (एक वचन और बहुवचन) का प्रयोग मिलता है। पालि में द्वियचन नहीं होता है।
(4) पालि हलन्त रहित, छह कारक, आठ लकार (चार काल, चार भाव) तथा आठ गण युक्त भाषा है।
प्रथम प्राकृत (पालि) के अन्तर्गत ही अभिलेखी प्राकृत या शिलालेखी प्राकृत भी आता है। इसके अधिकांश लेख शिला पर अंकित होने के कारण इसकी संज्ञा 'शिलालेखी प्राकृत' हुई।
(2) प्राकृत (द्वितीय प्राकृत) मध्यकालीन आर्गभागा को 'प्राकृत' भी कहा गया है। 'प्राकृत' की व्युत्पनि केक सम्बन्ध में दो मत प्रचलित है जो निम्न है-
(1) प्राकृत प्राबीनतम् जनभाषा है- प्राकृत प्राचीनतम प्रचलित जनभाषा है। नमि साधु ने इसका निर्वचन करते हुए लिखा है- "प्राक पूर्व कृतं प्राकृतं" अर्थात् प्राक् कृत शब्द से इसका निर्माण हुआ है जिसका अर्थ है पहले की बनी हुई। जो माषा मूल से चली आ रही है उसका नाम 'प्राकृत' है (नाम प्रकृतेः आगतं प्राकृतम)। नामि साधु ने 'काव्यालंकार" की टीका में लिखा है, "प्राकृतेति सकल जगज्जन्तुनर्ना व्याकरणादि मिरनाहत संस्कारः सहजो यचन व्यापारः प्रकृतिः प्रकृति तत्र भवः सेव वा प्राकृतम्" अर्थात सकल जगत के जन्तुओं (प्राणियों) के व्याकरण आदि संस्कारों से रहित सहजवचन व्यापार को प्रकृति कहते हैं। उससे उत्पन्न अथवा वही प्राकृत है। वाक्यतिराज ने 'गडडबहो' में लिखा
"सयलाओ इमं वाया विसंति पत्नो य णेंति वायाओ। पंत्रि समुद्धं विह णेंति सायराओ स्चिय जलाई।।"
अर्थात जिस प्रकार जल सागर में प्रवेश करता है और वहीं से निकलता है उसी प्रकार समस्त भाषाएँ, प्राकृत में ही प्रवेश करती है और प्राकृत से ही निकलती है।
निम्न लिखित है (2) प्राकृत की उत्पत्ति संस्कृत से हुई है- इस मत की पुष्टि करने वाले विद्वान
(3) "प्रकृतिः संस्कृतं तत्र भवं तत आगतंवा प्राकृतम्" अर्थात् प्रकृति या मूल को चस्तुनिश इकि
संस्कृत है और जो संस्कृत से आगत है, वह प्राकृत है। (हेमचन्द्र)
(ii) "प्रकृतिः संस्कृतं तत्र भवं प्राकृतमुच्यते" अर्थात् प्रकृति या मूल संस्कृत। उससे उत्पन्न भाषा को प्राकृत कहते हैं। (प्राकृत सर्वस्य-मार्कण्डेय)
(iii) "प्राकृतस्य सर्वमेव संस्कृत योनिः "अर्थात् प्राकृत की जननी संस्कृत (प्राकृत-संजीवनी- वासुदेव)
(iv) "प्रकृतेः संस्कृतायास्तु विकृतिः प्राकृती मता" अर्थात् संस्कृत की वि प्राकृत है। (षड् भाषाचन्द्रिका- लक्ष्मीधर)।
(v) "प्रकृतेः संस्कृतात् आगतं प्राकृतम्" अर्थात् प्रकृति संस्कृत से आगत प्रक्र है। (सिंह देवमणि)
अब प्रायः सभी विद्वानों से इस बात को स्वीकार लिया है कि प्राकृत उत्पत्ति संस्कृत से हुई है।
द्वितीय प्राकृत को 'साहित्यिक प्राकृत' भी कहते हैं। प्राकृत भाषाओं के विस में सर्वप्रथम भरतमुनि ने 'नाट्यशास्त्र' में विचार किया।
भरतमुनि ने अपने 'नाट्यशास्त्र' में 7 मुख्य प्राकृत तथा 7 गौण विभाश में चर्चा की, जो अांकित है-
मुख्य प्राकृत
मागधी
अवन्तिजा
प्राच्या
सूरसेनी (शौरसेनी)
अर्धमागधी
बाहुलीक
दाक्षिणात्य (महाराष्ट्री)
गौण विभाषा
शाबरी
आभीरी
चाण्डाली
सचरी
द्राविड़ी
उदूरजा
वनेचरी
व्याकरण का नाम 'प्राकृत प्रकाश' है। इसमें 12 परिच्छेद है। प्राकृत-वैयाकरणों में सर्वप्रथम नाम वररुचि (7वीं शताब्दी) का आता है। इसे
निम्नांकित है-वररुचि ने 'प्राकृत प्रकाश' ग्रन्थ में प्राकृत भाषा के चार भेद बताए है.
(1) महाराष्ट्री,
(2) पैशाची,
(3) मागधी और
(4) शौरसेनी।
हेमचन्द्र ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'प्राकृत-व्याकरण' में प्राकृत भाषा के तीन वी भेदों की चर्चा की, जो निम्न है-
(1) आर्षी (अर्धमागधी), (2) चूलिका पैशाची,
और (3) अपभ्रंशा
हेमचन्द्र को प्राकृत का पाणिनी माना जाता है। अपने व्याकरण के उदाहरण
के लिए हेमचन्द्र ने भट्टी के समान एक 'द्वयाश्रय काव्य' की भी रचना की है।
हेमचन्द्र की 'चूलिका-पैशाची' को ही आचार्य दण्डी ने 'भूत भाषा' कहा ही महाराष्ट्री को प्राकृत वैयाकरणों ने आदर्श, परिनिष्ठित तथा मानक प्राकृत माना है। इस प्राकृत का मूल स्थान महाराष्ट्र है।
डॉ० हार्नले के अनुसार महाराष्ट्री का अर्थ 'महान राष्ट्र' की भाषा है। महान राष्ट्र के अन्तर्गत राजपुताना तथा मध्यप्रदेश आदि आते हैं।
मानी है। जार्ज मियर्सन एवं जूल ब्लाक ने महाराष्ट्री प्राकृत से ही मराठी की उत्पत्ति
भरतमुनि ने 'दाक्षिणात्य प्राकृत' भाषा का भेद महाराष्ट्री के लिए ही किया है।
अवन्ती और वाहीक, ये दोनों भाषाएँ महाराष्ट्री भाषा में अन्तर्भूत है।
डॉ० मन मोहन घोष और डॉ० सुकुमार सेन का अभिमत है कि महाराष्ट्री प्राकृत शौरसेनी का ही विकसित रूप है।
आचार्य दण्डी ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'काव्यादर्श' में महाराष्ट्री को सर्वोत्कृष्ट प्राकृत भाषा बतलाया है-
"महाराष्ट्राश्रयां भाषां प्रकृष्टं प्राकृतं विदु । सागरः सूक्तिरत्नानां सेतुबन्धादि यन्मयाम्।।"
महाराष्ट्री प्राकृत में लिखी गई प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ निम्नलिखित हैं-
(1) राजा हाल कृत 'गाहा सतसई' (गाथा सप्तशती), (2) प्रवरसेन कृत 'रायण वहो' (सेतुबन्धः), (3) वाक्पत्ति कृत 'गडडवहो' (गौडवधः), (4) जयवल्लभकृत 'वज्ञ्जालग्ग', (5) हेमचन्द्र कृत 'कुमार पाल चरित'।
शौरसेनी प्राकृत मूलतः शूरसेन या मथुरा के आसपास की बोली थी। मध्यदेश की भाषा होने के कारण शौरसेनी का बहुत आदर था। (यो मध्ये मध्यदेशं विवसति स कविः सर्वभाषा निषण्णाः)। डॉ० पिशेल के अनुसार इसका विकास दक्षिण में हुआ।
शौरसेनी मूलतः नाटकों के गद्य की भाषा थी। आचार्य भरतमुनि ने लिखा भी है-"शौरौनम् समाश्रित्य भाषा कार्य तु नाटके।"
विद्वानों ने शौरसेनी प्राकृत का आधार भिन्न-भिन्न बताया है, जो निम्नलिखित
विद्वान वररूचि
रामशर्मन
पुरुषोतम
शौरसेनी का आधार
संस्कृत (प्रकृतिः संस्कृतम्) महाराष्ट्री (विरच्यते सम्प्रति शौरसेनी पूर्वेवभाषा प्रकृतिः किलास्याः)
संस्कृत तथा महाराष्ट्री ('संस्कृतानुगमनाद् बहुलम'; तथा 'शेषे महाराष्ट्री')
वररुचि ने शौरसेनी प्राकृत को ही प्राकृत भाषा का मूल माना है (प्रकृतिः शौरसेनी-प्रकृत प्रकाश-10-2)1
पैशाची प्राकृत को पैशाचिकी, पैशाचिका, ग्राम्य भाषा, भूतभाषा, भूतवचन, भूतभारित आदि नामों से भी पुकारा जाता है।
जार्ज ग्रियर्सन ने पैशाची भाषा-भाषी लोगों का आदिम वासस्थान उत्तर-पत्रिक पंजाब अथवा अफगानिस्तान को माना है तथा इसे 'दरद' से प्रभावित बताया।
लक्ष्मीधर ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'पद भाषा चंद्रिका' में राक्षस, पिचाश तथा मेरे पात्रों के लिए पैशाची भाषा का प्रयोग बतलाया है (रक्ष पिशाचनीचे पैशाची द्वितयं भवे
मार्कण्डेय ने 'प्राकृत सर्वस्व' में कैकय पैशाची शौरसेन पैशाची और पाव पैशाची इन तीन प्रकार की पैशाची भाषाओं का तीन देशों के आधार पर नामकरण কिছু है।
मागधी प्राकृत मगध देश की भाषा रही है। मार्कण्डेय ने शौरसेनी से मगर की व्युत्पत्ति बतायी है। (मागधी शौरसेनीतः)।
मागधी के शाकारी, चाण्डाली और शाबरी, ये तीन प्रकार मिलते हैं। नाई प्राकृत का प्राचीनतम रूप अश्वघोष के नाटकों में मिलता है।
भरतमुनि के अनुसार मागधी अन्तःपुर के नौकरों, अश्वपालों आदि की पर थी।
अर्धमागधी प्राकृत के सम्बन्ध में जार्ज ग्रियर्सन ने बताया कि यह मध्य देश (शूरसेन) और मगध के मध्यवर्ती देश (अयोध्या या कोसल) की भाषा थी।
श्रीजिनदा सगणिमहत्तर (7वीं शताब्दी) ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'निशीचचूर्णि अर्धमागधी को मगधदेश के अर्थ प्रदेश की भाषा में निबद्ध होने के कारण अर्थमागध का है (मगहद्ध विसयभाषा निबद्धं अदभागहं)।
अर्धमागधी का प्रयोग मुख्यतः जैन साहित्य में हुआ है। भगवान् महावीर का सम्पूर्ण धर्मोपदेश इसी भाषा में निबद्ध है।
जैनियों ने अर्धमागधी को 'आर्ष', 'आर्षी', 'ऋषिभाषा' या 'आदिभाषा' नाम के भी अभिहित किया है।
डॉ० जैकोथी ने प्राचीन जैन-सूत्रों की भाषा को प्राचीन महाराष्ट्री कहकर 'के महाराष्ट्री' नाम दिया है।
आचार्य विश्वनाथ ने 'साहित्य दर्पण' में अर्धमागधी को बेट, राजपूत एवं सेखें की भाषा बताया है।
(3) अपभ्रंश (तृतीय प्राकृत) 'अपभ्रंश' मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा और आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं के बीच की कड़ी है। इसीलिए विद्वानों ने 'अपप्रेश' से एक सन्धिकालीन भाषा कहा है।
भर्तृहरि के 'वाक्यपदीयम्' के अनुसार सर्वप्रथम व्याडि ने संस्कृत के मानक शब्दों से भिन्न संस्कारच्युत, भ्रष्ट और अशुद्ध शब्दों को 'अपभ्रंश' की संज्ञा दी। भर्तृहरि ने लिखा है-
"शब्दसंस्कारहीनो यो गौरिति प्रयुयुक्षते। तमपभ्रंश मिच्छन्ति विशिष्टार्थ निवेशिनम्।।"
व्याडि की पुस्तक का नाम 'लक्षश्लोकात्मक-संग्रह' था जो दुर्भाग्यवश अनुपलका है।
'अपभ्रंश' शब्द का सर्वप्रथम प्रामाणिक प्रयोग पतंजलि के 'महाभाष्य' में मिलता है । महाभाष्यकार ने 'अपभ्रंश' का प्रयोग 'अपशब्द' के समानार्थक के रूप में किया है-
"भूयां सोऽपशब्दाः अल्पीयांसः शब्दाः इति। एकैकस्य हि शब्दस्य बहवोऽपभ्रंशाः॥"
'अपभ्रंश' के सबसे प्राचीन उदाहरण भरतमुनि के 'नाट्य-शास्त्र' में मिलते हैं, जिसमें 'अपभ्रंश' को 'विभ्रष्ट' कहा गया है।
डॉ० भोलानाथ तिवारी और डॉ० उदयनारायण तिवारी के अनुसार, भाषा के अर्थ में 'अपभ्रंश' शब्द का प्रथम प्रयोग- चण्ड (6वीं शताब्दी) ने अपने 'प्राकृत-लक्षण' ग्रन्थ में किया है। (न लोपोऽभंशेऽधो रेफस्य)।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार, "अपभ्रंश' नाम पहले पहल बलभी के राजा धारसेन द्वितीय के शिलालेख में मिलता है जिसमें उसने अपने पिता गुहसेन (वि० सं० 6500 के पहले) को संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश तीनों का कवि कहा है।""
भागह ने 'काव्यालंकार में अपभ्रंश की संस्कृत और प्राकृत के साथ एक काव्योपयोगी भाषा के रूप में वर्णित किया है-
"संस्कृतं प्राकृतं चान्यदपभ्रंश इति विधा।"
आचार्य किशोरीदास वाजपेयी ने अपभ्रंश को 'घाण भाषा' कहा है।
आचार्य दण्डी ने 'काव्यादर्श' में समस्त वाङ्मय को संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और मिश्र, इन चार भागों में विभक्त किया है-
"तदेतद् वाड्मयं भूयः संस्कृत प्राकृतं तथा। अपभ्रंशश्च मिश्रञ्चेत्याहुशर्याश्चतुर्विधम्।।"
आचार्य दण्डी ने 'काव्यादर्श' में अपभ्रंश को 'आभीर' भी कहा है-"आभीरादि गिरथः काव्येष्वपभ्रंशः इति स्मृताः।"
अपभ्रंश को विद्वानों ने विभ्रष्ट, आभीर, अवहंस, अवहट्ट, पटमंजरी, अवहत्य, औहट, अवहट आदि नामों से भी पुकारा है।
विभिन्न विद्वानों ने अपभ्रंश के निम्नलिखित भेद बताए हैं-
विद्वान
अपभ्रंश के भेद
नमि साधु
(1) उपनागर, (2) आभीर, (3) ग्राम्य।
मार्कण्डेय
(1) नागर, (2) उपनागर, (3) नाचड।
याकोबी
(1) पूर्वी, (2) पश्चिमी, (3) दक्षिणी, (4) उत्तरी।
तागरे
(1) पूर्वी, (2) पश्चिमी, (3) दक्षिणी।
नामवर सिंह
(1) पूर्वी और (2) पश्चिमी।
डॉ० सुनीतिकुमार चटर्जी ने अपभ्रंश को भारतीय आर्यभाषा के विकास की एक 'स्थिति' माना है। इनके अनुसार 6वीं से 11 वीं शती तक प्रत्येक प्राकृत का अपना अपभ्रंश रूप रहा होगा जैसे मागधी प्राकृत के बाद मागधी अपभ्रंश अर्थमा के बाद अर्धमागधी अपभ्रंश, शौरसेनी प्राकृत के बाद शौरसेनी अपभ्रंश एवं प्राकृत के बाद महाराष्ट्री अपभ्रंश आदि।
अपभ्रंश की ध्वनियाँ डॉ० उदयनारायण तिवारी ने अपभ्रंश की नि वर्गीकरण निम्न ढंग से किया है-
स्वर-
हुस्व-अ, इ, उ, ए, ओं
10 स्वर
दीर्घ आ, ई, ऊ, ए, ओ
व्यंजन-
कण्ठ्य क, ख, ग, घ
4
4
5
5
तालव्य च, छ, ज, झ
मूर्धन्य ट, ठ, ड, ढ, ण
दन्त्य
त, थ, द, ध, (न-पूर्वी अप०)
ओष्ठ्य
प, फ, ब, भ, म
5
अन्तस्थ
य, र, ल, व (श-पूर्वी अपभ्रंश)
5
ऊष्म स, ह
그
व्यंजन 30
अपभ्रंश भाषा की महत्वपूर्ण विशेषताएँ निम्नलिखित है-
(1) अपभ्रंश को उकार बहुला भाषा कहा गया है।
(2) अपभ्रंश वियोगात्मक हो रही थी अर्थात् अपभ्रंश में विभक्तियों के स्थर स्वतन्व परसर्गों का प्रयोग होने लगा था।
(3) अपभ्रंश में दो बचन (एकवचन और बहुवचन) और दो ही लिंग (दु और स्त्रीलिंग) मिलते हैं।
अवहट्ट अपभ्रंश का ही परवर्ती या परिवर्तित रूप है।
डॉ० सुनीति कुमार चटर्जी ने अपभ्रंश और आधुनिक भारतीय आर्य भके बीच की कड़ी को 'अवहट्ट' कहा है।
'अवहड्ड' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग- ज्योतिश्वर ठाकुर ने अपने 'वर्णल ग्रन्थ में किया है।
(स) आधुनिक भारतीय आर्यभाषा
आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं का विकास अपभ्रंश से हुआ है।
आर० हार्नले ने सन् 1880 ई० में किया। आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं का सर्वप्रथम वर्गीकरण डॉ० ए०ए०
डॉ० हार्नले ने आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं को 4 वर्गों में विभाजित कि है जो निम्नांकित है-
(1) पूर्वी गौडियन पूर्वी हिन्दी, बंगला, असमी, उड़िया।
(2) पश्विमी गौडियन-पश्चिमी हिन्दी, राजस्थानी, गुजराती, सिन्धी, पंजाबी।
(3) उत्तरी गौडियन गढ़वाली, नेपाली, पहाड़ी।
(4) दक्षिणी गौडियन मराठी।
डॉ० हार्नले के अनुसार जो आर्य मध्यदेश अथवा केन्द्र में थे 'भीतरी आर्य' कहलाये और जो चारों ओर फैले हुए थे 'बाहरी आर्य' कहलाये।
डॉ० जार्ज ग्रियर्सन ने (लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया-भाग । तथा बुलेटिन ऑफ द स्कूल ऑफ ओरियंटल स्टडीज, लण्डन इन्स्टिट्यूशन-भाग । खण्ड 3 1920) अपना पहला वर्गीकरण निम्नांकित ढंग से प्रस्तुत किया है-
(1) बाहरी उपशाखा (क) उत्तरी-पश्चिमी समुदाय (1) लहँदा (ii) सिन्धी।
(ख) दक्षिणी समुदाय- (i) मराठी।
(ग) पूर्वी समुदाय (1) उडिया, (ii) बिहारी, (iii) बंगला, (iv) असमिया।
(2) मध्य उपशाखा (क) मध्यवर्ती समुदाय (i) पूर्वी हिन्दी।
(3) भीतरी उपशाखा (क) केन्द्रीय समुदाय (i) पश्चिमी हिन्दी, (ii) पंजाबी, (i) गुजराती, (iv) भीरनी, (v) खानदेशी, (vi) राजस्थानी।
(ख) पहाड़ी समुदाय (1) पूर्वी पहाड़ी अथवा नेपाली, (ii) मध्य या केन्द्रीय पहाड़ों, (iia) पश्चिमी पहाड़ी।
डॉ० तुनीति कुमार चटर्जी ने ग्रियर्सन के वर्गीकरण की आलोचना ध्वनिगत एवं व्याकरणगत आधारों पर करते हुए अपना वैज्ञानिक वर्गीकरण निम्न वर्गो में प्रस्तुत किया-
(1) उदीच्य सिन्धी, लहँदा, पंजाबी।
(2) प्रतीच्य राजस्थानी, गुजराती।
(3) मध्य देशीय-पश्चिमी हिन्दी।
(4) प्राच्य-पूर्वी हिन्दी, विहारी, उड़िया, असमिया, बंगला।
(5) दाक्षिणात्य-मराठी।
डॉ० धीरेन्द्र वर्मा ने डॉ० चटर्जी के वर्गीकरण में सुधार करते हुए अपना निम्नांकित वर्गीकरण प्रस्तुत किया-
(1) उदीच्य सिन्धी, लहँदा, पंजाबी।
(2) प्रतीच्य- गुजराती।
(3) मध्य देशीय राजस्थानी, पश्चिमी हिन्दी, पूर्वी हिन्दी, बिहारी।
(4) प्राच्य-उड़िया, असमिया, बंगला।
(5) दाक्षिणात्य-मराठी।
☐ श्री सीताराम चतुर्वेदी ने सम्बन्ध सूचक परसों के आधार पर अपना वर्गीकरण स्तुत किया, जो निम्न है-
का-हिन्दी, पहाड़ी, जयपुरी, भोजपुरी।
दा-पंजाबी, लहँदा।
जो-सिन्धी, कच्छी।
नो-गुजराती।
एर बंगाली, उड़िया, असमिया।
भोलानाथ तिवारी ने क्षेत्रीय तथा सम्बद्ध अपभ्रंशों के आधार पर अपन वर्गीकरण निम्न ढंग से प्रस्तुत किया है-
अपभ्रंश
शौर सेनी (मध्यवर्ती)
मागधी (पूर्वीय)
अर्थमागधी (मध्य पूर्वीय)
महाराष्ट्री (दक्षिणी)
ब्राचड-पैशाची (पश्चिमोत्तरी)
आधुनिक भाषाएँ
पश्चिमी हिन्दी, राजस्थानी, पहाड़ी, गुजराती।
बिहारी, बंगाली, उड़िया, असमिया।
पूर्वी हिन्दी।
मराठी।
सिन्धी, लहँदा, पंजाबी।
है-
डॉ० हरदेव बाहरी ने आधुनिक आर्य भाषाओं का वर्गीकरण इस प्रकार किय
हिन्दी वर्ग
हिन्दीतर (अ-हिन्दी) वर्ग
उत्तरी (नेपाली)
मध्य पहाड़ी, राजस्थानी, पश्चिमी हिन्दी, पूर्वी हिन्दी, बिहारी (ये सभी हिन्दी की उपभाषाएँ है)।
पश्चिमी (पंजाबी, सिन्धी, गुजरात।
दक्षिणी (सिंहली, मराठी)।
पूर्वी (उड़िया, बंगला, असमिया)।
प्रमुख आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं की विशेषताएँ
सिन्धी शब्द का सम्बन्ध संस्कृत सिन्धु से है। सिन्धु देश में सिन्धु नदी के दोनों किनारों पर सिन्धी भाषा बोली जाती है।
सिन्धी की मुख्यतः 5 बोलियाँ विचोली, सिराइकी, थरेली, लासी, लाड़ी है
सिन्धी की अपनी लिपि का नाम 'लंडा' है, किन्तु यह गुरुमुखी तथ फारसी-लिपि में भी लिखी जाती है।
लहँदा का शब्दगत अर्थ है 'पश्चिमी'। इसके अन्य नाम पश्चिमी पंजाब, हिन्दकी, जटकी, मुल्तानी, चिभाली, पोठवारी आदि हैं।
लहँदा की भी सिन्धी की भाँति अपनी लिपि 'लंडा' है, जो कश्मीर में प्रचलित शारदा-लिपि की ही एक उपशाखा है।
पंजाबी शब्द 'पंजाब' से बना है जिसका अर्थ है पाँच नदियों का देश।
पंजाबी की अपनी लिपि लंडा थी जिसमें सुधार कर गुरु अंगद ने गुरुमुख लिपि बनाई।
पंजाबी की मुख्य बोलियाँ माझी, डोगरी, दोआबी, राठी आदि है।
गुजराती गुजरात प्रदेश की भाषा है। गुजरात का सम्बन्ध 'गुर्जर' जाति है-गुर्जर का गज्जरत्ता > गुजरात।
गुजराती की अपनी लिपि है जो गुजराती नाम से प्रसिद्ध है। वस्तुतः गुजरात कैथे से मिलती जुलती लिपि में लिखी जाती है। इसमें शिरोरेखा नहीं लगती।
मराठी महाराष्ट्र प्रदेश की भाषा है। इसकी प्रमुख बोलियाँ कोकणी, नागपुरी कोष्टी, माहारी आदि है।
मराठी की अपनी लिपि देवनागरी है किन्तु कुछ लोग मोड़ी लिपि का भी प्रयो
करते हैं।
भाषा है। बंगला संस्कृत शब्द बंग आल (प्रत्यय) से बना है। यह बंगाल प्रदेश क
नवीन यूरोपीय विचार-धारा का सर्वप्रथम प्रभाव बंगला भाषा और साहित्य प
पड़ा।
बंगला प्राचीन देवनागरी से विकसित बंगला लिपि में लिखी जाती है।
असमी (असमिया) असम प्रदेश की भाषा है। इसकी मुख्य बोली विश्नुपुरिया
असमी की अपनी लिपि बंगला है।
उड़िया प्राचीन उत्कल अथवा वर्तमान उड़ीसा (ओड़ीसा) की भाषा है। इसक प्रमुख बोली गंजामी, सम्भलपुरी, भत्री आदि है।
उड़िया भाषा बंगला से बहुत मिलती-जुलती है किन्तु इसकी लिपि ब्राह्मी की उत्तरी शैली से विकसित है।
अब इससे आगे के पन्ने हम अगले कक्षा में पढ़ेंगे |
हिन्दी व्युत्पत्ति और अर्थ
'हिन्दी' शब्द की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में निम्नलिखित मत प्रचलित है-
(1) परम्परावादी संस्कृत पण्डितों के अनुसार, हिन्दी- हिन् (नष्ट करना) दु (दुष्ट)। अर्थात हिन्दु का अर्थ है जो दुष्टों का विनाश करे (हिनस्ति दुष्टान्।
(2) शब्द कल्पद्रुम के अनुसार, 'हिन्दू' शब्द 'हीन दुषडु' से बना है जिसका अर्थ है 'होनों को दूषित करने वाला (हीन दूषयति)।
(नौट ये दोनों मत कल्पना प्रसूत है।)
डॉ० भोलानाथ तिवारी के अनुसार 'हिन्दु' शब्द का प्राचीनतम प्रयोग 7वीं सदी के अन्तिम चरण के ग्रन्य 'निशीथचूर्णि' में प्रथम बार मिला है।
हिन्दु शब्द फारसी है जो संस्कृत शब्द सिन्धु का फारसी रूपान्तरण है।
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