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समलैंगिकता (Homosexuality)

गीतांजलि श्री तिरोहिता (2001)

रिश्ते तोड़ना आसान है बनाए रखना मुश्किल।

फिर....अंत तो कुछ नहीं पर .....बस जो बातें हुई है वो यादें बन जाती ही फिर इंसान उन यादों में रहता है ना जाने तुम कैसे सोच लेते हो कि तुरंत कोई इंसान किसी और को देखने लगेगा कैसे कोई पिछली याद से निकल सकता है थोड़ा तो......बनता है कि सोचे ये क्यों किया कुदरत से कैसे किसी को इतने करीब लाया और फिर उसे दूर किया क्या सिर्फ उसी की गलती है या हमारी भी है गलती=... अगर हमें किसी एक की गलती लगती है जो कि समाने वाले की ही लगती है तो क्या ये सही है नहीं.....दूर खड़े हो के अपने ख्यालों में अपनी यादों में हमे खुद को भी देखना चाहिए समझना चाहिए कि इस जगह से हमें भागना आसान लगता है तो इसका मतलब कोई भी कभी भी तुम्हे तुमसे तो नहीं मिलेगा शायद मिल भी जाए तो तुम्हे खुदने ही हजार खामियां दिखेगी क्यों कि हम है ही ऐसे बस अपनी गलती छुपाने के लिए दूसरों में खोट ढूंढा करते है जानते नहीं कि हमें खुद को भी जरा बदलना होगा क्यूं कि हम खुद भी तो ठीक नहीं हैं कितने भी लोग दुनिया में हो क्या किसी की विचारधारा किसी से 100% मेल खा सकती है क्या .... क्या हो कि हम एक जैसा सोचे क्या हो कि साथ उठे साथ खाए खाना भी एक जैसा ...