Part-7 हिंदी भाषा एवं साहित्य का वास्तुंनिस्ट इतिहास बाय सरस्वती पांडे गोविंद पांडे बुक इन हिंदी (बुक, सरस्वती पांडे गोविंद पांडे)
गद्य
हिन्दी गद्य का विकास
अद्योतन सूरी ने 778 ई० में 'कुवलय माला' नामक एक गद्य कृति की रचना की।
10वीं-11वीं शताब्दी के आस-पास रोडा कवि ने 'राउलवेल' नामक एक ग्रन्थ की रचना की।
राउलवेल' गद्य-पद्य मिश्रित चम्पू काव्य की प्राचीनतम हिन्दी कृति है।
राउलवेल एक शिलांकित कृति है।
हिन्दी साहित्य में नख-शिख वर्णन की श्रृंगार-परम्परा का आरम्भ 'राउलवेल' से माना जाता है।
राउलवेल' में हिन्दी की सात बोलियों के शब्द मिलते हैं जिनमें राजस्थानी प्रधान है।
'उक्ति व्यक्ति प्रकरण' हिन्दी का प्रथम गद्य का ग्रन्थ है।
'उक्ति व्यक्ति प्रकरण' की रचना महाराज गोविन्दचन्द्र के सभा पण्डित दामोदर शर्मा ने 12वीं शताब्दी के आसपास किया।
'उक्तिव्यक्ति प्रकरण' एक व्याकरण ग्रन्थ है।
डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी और डॉ० मोतीचन्द्र ने 'उक्ति व्यक्ति प्रकरण' को एक अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रन्थ माना है।
'वर्ण रत्नाकर' मैथिल कवि ज्योतिश्वर ठाकुर की रचना है।
'वर्ण रत्लाकर' मैथिली हिन्दी में रचित गद्य की प्रथम रचना है।
वर्ण रलाकर' का ढाँचा विश्वकोशात्मक है।
वस्तुतः साहित्यिक हिन्दी गद्य का क्रमबद्ध इतिहास 19वीं शताब्दी से प्रारम्भ होता है।
आधुनिक काल या 19वीं शती के पूर्व हिन्दी गद्य के तीन रूप प्रचलित थे- (1) राजस्थानी गड़ा, (2) ब्रजभाषा का गद्य, (3) खड़ी बोली का गद्य।
हिन्दी गद्य के तीनों रूपों में राजस्थानी-गद्य प्राचीनतम माना गया है।
राजस्थानी गद्य का सूत्रपात 10वीं शताब्दी में हुआ।
राजस्थानी गद्य की प्रमुख रचनाएँ व लेखक निम्न हैं-
रचना
लेखक
धनपाल कथा (14वीं शती)
तत्त्व विचार (14वीं शती)
पृथ्वीचन्द्र चरित्र या वाग्विलास (1421 ई०)
माणिक्यचन्द्र सूरी
पंचाख्यान (1847 ई०)
फतहराम वैरागी
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ब्रजभाषा-गद्य का सूत्रपात संवत् 1400 (1343 ई०) से
नष्ठ इतिहास
माना है।
आचार्य शुक्ल के अनुसार ब्रजभाषा गद्य का सर्वप्रथम प्रयोग 'गोरखपंधी योगियों' ने संवत् 1400 के आस-पास किया।
डॉ० वीरेन्द्रनाथ मिश्र ने 'पृथ्वीराजरासो' में 'वचनिका' शीर्षक के अन्तर्गत उपलब्ध गद्य को ब्रजभाषा गद्य का प्राचीनतम रूप माना है।
महाप्रभु वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ की ब्रजभाषा गद्य की रचना 'श्रृंगार-रस-मण्डन' है।
विठ्ठलनाथ की अन्य रचना 'यमुनाष्टक', 'नवरत्न सटीक' है।
'चौरासी वैष्णवों को, वार्ता' तथा 'दो सौ बावन वैष्णवों की वार्ता' नामक ग्रन्थ के रचनाकार विट्ठलनाथ के पुत्र गोसाई गोकुलनाथजी माने जाते हैं।
इसमें वैष्णव भक्तों और आचार्यों की महिमा प्रकट करने वाली कथाएँ लिखी गई हैं।
इसका रचनाकाल विक्रम को 17वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध माना जाता है।
नाभादास ने संवत् 1660 के आसपास 'अष्टयाम' नामक पुस्तक ब्रजभाषा में लिखी। इसमें भगवान राम की दिनचर्या का वर्णन है।
ओरछा नरेश महाराज जसवंत सिंह के आश्रित वैकुण्ठमणि शुक्ल ने सं० 1680 के आसपास ब्रजभाषा गद्य में 'अगहन माहात्म्य' तथा 'वैशाख माहात्म्य' नामक पुस्तक लिखी।
सूरति मिश्र ने संवत् 1767 में 'बैताल पचीसी' नामक पुस्तक की रचना की।
'बैताल पचीसी' की रचना संस्कृत कवि शिवदास की रचना से कथा लेकर की गई है।
बैताल पचीसी' का खड़ी बोली हिन्दुस्तानी में अनुवाद मजहर अली के साथ मिलकर लल्लू लाल ने 'बैताल पच्चीसी' (1801 ई०) नाम से किया।
संवत् 1852 (1795 ई०) में लाला हीरालाल ने 'आईने अकबरी की भाषा वचनिका' नामक एक बड़ी पुस्तक की रचना की।
दनकौर के निवासी प्रियादास ने सन् 1779 ई० में 'सेवक चरित्र' गद्य ग्रन्थ लिखा। ये राधाबल्लभीय सम्प्रदाय से सम्बन्धित थे।
लल्लू लाल ने 'राजनीति' (1802 ई०) तथा 'माधव विलास' (1817 ई०) नामक ब्रजभाषा गद्य-पद्य मिश्रित ग्रन्थ की रचना की।
'माधवविलास' 19वीं शताब्दी के सामाजिक जीवन के स्वरूप चित्रण की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण रचना है।
माणिकलाल ओझा ने सन् 1828 ई० में 'सोमवंशन की वंशावली' नामक ब्रजभाषा गद्य में रचना की।
खड़ी बोली गद्य का प्रारम्भिक रूप दक्षिणी साहित्य में मिलता है। दक्षिण के साहित्यकारों ने अपनी भाषा को 'हिन्दी', 'हिन्दवी', 'दक्खिनी', 'देहलवी', 'जबान हिन्दुस्तान' आदि कई नामों से पुकारा है।
'दक्खिनी हिन्दी' के सम्बन्ध में प्रो० एहतेशाम हुसैन ने लिखा है, "इस भाषा में पंजाबी, हरियाणी और खड़ी बोली का मेल था, यह ब्रज भाषा के प्रभाव से भी बची नहीं थी और सबसे बड़ी बात यह थी इसमें फारसी-अरबी के अनेक शब्द भी सम्मिलित हो गये थे। इतिहास से पता चलता है कि आरम्भ में उन्होंने उसी भाषा से
हिन्दी गद्य का
काम चलाया, यहाँ तक कि वह उन्नति करके साहित्य की भाषा बन गई। साहित्यकारों ने उसको कभी 'हिन्दी' कभी 'जबाने हिन्दुस्तान' कहा और कभी 'दकनी' कहकर पुकारा।"
दक्खिनी हिन्दी के प्रथम गद्य लेखक 'ख्वाजा बन्दा नेवाज गेसूदराज' (1318-1422 ई०) को माना जाता है।
'ख्वाजा बंदा नेवाज गेसूदराज' की प्रसिद्ध रचना 'मेराजुल-आशकीन' दक्खिनी गद्य की प्रथम पुस्तक मानी जाती है।
इनकी अन्य कृतियाँ निम्न हैं- (1) शिकारनामा, (2) तिलावतुल-वजूद, (3) हिदायतनामा, (4) रिसाला सेहवारा या बारहमासा।
'मीराजुल-आशकीन' में सूफी धर्म का उपदेश दिया गया है।
'कुतुबमुश्तरी' मुल्ला बजही की प्रमुख रचना है।
मुल्ला वजही ने सन् 1635 ई० में 'सबरस' नामक ग्रन्थ की रचना की।
'सबरस' को उर्दू-साहित्य की प्रथम गद्य-रचना माना जाता है।
'सबरस' में तसव्वुफ के सिद्धान्तों को प्रतीकात्मक शैली में व्यक्त किया गया है।
दक्खिनी हिन्दी में 'कुलियाते कुली कुतुबशाह' नामक एक वृहद काव्य की रचना मुहम्मद अली कुतुबशाह ने की।
हुसेन अली खाँ ने सन् 1838 ई० में 'चारदरवेश' का फारसी से 'दक्खिनी' में अनुवाद किया।
'चारदरवेश' का अनुवाद हुसैन अली खाँ ने अपने पुत्रों के लिए किया था।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने खड़ी बोली-गद्य का प्रारम्भ अकबर के समय में गंग कवि द्वारा रचित 'चंद-छंद बरनन की महिमा' से माना है।
गुरुमुखी लिपि में खड़ी बोली गद्य की रचा सोढी मिहरिवानु, हरिंजी, दयाल अनेमी आदि लेखकों ने की।
सोढी मिहरिवानु (1581-1640 ई०) ने 'सचुषंड पोथी' लिखकर गुरुवाणी की व्याख्या प्रस्तुत की है।
सोढ़ी मिहरिवानु के पुत्र हरिजी ने तीन पुस्तकों की रचना की है- (1) सुषमनी सहसंरनाम (परमारथ), (2) गोसट गुरुमिहरिवानु तथा (3) पोथी हरिजी।
दयालु अनेमी (1675-1721 ई०) की प्रमुख रचनाएँ निम्न हैं- (1) अवगत उल्लास (1675 ई०), (2) असटावक्रभाषा (1679 ई०) तथा (3) गीता भाषा (1721 ई०)।
जार्ज ग्रियर्सन, आर० डब्ल्यू फ्रेजर, नलिनी मोहन सान्याल प्रभृति विद्वान आधुनिक साहित्यिक खड़ी बोली का आविष्कार सर्वप्रथम गिलक्राइस्ट की अध्यक्षता में लल्लू लाल तथा सदल मिश्र द्वारा बताते हैं।
सन् 1800 ई० में मथुरा प्रसाद शुक्ल ने 'पंचांग दर्शन' नामक ज्योतिष ग्रन्थ की रचना को।
संवत् 1818 (1761 ई०) पं० दौलतराम ने हरिषेणाचार्य कृत 'जैन पद्म पुराण' का भाषानुवाद किया।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने विक्रम संवत 1798 (1741 ई०) में रचित पाका वस्तुनिष्ठ इतिहास
'भाषायोवाशिष्ठ' को परिमार्जित गद्य की प्रथम पुस्तक और राम प्रसाद निरंजनी को प्रथम प्रौढ़ गद्य लेखक स्वीकार किया है।
'भाषा योगवाशिष्ठ' की भाषा मूलतः पंजाबी-ब्रजभाषा मिश्रित खड़ी बोली है।
मुंशी सदासुख लाल ने खड़ी बोली में 'सुखसागर' की रचना 'विष्णु पुराण' के आधार पर किया।
खड़ी बोली गद्य को एक साथ आगे बढ़ाने वाले चार महानुभाव हुए हैं- (1) मुंशी सदासुखलाल 'नियाज', (2) सैयद इंशा अल्ला खाँ, (3) लल्लू लाल तथा (4) सदल मिश्र।
मुंशी सदासुखलाल 'नियाज' और इंशा अल्ला खाँ इन दोनों का सम्बन्ध फोर्ट विलियम कॉलेज से नहीं था।
मुंशी सदासुख लाल ने लिखा है, "रस्मौ रिवाज भाखा का दुनिया से उठ गया है।"
'लल्लू लाल' और 'सदल मिश्र' दोनों ही फोर्ट विलियम कॉलेज के प्राध्यापक थे।
मुंशी सदासुखलाल 'नियाज' की प्रमुख रचना 'सुखसागर' एवं 'मुंतखबुत्तवारीख' है।
इंशा अल्ला खाँ ने 'रानी केतकी की कहानी' की रचना सन् 1798-1803 ई० के मध्य में की।
रानी केतकी की कहानी' को 'उदयभान चरित' नाम से भी जाना जाता है।
रानी केतकी की कहानी से सर्वप्रथम खड़ी बोली गद्य-साहित्य में लौकिक श्रृंगारमय प्रेमाख्यानक परम्परा का सूत्रपात हुआ।
इंशा अल्ला खाँ ने अपनी भाषा नीति की घोषणा निम्न शब्दों में की-"यह वह कहानी है कि जिसमें हिन्दी छुट। और न किसी बोली का मेल है न पुट ॥"
शैली की दृष्टि से 'रानी केतकी की कहानी' हास्य प्रधान है।
इंशा अल्ला खाँ की भाषा सबसे चटकीली, मटकीली, अलंकृत, किस्सागोई शैली, मुहावरेदार और चलती है।
रानी केतकी की कहानी' हिन्दी की पहली मौलिक लिखित गद्य कथा है।
इंशा ने अपनी भाषा को तीन प्रकार के शब्दों से मुक्त रखने की प्रतिज्ञा की है- (1) वाहर की बोली अर्थात् अरबी, फारसी, तुर्की, (2) गँवारो अर्थात् ब्रजभाषा, अवधी इत्यादि और (3) भाखापन अर्थात् संस्कृत के शब्दों का मेल।
लल्लू लाल ने ग्यारह पुस्तकों की रचना की जो निम्नांकित है-(1) सिंहासन बत्तीसी (1801 ई०), (2) बैताल पच्चीसी (1801 ई०), (3) शकुन्तला नाटक (1810 ई०), (4) माधोनल (1801 ई०), (5) राजनीति (1802 ई०), (6) प्रेमसागर (1810 ई०), (7) लतायफ-इ-हिन्दी (1810 ई०), (8) ब्रजभाषा-व्याकरण (1811 ई०), (9) सभा विलास (1815 ई०), (10) माधव विलास (1817 ई०) (11) लाल चन्द्रिका (1818 ई०)।
लुल्लू लाल का 'ब्रजभाषा व्याकरण' ही इनकी मौलिक रचना है।
लल्लू लाल कृत 'राजनीति', 'माधवविलास' तथा 'लालचन्द्रिका' ब्रजभाषा-गद्य में है तथा शेष रचनाएँ खड़ी बोली गद्य में हैं।
लल्लू लाल ने सन् 1802 ई० में 'राजनीति' के नाम से 'हितोपदेश' की कहानियों हिन्दी
का ब्रजभाषा गद्य में अनुवाद किया।
लल्लू लाल की वे रचनाएँ जो अन्य लेखक की रचना का आधार लेकर लिखी गई.
निम्नलिखित हैं-(
1) प्रेमसागर या नागरी दशम-चतुर्भुज मिश्र के भागवत पुराण के दशम स्कन्ध के व्रज भाषानुवाद का खड़ी बोली में अनुवाद।
(2) लाल चन्द्रिका टीका- 'बिहारी सतसई' की टीका।
(3) सिहासन बत्तीसी-काजिम अली की सहायता से सुन्दरदास के व्रजभाषानुवाद का हिन्दुस्तानी रूपान्तर।
(4)
बैताल पच्चीसी-शिवदास रचित संस्कृत रचना के सुरति मिश्र कृत ब्रजभाषानुवाद का मजहर अली के साथ लिखित खड़ी बोली में रूपान्तर।
(5) लतायफ-इ-हिन्दी-खड़ी बोली, ब्रज और हिन्दुस्तानी की सौ लघु कथाओं का संग्रह।
(6) माधव विलास-ब्रजभाषा में लिखा गया चम्पू।
(7) भाषा कायदा- ब्रजभाषा व्याकरण।
लल्लू लालजी उर्दू को 'यामिनी भाषा' कहते थे। इन्होंने 'प्रेम सागर' की रचना करते समय 'यामिनीभाषा' को छोड़ने की बात कही थी।
आचार्य शुक्ल ने लिखा है, "लल्लू लाल की भाषा कृष्णोपासक व्यासों की सी
व्रजरंजित खड़ी बोली है।"
आचार्य शुक्ल ने स्पष्टतः कहा है, "सारांश यह है कि लल्लू लाल का काव्यभाषा गद्य भक्तों की कथावार्ता के काम का ही अधिकतर है, न नित्य व्यवहार के अनुकूल है न सम्बद्ध विचारधारा के योग्य।"
लल्लू लाल ने आगरा में एक प्रेस खोला जिसका नाम 'संस्कृत प्रेस' था।
लल्लू लाल ने 'लतायफ-इ-हिन्दी' को 'बजुवान-ई-रेख्ता' कहा है।
सदल मिश्र बिहार के आरा जिले के निवासी थे।
सदल मिश्र की प्रमुख रचनाएँ निम्न हैं- (1) चन्द्रावली या नासिकेतोपाख्यान (1803 ई०), (2) रामचरित्र (1806 ई०) और (3) हिन्दी पर्शियन वाकेबुलरी (1809 ई०)।
सदल मिश्र ने 'चन्द्रावली' या 'नासिकेतोपाख्यान' की रचना यजुर्वेद के आधार पर कठोपनिषद में वर्णित नचिकेता की कथा को आधार बनाकर खड़ी बोली गद्य में की।
सदल मिश्र ने 'रामचरित्र' की रचना 'अध्यात्म रामायण' के आधार पर की।
सदल मिश्र की भाषा 'पूरबीपन' लिए हुए व्यावहारिक खड़ी बोली है।
महत्त्व की दृष्टि से डॉ० श्याम सुन्दरदास ने हिन्दी गद्य के प्रारम्भिक आचार्यों को निम्न क्रम में रखा है-
(1) इंशाअल्ला खाँ (निवास पहले दिल्ली, बाद में लखनऊ)
(2) सदल मिश्र (निवास बिहार, जिला आरा, स्थान-शाहाबाद घुवडीहा)
(3) लल्लू लाल (निवास : आगरा)
(4) सदासुख लाल (निवास: दिल्ली)
महत्त्व की दृष्टि से आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी गद्य के प्रारम्भिक चार आचायर्यों को निम्न क्रम में रखा है-
(1) सदासुखलाल,
(2) इंशा अल्ला खाँ,
(3) लल्लू लाल,
(4) सदल मिश्र।
महत्त्व की दृष्टि से डॉ० बच्चन सिंह ने हिन्दी गद्य के प्रारम्भिक चार आचार्यों को निम्नलिखित क्रम में रखा है-
(1) सदासुख लाल,
(2) सदल मिश्र,
(3) इंशाअल्ला खाँ,
(4) लल्लू लाल।
खड़ी बोली गद्य के चार महानुभावों की भाषिक विशेषता लिखित है-
महानुभाव
मुंशी सदासुखलाल
भाषिक विशेषता
इंशा अल्ला खाँ
संस्कृत-मिश्रित हिन्दी या शिष्ट बोलचाल की भाषा चटकीली, मटकीली, मुहावरेदार और चलती भाषा कृष्णोपासक व्यासों की ब्रजरंजित खड़ी बोला पूरबीपन लिए हुए व्यावहारिक खड़ी बोली।
लल्लू लाल
सदल मिश्र
फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना सन् 1800 ई० में मार्किवस वेलेजली ने किया।
गिलक्राइस्ट का पूरा नाम डॉ० जॉन बौर्थविक गिलक्राइस्ट था।
गिलक्राइस्ट ने कुल 19 ग्रन्थों की रचना की। इनकी प्रमुख कृति 'ए डिक्शनरी ऑफ इंग्लिश एण्ड हिन्दुस्तानी' है।
गिलक्राइस्ट ने अपनी पुस्तक 'ए ग्रामर ऑफ दी हिन्दुस्तानी लैंग्वेज' में 'हिन्दी', 'उर्दू', 'रेख्ता' और 'हिन्दुस्तानी' को समानार्थी माना है।
गिलक्राइस्ट खड़ी बोली की तीन शैलियाँ मानते हैं-
(1) दरबारी या फारसी शैली, (2) हिन्दुस्तानी शैली,
(3) हिन्दवी शैली।
'हिन्दुस्तानी शैली' गिलक्राइस्ट को सर्वाधिक प्रिय थी। इसे वे 'दि ग्रैण्ड पापुलर स्पीच अंऑफ हिन्दुस्तान' कहते थे।
'कलकत्ता स्कूल बुक सोसाइटी' की स्थापना सन् 1817 ई० में किया गया।
'आगरा स्कूल बुक सोसाइटी' की स्थापना सन् 1833 ई० में हुई।
विलियम केरे ने बाइबिल का हिन्दी अनुवाद सन् 1809 ई० में 'न्ये धर्म नियम' शीर्षक से किया।
सन् 1809 ई० में हेनरी मार्टिन ने 'बाइबिल' का हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओं में अनुवाद किया।
अन्य महत्त्वपूर्ण रचनाकार एवं रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
रचनाकार
(1) जे०टी० आमसन
रचना
(2) जान म्योर
दाऊद के गीत (1836 ई०)
(3) जे०ए० शरमन
ईश्वरोक्तशास्त्र धारा (1846 ई०), संतमत निरूपण (1848 ई०)
'दि प्रापर नेम्स इन द ओल्ड एण्ड न्यू टेस्टामेण्ट्स रेन्डर्ड इन्दू उर्दू एण्ड हिन्दी' (1850 ई०), फूलों का शर (1850 ई०), पॉल का चरित्र (1852 ई०), वेदान्त विचार (1853 ई०)
(4) मार्श मैन
प्राचीन इतिहास का अनुवाद (1839 ई०)
हिन्दी गद्य का विकास
(5) पं० रतन लाल
कथा सार (1839 ई०)
स्वामी दयानन्द सरस्वती ने 1874 ई० में 'सत्यार्थ प्रकाश' की रचना खड़ी बोली हिन्दी-गद्य में की।
पण्डित मदनमोहन मालवीय के अथक प्रयत्न से सन् 1900 ई० में कचहरियों में नागरी की प्रतिष्ठा हुई।
दयानन्द के अनुयायी हिन्दी को 'आर्यभाषा' कहते थे।
हिन्दी भाषा की प्रथम पत्रिका 'उदंत मार्तंड' का प्रकाशन 30 मई 1826 ई० को कानपुर निवासी पं० जुगलकिशोर के सम्पादकत्व में हुआ।
उदंत्न मार्तंड' साप्ताहिक पत्रिका थी, जो कलकत्ता से निकलती थी।
'उदंत मार्तंड' में 'खड़ी बोली' का 'मध्यदेशीय भाषा' के नाम से उल्लेख किया गया है।
5
'उदंत मार्तंड' के प्रकाशन दिन को आधार मानकर 30 मई को 'राष्ट्रीय हिन्दी पत्रकारिता' दिवस मनाया जाता है।
कलकत्ता से सन् 1854 ई० में हिन्दी का पहला दैनिक पत्र 'समाचार सुधावर्षण' श्याम सुन्दर सेन के सम्पादकत्व में निकला।
प्रारम्भिक समय के प्रमुख समाचार पत्र, सम्पादक, वर्ष, प्रकार निम्नांकित हैं-
(1826 से 1867 तक)
समाचार-पत्र
उदन्त मार्तंड
जुगल किशोर
बंगदूत
प्रजामित्र
बनारस अखबार
मार्तण्ड
मालवा अखबार
सुधाकर
बुद्धि प्रकाश
समाचार सुधावर्षण
प्रजा हितैषी
राजा लक्ष्मण सिंह
जगत दीप भाष्कर
लोकमित्र
अवध अखबार (उर्दू)
ज्ञानदायिनी पत्रिका
तत्त्वबोधिनी पत्रिका
नवीनचन्द्र राय
वृत्तांत विलास
सम्पादक
वर्ष
राजा राममोहन राय
राजा शिवप्रसाद सिंह
मौ० नासिरुद्दीन
प्रेमनारायण
बाबू तारामोहन मित्र
मुंशी सदासुख लाल
श्यामसुन्दर सेन
मौ० नासिरुद्दीन
ईसाई मिशनरी
1863 ई०
1867 ई०
1865 ई०
1867 ई०
प्रकार
स्थान
1826 ई०
साप्ताहिक
1829 ई०
साप्ताहिक
कलकत्ता
1834 ई०
साप्ताहिक
कलकत्ता
1845 ई०
साप्ताहिक
कलकत्ता
1846 ई०
साप्ताहिक
कलकत्ता
काशी
1849 ई०
साप्ताहिक
मालवा
1850 ई०
साप्ताहिक
काशी
1852 ई०
साप्ताहिक
आगरा
1854 ई०
दैनिक
कलकत्ता
1855 ई०
आगरा
1846 ई०
कलकत्ता
आगरा
लखनऊ
मासिक
पंजाब
बरेली
मासिक
जम्मू
८) बंगदूत पत्रिका का प्रकाशन हिन्दी के अतिरिक्त अंग्रेजी, फारसी तथा बंगला भाषा में भी होता था।
बनारस अखबार' के विरोध में तारामोहन मित्र ने 'सुधाकर' पत्रिका का प्रकाशन किया।
मुंशी सदासुखलाल की पत्रिका 'बुद्धि प्रकाश', 'नरुल बाजार' का हिन्दी रूपान्तर
थी।
पं० बंशीधर ने आगरा से हिन्दी-उर्दू का एक पत्र निकाला था जिसके हिन्दी कालम का नाम 'भारत खण्डामृत' तथा उर्दू कालम का नाम 'आबेहयात' था।
गार्सा द तासी एक फ्रांसीसी विद्वान थे जो पेरिस में हिन्दुस्तानी या उर्दू के अध्यापक थे।
तासी ने सन् 1836 में 'हिन्दुस्तानी साहित्य का इतिहास' पुस्तक की रचना की।
तासी उर्दू भाषा के कट्टर समर्थक थे जिसके कारण वे हिन्दी को एक 'भद्दी बोली' कहते थे।
पंजाब प्रान्त के पं० नवीनचन्द्र राय हिन्दी भाषा के पक्के समर्थक थे।
विद्या की उन्नति के लिए नवीन चन्द्र राय ने लाहौर में 'अंजुमन लाहौर' सभा की स्थापना की।
नवीन चन्द्र ने लाहौर में स्त्री-शिक्षा का प्रचार जोर-शोर से किया।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने पंजाब के श्रद्धाराम फिल्लौरी को अपने समय का सच्चा हिन्दी हितैषी और सिद्धहस्त लेखक माना।
श्रद्धा राम फिल्लौरी की प्रमुख रचनाएँ निम्न हैं- गद्य (1) सत्यामृत प्रवाह, पद्म- (2) आत्मचिकित्सा, (3) तत्त्वदीपक, (4) धर्म रक्षा, (5) उपदेश संग्रह, (6) शतोपदेश।
श्रद्धा राम फिल्लौरी ने प्रसिद्ध आरती 'ओम जय जगदीश हरे' की रचना की।
राजा शिवप्रसाद 'सितारे हिन्द' (1823-1895 ई०) भारतेन्दु के गुरु थे।
राजा शिवप्रसाद सिंह सन् 1856 ई० में शिक्षा विभाग के इंस्पेक्टर नियुक्त हुए।
राजा शिवप्रसाद सिंह की महत्त्वपूर्ण रचनाएँ निम्नलिखित हैं- (1) राजा भोज का सपना, (2) आलसियों का कोड़ा, (3) इतिहासतिमिर नाशक, (4) मानव धर्मसार, (5) वीर सिंह का वृत्तांत, (6) उपनिषदसार, (7) भूगोल हस्तामलक, (8) वामा मनोरंजन, (9) वर्णमाला, (10) स्वयंबोध, (11) विद्यांकुर, (12) भाषा का इतिहास (लेख), (13) गुटका, (14) हिन्दुस्तान के पुराने राजाओं का हाल, (15) सिक्खों का उदय और अस्त
राजा शिवप्रसाद सिंह के सम्बन्ध में आचार्य शुक्ल ने लिखा है, "प्रारम्भ काल से ही वे ऐसी हिन्दी के पक्षपाती थे जिसमें सर्वसाधारण के बीच प्रचलित अरबी-फारसी शब्दों का स्वच्छन्द प्रयोग हो।"
राजा शिवप्रसादसिंह कृत 'गुटका' एक संग्रह-पुस्तिका है। यह स्कूली विद्यार्थियों के लिए लिखी गई थी।
राजा लक्ष्मण सिंह (1826-1896 ई०) संस्कृतनिष्ठ हिन्दी के समर्थक थे।
राजा लक्ष्मण सिंह ने कालिदास के तीन ग्रन्थों का अनुवाद हिन्दी में किया है, जो निम्न हैं- (1) शकुन्तला (1862), (2) रघुवंश (1878) और (3) मेघदूत (1882)1
राजा लक्ष्मण सिंह ने 'रघुवंश' के गद्यानुवाद के प्राक्कथन में लिखा है, "हमारे मत में हिन्दी और उर्दू दो बोली, न्यारी न्यारी है। हिन्दी इस देश के हिन्दू बोलते हैं और उर्दू यहाँ के मुसलमान और पारसी पढ़े हुए हिन्दुओं को बोलचाल है।"
प्रमुख संस्थाएँ निम्न हैं-भारत में हुए सांस्कृतिक जागरण, धार्मिक तथा सामाजिक सुधार से सम्बन्धित
संस्था
स्थापना वर्ष (ई०)
संस्थापक
ब्रह्म समाज
1828
राजा राममोहन राय
तत्वबोधिनी सभा
1839
देवेन्द्रनाथ ठाकुर
प्रार्थना समाज
1867
केशवचन्द्र सेन के सहयोग से राना डे,
आत्माराम और देवेन्द्रनाथ
वेद समाज
1867
केशवचन्द्र सेन
सत्य शोधक समाज
1873
ज्योतिया बाई फुले
आर्य समाज
1875
दयानन्द सरस्वती
थियोसाफिकल सोसाइटी
1882
ब्लाटवस्को एवं कर्नल अल्काट
रामकृष्ण मिशन
1897
स्वामी विवेकानन्द
हिन्दी नाटक का विकास
प्रथम उत्थान : भारतेन्दु युग
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है, "विलक्षण बात यह है कि आधुनिक गद्य-साहित्य की परम्परा का प्रवर्तन नाटकों से हुआ।"
हिन्दी का प्रथम नाटक, नाटककार एवं प्रस्तोता-
प्रस्तोता
मूल नाटक
भाषा
मूल नाटककार
डॉ० दशरथ ओझा
गय सुकुमार रास
अपभ्रंश
देल्हण
डॉ० गणपति चन्द्र गुप्त
गोरक्ष विजय
मैथिल
विद्यापति
डॉ० बच्चन सिंह
आनन्द रघुनंद
ब्रजभाषा
महाराज विश्वनाथ सिंह
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
आनन्द रघुबन्द
ब्रजभाषा
महाराज विश्वनाथ सिंह
भारतेन्दु हरिश्चन्द
नहुष
ब्रजभाषा
गिरिधरदास (गोपालचन्द्र)
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अपने पिता गिरिधरदास (मूलनाम गोपाल चन्द्र) कृत 'नहुष' (1859 ई०) को हिन्दी का प्रथम नाटक, राजा लक्ष्मण सिंह कृत 'शकुन्तला' (1862 ई०) को द्वितीय, अपने द्वारा लिखे 'विद्यासुंदर' (1868 ई०) को तीसरा और श्री निवासदास के तप्तासंवरण (1883 ई०) को चौथा नाटक माना है।
भारतेन्दु के अनुसार 'नहुष' की रचना 'विशुद्ध नाटक रीति' तथा 'पात्त्र प्रवेशादि नियम रक्षण' को ध्यान में रखकर की गई है।
'नहुष' नाटक पद्य-बद्ध ब्रजभाषा में लिखा गया है।
खड़ी बोली में सन् 1862 ई० में राजा लक्ष्मण सिंह द्वारा गद्य में अनूदित 'शकुन्तला' नाटक सबसे पहले आता है।
हिन्दी भाषा के अन्य प्रमुख नाटककार एवं नाटक निम्नलिखित हैं-
नाटककार
भाषा
नाटक
वर्ष (ई०)
प्राणचन्द चौहान
ब्रजभाषा
रामायण महानाटक
1610
रघुराय नागर
ब्रजभापा
सभामार
1700
अमानत
ब्रजभाषा
इंदरसभा
1853
यशवंत सिंह
ब्रजभाषा
प्रबोध चन्द्रोदय
1643
गुरु गोविन्द सिंह
ब्रजभाषा
चंडी-चरित्र
बनारसीदास
ब्रजभाषा
समय सार नाटक
1663
कृष्णजीवन लछिराम
ब्रजभाषा
करुणाभरण
1657
नेवाज
ब्रजभाषा
शकुन्तला
1680
गणेश कवि
ब्रजभाषा
प्रद्युम्न विजय
1863
अमानत कृत 'इन्दर सभा' एक आपेरा (गीतिनाट्य) है।
अंग्रेजों द्वारा प्रश्नम 'रंगशाला', 'प्ले हाउस' नाम से सन् 1776 ई० में कलकत्ता में स्थापित किया गया था।
सन् 1777 ई० में 'कलकत्ता थियेटर' की स्थापना हुई।
आधुनिक हिन्दी का पहला अभिनीत नाटक शीतला प्रसाद त्रिपाठी का 'जानकी मंगल' माना गया है। जो 1868 ई० में काशी में खेला गया और जिसमें लक्ष्मण का अभिनय भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने किया।
शकुन्तला के अभिनय में प्रतापनारायण मिश्र का अपने पिता से मूछ मुड़ाने के लिए आज्ञा माँगना प्रसिद्ध है।
सही अर्थों में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को ही नाट्य-विधा का प्रवर्तक माना जाता है।
हरिश्चन्द्र को भारतेन्दु की उपाधि 1880 ई० में काशी के पण्डित रघुनाथ ने दी थी।
भारतेन्दु के समस्त मौलिक एवं अनूदित नाटकों की संख्या 17 है।
भारतेन्दु का पहला नाटक 'विद्या सुन्दर' माना जाता है।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के मौलिक नाटक हैं-
नाटक
वर्ष (ई.)
प्रकार
नाटक के विषय
1. वैदिकी हिसा हिंसा न भवति
1873
प्रहसन
सामाजिक धार्मिक विसंगति पर व्यंग्य
2. विषस्य
1876
भाण (एक पात्रीय नाटक
बड़ौदा के गायकवाड़ के गद्दी से
विषमौषधम्
उतारे जाने तथा सयाजी राव के उनके
स्थान पर बिठाये जाने की घटना पर आधारित
3. प्रेम जोगिनी
1875
4 अंकों की नाटिका
काशी के धर्माडम्बर का छायाचित्र
4. चन्द्रावली
1876
नाटिक
वैष्णव भक्ति और प्रेमतत्त्व का चित्रण
5. भारत-दुर्दशा
1880
नाट्य या
भारतवर्ष के तत्कालीन परिस्थिति
रासक या
का चित्रण व अंग्रेजी राज्य की
लास्य रूपक
6. नीलदेवी
1881
गीतिरूपक
अप्रत्यक्ष निन्दा
राजपूतानी आनबान एवं नारी
व्यक्तित्व की प्रतिष्ठा (ऐतिहासिक गीति रूपक)
7. अंधेर नगरी
1881
प्रहसन
राजा की मूर्खता, अन्याय और अँधेरगर्दी पर तीखा व्यंग्य
8. सती प्रताप
1883 |
पौराणिक नाटक
सावित्री-सत्यवान के पौराणिक आख्यान पर आधारित
नाटक के उद्देश्य की चर्चा करते हुए भारतेन्दु ने नाटक के पाँच उद्देश्य बताये
(1) हास्य,
(2) श्रृंगार,
(3) कौतुक,
(4) समाज संस्कार,
(5) देश वत्सलता।
देश वत्सलता के उद्देश्य से भारतेन्दु ने 'भारत-जननी', 'नीलदेवी', 'भारत-दुर्दशा' और 'अंधेर नगरी' की रचना की।
'सती प्रताप' भारतेन्दु का अधूरा नाटक है जिसे राधा कृष्णदास ने पूरा किया।
ब्रजरत्नदास ने 'भारतेन्दु हरिश्चन्द्र' पुस्तक में लिखा है कि बिहार प्रान्त के किसी जमींदार के अन्यायों को लक्ष्य करके उसे सुधारने के लिए तथा 'नेशनल थियेटर' में अभिनीत किये जाने के लिए 'अंधेर नगरी' की रचना की गई थी।
भारतेन्दु हरिश्चन्द ने काशी में 'नेशनल थियेटर' की स्थापना में की।
काशीनाथ खत्री का नाटक 'बाल विधवा संताप' भारतेन्दु के घर पर खेला गया था।
'प्रेम जोगिनी' नाटक का पूर्व नाम 'काशी के छायाचित्र या दो भले बुरे फोटोग्राफ' था। जो इसी नाम से 'हरिश्चन्द्र चंद्रिक' पत्रिका में प्रथम बार प्रकाशित हुई।
भारतेन्दु ने तीन पत्रिकाओं का सम्पादन किया है-
(1) कविवचन सुधा 1868 ई० में प्रकाशित
{ (2) हरिश्चन्द्र मैगजीन 1873 ई० में प्रकाशित मासिक पत्रिका (हरिश्चन्द्र चंद्रिका)
(3) बालाबोधिनी 1874 ई० में प्रकाशित (महिलाओं से सम्बन्धित)
भारतेन्दु ने 'कवितावर्धिनी सभा', 'त्वदीय समाज', 'पैनी रीडिंग क्लब' आदि को स्थापना की।
भारतेन्दु हिन्दी के अकेले ऐसे प्रथम नाटककार हैं जिन्होंने अपनी मौलिकता और चिन्तन को नाटक-निबन्ध और अपने नाट्य लेखन में प्रयुक्त नये प्रयोगों द्वारा प्रस्तुत किया।
हरिश्चन्द्र ने 'नाटक निबन्ध' की रचना सन् 1883 ई० में की।
भारतेन्दु कृत 'भारत दुर्दशा' हिन्दी भाषा का पहला मौलिक राजनीतिक नाटक है।
'भारत जननी' हिन्दी का पहला मौलिक ओपेरा (गीति नाट्य) है।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के अनूदित नाटक-
अनूदित नाटक
वर्ष
मूल नाटक
भाषा
मूल नाटककार
रत्नावली
1868
रत्नावली नाटिका संस्कृत के चौर पंचासिका का, बंगला विद्यासागर का हिन्दी अनुवाद
संस्कृत
संस्कृत से
हर्ष
विद्या सुन्दर
1868
बंगला
संस्कृत में चौर कवि, बंगला में यतीन्द्र मोहन ठाकुर
पाखण्ड विडम्बन
1872
प्रबोध चंद्रोदय (3 अंक)
संस्कृत
कवि कृष्ण मिश्र
धनंजय विजय
1873
धनंजय विजय
संस्कृत
कांचनः कवि
मुद्रा राक्षस
1878
मुद्रा राक्षस
संस्कृत
विशाखादत्त
दुर्लभ बन्धु
1880
मरचेन्ट ऑफ वेनिस
अंग्रेजो
विलियम शेक्सपियर
{
कर्पूर मंजरी
1875
कर्पूर मंजरी
सत्य हरिश्चन्द्र
1875
भारत जननी
1877
चंड कौशिक
भारतमाता
प्राकृत
बंगला
राजशेखर
बंगला
क्षेमेश्वर
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा अभिनीत नाटक
नाटक
(1) जानकी मंगल (शीत लाबाद
)
हरिश्चन्द्र की भूमिका
लक्ष्मण की भूमिका
(2) नील देवी
पागल की भूमिका
(3) सत्य हरिश्चन्द्र
हरिश्चन्द्र की भूमिका
बाबू ब्रजरत्नदास एवं राधाकृष्ण दास के अनुसार भारतेन्दु द्वारा रचित 'प्रवास नाटक' उनका प्रथम नाटक है।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के अनूदित नाटकों के प्रकार व विषय-
अनूदित नाटक
प्रकार
नाटक का विषय
(1) रत्नावली
नाटिका
अपूर्ण जाटक है।
(2) विद्यासुन्दर
नाटक
इसमें 'प्रेम-विवाह' को अधिक श्रेयस्कर माना गया है।
(3) पाखण्ड विडम्बन
रूपक
इसमें वैष्णव मत की विशिष्टता व पाखण्ड मुक्त हरिभक्ति करने का उपदेश है।
(4) धनंजय विजय
व्यायोग
इसमें पाण्डवों के विराट की सभा में अज्ञातवास करने के अन्तिम दिन कौरवों ने विराट का गोधन-हरण कर लिया तब धनंजय ने अकेले परास्त किया।
(5) मुद्रा राक्षस
नाटक
यह एक राजनीतिक नाटक है जिसमें चाणक्य की कूटनीति का महत्व प्रतिपादित है।
(6) दुर्लभ बन्धु (या वंशपुर का महाजन)
नाटक
शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक की कथा का भारतीयकरण किया गया है।
(7) कर्पूर मंजरी
सट्टक
उसमें राजकुमार चन्द्रपाल और कुंतल देश के विदर्भनगर के बल्लभ राजा की कन्या के विचित्र विवाह का वर्णन है।
(8) सत्य हरिश्चन्द्र
नाटक
इसमें सत्य के आदर्श को प्रस्तुत किया गया है।
(9) भारत जननी
आपेरा या
इसमें पारस्परिक कलह, ईर्ष्या, द्वेष आदि के
लघु नाट्य
परिणामस्वरूप भारतीयों की दुर्दशा पर आँसू
गीत
बहाये गये हैं।
भारतेन्दु युग के कृष्ण के चरित्र पर आधृत पौराणिक नाटक-
नाटककार
नाटक
(1) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
चंद्रावली
वर्ष (ई० में)
(2) अम्बिकादत्त व्यास
ललिता
1876
(3) हरिहरदत्त दूने
महारास
1884
(4) खड्गबहादुर मल्ल
महारास और कल्पवृक्ष
1884
(5) सूर्यनारायण सिंह
श्यामानुराग नाटिका
1885 और 1886
1000
(6) चन्द्र शर्मा
उपाहरण
1887
(7) कार्तिक प्रसाद खत्री
उपाहरण
1892
(8) अयोध्या सिंह उपाध्याय
प्रद्युम्न विजय, रुक्मिणी परिणय
1893, 1894
भारतेन्दु युग के राम-कृष्ण के चरित्र पर आधृत पौराणिक नाटक-
नाटककार
नाटक
वर्ष (ई०
(1) श्रीनिवास दास
प्रह्लाद चरित्र
1888
(2) बालकृष्ण भट्ट
नल-दमयन्ती स्वयंवर, वृहन्नला
1895
(3) शालिग्राम लाल
अभिमन्यु वध, अर्जुन-मद-मर्दन,
पुरु-विक्रम
(4) देवकीनन्दन खत्री
सीताहरण, रामलीला
1876, 1879
(5) शीतला प्रसाद त्रिपाठी
रामचरितावली
1887
(6) द्विज दास
रामचरित्र नाटक
1891
भारतेन्दु युग के प्रेम प्रधान रोमानी नाटक निम्नांकित हैं-
नाटककार
नाटक
वर्ष (ई० में
(1) श्रीनिवास दास
रणधीर प्रेममोहिनी, तप्ता संवरण
1877, 1883
(2) किशोरीलाल गोस्वामी
प्रणयिनी परिणय, मयंक मंजरी
1890, 1891
(3) खड्ग बहादुर मल्ल
रति कुसुमायुध
1885
(4) शालिग्राम शुक्ल
लावण्यवती सुदर्शन
1892
(5) गोकुलनाथ शर्मा
पुष्पवती
1899
रणधीर प्रेम मोहिनी को हिन्दी का पहला दुःखान्तक नाटक माना जाता है।
हिन्दी के कुछ आलोचक विशेषतः गिरीश रस्तोगी ने भारतेन्दु कृत 'नीलदेवी' को हिन्दी का प्रथम दुःखान्तक नाटक माना है।
भारतेन्दु युग के प्रमुख ऐतिहासिक नाटक निम्नलिखित हैं-नाटककार
(1) श्रीनिवासदास
(2) राधाकृष्ण दास
(3) राधाचरण गोस्वामी
(4) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
नाटक
संयोगिता स्वयंवर
पद्मावती, महाराणा प्रताप
अमर सिंह राठौर, सती चन्द्रावती
वर्ष (ई० में)
1886
1882, 1897
1895
नील देवी
1881
भारतेन्दु युग के सामाजिक (समसामयिक) नाटक अग्रांकित हैं-
नाटककार
(1) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
नाटक
वर्ष (ई० में)
(2) बालकृष्ण भट्ट
भारत दुर्दशा
नई रोशनी का विप
1880
(3) खड्गबहादुर मल्ल
भारत आरत
1884
(4) अम्बिका दत्त व्यास
भारत-सौभाग्य
1885
(5) राधाकृष्ण दास
दुःखिनी बाला
1887
(6) गोपाल राम गहमरी
देश-दशा
1880
(7) काशीनाथ खत्री
विधवा-विवाह
1892
(8) देवकीनन्दन त्रिपाठी
भारत-हरण
1899
'संगीत शाकुन्तला' प्रतापनारायण मिश्र का महत्वपूर्ण नाटक है।
भारतेन्दुयुगीन महत्वपूर्ण प्रहसन-
नाटककार
प्रहसन
वर्ष (ई०)
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
वैदिक हिंसा हिंसा न भवति, अंधेर नगरी
1873, 1881
बालकृष्ण भट्ट
जैसा काम वैसा परिणाम, आचार विडम्बन
1877, 1899
विजयानन्द त्रिपाठी
महाअंधेर नगरी
1893
प्रतापनारायण मिश्र
कलि कौतुक रूपक
1886
राधाचरण गोस्वामी
बूढ़े मुँह मुँहासे, तन मन धन गुसाईजी के अर्पन
1886
अम्बिकादत्त व्यास
देशी घी और चर्बी में व्यवसाय
पहला आधुनिक रंगमंच बंगला का माना जाता है जिसके अन्तर्गत एक रूसी नागरिक लेबेडेफ द्वारा 1895 ई० में एक बंगला अनुवाद का मंचन हुआ।
पारसी थियेटर के लिए लिखे गये नाटक व नाटककार निम्न हैं-
नाटककार
नाटक
नारायण प्रसाद 'बेताब'
(1) कृष्ण सुदामा, (2) गोरख धंधा,
(3) मीठा जहर,
आगा हश्र काश्मीरी
(4) रामायण नाटक।
(1) अछूता दामन, (2) असीरे हिर्स (3) खूबसूरत बला, (4) चंडीदास नाटक, (5) जहरी साँप, (6)
भीष्म प्रतिज्ञा, (7) यहूदी की लड़की।
राधेश्याम कथावाचक
(1) घंटा-पंथ।
तुलसीदत्त शैदा
(1) जनकनंदिनी, (2) नारी-हृदय।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के प्रमुख सूक्ति निम्न हैं-
(1) अंग्रेजराज सुख साज साजे सब भारी पै धन विदेस चलि जात इहै अति ख्वारी। भारत दुर्दशा
(2) अंधा धुंध मच्यौ सब देसा। मानहु राजा रहत विदेसा ॥ - अंधेर नगरी
1 संस्कृत भाषा से अनूदित हिन्दी नाटक निम्नांकित हैं-
मूल
मूल नाटक
नाटककार
भवभूति
उत्तररामचरित
अनुवादक
(1) देवदत्त तिवारी (1871), (2) नंदलाल विश्वनाथ दूबे (1886), (3) लाला सीताराम
(1897)
मालतीमाधव
(1) लाला शालिग्राम (1881), (2) सीताराम (1898)
महावीरचरित
(1) लाला सीताराम (1897)
कालिदास
अभिज्ञानशाकुन्तलम्
(1) लक्ष्मण सिंह (1862), (2) नंदलाल
विश्वनाथ दूबे (1888)
मालविकाग्नि मित्र
(1) लाला सीताराम (1898)
कृष्णमित्र
प्रबोधचन्द्रोदय
(1) शीतला प्रसाद (1879), (2) अयोध्या
प्रसाद चौधरी
शूद्रक
मृच्छकटिक
(1) गदाधर भट्ट (1880), (2) लाला सीताराम (1899)
हर्ष
रत्नावली
(1) देवदत्त तिवारी (1872), (2) बालमुकुन्द सिंह (1898)
भट्टनारायण
वेणी संहार
(1) ज्वाला प्रसाद सिंह (1897)
बांग्ला भाषा से अनूदित हिन्दी नाटक निम्नलिखित हैं-
मूल नाटककार
मूल नाटक
अनुवादक
माइकेल मधुसूदन
पद्मावती
(1) बालकृष्ण भट्ट (1878)
शर्मिष्ठा
(1) रामचरण शुक्ल (1880)
कृष्णमुरारी
(1) रामकृष्ण वर्मा (1899)
मनमोहन वसु
सती
(1) उदित नारायण लाल (1880)
राजकिशोर दे
पद्मावती
(1) रामकृष्ण वर्मा (1889)
द्वारिकानाथ गांगुली
वीर नारी
(1) रामकृष्ण वर्मा (1899)
अंग्रेजी भाषा से अनूदित हिन्दी नाटक निम्न हैं-
मूल नाटककार
मूल नाटक
अनुवादक
वर्ष
अनूदित नाटक
विलियम शेक्सपियर
मरचेंट ऑफ वेनिस
आर्या
रत्नचन्द प्लोडर
1888
वेनिस का व्यापार
द कॉमेडी ऑफ ऐरर्स
ऐज यू लाइक इट
पुरोहित गोपीनाथ
1896
1879
भरम जालक
रोमियो जूलियट
पुरोहित गोपीनाथ
1897
मनभावन
मैकबेथ
मथुरा प्रसाद
1893
प्रेमलीला
साहसेन्द्र साहस
उपाध्याय
जोसेफ एडिसन
केटो
बाबू तोताराम
1879 कृतान्त
बाबू तोताराम ने 'भाषा संवर्धिनी' सभा की स्थापना की थी।
द्वितीय उत्थान : द्विवेदी युग
सन् 1903 ई० में बालकृष्ण भट्ट ने लिखा, 'हिन्दू जाति तथा हिन्दुस्तान को जल्द गिरा देने का सुगम लटका यह पारसी थियेटर है, जो दर्शकों को आशिकों-माशूकों का लुफ्त हासिल कराने का बड़ा उम्दा जरिया है।'
सन् 1912 ई० में बदरीनाथ भट्ट ने संस्कृत के 'वेणी संहार' नाटक का 'कुरुवन दहन' नाम से हिन्दी रूपान्तर किया।
द्विवेदी युग में रचित ऐतिहासिक नाटक निम्नलिखित है-
नाटककार
गंगा प्रसाद गुप्त
वृन्दावनलाल वर्मा
बद्रीनाथ भट्ट
कृष्ण प्रकाश सिंह
हरिदास माणिक
नाटक
वीर जयमल (1903)
सेनापति उदल (1909)
चन्द्रगुप्त (1915)
पन्ना (1915)
संयोगिता हरण (1915)
परमेष्ठीदास
वीर चुडावत सरदार (1918)
द्विवेदी युग के समसामयिक उपादानों पर लिखे नाटक निम्न हैं-
नाटककार
नाटक
भगवती प्रसाद
वृद्ध विवाह (1905)
जीवानन्द शर्मा
भारत विजय (1906)
कृष्णानन्द जोशी
उन्नति कहाँ से होगी (1915)
मिश्र बन्धु
नेत्रोन्मीलन (1915)
द्विवेदी युग में रचित प्रमुख पौराणिक नाटक निम्नांकित हैं-
नाटककार
नाटक
राधाचरण गोस्वामी
श्रीदामा (1904)
शिवनन्दन सहाय
सुदामा (1907)
बनवारी लाल
(1) कृष्ण कथा (2) कंस वध (1909)
ब्रजनन्दन सहाय
उद्धव (1909)
नारायण मिश्र
कंसवध (1910)
रामनारायण मिश्र
जनक बाड़ा (1906)
गंगा प्रसाद
रामाभिषेक (1910)
गिरधर लाल
रामवन यात्रा (1910)
नारायण सहाय
रामलीला (1911)
रामगुलाम लाल
धनुष यज्ञ लीला (1912)
महावीर सिंह
नल दमयंती (1905)
गौरचरण गोस्वामी
अभिमन्यु वध (1906)
सुदर्शनाचार्य
अनर्घ नल चरित (1906)
बाँके बिहारी लाल
सावित्री नाटिका (1908)
बालकृष्ण भट्ट
वेणु संहार (1909)
लक्ष्मी प्रसाद
उर्वशी (1910)
हनुमन्त सिंह
सती चरित्र (1910)
शिवन्दन मिश्र
शकुन्तला (1911)
बद्रीनाथ भट्ट
कुरुवन दहन (1912)
माधव शुक्ल
महाभारत पूर्वार्द्ध (1916)
हरिदास माणिक
पाण्डव-प्रताप (1917)
माखनलाल चतुर्वेदी
कृष्णार्जुन-युद्ध (1918)
तृतीय उत्थान : प्रसाद युग
जयशंकर प्रसाद ऐतिहासिक नाटककार के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
जयशंकर प्रसाद का प्रथम नाटक सन् 1910 ई० में प्रकाशित 'सज्जन' को माना जाता है।
जयशंकर प्रसाद के नाटक निम्नलिखित बताये जाते हैं-
नाटक
वर्ष (ई.)
आधार व विषय
(1) सज्जन
1910
सज्जन का कथानक महाभारत से लिया गया है।
(2) कल्याणी परिणय
1912
कल्याणी परिणय में चन्द्रगुप्त व सिल्यूकस की कथा है।
1
(3) करुणालय
1912
इसमें हरिश्चन्द्र व विश्वामित्र का पौराणिक आख्यान है।
(4) प्रायश्चित
1913
इसमें जयचंद के मूर्खतापूर्ण कुचक्र के कारण पृथ्वीराज का अन्त दिखाया गया है।
(5) राज्यश्री
1915
इसका आधार 'हर्षचरित' तथा चोनी यात्री ह्वेनसांग का ऐतिहासिक विवरण है।
(6) विशाख
1921
विशाख का कथानक कल्हण की 'राजतरंगिणी' के आरम्भिक अंश के आधार पर निर्मित हुआ है।
(7) अजातशत्रु
1922
इसमें तीन राज परिवारों-मगध, कौशल और कौशाम्बी को केन्द्र मानकर शासकों की महत्वाकांक्षा और सत्तालिप्सा को दिखाया गया है।
(8) जनमेजय का
नागयज्ञ
1926
इसमें परीक्षित का प्रतापी पुत्र जनमेजय पिता का बदला लेने के लिए नागों का विध्वंस करना चाहता है।
(9) कामना
1927
कामना संस्कृत के 'प्रबोध चन्द्रोदय' की भाँति अन्योपदेशिक नाटक है। इसमें भावनाओं को नाटकीय पात्रों का रूप दिया गया है।
(10) स्कन्दगुप्त
1928
इसमें कुमारगुप्त के विलासी साम्राज्य की उस स्थिति का चित्रण हुआ है जहाँ आन्तरिक कलह, संघर्ष और विदेशी आक्रमण के फलस्वरूप उसके भावी क्षय के लक्षण प्रकट होने लगे थे।
(11) एक घूँट
1930
1931
इसमें आनन्दवादी सिद्धान्त को व्यावहारिक भूमि पर खड़ा किया गया है। यह एक एकांकी नाटक है।
(12) चन्द्रगुप्त
इसका कथानक प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटनाओं अलक्षेन्द्र का आक्रमण, नंदवंश का नाश, सिल्यूकस का पराभव, चन्द्रगुप्त की प्रतिष्ठा के आधार पर निर्मित है।
(13) ध्रुवस्वामिनी
1933
ध्रुवस्वामिनी नाटक विशाख के 'देवी चन्द्रगुप्त' के आधार पर लिखा गया है।
सन् 1912 ई० में 'कल्याणी परिणय' का प्रकाशन 'नागरी प्रचारिणी पत्रिका' में हुआ था। 'चन्द्रगुप्त' नाटक 'कल्याणी परिणय' का ही परिवर्द्धित रूप है।
प्रसाद के नाटक 'चन्द्रगुप्त' का प्रकाशन सन् 1933 ई० में 'अभिनव चन्द्रगुप्त' के नाम से किया गया था।
प्रसाद के नाटकों के प्रमुख पात्र
नाटक
पुरुष पात्र
स्त्री पात्र
स्कन्दगुप्त
पृथ्वीसेन, स्कन्दगुप्त, भट्टार्क, बंधु वर्मा, महादंडनायक, पुरु गुप्त,
अन्त देवकी, देवसेना, विजया
कुमारगुप्त
चन्द्रगुप्त
चन्द्रगुप्त, चाणक्य, शकटार, सिंहरण आम्भीक, राक्षस, पर्वतक, सिल्यूकस
कार्नेलिया, कल्याणी, एलिस मालविका, अलका, सुवासिनी
ध्रुवस्वामिनी
चन्द्रगुप्त, रामगुप्त, शिखर स्वामी
ध्रुवस्वामिनी
प्रसाद के नाटकों पर बंगला नाटककार द्विजेन्द्रलाल राय तथा अंग्रेजी नाटककार विलियम शेक्सपियर के नाटकों का सर्वाधिक प्रभाव है।
ध्रुवस्वामिनी नाटक से समस्या नाटक का प्रवर्तन माना जाता है। इसमें अनमेल विवाह, तलाक एवं पुनर्विवाह की समस्या को उठाया गया है।
प्रसाद के नाटकों के प्रमुख संवाद, गीत एवं कथन-
चन्द्रगुप्त नाटक से -
(1) मुझे इस देश से जन्मभूमि के समान स्नेह होता जा रहा है। यहाँ के श्यामल-कुंज, घने जंगल, सरिताओं की माला पहने हुई शैल श्रेणी, हरी-भरी वर्षा, गर्मी की चाँदनी, शीतकाल की धूप और भोले कृषक तथा सरला कृपक-बालिकाएँ, बाल्यकाल की सुनी हुई कहानियों की जीवित प्रतिमाएँ हैं। यह स्वप्नों का देश, यह त्याग और ज्ञान का पालना, यह प्रेम की रंगभूमि-भारत भूमि क्या भुलाई जा सकती है? कदापि नहीं। यह अन्य देशों की जन्मभूमि
है, यह भारत मानवता की जन्मभूमि है। (कार्नेलिया चन्द्रगुप्त से) (2) "यदि प्रेम ही जीवन का सत्य है ती, संसार ज्वालामुखी है।"
- कार्नेलिया सुवासिनी से
(3) "महत्वाकांक्षा का मोती निष्ठुरता की सीपी में रहता है।"
(4) अरुण यह मधुमय देश हमारा !
- चाणक्य चन्द्रगुप्त से
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा। - कार्नेलिया
हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
(5) स्वयं प्रभा समुज्वला स्वतंत्रता पुकारती। समवेत गायन
स्कन्दगुप्त नाटक से-
९५०
अधिकार सुख कितना मादक और सारहीन होता है।
- स्कन्दगुप्त का आत्मकथन
प्रसादयुगीन ऐतिहासिक नाटक-
(1) हरिकृष्ण प्रेमी
रक्षाबंधन (1934), पाताल विजय (1936),
(2) चतुरसेन शास्त्री
प्रतिशोध (1937), शिवा साधना (1937)
उत्सर्ग (1929), अमर सिंह राठौर (1923)
(3) उदयशंकर भट्ट
चन्द्रगुप्त मौर्य (1931), विक्रमादित्य (1929),
दाहर अथवा सिन्धु पतन (1933), अंबा (1935)
(4) चन्द्रगुप्त विद्यालंकार
अशोक (1935), रेवा (1935)
(5) बदरीनाथ भट्ट
दुर्गावती (1925), चन्द्रगुप्त (1915)
(6) प्रेमचंद
कर्बला (1928)
(7) गोविन्दवल्लभ पंत
राजमुकुट (1935), वरमाला (1925)
(8) जगन्नाथ प्रसाद मिलिद
प्रताप प्रतिज्ञा (1929)
(9) पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र'
महात्मा ईसा
(10) रामवृक्ष बेनीपुरी
आम्बपाली
प्रसादयुगीन सामाजिक नाटक-
नाटककार
(1) विश्वम्भरनाथ शर्मा 'कौशिक'
नाटक
अत्याचार का परिणम (1921), हिन्दू विधवा नाटक (1935)
(2) प्रेमचंद
संग्राम (1922)
(3) सुदर्शन
अंजना (1923), आनरेरी मैजिस्ट्रेट (1926), भाग्य (1937)
(4) गोविन्दवल्लभ पंत
कंजूस की खोपड़ी (1923), अंगूर की बेटी (1937)
(5) पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र'
चुम्बन (1937), डिक्टेटर (1937)
(6) सेठ गोविन्ददास
प्रकाश (1935)
(7) उदयशंकर भट्ट
कमला (1935)
प्रसाद युगीन हास्य-व्यंग्य प्रधान नाटक-
नाटककार
(1) जी०पी० श्रीवास्तव
नाटक
उलटफेर (1918), दुमदार आदमी (1919), गड़बड़झाला (1919), नाक में दम उर्फ जवानी बनाम बुढ़ापा उर्फ मियां की जूती मियां के सर (1926), भूलचूक (1928), चोर के घर छिछोर (1933), चाल वेढब (1934), साहित्य का सपूत (1934), स्वामी चौखटानंद (1936), मरदानी औरत (1920),
विवाह विज्ञापन (1927), मिस अमेरीकन (1929)
(2) रामदास गौड़
ईश्वरीय न्याय (1924)
प्रसादयुगीन धार्मिक पौराणिक नाटक-
नाटककार
नाटक
अंबिकादत्त त्रिपाठी
सीय स्वयंवर नाटक (1918)
रामनरेश त्रिपाठी
सुभद्रा (1942), जयंत (1934)
वियोगी हरि
छद्म योगिनी (1928), प्रबुद्ध यामुन (1929)
हरिऔध
प्रद्युम्न विजय व्यायोग (1936), रुक्मिणी परिणय (1937)
सेठ गोविन्द दास
कर्तव्य (1936)
किशोरीदास वाजपेयी
सुदामा (1934)
माखनलाल चतुर्वेदी
कृष्णार्जुन युद्ध (1918)
मैथिलीशरण गुप्त
तिल्लोतमा (1916), अनघ (1925)
उदयशंकर भट्ट
सागर विजय (1933), विद्रोहिणी अंबा (1935), मत्स्यगन्धा (1937), विश्वामित्र (1938), राधा (1940)
लक्ष्मीनारायण मिश्र को हिन्दी में 'समस्या नाटक' का जन्मदाता माना जाता है।
लक्ष्मीनारायण मिश्र के मुख्य नाटक हैं-
(1) अशोक (1927), (2) संन्यासी (1930), (3) मुक्ति का रहस्य (1932), (4) राक्षस का मन्दिर (1931), (5) राजयोग (1933), (6) सिन्दूर की होली (1934) और (7) आधी रात (1934)।
प्रतीकवादी नाटकों की सार्थक संज्ञा 'अन्योपदेशिक' कही गई है।
प्रसाद का 'कामना' (1927), पंत का 'ज्योत्स्ना' (1934) और भगवती प्रसाद वाजपेयी का 'छलना' (1939) ये तीनों नाटक अन्योपदेशिक नाटक हैं।
'गीति नाट्य' लेखन का प्रवर्तक जयशंकर प्रसाद को माना जाता है।
'क्ररुणालय' को हिन्दी का प्रथम यीत्क्ति-लाट्य माना जाता है।
कुछ आलोचक विद्वान भारतेन्दु कृत 'भारत-जननी' को प्रथम 'गीति नाट्य' मानते हैं।
प्रसादयुगीन प्रमुख 'गीतिनाट्य' निम्नलिखित हैं-
जयशंकर
करुणालय (1912)
मैथिलीशरण गुप्त
अनघ (1925)
हरिकृष्ण प्रेमी
स्वर्ण विहान (1930)
भगवतीचरण वर्मा
तारा
उदयशंकर भट्ट
मत्स्यगंधा (1937), विश्वामित्र (1938)
सुमित्रानंदन पंत
रजत शिखर (1952), शिल्पी (1952)
गिरिजा कुमार माथुर
कल्पान्तर
धर्मवीर भारती
अंधायुग (1955 ई०)
डॉ० नगेन्द्र ने 'गीतिनाट्य' को 'भावनाट्य' की संज्ञा दी है।
'समस्या नाटक' का प्रवर्तन हिन्दी में अंग्रेजी इब्सन एवं बनार्ड शॉ के प्रभाव से हुआ।
प्रमुख 'समस्या नाटक' निम्न है-
नाटककार
समस्या नाटक
प्रेम सहाय सिह
नवयुग (1934)
लक्ष्मीनारायण मिश्र
राक्षस का मन्दिर (1931), संन्यासी (1930 ई०), मुक्ति का रहस्य (1932), राजयोग (1933), सिन्दूर की होली (1934), आधी रात (1934)।
उपेन्द्रनाथ 'अश्क'
लक्ष्मी का स्वागत (1935), स्वर्ग की झलक (1940), छठा बेटा (1940), जय पराजय (1937), देवताओं की छाया (1940), अलग अलग रास्ते (1954), अंजो दीदी (1955),
भँवर (1961), वड़े खिलाड़ी (1967), लौटता हुआ दिन (1972), कैद, उड़ान।
सेठ गोविन्ददास विकास (1941), सेवापथ (1940), प्रकाश (1935), संतोष कहाँ (1945), महत्व किसे (1947), गरीबी और अमीरी (1947)
वृन्दावनलाल वर्मा खिलौने की खोज (1950)
हरिकृष्ण प्रेमी
छाया (1941), बंधन (1941)
पृथ्वीनाथ शर्मा
दुविधा (1938), अपराधी (1939), साथ (1944)
गणेश प्रसाद द्विवेदी सोहाग बिन्दी (1935)
सूर्यनारायण शुक्ल खेतिहर देश (1939)
विनोद रस्तोगी नये हाथ (1958)
विष्णु प्रभाकर
डॉक्टर (1958), युगे युगे क्रांति (1969)
चतुर्थ उत्थान : प्रसादोत्तर नाटक
प्रसादोत्तर युगीन ऐतिहासिक नाटक-
हरिकृष्ण प्रेमी स्वप्न भंग (1940), आहुति (1940), उद्धार (1949), प्रकाश स्तम्भ (1954), कीर्ति स्तम्भ (1955), शतरंज के खिलाड़ी (1955), संरक्षक (1958), साँपों की सृष्टि (1959), रक्तदान (1962), आन का मान (1962), अमर आन (1964), अमर बलिदान (1968), अमृत पुत्रो (1970)।
लक्ष्मीनारायण मिश्र अशोक (1927), गरुड़ ध्वज (1945), वत्सराज (1950), दशाश्वमेध (1950), वितस्ता की लहरें (1953), धरती का हृदय, काल विजय, गंगाद्वार (1974)।
वृन्दावनलाल वर्मा झांसी की रानी (1948), पूर्व की ओर (1950), बीरवा (1950), कश्मीर का काँटा (1948), फूलों की बोली (1947), ललित विक्रम (1953)।
उदयशंकर भट्ट
मुक्तिपथ (1944), शक-विजय (1949)
गोविन्दवल्लभ पंत
राजमुकुट (1935), अन्तःपुर का छिद्र (1940), तुलसीदास (1974), आत्मदीप (1978)।
रामकुमार वर्मा
कौमुदी महोत्सव (1954), विजय पर्व (1954)।
प्रसादोत्तरयुगीन पौराणिक नाटक
नाटककार
उदयशंकर भट्ट
नाटक
राधा (1941), अशोक वन वन्दिनी (1959), गुरु द्रोण का अन्तर्निरीक्षण (1959), अश्वत्थामा (1959), असुर सुन्दरी (1972)।
गोविन्दवल्लभ पंत ययाति (1951)
पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र' गंगा का बेटा (1940)
सेठ गोविन्ददास
कर्ण (1946)
श्री रांगेय राघव
स्वर्गभूमि का यात्री (1951)
पंचम उत्थान : समकालीन नाटक
सन् 1961 ई० में सर्वप्रथम मार्टिन एसलिन ने 'एब्सर्ड' (विसंगति) शब्द का प्रयोग एवं व्याख्या की।
हिन्दी के विसंगति नाटकों पर सर्वाधिक प्रभाव प्रसिद्ध एब्सर्ड नाटककार सैमुअल बेकेट (Samuel Backett) के 'बेटिंग फॉर गोदो' और 'एडगेम' नाटक का पड़ा।
हिन्दी में विसंगति नाटकों की शुरुआत भुवनेश्वर के लघु नाटक 'असर' (1938 ई०) से माना जाता है।
डॉ० गिरीश रस्तोगी एवं डॉ० मदान ने हिन्दी में विसंगति नाटकों की शुरुआत भुवनेश्वर के नाटक 'ताँबे के कीड़े' (1946 ई०) से माना है।
सन् 1936 ई० में प्रकाशित 'कारवाँ' भुवनेश्वर का एकमात्र नाट्य संकलन है। इसमें 'श्यामा-एक वैवाहिक विडम्बना' (1933), 'प्रतिभा का विवाह' (1933 ई०), 'शैतान' (1934) एवं 'रहस्य-रोमांस' (1935) आदि नाटक संकलित है।
मोहन राकेश आधुनिकता बोध के नाटककार हैं। इनके प्रमुख नाटक निम्न है-
नाटक
वर्ष
प्रकार
पुरुष
स्त्री
आषाढ़ का एक दिन
1958
ऐतिहासिक
कालिदास,
अंबिका मल्लिका
विलोम, मातुल दंतुल
लहरों के राजहंस
1963
ऐतिहासिक
नंद, श्यामांग, आनंद
सुन्दरी, अलका
आधे अधूरे
1969
महेन्द्रनाथ
सिंघानिया
सावित्री, बिन्नी, किन्नी, जुनेजा
पैर तले जमीन
अधूरा
अंडे के छिलके
एकांकी
जगमोहन, अशोकू
सिपाही की माँ
एकांकी
प्यालियाँ टूटती हैं
एकांकी
बहुत बड़ा सवाल
एकांकी
रात बितने तक
ध्वनि नाट्य
छतरिया
पार्श्व नाटक
शायद
बीजनाटक
वीजनाटक
'लहरों के राजहंस' नाटक की रचना मोहन राकेश ने अश्वघोष के महाकाव्य 'सौरानन्द' के आधार पर किया है।
page 252
Comments
Post a Comment