Part-3 हिंदी भाषा एवं साहित्य का वास्तुंनिस्ट इतिहास बाय सरस्वती पांडे गोविंद पांडे बुक इन हिंदी (बुक, सरस्वती पांडे गोविंद पांडे)

भाषा-विज्ञान भाषा के मुख्यतः चार तत्व होते हैं- (1) ध्वनि (2) शब्द (पद), (3) वाक्र और (4) अर्थ। इन चार तत्वों को ही भाषा-विज्ञान के अन्तर्गत भाषा विज्ञान का चा अंग माना जाता है। ध्वनिन शब्द (परुयारत्रवान्य भाषां के चारों तत्वों की परिभाषा निम्नवत है- (1) "उच्चारण की दृष्टि से भाषा की लघुतम इकाई ध्वनि है।" (2) "सार्थकता की दृष्टि से भाषा की लघुतम इकाई शब्द है।" 3) "भाषा की व्याकरणीय योग्यता प्राप्त लघुतम इकाई पद या रूप है।' ( (4) भाषा की पूर्ण सार्थक इकाई को वाक्य कहते हैं। (1) ध्वनि-विज्ञान 'ध्वनि' को 'स्वनिम' (Phoneme) भी कहते है। 'स्वनिम' शब्द संस्कृत 'स्वन्' धातु से बना है जिसका अर्थ होता है 'ध्वनि'। ध्वनि के तीन पक्ष होते हैं- (1) उत्पादन, (2) संवहन, और (3) ग्रहण। र्ध्वा का उत्पादन वागिन्द्रि‌यों से होता है, उसके संवहन के लिए वायु तरंगे कार्य करती हैं औ ग्रहण की क्रिया कर्ण (कान) द्वारा होती है। 'ध्वनि गुण' चार माने गए हैं-मात्रा, स्वर, आघात, वृत्ति। 'ध्वनिगुण' व ध्वनि लक्षण, रागीय तत्व, अखण्ड ध्वनि, रागिम आदि भी कहते हैं। मानस्वर की कल्पना अमेरिका के प्रो० डेनियन ने सन् 1953 ई० में की र्थ इसे 'Cordinal Vowels' भी कहते हैं। मानस्वरों की संख्या 8 है, जो किसी भाषा विशेष से सम्बद्ध न होकर ए काल्पनिक स्वर हैं। जीभ की स्थिति, ओंठ की आकृति एवं मुख-विवर के आधार पर 'मानस्वर का वर्गीकरण निम्न ढंग से किया जा सकता है- मानस्वर मुख-विवर जीभ की स्थिति ओंठ की स्थिति ई (i) ए (e) संवृत्त अर्धसंवृत्त अग्र अग्र अवृत्तमुखी अवृत्तमुखी हिन्दी साहित्य एवं भाषा का वस्तुनिष्ठ इतिहास ऍ (e) अर्धविवृत अग्र अवृत्तमुखी अऽ (a) विवृत अग्र अवृत्तमुखी आ (a) विवृत पश्च वृत्तमुखी ओं (६) अर्ध विवृत पश्च वृत्तमुखी ओ (0) अर्धसंवृत पश्च वृत्तमुखी ऊ (u) संवृत पश्च वृत्तमुखी 'मानस्वर' को 'प्रधान स्वर', 'मेय स्वर' भी कहते हैं। 'गौण मानस्वों' की संख्या सात है। 'स्वनिम' को 'ध्वनि ग्राम' भी कहा जाता है जो अंग्रेजी के 'Phoneme" का रूपान्तर है। किन्तु भारत सरकार के पारिभाषिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग ने 'Phoneme' का हिन्दी अनुवाद 'स्वनिम' माना है। स्वनिम के दो भेद होते हैं- (1) खण्ड्य (Segmental) और (2) खण्डेतर (Supra Segmental)। ऐसी ध्वनियाँ जिन्हें हम स्वतन्त्र रूप से उच्चरित कर सकते हैं, उन्हें खण्ड्य स्वनिम कहते हैं। इसके दो भेद हैं- (1) स्वर व (2) व्यंजन। जिन ध्वनियों का स्वतन्त्र उच्चारण नहीं हो सकता, उन्हें खण्डेतर स्वनिम कहते हैं। इसके प्रमुख भेद है- अनुनासिकता, सुर, अनुतान, संगम। प्रसिद्ध 'ध्वनि-नियम' निम्नलिखित है- ध्वनि-नियम प्रवर्तक जन्म-मृत्यु स्थान ग्रिम-नियम याकोब ग्रिम 1785-1663 जर्मन ग्रसमैन-नियम हेर्मन ग्रासमैन 1809-1877 जर्मन बर्नर-नियम कार्ल अडोल्फ बर्नर 1846-1896 जर्मन तालव्य-नियम विल्हेल्म थामसन व कालित्स प्रो० पॉट व प्रो० फोर्तुनातावे रुसी मूर्धन्य-नियम (2) पद या रूप विज्ञान प्रयोग समर्थ सार्थक शब्द को पद कहते हैं। यास्काचार्य ने 'पद' के मुख्यतः चार भेद माने हैं-(1) नाम, (2) आख्यात, (3) उपसर्ग और (4) निपात रूपिम को चार प्रमुख आधारों पर वर्गीकृत किया जाता है जो निम्न है- पथ-विज्ञान प्रयोग मुक्त रूपिम बद्ध रूपिम रचना संयुक्त रूपिम मिश्रित रूपिम अर्थ व सम्बन्ध तत्व अर्थ तत्व प्रदर्शक रूपिम सम्बन्ध तत्व प्रदर्शक रूपिम खण्डीकरण खण्डात्मक रूपिम अखण्डात्मक रूपिम (3) वाक्य विज्ञान पण्डित कामता प्रसाद 'गुरु' के अनुसार, "एक विचार पूर्णता से प्रकट करने बाले शब्द समूह को वाक्य कहते हैं।" आचार्य शुक्ल के अनुसार, "आकांक्षा, योग्यता और आसत्ति से युक्त पद समूह वाक्य कहलाता है।" 'पद' और 'वाक्य' के महत्व की प्रतिष्ठा को लेकर दो दार्शनिक सिद्धान्त प्रसिद्ध है, जो निम्न हैं- सिद्धान्त प्रवर्तक कुमारिल भट्ट प्रभाकर गुरु कथन अभिहितानां पदार्थानाम् अन्वयः अन्वितानां पदार्थानाम् अभिधानम् अभिहितान्वयवाद (पदवाद) अन्विताभि धानवाद (वाक्यवाद) कविराज विश्वनाथ ने वाक्य के तीन अनिवार्य तत्व माने हैं- (1) आकांक्षा- अर्थज्ञान की पूर्ति की जिज्ञासा (2) योग्यता - बुद्धिसंगत सम्बन्ध (3) आसत्ति- अव्यवधान। वाक्य के मुख्यतः दो अवयव होते हैं- उद्देश्य और विधेय। विभिन्न आधारों पर वाक्य के भेद अग्रांकित हैं- अर्थ (8 भेद) क्रिया (2 भेद) रचना (3 भेद) शैली (3 भेद) आकृति (2 भेद) विधान सूचक निषेध सूचक क्रिया युक्त क्रियाविहीन सरल वाक्य मिश्र वाक्य संयुक्त वाक्य शिथिल समीकृत आवर्तक योगात्मक अयोगात्मक आज्ञा सूचक प्रश्न सूचक विस्मय सूचक सन्देह सूचक इच्छा सूचक संकेत सूचक (4) अर्थ विज्ञान त्यै एवं भाषा का वस्तुनिष्ठ प्रतिहार शब्द के द्वारा जो प्रतीति होती है, उसे 'अर्थ' कहते हैं। ☐ संकेत ग्रह (अर्थबोध) के भारतीय विद्वानों ने 8 साधन माने हैं तथा पाश्चात्य विद्वानों ने 3 साधन माने हैं, जो निम्न है- भारतीय- (1) व्याकरण, (2) आप्तवाक्य, (3) उपमान, (4) वाक्य से (प्रकरण), (5) विवृत्ति (व्याख्या, विवरण), (6) प्रसिद्ध पद का सन्निधि, (7) व्यवहार, (8) कोश। पाश्चात्य (1) व्यवहार (Demonstration), (2) विवरण (Circumlocution), (3 अनुवाद (Translation)! हिन्दी साहित्य कोश के अनुसार, "शब्द की शक्ति उसके अन्तर्निहित अर्थ को व्यक्त कराने वाले व्यापार हैं। इसके प्रमुख भेद निम्न हैं- शब्द शब्द शक्ति या वृत्ति अर्थ वाचक अभिधा वाच्य (मुख्य) लक्षक लक्षणा लक्ष्य (गौण) व्यंजक व्यंजना व्यंग्य (प्रतीयमान) प्रमुख शब्द शक्तियों की परिभाषा निम्नलिखित हैं- शब्द शक्ति परिभाषा अभिधा साक्षात संकेतित अर्थ (मुख्यार्थ) का बोध कराने वाले व्यापार को 'अभिधा शक्ति' कहते हैं। लक्षणा मुख्यार्थ का बाधा होने पर रूढ़ि के कारण या किसी प्रयोजन के लिए मुख्यार्य से सम्बद्ध अन्य अर्थज्ञान जिस शक्ति के द्वारा होती है, वह लक्षणा है। अर्थात् लक्षणा के तीन हेतु (कारण) है- (1) मुख्यार्थ का बाध, (2) मुख्यार्थ का लक्ष्यार्थ से योग और (3) रूढ़ि या प्रयोजन। व्यंजना व्यंजना शक्ति ऐसे अर्थ को बतलाती है जो अभिधा, लक्षणा या तात्पर्य वृत्ति द्वारा उपलब्ध नहीं होता। व्यंजना व्यापार को ध्वनन, गमन, प्रत्यागमन आदि कहते हैं। पाश्चात्य विद्वानों ने अर्थ के तीन भेद माने है- (1) कोशार्थ, (2) व्याकरणार्थ और (3) अनित्यार्थ। शब्द मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं- (1) एकार्यक और (2) अनेकार्थक। भाषा-विज्ञान एकार्थक शब्दों के अर्थ-निर्णय के 10 साधन माने गए है तथा अनेकार्थक शब्दों के अर्थ-निर्णय के 14 साधन माने गए हैं, जो निम्न हैं- एकार्थक (1) वक्ता, (2) बोद्धा (श्रोता), (3) वाक्य, (4) वाच्य, (5) अन्य सन्निधि, (6) प्रकरण, (7) देश, (8) काल, (9) काकु और (10) चेष्टा। अनेकार्थक (1) संयोग, (2) वियोग, (3) साहचर्य, (4) विरोध, (5) अर्थ, (6) प्रकरण, (7) लिंग, (8) अन्य शब्द का सन्निधि, (9) सामर्थ्य, (10) औचित्य, (11) देश, (12) काल, (13) व्यक्ति और (14) स्वर। अर्थ परिवर्तन की तीन दिशाएँ हैं जो निम्न हैं- (1) अर्थ-विस्तार (Expansion of Meaning) (2) अर्थ-संकोच (Centraction of Meaning) (3) अर्थादेश (Transferance of Meaning) अर्थ परिवर्तन की दिशाओं का रेखाचित्र निम्न है- अर्थ परिवर्तन की दिशाएँ अर्थ विस्तार अर्थ संकोच अर्थादेश अर्थोत्कर्ष अर्थापकर्ष मूर्तीकरण अमूर्तीकरण अर्थ परिवर्तन या विकास के अन्तर्गत 'अर्थ-विस्तार' की दृष्टि से प्रमुख शब्दों की सूची निम्न है- शब्द मूल अर्थ परिवर्तित अर्थ (विस्तार) स्याही काली स्याही सभी रंगों की लिखने की स्याही तेल तिल का तेल सभी प्रकार का तेल कुशल कुशों को लाना निपुण, चतुर प्रवीण वीणा वादन में निपुण दक्ष, चतुर महाराज राजा रसोइया गवेषणा गाय चाहना खोज अर्थ परिवर्तन या विकास के अन्तर्गत 'अर्थ-संकोच' की दृष्टि से प्रमुख शब्दों की सूची निम्न हैं- शब्द मूल अर्थ परिवर्तित अर्थ (संकोच) सर्प जो सरकला है साँप कुंजर धान्य मोदक बाढ़ लगान गौ ऋक्ष आदर्श आशा जो कुंज में विचरता है हाथी चावल, अन्न लड्डू जलावेग धान से सम्बद्ध प्रसन्न करने वाला बढ़ने की क्रिया जो लगाया गया इन्द्रिय, पृथ्वी नक्षत्र, ऋषि दर्पण, प्रतिलिपि कर गाय रीछ (भालू) अनुकरणीय इच्छा देवता का जन्म हिरन अवतार दिशा, इच्छा उतार, भूमिका मृग मुर्गा पशु पक्षी मदक नशीला खाजा खाद्य अन्न खाया हुआ लोह धातु कुक्कुट अफीम एक मिठाई चना, गेहूँ आदि लोहा निम्न है- अर्थोत्कर्ष अर्थापकर्ष अमूर्तीकरण अर्थ परिवर्तन के अन्तर्गत 'अर्थादेश' की दृष्टि से कुछ प्रमुख शब्दों की सूची मूर्तीकारण मुग्ध असुर फिरंगी जुगुप्सा लाठी (सहारा) काँटा (दर्द) उपन्यास सुहाग (सौभाग्य) प्राखण्ड शौच भार (जिम्मेदारी) सामग्री (संचय) चाल कृष्ण (काला) निमग्न (व्यस्त) जमादार त्योहार चार्वाक गधा (मुर्ख) बात उड़ाना विचार बिखर गये मुहूर्त सुहागिन पूँछ (उपाधि) विरहाग्नि घृणा देहाती आँख दिखाना विचारधारा मधुर माथा ठनकाना विद्याधन चमार वज्रवटुक सीधा-सादा अन्धकार (निराशा) देवता आवदस्त हजरत महाराज पतझाड़ (दुःख) जनता गवेषणा मन्दिर जुगनू (बुद्धि, चेतना) सफेदी देवदासी कलश पतवार (सहारा) रश्मि (ज्ञान) उतराई महाजन नाम कुम्भ शलभ (सांसारिक मोह) धुलाई समुद्र (आत्मा) रंगाई सवारी पद्य हिन्दी साहित्येतिहास लेखन की परम्परा हिन्दी-साहित्य के इतिहास-लेखन का सबसे पहला प्रयास फ्रेंच विद्वान गार्सा द तासी ने किया। गार्सा द तासी ने अपनी पुस्तक की रचना फ्रेंच भाषा में की। तासी ने अपनी पुस्तक का नाम 'इस्वार द ला लितरेत्युर ऐन्दुई ऐन्दुस्तानी' रखा है। यह पुस्तक दो भागों में विभक्त है जिसका प्रकाशन क्रमशः 1839 ई० तथा 1847 ई० में हुआ। यह ग्रन्थ ग्रेट ब्रिटेन और आयरलैंड की प्राच्य साहित्य-अनुवादक समिति की ओर से पेरिस में मुद्रित किया गया। -1 'इस्त्वार द ला लितरेत्युर ऐन्दुई ऐन्दुस्तानी' द्वितीय संस्करण में तीन भागों में विभक्त हो गया, जिसका प्रकाशन सन् 1871 ई० में हुआ। तासी ने अपनी पुस्तक में हिन्दी और उर्दू के अनेक कवियों का विवरण अंग्रेजी वर्णक्रमानुसार दिया है। गार्सा द तासी के ग्रन्थ में कुल 738 कवि हैं जिनमें हिन्दी के 72 तथा शेष उर्दू के हैं। डॉ० लक्ष्मीसागर वाष्र्णेय ने तॉसी के ग्रन्थ का हिन्दी अनुवाद 'हिन्दुई साहित्य का इतिहास' नाम से प्रकाशन सन् 1952 ई० में कराया। तासी की पुस्तक 'इस्त्वार द ला लितरेत्युर ऐन्दुई ऐन्दुस्तानी' में 'ऐन्दुई' के लिए हिन्दवी (हिन्दी) और 'ऐन्दुस्तानी' के लिए हिन्दुस्तानी (उर्दू) अर्थ प्रयुक्त होता है। हिन्दी साहित्येतिहास लेखन की परम्परा में हिन्दी भाषा में लिखा प्रथम ग्रन्थ श्री महेशदत्त शुक्ल द्वारा रचित 'भाषा काव्य संग्रह' है। भाषा काव्य संग्रह का प्रकाशन सन् 1873 ई० में नवल किशोर प्रेस, लखनऊ से हुआ। शिव सिंह सेंगर ने 'शिव सिंह सरोज' नाम से हिन्दी भाषा में दूसरा महत्त्वपूर्ण इतिहास ग्रन्थ रचा। 'शिव सिंह सरोज' का प्रकाशन 1883 ई० में हुआ। 'शिव सिंह सरोज' में एक सहस्त्र (838 कवि) 'भाषा कवियों' का जीवन-चरित तथा उनकी कविताओं के उदाहरण दिये गये हैं। सन् 1888 ई० में एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल की पत्रिका के विशेषांक के रूप में ग्रियर्सन द्वारा रचित 'द माडर्न वर्नेक्युलर लिटरेचर ऑफ हिन्दुस्तान' का प्रकाशन हुआ। का वस्तुनिष्ठ इतिहास जार्ज ग्रियर्सन द्वारा रचित 'द माडर्न वर्नेक्युलर लिटरेचर ऑफ हिन्दुस्तान' को सच्चे अर्थों में हिन्दी साहित्य का पहला इतिहास ग्रन्थ माना जाता है। ग्रियर्सन ने अपने ग्रन्थ में 952 कवियों को शामिल किया है। डॉ० किशोरीलाल गुप्त ने 'द माडर्न वर्नेक्युलर लिटरेचर ऑफ हिन्दुस्तान' का 'हिन्दी साहित्य का प्रथम इतिहास' शीर्षक से हिन्दी अनुवाद किया। जिसका प्रकाशन सन् 1957 ई० में हुआ। ग्रियर्सन ने कवियों और लेखकों का कालक्रमानुसार वर्गीकरण तथा उनकी प्रवृत्तियों को स्पष्ट किया। विभिन्न युगों की काव्य प्रवृत्तियों की व्याख्या करते हुए उनसे सम्बन्धित सांस्कृतिक परिस्थितियों व प्रेरणा स्रोतों का उ‌द्घाटन किया। प्रस्तुत ग्रन्थ को विभिन्न काल खण्डों में विभक्त किया गया है तथा प्रत्येक अध्याय काल विशेष का सूचक है। जार्ज ग्रियर्सन ने प्रथम बार हिन्दी साहित्य का भाषा की दृष्टि से क्षेत्र निर्धारण करते हुए संस्कृत-प्राकृत एवं अरबी-फारसी मिश्रित उर्दू को उससे पृथक् किया। हिन्दी साहित्य के विकास क्रम का निर्धारण चारण काव्य, धार्मिक काव्य, प्रेमकाव्य, दरबारी काव्य के रूप में किया गया है। 16वीं-17वीं शताब्दी के युग (भक्तिकाल) को हिन्दी काव्य का स्वर्ण युग मानना ग्रियसुंत की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। मिश्र बन्धुओं ने 'मिश्रवन्धु विनोद' नामक इतिहास ग्रन्थ की रचना की। चमिश्र बन्धुओं में 'गणेश विहारी', 'श्याम बिहारी' तथा 'शुकदेव बिहारी मिश्र' है। मिश्रवन्धु विनोद चार भागों में विभक्त है जिसके प्रथम तीन भाग का प्रकाशन सन् 1913 ई० में तथा चतुर्थ भाग का 1934 ई० में प्रकाशन हुआ। 'मिश्रवन्धु विनोद' में 4591 कवियों का जीवनवृत्त वर्णित है। इसमें अनेक अज्ञात कवियों को प्रकाश में लाने के साथ ही उनके साहित्यिक महत्त्व को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। 'मिश्रबन्धु विनोद' में कवियों का सापेक्षिक महत्त्व निर्धारित करने के लिए उनकी चार श्रेणियाँ बनाई गयी हैं। हिन्दी साहित्येतिहास लेखन की परम्परा में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा रचित ''हिन्दी साहित्य का इतिहास' का स्थान सर्वोच्च है। आचार्य शुक्ल का इतिहास मूलतः नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित 'हिन्दी शब्दसागर' की भूमिका के रूप में 'हिन्दी-साहित्य का विकास' के नाम से सन् 1929 ई० में प्रकाशित हुआ। हिन्दी साहित्य का इतिहास' में एक हजार कवियों और लेखकों को शामिल किया गया है। हिन्दी साहित्येतिह आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने शिवसिंह सेंगर, जार्ज ग्रियर्सन तथा मिश्र बन्धुओं के इतिहास को 'कवि वृत्त संग्रह' संज्ञा से अभिहित किया। आचार्य शुक्ल ने लिखा है, "जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिविम्ब होता है, तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अन्त तक इन्हीं चित्तवृत्तियों की परम्परा को परखते हुए साहित्य-परम्परा के साथ उनका सामंजस्य दिखाना ही 'साहित्य का इतिहास' कहलाता है। जनता की चित्तवृत्ति बहुत कुछ राजनीतिक, सामाजिक, साम्प्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थिति के अनुसार होती है।" सर्वप्रथम आचार्य शुक्ल ने साहित्येतिहास को आलोचना से पृथक् किया तथा अपने विकासवादी एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण का परिचय दिया। आचार्य शुक्ल ने साहित्येतिहास के प्रति एक निश्चित व सुस्पष्ट दृष्टिकोण का परिचय देते हुए युगीन परिस्थितियों के सन्दर्भ में त्रिकास क्रम की व्याख्या करने का प्रयास किया। आचार्य शुक्ल ने 'काल विभाजन' के अन्तर्गत हिन्दी साहित्य के 900 वर्षों के इतिहास को चार सुस्पष्ट काल खण्डों में विभक्त किया है। शुक्लजी ने भक्तिकाल को चार भागों या शाखाओं में बाँट कर उसे सर्वप्रथम शुद्ध दार्शनिक एवं धार्मिक आधार पर प्रतिष्ठित किया। भक्तिकाल निर्गुण धारा सगुण धारा ज्ञानाश्रयी शाखा प्रेमाश्रयी शाखा रामभक्ति शाखा कृष्ण भक्ति शाखा रामचन्द्र शुक्ल ने अपने इतिहास में पहली वार कवियों और साहित्यकारों के जीवन-चरित सम्बन्धी इतिवृत्ति के स्थान पर उनकी रचनाओं के साहित्यिक मूल्यांकन को प्रमुखता दी। एडविन ग्रीव्स महोदय ने सन् 1917 ई० में अंग्रेजी भाषा में 'ए स्केच ऑफ हिन्दी लिट्रेचर' नाम से हिन्दी साहित्य का एक संक्षिप्त इतिहास ग्रन्थ लिखा। इन्होंने हिन्दी साहित्य के इतिहास के पाँच विभाग किये हैं। २ सन् 1920 ई० में एफ०ई०के० ने अंग्रेज़ी भाषा में 'ए हिस्ट्री ऑफ हिन्दी लिट्रेचर' नाम से एक इतिहास ग्रन्थ लिखा। 'तजकिरा-ई-शुअराई-हिन्दी' (1848 ई०) नामक इतिहास ग्रन्थ मौलवी करीमुद्दीन द्वारा लिखा गया। इसमें कुल कवियों की संख्या 1004 है जिसमें हिन्दी के 62 कवि हैं। इस ग्रन्थ में प्रथम बार काल-क्रम का ध्यान रखा गया। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने तीन इतिहाम ग्रन्थों की रचना क्रमशः 'हिन्दी भाषा का वस्तुनिष्ठ इतिहास साहित्य की भूमिका' (1940), 'हिन्दी साहित्य उद्भव और विकास' (1952) और 'हिन्दी साहित्य का आदिकाल' (1952) नाम से की। आचार्य द्विवेदी ने अपने इतिहास में परम्परा की निरन्तरता का अनुशीलन करते हुए एक व्यापक इतिहास-दर्शन की भूमिका तैयार की। डॉ० रामकुमार वर्मा ने 'हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास' नामक पुस्तक लिखी। 'हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास' का प्रकाशन सन् 1938 ई० में हुआ। डॉ० वर्मा ने अपने इतिहास ग्रन्थ में 693 ई० से 1693 ई० तक की कालावधि अर्थात् संधिकाल से लेकर भक्ति काल तक की अवधि को ही लिया। । डॉ० वर्मा ने सम्पूर्ण ग्रन्थ को सात प्रकरण में विभक्त किया। । डॉ० वर्मा ने स्वयंभू को, जो कि अपभ्रंश के सबसे पहले कवि हैं, हिन्दी का पहला कवि मानते हुए हिन्दी साहित्य का आरम्भ 693 ई० से स्वीकार किया। नागरी प्रचारिणी सभा से 'हिन्दी साहित्य का वृहद् इतिहास' का प्रकाशन 16 खण्डों में हो चुका है। अनेकानेक विद्वानों ने अलग-अलग खण्डों का सम्पादन कार्य किया है, जो अग्रांकित है- भाग प्रत्येक भाग का नाम सम्पादक प्रथम हिन्दी साहित्य की पीठिका डॉ० राजबलो पाण्डेय दूसरा हिन्दी भाषा का विकास डॉ० धीरेन्द्र वर्मा तीसरा आदिकाल पं० करुणापति त्रिपाठी व चौथा भक्तिकाल : निर्गुण भक्ति वासुदेव सिंह पाँचवाँ भक्तिकाल : सगुण भक्ति परशुराम चतुर्वेदी देवेन्द्रनाथ शर्मा व विजयेंद्र छठा रोतिकाल : रीतिबद्ध स्नातक सातवाँ ' रीतिकाल : रीतिमुक्त डॉ० नगेन्द्र आठवाँ हिन्दी साहित्य का अभ्युत्थान डॉ० भगीरथ मिश्र डॉ० विनयमोहन शर्मा भारतेन्दु काल (संवत् 1900-1950 वि० तक) नवाँ द्विवेदी काल (सं० 1950-75 वि०) दसवाँ उत्कर्ष काल : काव्य, (सं० 1975-95 वि०) ग्यारहवाँ उत्कर्ष काल: नाटक (सं० 1975-95 वि०) बारहवाँ कथा-साहित्य (सं० 1975-95 वि०) पं० सुधाकर पाण्डेय डॉ० नगेन्द्र सवित्री सिंह व दशरथ ओझा डॉ० निर्मला जैन हिन्दी साहित्येतिहार तेरहवाँ समालोचना, निबन्ध और पत्रकारिता सं० लक्ष्मीनारायण' सुधांशु' (सं० 1975-95 वि०) चौदहवाँ अद्यतन काल (सं० 1995-2017 वि०) पन्द्रहवाँ आंतर भारती हिन्दी साहित्य सोलहवाँ हिन्दी का लोक साहित्य सहा० डॉ० हरवंशलाल शर्मा और डॉ० कैलाशचन्द्र भाटिया डॉ० नगेन्द्र और पं० राहुल सांकृत्याय डॉ० कृष्णदेव उपाध्याय डॉ० धीरेन्द्र वर्मा ने विभिन्न विद्वानों के सामूहिक इतिहास ग्रन्थ का सम्पादन कार्य किया। सहयोग से 'हिन्दी साहित्य' नामन इस ग्रन्थ में सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य को तीन कालों-आदिकाल, मध्यकाल ए आधुनिक काल में विभक्त करते हुए प्रत्येक काल की काव्य-परम्पराओं का विवर अविच्छिन्न रूप में प्रस्तुत किया गया है। हिन्दी साहित्येतिहास सम्बन्धी प्रमुख ग्रन्थ तथा रचनाकार- (1) हिन्दी काव्यधारा (1944 ई०) : पं० राहुल सांकृत्यायन (2) हिन्दी साहित्य का इतिहास (1973 ई०) सं० डॉ० नगेन्द्र (3) हिन्दी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास ई०) : डॉ० गणपतिचन्द्र गुप्त (दो भाग में, प्रथम व द्वितीय खण्ड 1965 : आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मि (4) हिन्दी साहित्य का अतीत (दो भाग) : डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी (5) हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास (1986 ई०) (6) साहित्य का इतिहास-दर्शन : डॉ० नलिन विलोचन शर्मा (7) हिन्दी भाषा का विकास (1924 ई०) : डॉ० श्यामसुन्दर दास (8) हिन्दी भाषा और साहित्य (1930 ई०) : डॉ० श्यामसुन्दर दास (9) हिन्दी कोविद रत्नमाला : डॉ० श्यामसुन्दर दास [दो भाग (प्रथम 1909 में व द्वितीय 1914 में प्रकाशित)] (10) राजस्थानी भाषा और साहित्य : डॉ० मोतीलाल मेनरिया (11) राजस्थानी पिंगल साहित्य : डॉ० मोतीलाल मेनारिया (12) हिन्दी वीरकाव्य (1945 ई०) : डॉ० टीकम सिंह तोमर (13) हिन्दी काव्यशास्त्र का इतिहास : डॉ० भगीरथ मिश्र (14) आधुनिक हिन्दी का आदिकाल (1973 ई०) : श्री नारायण चतुर्वेदी (15) हिन्दी साहित्य : वीसवीं शताब्दी (1945 ई०) : नन्ददुलारे वाजपेयी (16) आधुनिक हिन्दी साहित्य (1950 ई०) : नन्ददुलारे वाजपेयी (17) हिन्दी साहित्य का इतिहास (1931 ई०) रमाशंकर शुक्ल 'रसाल' (18) हिन्दी भाषा का उद्भव और विकास : उदयनारायण तिवारी (19) हिन्दी साहित्य विमर्श (1923 ई०) : पदुमलाल पुत्रालाल बख्शी (20) कविता कौमुदी (1917 ई०) : रामनरेश त्रिपाठी (71) भाषा काव्य संग्रह (1873 ई०) : महेश दत्त शुक्ल (22) हिन्दी साहित्य का विवेचनात्मक इतिहास (1930 ई०) सूर्यकान्त शास्त्री (23) आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास (1934 ई०) : कृष्णशंकर शुक्ल (24) मार्डन हिन्दी लिट्रेचर (1939 ई०) : डॉ० इन्द्रनाथ मदान (25) खड़ी बोली हिन्दी साहित्य का इतिहास (1941 ई०) : ब्रजरत्नदास (26) आधुनिक हिन्दी साहित्य (1941 ई०) : लक्ष्मीसागर वाष्र्णेय (27) ब्रजमाधुरी सार (1923 ई०) : वियोगी हरि (28) हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास (1996 ई०) : डॉ० बच्चन सिंह (29) हिन्दी साहित्य का आधा इतिहास (2003 ई०) : सुमन राजे (30) हिन्दी साहित्य का मौखिक इतिहास : नीलाभ (31) हिन्दी साहित्य का ओझल नारी इतिहास : नीरजा माधव (2013 ई०) का वस्तुनिष्ठ इतिहास हिन्दी साहित्य : काल-विभाजन और नामकरण डॉ० जॉर्ज गियर्सन का काल-विभाजन (1) चारण काल (700-1300 ई०), (2) पन्द्रहवीं शती का धार्मिक पुनर्जागरण, (3) जायसी की प्रेम कविता, (4) ब्रज का कृष्ण सम्प्रदाय, (5) मुगल दरवार, (6) तुलसीदास, (7) रीतिकाव्य, (8) तुलसीदास के अन्य परवर्ती, (१) अट्ठारहवीं शताब्दी, (10) कम्पनी के शासन में हिन्दुस्तान, (11) महारानी विक्टोरिया के शासन में हिन्दुस्तान। जार्ज ग्रियर्सन ने सर्वप्रथम हिन्दी साहित्य के आरम्भिक काल को 'चारण काल' से अभिहित किया। ग्रियर्सन ने 'चारण काल' के अन्तर्गत 9 कवियों-पुष्य कवि, खुमाण सिंह, केदार, कुमार पाल, अनन्यदास, चन्द, जगनिक, जोधराज एवं शार्ङ्गधर का उल्लेख किया है। ग्रियर्सन ने अपने इतिहास में केवल प्रवृत्तिगत काल-विभाजन किया है। ग्रियर्सन ने कालों का नामकरण एक आधार पर नहीं किया। मिश्र बन्धुओं का काल-विभाजन (1) प्रारम्भिक काल पूर्व प्रारम्भिक काल (700-1343 वि०) उत्तरारंभिक काल (1344-1444 वि०) (2) माध्यमिक काल पूर्व माध्यमिक काल (1445-1560 वि०) प्रौढ़ माध्यमिक काल (1561-1680 वि०) (3) अलंकृत काल पूर्वालंकृत काल (1681-1790 वि०) (4) परिवर्तन (1890-1924 वि०) उत्तरालंकृत काल (1791-1889 वि०) (5) वर्तमान काल (1926 वि० से अब तक) आचार्य शुक्ल का काल विभाजन (1) आदिकाल (वीरगाथा काल, सं० 1050 1375) (2) पूर्व-मध्यकाल (भक्ति काल, सं० 1375 1700) (3) उत्तर-मध्यकाल (रोति काल, सं० 1700 1900) (4) आधुनिक काल (गद्य काल, सं० 1900-1984) डॉ० रामकुमार वर्मा का काल-विभाजन (1) संधि काल (सं० 750 1000 वि०) (2) चारण काल (सं० 1000 1375 वि०) (3) भक्ति काल (सं० 1375 1700 वि०) (4) रीतिकाल (सं० 1700 1900 वि०) (5) आधुनिक काल (सं० 1900 से अब तक) डॉ० गणपतिचन्द्र गुप्त का काल विभाजन (1) आदिकाल (सन् 1184-1350) (2) पूर्व मध्यकाल (सन् 1350-1600 ई०) (3) उत्तर मध्यकाल (सन् 1600-1857 ई०) (4) आधुनिक काल (सन् 1857 से अब तक) डॉ० नगेन्द्र द्वारा सम्पादित ग्रन्थ 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' के अनुसार काल-विभाजन - (1) आदिकाल- सातवीं शती के मध्य से चौदहवीं शती के मध्य तक (2) भक्तिकाल-14वीं शती के मध्य से 17वीं शती के मध्य तक। (3) रीतिकाल-17वीं शती के मध्य से उन्नीसवीं शती के मध्य तक। (4) आधुनिक काल-19वीं शती के मध्य से अब तक (i) पुनर्जागरण काल (भारतेन्दु काल) 1857-1900 ई० (ii) जागरण-सुधार-काल (द्विवेदी काल) 1900-1918 ई० (iii) छायावाद काल 1918-1938 ई० (iv) छायावादोत्तर काल (क) प्रगति प्रयोग काल 1938-1953 ई० (ख) नवलेखन-काल 1953 ई० से अब तक डॉ० बच्चन सिंह का काल-विभाजन (1) अपभ्रंश काल (2) भक्तिकाल (सन् 1400-1650) (3) रीतिकाल (सन् 1650-1857) (4) आधुनिक काल (सन् 1857 से अब तक) आदिकाल का नामकरण नाम चारण काल 1 प्रयोक्ता जार्ज ग्रियर्सन प्रारम्भिक काल बीज वपन काल वीरगाथा काल सिद्ध सामंत काल वीरकाल संधिकाल एवं चारण काल आदिकाल आधार काल रीतिकाल का नामकरण नाम रीतिकाव्य अलंकृत काल रीतिकाल श्रृंगारकाल कला काल हिन्दी साहित्य एवं भाषा का वस्तुनिष्ठ इतिहास मिश्र बन्धु आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी आचार्य रामचन्द्र शुक्ल पं० राहुल सांकृत्यायन आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र डॉ० रामकुमार वर्मा आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी सुमन राजे प्रयोक्ता जार्ज ग्रियर्सन मिश्र बन्धु आचार्य रामचन्द्र शुक्ल आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र रमाशंकर शुक्ल रसाल डॉ० उदयनारायण तिवारी, डॉ० गोविन्द त्रिगुणायत और डॉ० महेन्द्रनाथ दुबे द्वारा 'भाषा' की दृष्टि से किया काल विभाजन (1) पृष्ठभूमि अवहट्ठ काल (2) उन्मेष काल भाषा ब्रजबुलि, पुरानी ब्रजी, कौरवी या खड़ी बोली एवं अवधी काल (3) पूर्व भाग ब्रजभाषा अवधी काल (4) उत्तर भाग खड़ी बोली काल आदिकाल पूर्व पीठिका आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा वर्णित आदिकाल के सन्दर्भ में प्रमुख कथन ८ प्राकृत की अन्तिम अपभ्रंश अवस्था से ही हिन्दी साहित्य का आविर्भाव माना जा सकता है। हिन्दी साहित्य का आदिकाल संवत् 1050 से लेकर संवत् 1375 तक अर्थात् महाराज भोज के समय से लेकर हम्मीरदेव के समय के कुछ पीछे तक माना जा सकता है। राजाश्रित कवि और चारण जिस प्रकार नीति, श्रृंगार आदि के फुटकल दोहे राज सभाओं में सुनाया करते थे, उसी प्रकार अपने आश्रयदाता राजाओं के पराक्रमपूर्ण चरितों या गाथाओं का वर्णन भी किया करते थे। यही प्रबन्ध परम्परा 'रासो' के नाम से पायी जाती है जिसे लक्ष्य करके इस काल को हमने 'वीरगाथा काल' कहा है। आदिकाल अपभ्रंश नाम पहले पहल बलभी के राजा धारसेन द्वितीय के शिलालेख में मिलता है जिसमें उसने अपने पिता गृहसेन (वि०सं० 650 के पहले) को संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश तीनों का कवि कंहा है। प्रसिद्धों को उद्धृत रचनाओं की भाषा देशभाषा मिश्रित अपभ्रंश या पुरानी हिन्दी की काव्यभापा है। पुरानी हिन्दी की व्यापक काव्यभाषा का ढाँचा शौरसेनी प्रसूत अपभ्रंश अर्थात् ब्रज और खड़ी बोली (पश्चिमी हिन्दी) का था। आध्यात्मिक रंग के चश्में आजकल बहुत सस्ते हो गये हैं। उन्हें चढ़ाकर जैसे कुछ लोगों ने 'गीतगोविन्द' के पदों को आध्यात्मिक संकेत बताया है, वैसे ही विद्यापति के इन पदों को भी। महत्त्वपूर्ण काव्य पंक्तियाँ 1. "जो जिण सासण भाषियउ सो भइ कहियड सारु। जो पालइ सइ भाउ करि सो सरि पावइ पारु ॥"- देवसेन (श्रावकाचार) 2. "पंडिअ सअल सत्त बक्खाणइ। देहहि रुद्ध बसंत न जाणइ। अमणागमण ण तेन विखंडिअ। तो वि णिलज्जइ भणइ हउँ पंडिय ॥" - सरहपा "जहि मन पवन न संचरइ, रवि ससि नाहि पवेश। तहि वत चित्त विसाम करु, सरेहे कहिअ उवेश ॥"- सरहपा "घोर अधारे चंदमणि जिमि उज्जोअ करेइ। परम महासुह एषु कणे दुरिअ अशेष हरेइ ॥" - सरहपा 3. "काआ तरुवर पंच विडाल"- लूइया "भाव न होइ, अभाव ण जाइ"- लूइपा 4. "सहजे थर करि वारुणी साध" विरुपा 5. "एक्क ण किज्जइ मंत्र ण तंत" कण्हपा 6. "हालो डोंबी ! तो पुछमि सदभावे सदगुरु पाअ पए जाइब पुणु जिणउरा" - कण्हपा 7. "भल्ला हुआ जो मारिया"- हेमचन्द्र "पिय संगमि कउ निद्दड़ी"- हेमचन्द्र 8. "गंगा जउँना माझे बहइ रे नाई"- डोम्भिपा 9. "नगर बाहिरे डोंबी तोहरि कुडिया छइ।" "छोइ जाइ सो बाह्य नाड़िया ॥"- कण्हपा "जिमि लोण बिलिज्ञ्जइ पाणि एहि तिमि धरणी लइ चित्त"- कण्हपा 10. "देसिल बयना सब जन मिट्ठा। ते तैंसन जंपओ अवह‌ट्ठा ॥" - विद्यापति "हिन्दू बोले दूरहि निकार। छोटे तरुका भभकी मार ॥" - विद्यापति (कीर्तिलता से) 11. "मनहु कला ससभान कला सोलह सो बन्निय" "विगसि कमललिग, भ्रमर, बेनु, खंजन मृग लुट्टिय"- पृथ्वीराज रासो से "बज्जिय घोर निसान रान चौहान चहाँ दिस।"- पृथ्वीराज रासो से "उट्टि राज प्रिथिराज बाग मनो लग्ग वीर नट" - पृथ्वीराज रासो से 12. "बारह बरिस लै कूकर जीएँ औ तेरह लौ जिऐं सियार। बरिस अठारह छत्री जीऐं, आगे जीवन को धिक्कार ॥" - जगनिक 13. "एक थाल मोती से भरा" - अमीर खुसरो "एक नार ने अचरज किया" - अमीर खुसरो "गोरी सोवै सेज पर, मुख पर डारै केस" अमीर खुसरो "मेरा जोबना नवेलरा भयो है गुलाल" अमीर खुसरो 14. "जे हाल मिसकी मकुन तगाफुल दुराय नैना, बनाय बतियाँ"- अमीर खुसरो 15. "सरस वसंत समय भल पावलि" - विद्यापति (पदावली से) "कालि कहल पिय साँझहिरे, जाइब मइ मारू देस" - विद्यापति (पदावली से) महत्त्वपूर्ण तथ्य 'प्राकृताभास हिन्दी' का तात्पर्य है प्राकृत की रूढ़ि‌यों में बहुत कुछ बद्ध हिन्दी। कवि विद्यापति ने दो प्रकार की भाषा का प्रयोग किया है- (1) पुरानी अपभ्रंश का और (2) बोलचाल की देशी भाषा का। 'गाहा' या 'गाथा' कहने से प्राकृत का बोध होता है। 'दोहा' या 'दूहा' कहने से अपभ्रंश या लोक प्रचलित काव्य-भाषा का बोध होता है। भरतमुनि (वि० तीसरी शती) ने नाट्यशास्त्र में 'अपभ्रंश' नाम न देकर लोकभाषा को 'देशभाषा' ही कहा है। अपभ्रंश या प्राकृताभास हिन्दी की रचना विक्रम की सातवीं शताब्दी से होने लगा था। चौरासी सिद्धों के नाम ये हैं- (1) लुइपा कायस्थ, (2) लीलापा, (3) विरूपा, (4) डोम्बुिपा क्षत्रिय, (5) शरपा - क्षत्रिय, (6) सरहपा ब्राह्मण, (7) कंकालीपा- शूद्र, (8) मौनपा राजकुमार, (11) वीणापा - राजकुमार, तँतवा, (14) चमारिपा चर्मकार, ब्राह्मण, (17) कण्हपा कायस्थ, - मछुआ, (9) गोरक्षपा, (10) चोरंगिपा (12) शान्तिपा ब्राह्मण, (13) तंतिपा (15) खड्गपा शूद्र, (16) नागार्जुन (18) कर्णरिपा, (19) थगनपा शूद्र, (20) नारोपा ब्राह्मण, (21) शलिपा -शूद्र, (22) तिलोपा ब्राह्मण, (23) छत्रपा (25) दोखंधिपा, (26) अजोगिपा गृहपति, (27) कालपा, (28) धोम्मिपा शूद्र, (24) भद्रपा ब्राह्मण, धोबी, (29) कंकणपा राजकुमार, (30) कमरिपा, (31) डेंगिपा ब्राह्मण, (32) भदेपा, (33) तंधेपा शूद्र, (34) कुक्कुरिपा ब्राह्मण, (35) कुचिपा -शूद्र, (36) धर्मपा ब्राह्मण, (37) महोपा शूद्र, (38) अचितपा - लकड़‌हारा, राजकुमार, (39) भलहपा क्षत्रिय, (40) नलिनपा, (41) भुसुकिपा आदिकाल -(42) इन्द्रभूति - राजा, (43) मेकोपा वणिक्, (44) कुठालिपा, (45) कमरिपा लोहार, (46) जालंधरपा ब्राह्मण, (47) राहुलपा शूद्र, (48) मेदनीपा, (49) धर्वरिपा, (50) धोकरिपा शूद्र, (51) पंकजपा ब्राह्मण, (52) घंटापा क्षत्रिय, (53) जोगीपा - डोम, (54) चेकुलपा शूद्र, (55) गुंडरिपा - चिड़ीमार, (56) लुचिकपा ब्राह्मण, (57) निर्गुणपा शूद्र, (58) जयानन्त ब्राह्मण, (59) चर्पटीपा कहार, (60) चम्पकपा, (61) भिखनपा शूद्र, (62) भलिपा कृष्ण घृत वणिक्, (63) कुमरिपा, (64) चवरिपा, (65) मणिभद्रा (योगिनी) गृहदासी, (66) मेखलापा (योगिनी) गृहपति कन्या, (67) कनपलापा (योगिनी) गृहपति कन्या, (68) कलकलपा शूद्र, (69) कंतालीपा दर्जी, (70) धहुलिपा -शूद्र, (71) उधलिपा वैश्य, (72) कपालपा शूद्र, (73) किलपा राजकुमार, (74) सागरपा राजा, (75) सर्वभक्षपा शूद्र, (76) नागबोधिपा ब्राह्मण, (77) दारिकपा चमार, राजा, (78) पुतुलिपा शूद्र, (79) पनहपा (80) कोकालिपा - राजकुमार, (81) अनंगपाशूद्र, (82) लक्ष्मीकरा (योगिनी) राजकुमारी, (83) समुदपा, (84) भलिपा ब्राह्मण सिद्धों में सबसे पुराने 'सरह' (सरोजवज्र भी नाम है) है। 'महासुखवाद' का प्रवर्तन वज्रयान शाखा में हुआ। 'महासुख' का अर्थ है आनन्दस्वरूप ईश्वरत्व। प्रज्ञा और उपाय के योग से इस 'महासुख' दशा की प्राप्ति मानी गई है। गोरखनाथ का नाथ पंथ मूल रूप से वज्ञयान शाखा का ही एक रूप है। गोरखनाथ ने पतंजलि के उच्च लक्ष्य, ईश्वर प्राप्ति को लेकर हठयोग का प्रवर्तन किया। वज्रयानी सिद्धों का लीला क्षेत्र भारत का पूरबी भाग था। गोरखनाथ ने अपने ग्रन्थ का प्रचार देश के पश्चिमी भागों में विशेषकर राजपुताने और पंजाब में किया। नोथों की संख्या नौ माना गया है। लोग इन्हें नवनाथ भी कहते हैं। 'गोरक्ष सिद्धान्त संग्रह' में इनका नाम निम्न क्रम में बताया गया है-नागार्जुन, जड़भरत, हरिश्चन्द्र, सत्यनाथ, भीमनाथ, गोरक्षनाथ, चर्पट, जलंधर और मलयार्जुन। अपभ्रंश साहित्य डॉ० रामकुमार वर्मा ने अपभ्रंश भाषा के प्रथम कवि स्वयंभू को हिन्दी का प्रथम कवि माना है। २ स्वयंभू आठवीं शती (783 ई०) के आसपास विद्यमान थे। स्वयंभू को ही जैन परम्परा का भी प्रथम कवि माना जाता है। स्वयंभू के तीन ग्रन्थ बताये जाते हैं- (1) पउम चरिउ, (2) रिट्ठणेमि चरिउ तथा (3) स्वयंभू छंद। स्वयंभू को अपभ्रंश भाषा का वाल्मीकि तथा व्यास कहा जाता है। का वस्तुनिष्ठ इतिहास स्वयंभू ने अपनी भाषा को 'देशी भाषा' कहा है। स्वयंभू के 'पउमचरिउ' को उसके पुत्र त्रिभुवन ने पूरा किया। 'पठमचरिउ' में राम का चरित्र विस्तार से वर्णित है। शिवसिंह सेंगर ने अपने ग्रन्थ 'शिवसिंह सरोज' में किसी पुरानी अनुश्रुति के आधार पर सातवीं शताब्दी के पुष्य या पुंड कवि को हिन्दी का प्रथम कवि माना है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार-"यह पुष्य सम्भवतः अपभ्रंश का प्रसिद्ध कवि पुष्यदंत है जिसका आविर्भाव 9वीं शती. में हुआ।" सर्वमान्य धारणा है कि पुष्यदंत का आविर्भाव 972 ई० (10वीं शती) में हुआ। ७ पुष्यदंत की प्रमुख रचनाएँ हैं- (1) तिरसठी महापुरिस गुणालंकार, (2) णयकुमारचरिउ तथा (3) जसहर चरिठ। पुष्यदंत के 'तिरसठी महापुरिस गुणालंकार' को ही महापुराण नाम से जाना जाता है। महापुराण में 63 महापुरुषों का जीवन चरित वर्णित है। पुष्पदंत ने अपने चरित काव्यों में चौपाई छंद का प्रयोग किया है। पुष्यदंत ने साहित्य की रचना विशुद्ध धार्मिक भाव से किया है। अपभ्रंश और अवहट्ठ में चउपई (चौपाई) 15 मात्राओं का छन्द था। पुष्यदंत को हिन्दी का भवभूति कहा जाता है। शिवसिंह सेंगर ने पुष्यु कवि को 'भाखा की जड़' कहा है। पुष्यदंत ने स्वयं को 'अभिमान मेरु', 'काव्यरत्लाकर', 'कविकुल तिलक' आदि उपाधियों से विभूषित किया है। हरिषेण ने अपनी 'धम्म परीक्खा' में अपभ्रंश के तीन कवि माने हैं- (1) चतुर्मुख, (2) स्वयंभू और (3) पुष्यदंत। स्वयंभू ने चतुर्मुख को पद्धड़िया बंध का प्रवर्तक तथा सर्वश्रेष्ठ कवि कहा है। पद्धरी 16 मात्रा का मात्रिक छंद है। इस छंद के नाम पर इस पद्धति पर लिखे जाने वाले काव्यों को पद्धड़िया बंध कहा गया है। पुष्पदंत मान्यखेट के प्रतापी राजा कर्ण के महामात्य भीम के सभा-कवि थे। धनपाल वाक्यपतिराज मुंज के कवि सभा रत्न थे जिन्हें मुंज ने 'सरस्वती' की उपाधि दी थी। अपभ्रंश के तीसरे प्रमुख कवि धनपाल ने दसवीं शती में 'भविसयत्तकहा' की रचना की। 12वीं शताब्दी में जिनदत्त सूरी द्वारा लिखित ग्रन्थ 'उपदेश रसायन रास' (1114 ई०) को जैन रास काव्य परम्परा का प्रथम ग्रन्थ माना जाता है। 'उपदेश रसायन रास' अपभ्रंश भाषा का प्रथम रास काव्य है। रास काव्य परम्परा का हिंदी में प्रवर्तन करने का श्रेय 'भरतेश्वर बाहबली रास' (1184 ई०) के रचयिता श्री शालिभद्र सूरी, को है। 'उपदेश रसायनरास' 80 पद्मों का नृत्य गोत रासलीला काव्य है। अब्दुल रहमान द्वारा लिखित 'संदेश रासक' पहला धर्मेतर रास ग्रन्थ है। देशी भाषा में किसी मुसलमान द्वारा लिखित प्रथम काव्य ग्रन्थ 'संदेशरासक' है। आदिकाल 그 संदेशरासक एक खण्ड काव्य है जिसमें विक्रमपुर की एक वियोगिनी के विरह की कथा वर्णित है। 2 विद्वानों ने उसका समय बारहवीं शती का उत्तरार्द्ध और 13वीं शती का आरम्भमाना है। मुनि रामसिंह जैन-साहित्य में सर्वश्रेष्ठ रहस्यवादी कवि कहे जाते हैं। डॉ० हीरालाल मुनि रामसिंह का आविर्भाव-काल सं० 1057 के लगभग मानते हैं। मुनिराम सिंह ने 'पाहूड दोहा' की रचना की। अपभ्रंश भाषा में दोहा काव्य का आरम्भ छठी शताब्दी के कवि जोइन्दु से माना जाता है। जोइन्दु ने दो पुस्तकों की रचना की है- (1) परमात्म प्रकाश और (2) योगसार। जार्ज ग्रियर्सन ने आदिकाल के अन्तर्गत नौ कवियों को शामिल किया-पुष्य कवि, खुमान सिंह, केदार, कुमार पाल, अनन्यदास, चन्द्र, जगनिक, शार्ङ्गधर एवं जोधराज । मिश्र बन्धुओं ने 'मिश्र बन्धु-विनोद' के प्रथम संस्करण में 'आरम्भिक काल' (700-1444 वि०) के अन्तर्गत 19 कवियों को स्थान दिया है। ये 19 कंवि इस प्रकार हैं- (1) पुष्य या पुण्ड रचना अज्ञात 770 वि० (2) अज्ञात कवि खुमान रासो 890 वि० (3) नन्द कवि रचना अज्ञात 1137 वि० (4) मसऊद रचना अज्ञात 1180 वि० (5) कुतुब अली रचना अज्ञात 1180 वि० (6) साईदान चारण सम्वतसार 1191 वि० (7) अकरम फैज वर्तमाल 1205-58 वि० (8) चन्द पृथ्वीराज रासो 1225-49 वि० (9) जगनिक आल्हा (10) केदार कवि अज्ञात 1225 वि० (11) बारदर वेणी (12) जल्हन भागवत दशम स्कन्ध भाषा 1344 वि० (13) भूपति विसलदेव रासो 1354 वि० (14) नरपति नाल्ह विजयपाल रासो 1355 वि० (15) नल्हसिंह हम्मीर काव्य 1357 वि० (16) शार्ङ्गधर (17) अमीर खुसरो नूकर चंदा की प्रेम कहानी 1385 वि० (18) मुल्ला दाऊद 40 ग्रन्थ 1407 वि० (19) गोरखनाथ मिश्र बन्धुओं ने अपने 'मिश्र बन्धु-विनोद' के अगले संस्करणों में नाथपंथियों और सिद्धों को सम्मिलित करते हुए इस काल में कवियों की संख्या 75 तक पहुँचा दी। एव भाषा का वस्तुनिष्ठ इतिहास आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने इतिहास में आदिकालीन रचनाओं को दो वर्गों में विभक्त किया है- (1) अपभ्रंश और (2) देशभाषा (बोलचाल) की रचनाएँ। आचार्य शुक्ल ने निम्नांकित 12 रचनाओं को ही साहित्य में स्थान दिया- (क) अपभ्रंश की रचनाएँ- (1) विजयपाल रासो, (2) हम्मीर रासो, (3) कीर्तिलता और (4) कीर्ति पताका। (ख) 'देशभाषा काव्य' की रचनाएँ- (1) खुमान रासो, (2) बीसलदेव रासो, (3) पृथ्वीराज रासो, (4) जयचन्द्र प्रकाश, (5) जयमयंक जस चन्द्रिका, (6) परमाल रासो (आल्हा का मूल रूप), (7) खुसरो की पहेलियाँ और (8) विद्यापति पदावली। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने आदिकाल के अन्तर्गत नौ कवियों को शामिल किया है। हेमचन्द्र गुजरात के सोलंकी राजा सिद्धराज जयसिंह और उनके भतीजे कुमार पाल के राजदरबार में रहते थे। आचार्य के व्याकरण का नाम 'सिद्ध हेमचन्द्र शब्दानुशासन' था। हेमचन्द्र का व्याकरण 'सिद्ध हेम' नाम से प्रसिद्ध हुआ। 'सिद्ध हेम' में संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश तीनों का समावेश किया गया है। हेमचन्द्र प्रसिद्ध जैन आचार्य थे और इनका जन्म 1088 ई० में हुआ। हेमचन्द्र के अन्य पुस्तकों का नाम निम्न है- 'कुमार पाल चरित्र', 'योगशास्त्र', 'प्राकृत व्याकरण', 'छन्दोनुशासन' और 'देशी नाममाला कोष'। हेमचन्द्र को प्राकृत का पाणिनी माना जाता है। अपने व्याकरण के उदाहरणों के लिए हेमचन्द्र ने भट्टी के समान एक 'द्वयाश्रय काव्य' की भी रचना की है। सोमप्रभ सूरी गुजरात के एक प्रसिद्ध जैन साधु थे जिनका आविर्भाव 1252 वि०स० में माना जाता है। सोमप्रभ सूरी ने 'कुमारपाल प्रतिबोध' (1241 वि०सं०) नाम एक गद्य-पद्य मय संस्कृत-प्राकृत काव्य लिखा। जैनाचार्य मेरुतुंग ने संवत् 1361 में 'प्रबन्धचिन्तामणि' नामक एक ग्रन्थ की रचना संस्कृत भाषा में की। 'प्रवन्ध चिन्तामणि' में कुछ दोहे मालवा नरेश राजा भोज के चाचा मुंज के कहे हुए हैं। 'प्रबन्ध-चिन्तामणि' में दूहा विद्या' में विवाद करने वाले दो चारणों की कथा आई है इसीलिए अपभ्रंश काव्य को 'दूहा विद्या' भी कहा जाने लगा। -अपभ्रंश से पूर्व दोहा का प्रयोग नहीं होता था। लक्ष्मीधर ने 14वीं शताब्दी के अन्त में 'प्राकृत पैंगलम' नामक एक ग्रन्थ का संग्रह किया। 'प्राकृत पैंगलम्' में विद्याधर, शार्डगधर, जज्ञ्जल, बब्बर आदि कवियों की रचनाओं को संकलित किया गया है। 'प्राकृत पैंगलम' में प्राकृत और अपभ्रंश छन्दों की विवेचना की गई है। आदिकाल 'प्राकृत पैंगलम्' को 'प्राकृत पिंगल सूत्र' भी कहा जाता है। 'प्राकृत पैंगलम्' की टीका बंशीधर नामक किसी विद्वान ने लिखा है। शार्डगधर एक अच्छे कवि और सूत्रकार थे। शार्डगधर ने 'शार्डगधर पद्धति' के नाम से एक सुभाषित संग्रह बनाया। 'शार्डगधर पद्धति' में बहुत से शाबर मंत्र और भाषा चित्र-काव्य भी दिया गया है। आचार्य शुक्ल ने 'प्राकृत पैंगलम्' के कुछ छंद के आधार पर 'हम्मीररासो' ग्रन्थ के अस्तित्व की कल्पना की जिसका रचनाकार शार्डगधर को बताया। राहुल सांकृत्यायन ने जज्जल नामक किसी कवि को इसका रचयिता घोषित किया। हजारीप्रसाद द्विवेदी का कथन है कि 'हम्मीर' शब्द अमीर का विकृत रूप है, जो किसी पात्र का न होकर एक विशेषण के रूप में प्रयुक्त हुआ है। शिवसिंह सेंगर के अनुसार चंद की औलाद में शार्डगधर कवि हुए थे, जिन्होंने हम्मीर गैरा और हम्मीर काव्य भाषा में बनाया था। शार्डगधर कृत 'शार्डगधर पद्धति' संस्कृत भाषा में लिखा एक पद्यकोष है किन्तु बीच-बीच में देशभापा के वाक्य भी आये हैं। श्रीमल्लदेव राजा की प्रशंसा में 'शार्डगधर पद्धति' में श्रीकंठ पण्डित का संगृहीत यह श्लोक उल्लेख योग्य है- नूनं बादलं छाइ खेह पसरी निःश्राण शब्दः खरः । शत्रु पाड़ि लुटालि तोड़ हसिनों एवं भणन्त्युद्भटाः ॥ झूठे गर्वभरा मघालि सहसों रे कंत मेरे कहे। कंठे पाग निवेश जाह शरणं श्रीमल्लदेवं विभुम् ॥ ० डॉ० बच्चन सिंह ने अनुमान व्यक्त किया है कि शार्डगधर कुंडलिया छन्द के प्रथम प्रयोक्ता हैं। सिद्ध साहित्य सरहपा को हिन्दी का प्रथम कवि माना जाता है। इन्हें सरोजवज्र, राहुल भद्र आदि नामों से भी जाना जाता है। सिद्धों में सबसे पुराने सरहपाद हैं। सिद्धों ने बौद्ध-धर्म के वज्रयान तत्त्व का प्रचार करने के लिए जो साहित्य जन-भाषा में लिखा, वह हिन्दी के सिद्ध-साहित्य की सीमा में आता है। वज्रयान का केन्द्र श्रीपर्वत पर रहा। सहजयानियों की भाषा का नाम संध्या भाषा है। कुछ विद्वानों ने संध्या भाषा का अर्थ यह बताया है कि यह ऐसी भाषा है, जिसमें संध्या के समान प्रकाश तथा अन्धकार का मिश्रण है, ज्ञान के आलोक से उसकी सारी बातें स्पष्ट हो जाती है। कुछ विद्वानों ने संध्या भाषा का अर्थ अभिसंधि या अभिप्राययुक्त वाणी बताया है। पण्डित विधुशेखर शास्त्री ने बताया कि मूल शब्द संध्या भाषा नहीं, बल्कि संधा त्य एवं भाषा का वस्तुनिष्ठ इतिहास ज्योतिरीश्वर ठाकुर रचित वर्ण रत्नाकर नामक 14वीं शताब्दी के मैथिली ग्रन्थ में 8 सिद्धों के नाम दिये गये हैं। सहजयानियों की संध्या भाषा का प्रभाव संत कवियों पर भी पड़ा और वे उलटवासियाँ लिखने लगें। राहुल सांकृत्यायन ने सरहपाद का समय 769 ई० स्थिर किया है। विनयतोष भट्टाचार्य ने सरहपाद का समय वि०सं० 690 (633 ई०) स्थिर किया है। इनके लिखे 32 ग्रन्थ बताये जाते हैं जिनमें 'दोहा कोश' प्रसिद्ध है। महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री द्वारा सम्पादित 'बौद्ध गान ओ दोहा' में सरहपा और कृष्णाचार्य का दोहा संगृहीत है। महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री ने 'बौद्ध गान ओ दोहा' में संगृहीत पुस्तकों की भाषा को 'प्राचीन बंगला' कहा है। 1 'दोहा कोश' का सम्पादन डॉ० प्रबोध चन्द्र बागची ने किया। 1 'दोहा कोश' में तिल्लोपा, सरहपा, कण्हपा के दोहे संगृहीत हैं। सरहपा की जीवन दृष्टि संक्षेप में इस प्रकार है-सहज संयम पाखण्ड और आडम्बर-विनाश गुरु सेवा ↓ सहज मार्ग महासुख की प्राप्ति बच्चन सिंह ने लिखा है-" आक्रोश की भाषा का पहला प्रयोग सरहपा में ही दिखायी देता है।" सिद्धों की भाषा को 'संध्या भाषा' का नाम मुनिदत्त तथा अद्वयवज्र ने दिया। शबरपा सग्रहमा के शिष्य तथा लुड्पाद के गुरु थे। शबरों की भेषभूषा में रहने के कारण इनका नाम शबरपाद पड़ा। इनका जन्म क्षत्रिय कुल में सन् 780 ई० में हुआ। चर्यापद शबरपा की प्रसिद्ध पुस्तक है। चर्यापद एक प्रकार का गीत है जो सामान्यतः अनुष्ठानों के समय गाया जाता है। चर्यापद संधा भाषा के दृष्ट-कूट में लिखी गई हैं जिनके दुहरे अर्थ होते हैं। सिद्ध साहित्य में दोहा कोश को रचना परिनिष्ठित अपभ्रंश में हुई है तथा चर्यापदों की अवहट्ठ में। सिद्धों का दोहा और चर्यापद संत साहित्य में क्रमशः 'साखी' और 'सबदी' में किंचित रूपान्तरित हो गया। लुइपा का जन्म राजा धर्मपाल के शासन काल में सन् 773 ई० में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। लुइपा शबरपा के शिष्य थे।. आदिकाल 12 84 सिद्धों में लक्ष्पा का स्थान प्रथम तथा सबसे ऊँचा माना जाता है । लइपा साधना में इतने ऊँचे थे कि उडीसा के राजा दारिकपा और उनके मंत्री डेंगीपा इनके शिष्य हो गये थे। ० डोम्भिपा का जन्म मगध के क्षत्रिय वंश में सन् 840 ई० के आसपास हुआ। ० इनके द्वारा रचित 21 ग्रन्थ बताये जाते हैं, जिनमें 'डोम्बि-गीतिका', 'योगचर्या', 'अक्षरद्विकोपदेश' आदि प्रसिद्ध हैं। डोम्भिपा विरूपा के शिष्य थे। कण्हपा सिद्धों में सर्वश्रेष्ठ विद्वान तथा सबसे बड़े कवि थे। कण्हपा का जन्म कर्नाटक के ब्राह्मण वंश में सन् 820 ई० में हुआ था। राहुल सांकृत्यायन के अनुसार "कण्हपा पाण्डित्य और कवित्व में बेजोड़ थे।" कण्हपा बिहार के सोमपुरी स्थान पर रहते थे तथा जलन्धरपा को अपना गुरु बनाया था। जैन साहित्य ० जैन साधुओं ने अपने मत का प्रसार हिन्दी कविता के माध्यम से पश्चिमी क्षेत्र में किया। राप्स काव्य परम्परा में प्राचीनतम ज्ञात ग्रन्थ 'रिपुदारणरास' है। डॉ० दशरथ ओझा ने इसका समय 905 ई० बताया है। 'रिपुदारण रास' संस्कृत भाषा में लिखा है तथा इसमें अभिनय, नृत्य और गान इन तीनों तत्त्वों का मिश्रण है। जितदत्त सूरी द्वारा रचित 'उपदेश रसायनरास' अपभ्रंश भाषा का सर्वप्रथम रास ग्रन्थ है। अपभ्रंश भाषा का दूसरा रास या रासक काव्य अब्दुर्रहमान द्वारा रचित 'संदेश रासक' है। हिन्दी का प्रथम ऐतिहासिक रास ग्रन्थ 'पंचपाण्डव रचित रास' है। २ 'पंचपाण्डव रचित रास' के लेखक शालिभद्र सूरी द्वितीय को माना जाता है। इसका रचनाकाल 1350 ई० था। मुनिजिन विजय, डॉ० दशरथ ओझा, डॉ० गणपति चन्द्रगुप्त ने श्रीशालिभद्र सूरी द्वारा रचित 'भरतेश्वर बाहुबली रास' को हिन्दी-जैन-रास परम्परा का आदिकाव्य माना है। ० डॉ० गणपति चन्द्र गुप्त ने शालिभद्र सूरी को हिन्दी का प्रथम कवि माना है। 'भरतेश्वर बाहुबली रास' की रचना 1184 ई० में हुई तथा इस ग्रन्थ में भरतेश्वर तथा बाहुबली का चरित वर्णित है। यह ग्रन्थ 205 छन्दों में रचित एक सुन्दर खण्ड काव्य है। 'भरतेश्वर बाहुबली' का सम्पादन मुनिजिन विजय ने किया है। प्रसिद्ध जैन आचार्य देवसेन कृत 'श्रावकाचार' को डॉ० नगेन्द्र ने हिन्दी की प्रथम की वस्तुनिष्ठ इतिहास देवसेन ने सन् 933 ई० में श्रावकाचार की रचना की। श्रावकाचार में 250 दोहों में श्रावक-धर्म का प्रतिपादन किया है। देवसेन के अन्य ग्रन्थ हैं- 'नयचक्र', 'दर्शन सार', 'भाव संग्रह', 'आराधनासार' और 'तत्त्वसार' तथा 'सावय धम्म दोहा'। इन ग्रन्थों में इनका 'नयचक्र' बहुत प्रसिद्ध है। देवसेन के 'नयचक्र' को 'लघुनयचक्र' का नाम भी दिया गया है। देवसेन अपने ग्रन्थ में जैन धर्म के अनेक संघों की उत्पत्ति लिखी है जिसे इन्होंने 'जैनाभास' का नाम दिया। 'बृहदनयचक्र' की रचना देवसेन के शिष्य माइल्ल धवल ने किया जो कि देवसेन के नाम से प्रसिद्ध है। 'बृहद नयचक्र' का वास्तविक नाम 'दव्व सहाव पयास' (द्रव्य स्वभाव प्रकाश) है। पहले यह ग्रन्थ 'दोहाबन्ध' में था किन्तु बाद में किसी शुभंकर के कहने से प्राकृत में 'गाथा-बन्ध' कर दिया। 'द्रव्य स्वभाव प्रकाश' (दव्व सहाव पयास) पहले पुरानी हिन्दी या अपभ्रंश भाषा में लिखा था। 'दव्व सहाव पयास' अब प्राकृत भाषा में मिलती है। 'दव्व सहाव पयास' माइल्ल धवल की रचना है। शालिभद्र सूरी के 'बुद्धि रास' नामक ग्रन्थ का संग्रह उनके शिष्य सिवि ने किया था। आसुग नामक कवि ने जालौर में लगभग 1200 ई० के आसपास 35 छन्दों का एक लघु खण्डकाव्य 'चन्दवबाला रास' नाम से लिखा। आसुग ने 'जीव-दया रास' नामक एक अन्य ग्रन्थ की भी रचना की है। जिन धर्म सूरी ने 1209 ई० में 'स्थूलि भद्र रास' की रचना है। ' स्थूलिभद्र रास' में रचयिता का नाम 'जिणधाम' मिलता है जो जिनधर्म का ही पर्याय समझा जाता है। विजय सेन सूरी ने 'रेवंतगिरि रास' की रचना 1231 ई० के आस-पास किया। 'रेवंतगिरि रास' में जैन तीर्थ रेवंत गिरि तथा तीर्थकर नेमिनाथ की प्रतिमा के महत्त्व का प्रतिपादन ऐतिहासिक एवं पौराणिक इतिवृत्त तथा प्राकृतिक सौन्दर्य के आधार पर किया गया है। 'रेवंतगिरि रास' चार कड़वकों में विभक्त है। 'रेवंतगिरि रास' की ही भाँति कवि पल्हण द्वारा रचित 'आबू रास' (1232 ई०) में भी जैनियों के प्रसिद्ध स्थान आबू मन्दिर का वर्णन किया गया है। मुनि सुमतिगणि ने 'नेमिनाथ रास' में जैन तीर्थकर नेमिनाथ के चरित का वर्णन अत्यन्त संक्षेप में किया है। 'नेमिनाथ रास' की रचना 1213 ई० में हुई। इसमें 58 छन्द हैं। चौपाई छंद में बारहमासा का वर्णन विनयचन्द्र सूरि द्वारा रचित 'नेमिनाथ चउपई' से माना जाता है। आदिकाल विनयचन्द्र सूरि की अन्य रचनाएँ 'मल्लिनाथ महाकाव्य', 'पार्श्वनाथ चरित' 'कल्पनिरुक्त', 'उवएसमाला कहाणय छप्पय' आदि हैं। जैन रास परम्परा के अन्य कवि एवं काव्य प्रमुख कवि (1) प्रज्ञातिलक (2) देल्हण (3) सारमूर्ति (4) अभयदेव सूरि (5) चन्द्रमुनि (6) कनकामर मुनि (7) कवि णयणंदि (8) जिनवल्लभ सूरि ( 9) योगचन्द्र मुनि (प्रसिद्ध दोहाकार) (10) जिनदत्त सूरि (11) हरिभद्र सूरि (12) सोमप्रभ सूरि (13) जिनपद्म सूरि (14) धर्मसूरि (15) अम्बदेव सूरि (16) राजशेखर सूरि रचना कच्छुली रास (1306 ई०) गय सुकुमाल रास (14वीं शती) जिन पद्मसूरी पट्टाभिषेक रास (1333 ई०) जय तिहुअण पुराण-सार करकंड्ड चरिए सुदंसण चरिउ संघपट्टक योगसार 'चाचरि', 'कालस्वरूप कुलक' एवएस रसायण (उपदेश रसायण) ललित विस्तरा, धूर्ताख्यान, जसहर, चरिए, सम्बोध प्रकरण, णेमिणाह चरिउ। कुमार पाल प्रतिबोध स्थूलिभद्द फागु जम्बू स्वामी रासा संघपति समरा रासा नेमिनाथ फाग फागु काव्य आदिकाल की रास-परम्परा की ही भाँति फागु-काव्य परम्परा भी जैन कवियों की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। 'फागु' शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के 'फल्गु' (वसन्त) प्राकृत के 'फागु' और हिन्दी के 'फाग' से मानी गई है। फागु काव्य परम्परा का सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ 'जिनचंद सूरि' द्वारा रचित 'जिनचंद सूरि फागु' (1284 ई०) है। फागु काव्य का अर्थ है वसन्त ऋतु का काव्य। 'जिनचंद सूरि' में 25 छंद हैं। 'सिरिथूलिभद्द फागु' (श्रीस्थूलिभद्र फागु) फागु काव्य परम्परा का सर्वाधिक सुन्दर काव्य है। 'श्रीनेमिनाथ फागु' की रचना राजशेखर सूरी ने किया। 'श्रीनेमिनाथ फागु' की रचना 1350 ई० में हुई जिसमें नेमिनाथ एवं राजुल के विवाह की घटना का चित्रण है। एवं भाषा का वस्तुनिष्ठ इतिहास पूरा काव्य सिर्फ 27 छन्दों में निबद्ध है। 'वसंत विलास फागु' संज्ञक अनेक रचनाएँ मिलती हैं; जिनमें से एक 14वीं शती की तथा दूसरी 16वीं शती की है। डॉ० माताप्रसाद गुप्त ने परिश्रमपूर्वक 'वसंतविलास फागु' का सम्पादन किया तथा इसका समय 13वीं शताब्दी बताया। 'वसंत विलास फागु' 84 छन्दों में रचित एक श्रृंगारिक काव्य है जिसमें वसंत और स्त्रियों पर उसके विलासपूर्ण प्रभाव का मनोहारी चित्रण है। थि साहित्य गोरखनाथ का 'नाथपंथ' बौद्धों की वज्रयान शाखा से निकला हुआ माना जाता है। गोरखनाथ ने पतंजलि के उच्च लक्ष्य, ईश्वर प्राप्ति को लेकर हठयोग का प्रवर्तन किया। सिद्धों की वाममार्गी भोग प्रधान योग साधना की प्रतिक्रिया के रूप में आदिकाल में नाथ पंथियों की हठयोग साधना आरम्भ हुई। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार "नाथ पंथ या नाथ सम्प्रदाय के सिद्ध-मत, सिद्ध-मार्ग, योगमार्ग, योग सम्प्रदाय, अवधूत-मत एवं अवधूत सम्प्रदाय नाम भी प्रसिद्ध हैं।" 1 हठयोगियों के 'सिद्ध-सिद्धान्त-पद्धति' ग्रन्थ के अनुसार 'ह' का अर्थ है सूर्य तथा 'ठ' का अर्थ है चन्द्र। इन दोनों के योग को ही 'हठयोग' कहते हैं। हिन्दी-साहित्य में षट्चक्रों वाला योग-मार्ग गोरखनाथ ने चलाया। गोरखनाथ को नाथ-साहित्य का आरम्भकर्ता माना जाता है। गोरखनाथ के गुरु का नाम मत्स्येन्द्रनाथ था। मत्स्येन्द्रनाथ को मीननाथ और मछन्दरनाथ भी कहा गया है। मत्स्येन्द्रनाथ चौथे बोधिसत्व अवलोकितेश्वर के नाम से भी प्रसिद्ध हुए हैं। मिश्र बन्धुओं ने गोरखनाथ को हिन्दी का प्रथम गद्य लेखक माना है। राहुल सांकृत्यायन ने गोरखनाथ का समय 845 ई० माना है, डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी उन्हें नवीं शती का मानते हैं, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और डॉ० रामकुमार वर्मा 13वीं शती का बताते हैं तथा डॉ० पीताम्बर दत्त बडथ्वाल उन्हें ग्यारहवीं शती का मानते हैं। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है, "शंकराचार्य के बाद इतना प्रभावशाली और इतना महिमान्वित भारतवर्ष में दूसरा नहीं हुआ। भारतवर्ष के कोने-कोने में उनके अनुयायी आज भी पाये जाते हैं। भक्ति आन्दोलन के पूर्व सबसे शक्तिशाली धार्मिक आन्दोलन गोरखनाथ का भक्ति मार्ग ही था। गोरखनाथ अपने युग के सबसे बड़े नेता थे।" डॉ० पाताम्बर दत्त बडथ्वाल ने गोरखनाथ के 14 ग्रन्थों को प्रमाणित मानकर उनका सम्पादन 'गोरखबानी' नाम से किया। 'गोरखवानी' में संकलित गोरखनाथ के प्रामाणिक ग्रन्थ निम्नलिखित हैं- (1) शब्द, (2) पद, (3) शिष्या दर्शन, (4) प्राणसंकली, (5) नरवैवोध, (6) आत्मबोध, (7) अभयमात्रा योग. (8) पंद्रहतिथि, (9) सप्तवार, (10) मछिन्द्र गोरखबोध, (11) रोमावली, (12) ज्ञान तिलक, (13) ग्यान चौंतीसा, (14) पंचमात्रा। गोरखनाथ के संस्कृत भाषा में लिखे निम्नलिखित ग्रन्थ बताये जाते हैं- (1) सिद्ध-सिद्धान्त-पद्धति, (2) विवेक मार्तंड, (3) शक्ति संगम तंत्र, (4) निरंजन पुराण, (5) वैराट पुराण, (6) गोरक्षशतक, (7) योगसिद्धान्त पद्धति, (8) योग बिन्तामणि इत्यादि । 10वीं शताब्दी के प्रसिद्ध कश्मीरी आचार्य अभिनव गुप्त ने अपने तंत्रालोक में मच्छंद विभु या मत्स्येन्द्रनाथ की वन्दना की है। नाथों की संख्या नौ मानी गई है। 'गोरक्ष सिद्धान्त संग्रह' में नव प्रवर्तकों के निम्नलिखित नाम गिनाए गये हैं- (1) नागार्जुन, (2) जड़भरत, (3) हरिश्चन्द्र, (4) सत्यनाथ, (5) भीमनाथ, (6) गोरक्षनाथ, (7) चर्पट, (8) जलन्धर और (9) मलयार्जुन। डॉ रामकुमार वर्मा ने 'नवनाथों' का निम्नलिखित नाम बताया है- (1) आदिनाथ, (2) मत्स्येन्द्रनाथ, (3) गोरखनाथ, (4) गाहिणीनाथ, (5) चर्पटनाथ, (6) चौरंगीनाथ, (7) ज्वालेन्द्रनाथ, (8) भर्तृनाथ एवं (9) गोपीचन्द नाथ। आदिनाथ को परवर्ती संतों ने 'शिव' माना है। चर्पटनाथ का पूर्व नाम 'चरकानन्द' था। चौरंगीनाथ गोरक्षनाथ के शिष्य थे और ये 'पूग्नभगत' नाम से प्रसिद्ध हुए। नाथ सम्प्रदाय में जलन्धर को 'बालनाथ' कहा जाता है। 'नागार्जुन', 'गोरखनाथ', 'चर्पट' तथा 'जलंधर' का नाम नाथ और मिद्ध दोनों में गिना जाता है। नाथों में 'रसायनी' नागार्जुन को माना जाता है। नाथ पंथ के जोगियों को कनफटा भी कहा जाता है। नाथपंथियों की भापा 'सधुक्कड़ी' भाषा थी, जिसका ढाँचा कुछ खड़ी बोली लिये हुए राजस्थानी थी। गोरखनाथ ने अपनी रचनाओं में गुरु-महिमा, इंद्रिय-निग्रह, प्राण-साधना, वैराग्य, मनःसाधना, कुण्डलिनी जागरण, शून्य-समाधि आदि का वर्णन किया है। मत्स्येन्द्रनाथ का वास्तविक नाम विष्णु शर्मा माना जाता है। इनकी लिखो संस्कृत रचना 'काल ज्ञान निर्णय' का सम्पादन प्रबोधचन्द्र वागाची ने किया है। रासो साहित्य आंचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने रासो साहित्य का विवरण 'वीरगाथा काल' के अन्तर्गत दिया है। साहित्य एवं भाषा का वस्तुनिष्ठ इतिहास आचार्य शुक्ल के अनुसार, वीरगीत परम्परा का प्राचीनतम ग्रन्थ 'बीसलदेव रासो' है। विद्वानों ने 'रासो' शब्द की व्युत्पत्ति निम्न ढंग से बतायी है- विद्वान/प्रस्तोता मूल शब्द राजसूय गार्सा द तासी राजयश हर प्रसाद शास्त्री रासक नरोत्तम स्वामी कविराज श्यामलदास रहस्य काशी प्रसाद जायसवाल रहस्य आचार्य रामचन्द्र शुक्ल रसायण - रास या रासो नंद दुलारे वाजपेयी रास हजारी प्रसाद द्विवेदी रासक (उपरूपक) रामस्वरूप चतुर्वेदी राउस या रस दशरथ शर्मा रासक माताप्रसाद गुप्त रासक गणपति चन्द्र गुप्त रासक रास रासा रासु रासो रासो साहित्य के प्रमुख रचनाकार व रचना आचार्य शुक्ल के अनुसार निम्न हैं- कवि रचना समय रस अध्याय भाषा काव्यरूप दलपति विजय खुमाण रासौ 9वीं सदी वीर राजस्थानी प्रबन्ध नरपति नाल्ह बीसलदेव रासो 1212 श्रृंगार चार खण्ड वीरगीत जगनिक परमाल रासो 1230 वीर वीरगीत चन्दवरदायी (आल्ह खण्ड) पृथ्वीराजरासो वीर श्रृंगार 69 समय सर्ग डिंगल प्रबन्ध केदार भट्ट जयचन्द प्रकाश 1224 वीर प्रबन्ध मधुकर भट्ट जयमयंक जसचंद्रिका 1243 प्रबन्ध शार्डगधर हम्मीर रासो वीर श्रीधर 42 छंद 70 छंद वीरगीत नल्ह सिह विजयपाल रासो रणमल्ल छंद 1454 वीर डिगल वीरगीत आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है, "चन्दबरदाई हिन्दी के प्रथम महाकवि माने जाते हैं और इनका 'पृथ्वीराज रासो' हिन्दी का प्रथम महाकाव्य है।" मिश्र बन्धुओं ने लिखा है, "हिन्दी का वास्तविक प्रथम महाकवि चन्द्रवरदाई को ही कहा जा सकता है।" पृथ्वीराज रासो' की प्रामाणिकता-अप्रामाणिकता में विद्वानों के बीच मतभेद है जो निम्नांकित है- प्रामाणिक अप्रामाणिक अर्ध प्रामाणिक श्यामसुन्दर दास मिश्र बन्धु मुनिजन विजय आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी मोहनलाल विष्णु लाल पंड्या आचार्य रामचन्द्र शुक्ल देवी प्रसाद कविराज श्यामलदास गौरीशंकर हीराचन्द ओझा बूल्हर मुरारिदान डॉ० सुनीति कुमार चटर्जी कर्नल टाड डॉ० दशरथ ओझा 'पृथ्वीराज रासो' में 68 छन्दों का प्रयोग किया गया है। मुख्य छंद निम्न है- कवित्त, छप्पय, दूहा, तोमर, त्रोटक, गाहा और आर्या। चन्दबरदाई को 'छप्पय छंद' का विशेषज्ञ माना जाता है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने 'पृथ्वीराजरासो' को शुक-शकी संवाद के रूप में रचित माना है। डॉ० बूल्हर ने सर्वप्रथम कश्मीरी कवि जयानक कृत 'पृथ्वीराजविजय' के आधार पर सन् 1875 में 'पृथ्वीराज रासो' को अप्रामाणिक घोषित किया। पृथ्वीराज रासो' को चन्दबरदायी के पुत्र जल्हन ने पूर्ण किया। ० डॉ० बच्चन सिंह ने लिखा है, "यह (पृथ्वीराज रासो) एक राजनीतिक महाकाव्य है, दूसरे शब्दों में राजनीति की महाकाव्यात्मक त्रासदी है।" हिन्दी में सर्वप्रथम बारहमासा का वर्णन नरपतिनाल्ह कृत 'बीसलदेव रासो' में मिलता है। 'कयमास बध' 'पृथ्वीराज रासो' का एक महत्वपूर्ण समय (सर्ग) है। आचार्य शुक्ल ने वीरकाव्य परम्परा का प्रथम ग्रन्थ 'बीसलदेव रासो' को स्वीकार किया है। 'परमाल रासो' में आल्हा ऊदल नामक दो सरदारों की वीरता का वर्णन है। 'आल्हखण्ड' को सर्वप्रथम सन् 1865 ई० में फर्रुखाबाद के तत्कालीन जिलाधीश 'चार्ल्स इलियट' ने प्रकाशित करवाया था। आल्ह खण्ड बरसात ऋतु में उत्तर प्रदेश के बैसवाड़ा, पूर्वांचल और बुन्देलखण्ड क्षेत्र में गाया जाता है। विद्यापति (1350-1450 ई०) विद्यापति के गुरु का नाम पण्डित हरि मिश्र था। विद्यापति बिहार प्रान्त के दरभंगा जिले के 'विपसी' नामक गाँव के निवासी थे। भाषा की दृष्टि से विद्यापति द्वारा रचित ग्रन्थ निम्न हैं- संस्कृत अवहट्ट मैथिली शैव सर्वस्व सार कीर्तिलता पदावली गंगा वाक्यावली कीर्ति पताका गोरक्ष विजय (नाटक) का वस्तुनिष्ठ इति (2) "एक नार ने अचरज किया। साँप मारि पिंजड़े में दिया ॥ जों जों सांप ताल को खाए। सूखे ताल साँप मर जाए॥" (दिया बत्ती) (3) "एक नार दो को ले बैठी। टेढी होके बिल में पैठी ॥ जिसके बैठे उसे सुहाय। खुसरो उसके बल बल जाय ॥" (पायजामा) (4) "अरथ ते इसका बूझेगा। मुँह देखो तो सूझेगा ॥" (दर्पण) ब्रजभाषा रूप- (1) "चूक भई कुछ बासों ऐसी। देस छोड़ भयो परदेसी ॥" (2) "एक नार पिया को भानी। तन वाको सरगा ज्यों पानी ॥" (3) "चाम मास वाके नहिं नेक। हाड़ हाड़ में वाके छेद ॥ मोहि अचंभों आवत ऐसे। वामें जीव बसत है कैसे ॥" दोहे और गीत ब्रजभाषा में- (1) "उज्जल बरन, अधीन तन, एक चित्त दो ध्यान। देखत में तो साधु है, निपट पाप की खान।" "खुसरो रैन सुहाग की जागी पी के संग। तन मेरो मन पीठ को, दोउ भए एक रंग।" "गोरी सोवै सेज पर, मुख पर डारै केस। चल खुसरो घर आपने, रैन भई चहु देस।" (2) "मोरा जोबना नवेलरा भयो है गुलाल। कैसे गर दीनी कस मोरी माल ॥ सूनी सेज डरावन लागै, विरहा अगिन मोहि डस डस जाय।" ( 3) "जे हाल मिसकी मकुन तगाफुल दुराय नैना, बनाय बतियाँ। किताबे हिज्राँ न दारम, ऐ जाँ! न लेहु काहे लगाय छतियाँ ॥" महत्वपूर्ण पंक्तियाँ गोरखनाथ के छंद- (1) "नौ लख पातरि आगे नाचैं, पीछे सहज अखाड़ा। ऐसे मन लौ जोगी खेलै, तब अंतरि बसै भंडारा ॥" (2) "अंजन मांहि निरंजन भेढ्या, तिल मुख भेट्या तेलं। मूरति मांहि अमूरति परस्या भया निरंतरि खेलं ॥" (3) "नाथ बोलै अमृतवाणी। बरिपैगी कवली पांणी ॥ गाड़ि पडरवा वांधिलै खूँटा। चलै दमामा वजिले ऊँटा ॥" (4) "गुर कीजै महिला निगुरा न रहिला, गुरु बिन ग्यानं न पायला रे भाईला।" (5) "अवधू रहिया हाटे वाटे रूष विरप की छाया। तजिबा काम क्रोध लोभ मोह संसार की माया ॥" (6) "स्वामी तुम्हई गुरु गोसाई। अम्हे जो सिव सबद एक बूझिबा ॥ निरारंबे चेला कूण विधि रहै। सतगुरु होइ स पुछया कहै॥" (7) "अभि-अन्तर की त्यागै माया" आदिकाल (8) "दुबध्या मेटि सहज में रहें" (9) "जोइ-जोइ पिण्डे सोई-ब्रह्माण्डे" (10) "अवधू मन चंगा तो कठौती में गंगा" कुक्कीरपा के छंद - (1) "हाउनिवासी खमण भतारे, मोहारे बिगोआकहण न जाइ।" (2) "ससुरी निंद गेल, बहुड़ी जागअ" पृथ्वीराज रासो से- (1) "राजनीति पाइयै। ग्यान पाइयै सु जानिय ॥ उकति जुगति पाइयै। अरथ घटि बढ़ि उनमानिया ॥" (2) "उक्ति धर्म विशालस्य। राजनीति नवरसं ॥ खट भाषा पुराणं च। कुरानं कथितं मया ॥" (3) "कुट्टिल केस सुदेस पोह परिचिटात पिक्क सद। कमलगंध बटासंध हंसगति चलित मंद मंद ॥" | (4) "रघुनाथ चरित हनुमंत कृत, भूप भोज उद्धरिय जिमि। पृथ्वीराज सुजस कवि चंद कृत, चंद नंद उद्धरिय तिमि ॥" लौकिक साहित्य 'ढोला-मारू रा दूहा' 11 वीं शताब्दी में रचित एक प्रसिद्ध प्रेम काव्य है। 'ढोला-मारू-रा दूहा' मूलतः दोहा छंद में रचित था, जिसमें 17वीं शताब्दी में कुशलराय नामक कवि ने कुछ चौपाइयाँ जोड़कर इसका विस्तार कर दिया। इसमें ढोला नामक राजकुमार और मारवणी नामक राजकुमारी की प्रेम कथा का - वर्णन है। इस काव्य का मूल कवि कल्लोल था। इस काव्य की महत्वपूर्ण पंक्ति निम्न है-"सोरठियो दूहा भलो, भली मरवण री बात। जोबन छाई धण भली, तारां छाई रात ॥" 'वसन्त विलास' 13वीं शताब्दी में रचित महत्वपूर्ण काव्य ग्रन्थ है । Q 'वसन्त विलास' 84 दोहों में रचित एक श्रृंगारिक काव्य है जिसमें वसन्त और स्त्रियों पर उसके विलास पूर्ण प्रभाव का मनोहारी चित्रण है। ० वसन्त विलास का सम्पादन सर्वप्रथम केशवलाल हर्षादराय ने किया। इस काव्य की महत्वपूर्ण पंक्ति निम्न है- "इणि पर कोइलि कूजइ, पूंजइ युवति मणोर। विधुर वियोगिनि धूजई, कूजइ मयण किसोर ॥" विविध अपभ्रंश भाषा में तीन प्रकार के बन्ध पाये जाते हैं- (1) दोहा बंध, (2) पद्धड़िया बंध और (3) गेय पद बन्ध । हजारीप्रसात दिवेदी ने लिखा है, "दोहा या दूहा अपभ्रंश का अपना छंद है। उसी प्रकार जिस प्रकार गाथा प्राकृत का अपना छंद है।" अपभ्रंश का चरित काव्य पद्धड़िया बंध में लिखा गया है। चरित काव्यों में पद्धड़िया छंद की आठ-आठ पंक्तियों के बाद धत्ता दिया रहता है जिसे 'कडवक' कहते हैं। हिन्दी में सर्वप्रथम चौपाई और दोहा पद्धति का प्रयोग बौद्ध सिद्ध सरहपा की रचनाओं में मिलता है। हिन्दी के प्रथम कवि, उनका समय एवं उनके प्रस्तोता निम्न हैं- प्रस्तोता प्रथम कवि समय शिव सिंह सेंगर पुष्य या पुण्ड सातवीं शताब्दी राहुल सांकृत्यायन सरहपा सन् 769 ई० रामकुमार वर्मा स्वयंभू विक्रम की आठवीं शताब्दी गणपति चन्द्र गुप्त शालिभद्र सूरि सन् 1184 ई० डॉ० वी० भट्टाचार्य सरहपा को बांग्ला भाषा का प्रथम कवि मानते हैं। कवि भुवाल (10वीं शताब्दी) हिन्दी के प्रथम कवि हैं जिन्होंने दोहा-चौपाई छंद में 'भगवद्‌गीता' का अनुवाद किया। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अब्दुल रहमान को हिन्दी का प्रथम कवि माना है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने आदिकाल को 'अनिर्दिष्ट लोक प्रवृत्ति' का युग कहा है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने आदिकाल को 'अत्यधिक विरोधी और व्याघातों का युग' कहा है। चन्द्रधर शर्मा गुलेरी, राहुल सांकृत्यायन एवं रामचन्द्र शुक्ल अपभ्रंश को पुरानी हिन्दी मानते हैं। हजारी प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा अपभ्रंश को हिन्दी से पृथक् मानते हैं। भोलाशंकर व्यास ने हिन्दी के आरम्भिक रूप को 'अवहट्ठ' कहा था । अमीर खुसरो को संगीत के क्षेत्र में कव्वाली, तराना गायन शैली एवं सितार वाद्य यंत्र का जन्मदाता माना जाता है। डॉ० रामकुमार वर्मा ने अमीर खुसरो को अवधी भाषा का प्रथम कवि माना है।

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