Part-6 हिंदी भाषा एवं साहित्य का वास्तुंनिस्ट इतिहास बाय सरस्वती पांडे गोविंद पांडे बुक इन हिंदी (बुक, सरस्वती पांडे गोविंद पांडे)
आधुनिक काल
भारतेन्दु युग (पुनर्जागरणकाल)
हिन्दी साहित्य में 'आधुनिक काल' नाम सर्वप्रथम आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा दिया गया था।
'रेनेसौं' (नवजागरण या पुनर्जागरण) शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम प्रसिद्ध फ्रांसीसी इतिहासकार मिशेसेंट ने 19वीं सदी के पूर्वार्ड में किया था।
कुछ आलोचकों ने 'नवजागरण' और 'पुनर्जागरण' में शाब्दिक भेद करते हुए भक्तिकाल को 'नय जागरण' तथा १९वीं सदी से आरम्भ होने वाले जागरण को 'पुनर्जागरण' कहा है।
डॉ० राम विलास शर्मा ने 'हिन्दी नवजागरण' के दो हिस्से किये हैं-
(१) लोक जागरण (भक्ति आन्दोलन)
आधुनिक काल
(२) नवजाग्रण (हिन्दी नवजागरण या आधुनिककाल)
डॉ० रामविलास शर्मा ने 'लोक जागरण' तथा 'नवजागरण' में निम्नलिखित ढंग स अन्तर व्यक्त किया है-
लोकजागरण प्रथम जातीय निर्माण को व्यक्त करने वाला सांस्कृतिक आन्दोलन है, जिसका मुख्य स्वर सामन्त विरोधी तथा मानवतावादी है। भक्ति आन्दोलन का काव्य हो 'लोक जागरण' का काव्य है।
नवजागरण या हिन्दी नवजागरण राष्ट्रीय स्वाधीनता का सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक आन्दोलन है, जिसका मुख्य स्वर साम्राज्यवाद विरोधी तथा सामन्तवाद विरोधी है।
डॉ० रामविलास शर्मा ने लिखा है, "जो नवजागरण १८५७ के स्वाधीनता संग्राम से आरम्भ हुआ, वह भारतेन्दु युग में और व्यापक बना, उसकी साम्राज्यवाद विरोधी, सामन्तवाद विरोधी प्रवृत्तियाँ द्विवेदी युग में और पुष्ट हुई फिर निराला के साहित्य में कलात्मक स्तर पर तथा उनकी विचारधारा में ये प्रवृत्तियाँ क्रान्तिकारी रूप में व्यक्त हुई।"
डॉ० मैनेजर पाण्डेय ने लिखा है, "यमविलास शर्मा हिन्दी नव-जागरण और उसके साहित्य की विशेषताओं का सशक्त, स्वतन्त्र और प्रामाणिक विवेचन करने वाले पहले व्यक्ति है।"
डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी ने लिखा है, "पुनर्जागरण दो जातीय संस्कृतियों की टकराहट से उत्पन्न रचनात्मक ऊर्जा है।"
हिन्दी में आधुनिकता और पुनर्जागरण के प्रवर्तक और पितामह भारतेन्दु हरिश्चन्द को माना जाता है।
विभिन्न विद्वानों ने भारतेन्दु युग का काल निर्धारण निम्न ढंग से किया है-
प्रस्तोता
सीमांकन (ई०)
काल का नामकरण
मिश्रवन्धु
1869-1888
वर्तमान काल
रामचन्द्र शुक्ल
1868-1893
नई धारा: प्रथम उत्थान
रामकुमार वर्मा
1870-1900
आधुनिक काल
केसरीनारायण शुक्ल
1865-1900
नवजागरण
रामविलास शर्मा
1857-1900
भारतेन्दु पूर्व काव्यधारा (1843-1867 ई०)
सन् 1843 से 1867 ई० तक का कृतित्व भारतेन्दु युग की पृष्ठभूमि के रूप में जाना जाता है।
भारतेन्दु पूर्व काव्यधारा में रचित महत्वपूर्ण भक्तिकाव्य निम्नांकित हैं-
कवि
रचनाएँ
रीवा नरेश रघुराज सिंह
(1) राम स्वयंवर (1969 ई०),
(2) रुक्मिणी
रघुनाथदास रामसनेही
(1) विश्रामसागर (1854 ई०)।
सरदार कवि
(1) राम रत्नाकर, (2) रामलीला प्रकाश, (3) हनुमतभूषण, (4) तुलसीभूषण।
ललितकिशोरी (कुंदनलाल)
स्फुट छंद।
गोपालचंद 'गिरिधरदास'
इतिहास
परिणय, (3) आनंदांबुनिधि, (4) रामाष्टयाम।
(1) राधा स्तोत्र, (2) गोपालस्तोत्र, (3) जरासन्ध वध, (4) बलराम कथामृत, (5) रामकथामृत ।
भारतेन्दु पूर्व ब्रजभाषा में रचित श्रृंगारिक रचनाएँ निम्नांकित हैं-
कवि
रचनाएँ
सेवक
नखशिख
सरदार कवि
(1) षऋतु, (2) साहित्य सरसी, (3) श्रृंगार संग्रह।
चन्द्रशेखर वाजपेयी
(1) नखशिख, (2) हम्मीर हठ (1845 ई०)।
भारतेन्दु पूर्व काव्य रीति निरूपण रचनाएँ निम्नांकित हैं-
कवि
रचनाएँ
रामदास (राजकुमार) - कविकल्पद्रुम (1844 ई०) ।
सेवक-वाग्विलास।
गोपालचंद्र 'गिरिधरदास'- (1) भारतीभूषण, (2) छंदोवर्णन।
बैजनाथ द्विवेदी- (1) सीतारामाभरण मंजरी (1864 ई०), (2) रामरहस्य (1866 ई०), (3) वृत्तनि दोष कदम्ब (1866 ई०), (4) वामाविलास (1866 ई०), (5) उद्दीपन श्रृंगार (1867 ई०), (6) अनुभव उल्लास (1867 ई०), (7) चित्राभरण (1867 ई०)।
लछिराम (ब्रह्मभट्ट) - (1) मानसिहाष्टक, (2) प्रताप रत्नाकर, (3) प्रेम रत्नाकर, (4) लक्ष्मीश्वर रत्नाकर, (5) रावणेश्वर कल्पतरु, (6) कमलानंद-कल्पतरु ।
भारतेन्दु और उनका मण्डल
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का संक्षिप्त जीवन वृत्त निम्नांकित है-
जन्म-मृत्यु (ई०)
जन्मस्थान
पिता
गुरु
उपाधि
उपनाम
1850-1885
काशी
गोपालचन्द
'सितारे हिन्द'
भारतेन्दु
रसा
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की समस्त रचनाओं की संख्या 175 है और उनके काव्य-ग्रन्थों की संख्या 70 है। इनके काव्य संग्रह निम्नांकित हैं-
(1) भक्ति सर्वस्व, (2) प्रेम-मालिका, (3) कार्तिक स्नान, (4) वैशाख माहात्म्य, (5) प्रेम सरोवर, (6) प्रेमाश्नुवर्षण, (7) जैन कुतूहल, (8) प्रेम माधुरी, (9) प्रेमतरंग, (10) उत्तरार्द्ध भक्तमाल, (11) प्रेम प्रलाप, (12) गीत गोविन्दानंद, (13) सतसई श्रृंगार, (14) होली, (15) मध-प्रक्कत्ल (16) राग
संग्रह, (17) वर्षा विनोद, (18) विनय प्रेम पचासा, (19) फूलों का गुच्छा, (20) प्रेम फुलवारी, (21) कृष्णचरित, (22) श्री अलवरत-वर्णन, (23) श्री राजकुमार सुस्वागत-पत्र, (24) सुमनोऽञ्जलिः, (25) श्री जीवनजी महाराज, (26) चतुरंग, (27) देवी छद्म लीला, (28) प्रातः स्मरण मंगलपाठ, (29) दैन्य प्रलाप, (30) उरेहना, (31) तन्मय लीला, (32) दान-लीला, (33) रानी छद्म लीला, (34) संस्कृत लावनी, (35) वसन्त होली, (36) स्फुट समस्याएँ, (37) मुँह दिखावनी, (38) उर्दू का स्यापा, (39) प्रबोधिनी, (40) प्रातः समीरन, (41) बकरी-विलाप, (42) स्वरूप चिन्तन, (43) श्री राजकुमार शुभागमन वर्णन, (44) भारत भिक्षा, (45) श्री पंचमी, (46) श्री सर्वोत्तम स्रोत, (47) निवेदन पंचक, (48) मान सोपायन, (49) प्रातः स्मरण स्तोत्र, (50) हिन्दी की उन्नति पर व्याख्यान, (51) अपवर्गदाष्टक, (52) मनोमुकुल माला, (53) वेणु-गोति, (54) श्रीनाथ स्तुति, (55) मूक प्रश्न, (56) अपवर्ग पंचक, (57) पुरुषोत्तम पंचक (58) भारत वीरत्व, (59) श्री सीतावल्लभ स्तोत्र, (60) श्री रामलीला, (61) भीष्म स्तवराज, (62) मान लीला फूल-बुझौअल, (63) बंदर सभा, (64) विजय वल्लरी, (65) विजयिनी विजय-वैजयन्ती, (66) नये जमाने की मुकरी, (67) जातीय संगीत, (68) रिपुनाष्टक, (69) स्फुट कविताएँ, (70) प्रिंस ऑफ वेल्स के पीड़ित होने पर कविता।
भारतेन्दु कृत 'विजयिनी विजय वैजयंती' शीर्षक कविता मिस्र में भारतीय सेना क विजय प्राप्ति पर लिखी गयी थी।
भारतेन्दु ने 'नारद भक्ति सूत्र' और 'शाण्डिल्य, भक्ति सूत्रों' का अनुवाद क्रमश 'तदीय सर्वस्व (1874 ई०)' और 'भक्ति सूत्र वैजयन्ती' शीर्षक से किया।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 'पैरोडी', 'स्यापा', 'गाली', 'लावनी' आदि शैलीगत रूपों में कविताएँ लिखी हैं, जो निम्नांकित हैं-
कविताएँ
बंदर सभा
उर्दू का स्यापा
समधिन मधुमास
नये जमाने की मुकरी
प्रातः समीरन
वर्षा विनोद
'रानी छद्यलीला', 'तन्मय लीला' और देवी छद्म लीला 'विजयिनी विजय वैजयंती' और 'हिन्दी भाषा'
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 'फूलों का गुच्छा' कविता खड़ी बोली में लिखी है।
कवि
जन्म-मृत्यु (ई०)
शैली / छंद
पैरोडी
स्यापा
गाली
मुकरी
पयार
लावनी
प्रबन्ध गीति
निबन्ध काव्य
भारतेन्दु मण्डल के अन्य कवि कालक्रमानुसार निम्न हैं-
रचनाएँ
बदरीनारायण चौधरी 1855-1923
(1) जीर्ण-जनपद
वस्तुनिष्ठ इतिहास
(दुर्दशा-दत्तापुर),
(2) आनन्द अरुणोदय, (3) हार्दिक हर्षादर्श,
(4) मयंक महिमा, (5) अलौकिक लीला,
(6) वर्षा बिन्दु, (7) लालित्य लहरी,
(8) वृजचन्द पंचक, (१) सूर्यः स्तोत्र।
प्रतापनारायण मिश्र 1856-1894
(1) प्रेम पुष्पावली, (2) मन की लहर,
(3) लोकोक्ति शतक, (4) तुप्यन्ताम्, (5) शृङ्गार विलास, (6) हर गंगा।
ठाकुर जगमोहन सिंह 1857-1899
(1) प्रेम सम्पत्ति लता (1885 ई०), (2) श्यामा लता (1885 ई०), (३) श्यामा सरोजिनी (1886 ई०), (4) देवयानी (1886 ई०)
अम्बिकादत्त व्यास 1858-1900
(1) पावस पचासा (1886 ई०), (2) सुकवि सतसई (1887 ई०), (3) हो हो होरी (1891 ई०)
राधाकृष्णदास 1865-1907 (1) भारत बारहमासा, (2) देश दशा
बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' उर्दू में 'अब्र' नाम से कविताएँ लिखते थे।
प्रेमघन की समस्त काव्य कृतियों का संकलन, 'प्रेमघन-सर्वस्व' शीर्षक से किया गया है।
प्रेमघन ने विलायत में दादा भाई नौरोजी को 'काला' कहे जाने पर क्षोभपूर्ण कविताएँ लिखी थी।
प्रेमघन की कविताओं में यति भंग प्रायः मिलता है। इन्होंने 'मयंक महिमा' की रचना खड़ी बोली में की।
प्रतापनारायण मिश्र की प्रतिनिधि कविताओं को 'प्रताप-लहरी' शीर्षक से संकलित किया गया है।
प्रतापनारायण मिश्र ने 'हरगंगा', 'तृप्यंताम्', 'बुढ़ापा', 'हिन्दी की हिमायत' शीर्षक से महत्वपूर्ण कविताएँ लिखों।
ठाकुर जगमोहन सिंह ने श्रृंगार और प्रकृति-सौन्दर्यपरक कविताओं की रचना की। इन्होंने विंध्य क्षेत्र की प्रकृति का वैविध्यपूर्ण वर्णन किया है।
जगमोहन सिंह ने कालिदास कृत 'ऋतु संहार' और 'मेघदूत' का ब्रज भाषा में अनुवाद किया।
अम्बिकादत्त व्यास ने अपने कवि जीवन का आरम्भ कवितावर्द्धिनी सभा में 'पूरी अमी की कटोरिया-सी, चिरंजीवी रहौ विक्टोरिया रानी' समस्या की पूर्ति करके किया और इस पर उन्हें 'सुकवि' की उपाधि प्राप्त हुई थी।
अम्बिकादत्त व्यास ने खड़ी बोली में' कंस वध' (अपूर्ण) शीर्षक प्रबन्ध-काव्य की आधु
की। साथ ही फारसी छंद में 'दशरथ विलाप' नामक कविता खड़ी बोली में लिखी।
राधाकृष्णदास भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के फुफेरे भाई थे। इन्होंने रहीम के दोहों पर कुण्डलियों, की रचना की।
भारतेन्दु काल के अन्य कवि अग्रांकित हैं-
कवि
रचनाएँ
नवनीत चतुर्वेदी
कुब्जा पच्चीसी
गोविन्द गिल्लाभाई
शृङ्गार सरोजिनी, पावस पयोनिधि, राधामुख
पोडसी, षड्ॠतु, नीति विनोद
दिवाकर भट्ट
नख शिख (1884 ई०), नवोढ़ा रत्न (1888 ई०)
रामकृष्ण वर्मा 'बलवीर'
बलवीर पचासा
राजेश्वरीप्रसाद सिंह 'प्यारे'
प्यारे प्रमोद
रावकृष्णदेव शरण सिंह 'गोप'
प्रेम सन्देसा
दुर्गादत्त व्यास
अधमोद्धार शतक (1872 ई०)
राधाचरण गोस्वामी
नवभक्तमाल
गुलाब सिह
प्रेम सतसई
भारतेन्दुयुगीन प्रमुख समस्यापूर्ति संग्रह और कवि निम्नलिखित हैं-
कवि
समस्यापूर्ति संग्रह
दुर्गादत्त व्यास
समस्यापूर्ति-प्रकाश
अम्बिकादत्त व्यास
समस्यापूर्ति-सर्वस्व
गोविन्द गिल्लाभाई
समस्यापूर्ति-प्रदीप
गंगाधर 'द्विजगंग'
समस्या-प्रकाश
नर्मदेश्वर प्रसाद सिंह
पंचरत्न
भारतेन्दुयुगीन कवियों की महत्त्वपूर्ण काव्य पंक्तियाँ
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द
(1) सहसन बरसन सो सुन्यो जो सपने नहिंकान, सो जय आरज शब्द।
(2) फरकि उठीं सबकी भुजा, खरकि उठी तरवार। क्यों आपुहिं ऊँचे भए आर्य मोछ के बार ॥
(3) हाय! वहै भारत-भुव भारी। सव ही विधि सों भई दुखारी ॥ हाय चित्तौर ! निलज तू भारी। अजहुँ खरो भारतहि मंझारी ॥
(4) निज भाषा उन्नत अहै, सब उन्नति कै मूल। बिन निज भाषा ज्ञान कै मिटै न हिय कै सूल ॥
(5) कहाँ करुणानिधि केशव सोए ? जागत नाहि अनेक जतन करि भारतवासी रोए ॥
(6) मेरे तो साधन एक ही है, जग नन्द लला वृषभानु दुलारी ॥
(7) पिय प्यारे तिहारे निहारे बिना अँखियाँ दुखियाँ नहिं मानती हैं।
(8) सिसुताई अजी न गई तन ते, तऊ जोवन जोति वहोरे लगी।
(9) आजु लौं न मिले तो कहा हम तो तुमरे सब भाँति कहावें। प्यारे जू है जग की यह रीति विदा की समैं सब कण्ठ लगावैं ॥
(10) मुँह जव लाग, तव नहिं छूटे, जाति मान धन सब कुछ लूटे। पागल करि मोहि करे खराव, क्यों सखि सज्जन नहीं सराव ॥
(11) हैं हैं उर्दू हाय हाय! कहाँ सिधारी हाय! हाय !
(12) सभा में दोस्तों बंदर की आमाद है, गधे और फूलों के अफसर की आमाद आमाद है ॥
(13) भीतर-भीतर सब रस चूसे, हँस हँस के तन मन धन मूसै। जाहिर बातन में अति तेज क्यों सखि सज्जन नहि अंगरेज ॥
(14) 'रसा' महवे फसाहत दोस्त क्या दुश्मन भी हैं सारे। जमाने में तेरे तर्जे-सुखन की यादगारी है।
(15) श्री राधा माधव युगल चरण रस का अपने को मस्त बना। पी प्याला भर भरकर कुछ इस मैं का भी देख मजा ॥
(16) रोवहु सब मिलि, आवहु भारत भाई। हा ! हा! भारत दुर्दशा न देखी जाई ॥
(17) रहै क्यों एक म्यान असि दौय। जिन नैनन में हरि-रस छायो तेहि क्यों भावै कोय ॥
(18) सखा प्यारे कृष्ण के गुलाम राधा रानी के।
ख) बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन'
(1) निरधन दिन दिन होत है, भारत भुव सव भाँति। ताहि बचाइ न कोउ सकत निज भुज बुधि वल काँति ॥
(2) अचरज होत तुमहुँ सम गोरे वाजत कारे। तासों कारे 'करि' शब्दहु पर हैं वारे ॥
(3) भयो भूमि भारत में महा भयंकर भारत। भए बीरवल सकल सुभट एकहि सँग गारत ॥
(4) आजु ली रही अनेक भौति धीर धारि कै। पै न भाव मोहिं बैठनो सु मौन मारि कै ॥
(5) वगियान वसन्त बसेरो कियो, बसिए तेहि त्यागि तपाइए ना। दिन काम कुतूहल के जो बने, तिन बीच वियोग बुलाइए ना ॥ 'घन प्रेम' बढ़ाय के प्रेम, अहो! विथा वारि वृथा वरसाइए ना ॥ चित चैत की चाँदनी चाह भरी, चरचा चलिवे की चलाइए ना ॥
(6) धन्यभूमि भारत सव रतननि की उपजावनि।
(ग) प्रतापनारायण मिश्र
(1) चह हु साँचहु निज कल्यान, तौ सब मिलि भारत संतान। जपो निरन्तर एक जवान, हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान।
(2) तबहि लख्याँ जहँ रह्यो एक दिन कंचन वरसत। तहं चौथाई जन रूखी रोटिहुँ को तरसत।
(3) पढ़ि कमाय कोन्हों कहा, हरे देश कलेस। जैसे कंता घर रहे, तैसे रहे विदेश ॥
(4) जग जार्न इंगलिश हमें वाणी वस्त्रहि जोय। मिटै बदन कर श्याम रंग जन्म सुफल तव होय ॥
(5) नौन तेल लकरी घासह पर टिक्स लगे जहं। चना चिरौंजी मोल मिलें जहं दीन प्रजा कहं ॥
(6) अभी देखिए क्या दशा देश की हो। बदलता है रंग आसमां कैसे कैसे !
(7) कौन करे जो नहिं कसकत सुनि विपति बाल विधवन को।
(8) विधवा विलपें नित धेनु कटें कोउ लागत हाय गोहार नहीं ॥
(घ) ठाकुर जगमोहन सिंह
(1) अब यों उर आवत है सजनी, मिलि जाउं गरे लगि कै छतियाँ। मन की करि भांति अनेकन औ मिलि की जियरी रस की बतियाँ ॥ हम हारि अरी करि उपाय, लिखी बहु नेह भरी पतियां। जगमोहन मोहनी मूरति के बिना कैसे कटे दुःख की रतियाँ ॥
(2) पहार अपार कैलास से कोटिन ऊँची शिखा लगि अम्बर चूम। निहारत दीठि भ्रमै पगिया गिरि जात उत्तंगता ऊपर झूम ॥
(3) कुलकानि तजी गुरु लोगन में बसिकै सब वैन कुवैन सहा। सव छोड़ि तुम्हें हम पायो अहो तुम छोड़ि हमें कहो पायो कहा ॥
विविध
सन् 1888 ई० में प्रकाशित 'खड़ीवोली आन्दोलन' पुस्तक से मुजफ्फरपुर निवासी अयोध्या प्रसाद खत्री ने काव्य में खड़ीबोली का सूत्रपात किया।
अयोध्या प्रसाद खत्री कृत 'खड़ीबोली आन्दोलन' में ब्रजभाषा और अवधी की रचनाओं को हिन्दी साहित्य के अन्तर्गत स्थान देने से इन्कार कर दिया गया था।
अयोध्याप्रसाद खत्री ने 'खड़ीबोली का पद्य' (1889 ई०) शीर्षक से एक अन्य रचना में विभिन्न शैलियों में रचित उस समय की खड़ी बोली कविताओं का संकलन किया था।
अयोध्याप्रसाद खत्री ने खड़ीबोली पद्म की पाँच स्टाइलें बताई थीं-जैसे मौलवी स्टाइल, मुंशी स्टाइल, पण्डित स्टाइल, मास्टर स्टाइल।
आधुनिक काल में व्रजभाषा पद्म के लिए संस्कृत वृत्तों का व्यवहार पहले पहल स्वर्गीय पण्डित सरयू प्रसाद मिश्र ने रघुवंश महाकाव्य के अपने 'पद्यबद्ध भाषानुवाद' में किया था।
द्विवेदी युग (जागरण सुधार काल)
वस्तुनिष्ठ इतिहास
डॉ० नगेन्द्र ने द्विवेदी काल को 'जागरण सुधार काल' नाम से अभिहित किया और इसकी समयावधि 1900 से 1918 ई० तक माना।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने द्विवेदी युग को 'नई धारा : द्वितीय उत्थान' के अन्तर्गत रखा है तथा समयावधि सन् 1893 से 1918 ई० तक माना है।
द्विवेदी मण्डल : कालक्रमानुसार कवि विवरण
श्रीधर पाठक (1859-1928 ई०) खड़ीबोली के प्रथम स्वच्छंदतावादी कवि हैं।
श्रीधर पाठक ने ब्रजभाषा में मौलिक काव्य 'कश्मीर सुषमा' की रचना सन् 1904 ई० में की।
श्रीधर पाठक द्वारा अनूदित काव्य ग्रन्थ निम्नांकित है-
अनूदित रचना
अनूदित वर्ष ई०
गडेरिये और दार्शनिक
एकांतवासी योगी
1886
उजड्ग्राम
1889
श्रांत पथिक
1902
मूल रचना
शेफर्ड एण्ड
फिलाशफर
हरमिट
डेजर्टेड विलेज
ट्रैवलर
ऋतुसंहार
ऋतुसंहार
मूल
अनूदित भाषा
रचनाकार
ग्रे
गोल्डस्मिथ
गोल्डस्मिथ
गोल्डस्मिथ
कालिदास
खड़ी बोली
ब्रजभाषा
खड़ी बोली
ब्रज
श्रीधर पाठक की खड़ी बोली में मौलिक कृतियाँ निम्नांकित हैं-
(1) वनाष्टक, (2) देहरादून (1915 ई०), (3) भारतगीत (1928 ई०), (4)
जगत सचाई सार, (5) स्वर्गीय वीणा, (6) धनविजय, (7) सांध्य अटन, (8)
गुनवंत हेमंत (1900 ई०)।
श्रीधर पाठक द्वारा ब्रजभाषा में रचित मौलिक काव्य निम्न हैं-(1) कश्मीर सुषमा (1904 ई०), (2) मनोविनोद (1882 ई०)
श्रीधर पाठक ने 'एकांतवासी योगी' की रचना लावनी या ख्याल शैली में की है तथा 'श्रांत पथिक' की रचना रोला छंद में की है।
श्रीधर पाठक द्वारा खड़ी बोली में रचित प्रथम कविता 'गुनवंत हेमंत' है तथा खड़ी चोली की प्रथम पुस्तक 'एकांतवासी योगी' है।
महावीर प्रसाद द्विवेदी (1864-1938 ई०) का जन्म रायबरेली के दौलतपुर गाँव में हुआ था।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है, "हम पं० महावीर प्रसाद द्विवेदी को पद्म रचना की एक प्रणाली के प्रवर्तक के रूप में पाते हैं।"
महावीर प्रसाद द्विवेदी ने गद्य और पद्य दोनों के लिए खड़ी बोली में सामान्य बोलचाल की भाषा को प्राथमिकता देने की वकालत की।
। महावीर प्रसाद द्विवेदी के अनूदित व मौलिक लगभग 80 ग्रन्थ हैं। इनके प्रमुख काव्य-संग्रह निम्नांकित हैं- (1) काव्य मंजूषा, (2) सुमन (1923 ई०), (3) कान्य कुब्ज-अबला-विलाप, (4) देवी स्तुति शतक, (5) कान्यकुब्जावलीव्रतम् ।
महावीर प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है, "कविता का विषय मनोरंजन एवं उपदेशजनक होना चाहिए। यमुना के किनारे केलि कौतूहल का अद्भुत वर्णन बहुत हो चुका। न परकीयाओं पर प्रबन्ध लिखने की अब कोई आवश्यकता है और न स्वकीयाओं के 'गतागत' की पहेली बुझाने की। चींटी से लेकर हाथीपर्यन्त, भिक्षुक से लेकर राजापर्यन्त मनुष्य, बिन्दु से लेकर समुद्र पर्यन्त जल, अनन्त आकाश, अनन्त पृथ्वी, अनन्त पर्वत- सभी पर कविता हो सकती है।"
महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित अनूदित काव्य निम्न हैं-
अनुवाद
आधार ग्रन्थ
विनय शतक भर्तृहरि
भर्तृहरि के वैराग्यशतक का दोहों में अनुवाद
विहार-वाटिका
जयदेव के गीतगोविन्द का संक्षिप्त अनुवाद
स्नेह माला
भर्तृहरि के श्रृंगार शतक का दोहों में अनुवाद
गंगा लहरी
पण्डित राज जगन्नाथ की गंगा लहरी का सवैया में अनुवाद
ऋतु तरंगिणी
कालिदास के ऋतुसंहार का छायानुवाद
महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रसिद्ध कविता 'सरगौ नरक ठेकाना नाहि' है।
अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' (1865-1947 ई०) को डॉ० गणपतिचन्द्र गुप्त ने आधुनिक काल का सूरदास कहा है।
हरिऔध ने तीन प्रबन्ध काव्य लिखे जो निम्न हैं-
प्रबन्धकाव्य
वर्ष ई०
सर्ग
विषय
प्रिय प्रवास
1914
17 कृष्ण के बचपन से लेकर मथुरा प्रस्थान तक का वर्णन
पारिजात
1937
15
आध्यात्मिक एवं धार्मिक विषयों का वर्णन
वैदेही वनवास
1941
18
इसमें राम के द्वारा सीता के निर्वासन की कथा है।
'प्रिय प्रवास' को खड़ी बोली हिन्दी का प्रथम महाकाव्य माना जाता है। 'प्रिय प्रवास' का सर्वप्रथम नाम 'ब्रजांगना विलाप' था। यह सम्पूर्ण काव्य संस्कृत के वर्णवृत्तों पर आधारित है।
हरिऔध के अन्य प्रमुख काव्य ग्रन्थ निम्नांकित हैं-
(1) कृष्णशतक (1882 ई०), (2) रसिक रहस्य (1899 ई०), (3) प्रेमांबुवारिधि (1900 ई०), (4) प्रेम प्रपंच (1900 ई०), (5) प्रेमांवु प्रश्रवण (1901 ई०), (6) प्रेमांबु प्रवाह (1901 ई०), (7) चोखे चौपदे (1932 ई०), (8) चुभते चौपदे (1924 ई०), (9) पद्म प्रसून (1925 ई०), (10) बोलचाल (1928 ई०), (11) रस कलस (1931 ई०), (12) फूल पत्ते (1935 ई०) (13) कल्पलता (1937 ई०), (14) ग्रामगीत (1938 ई०), (15) हरिऔध सतसई (1940 ई०), (16) मर्म
स्पर्श (1956 ई०)।
हरिऔध द्वारा ब्रजभाषा में रचित 'रसकलश' (1931 ई०) एक रीति ग्रन्थ है।
तहास हरिऔध कृत 'चुभते चौपदे', 'चोखे चौप्रदे' और 'बोलचाल' मुहावरेदार भाषा में लिखा गया है।
हरिऔध को 'कवि सम्म्राट' तथा 'प्रिय प्रवास' पर इन्हें मंगला प्रसाद पारितोषिक प्रदान किया गया था।
रामचरित उपाध्याय (1872-1938 ई०) द्विवेदी युग के प्रमुख सूक्तिकार के रूप में प्रसिद्ध हैं।
रामचरित उपाध्याय के प्रमुख काव्य निम्नांकित हैं- (1) रामचरित चिन्तामणि (1920 ई०, प्रबन्ध काव्य), (2) राष्ट्रभारती, (3) देवदूत, (4) देवसभा, (5) विचित्र विवाह, (6) भारत भक्ति, (7) देवी द्रौपदी, (8) सूक्ति मुक्तावली।
मैथिलीशरण गुप्त (1886-1964 ई०) को आधुनिक युग का तुलसी स्वीकार किया जाता है।
मैथिलीशरण गुप्त का संक्षिप्त जीवनवृत्त निम्नांकित है-
जन्मस्थान
पिता
गुरु
प्रथम कविता
प्रथम काव्य संग्रह
चिरगाँव (झाँसी)
रामशरण दास
महावीरप्रसाद द्विवेदी
हेमन्त
रंग में भंग
मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित प्रमुख काव्य ग्रन्थ निम्नांकि हैं-
(1905 ई०) (1909 ई०)
(1) रंग में भंग (1909 ई०), (2) जयद्रथ वध (1910 ई०), (3) किसान (1917 ई०), (4) विकट भट (1929 ई०), (5) गुरुकुल (1929 ई०), (7) साकेत (1931 ई०), (7) भारत-भारती (1912 ई०), (8) झंकार (1929 ई०), (9) यशोधरा (1932 ई०), (10) द्वापर (1936 ई०), (11) जय भारत (1952) ई०), (12) विष्णु प्रिया (1957 ई०), (13) सिद्धराज (1936 ई०), (14) हिन्दू (1927 ई०), (15) वैतालिक, (17) पंचवटी (1925 ई०)।
हिन्दी साहित्य में 'रामचरितमानस' के बाद रामकाव्य का दूसरा स्तम्भ मैथिलीशरण गुप्त कृत 'साकेत' है।
मैथिलीशरण गुप्त को 'साकेत' रचना की मूल प्रेरणा सन् 1908 ई० में सरस्वती पत्रिका में महावीरप्रसाद द्विवेदी के लेख 'कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता' से मिली। यह लेख महावीरप्रसाद द्विवेदी ने अपने छद्म नाम 'भुजंग भूषण भट्टाचार्थ' नाम से प्रकाशित कराया।
'साकेत' शब्द मूलतः पालि भाषा का शब्द है जिसका अर्थ अयोध्या है। इसमें 12 सर्ग है। इसे डॉ० नगेन्द्र ने 'जनवादी काव्य' कहा है।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने गुप्तजी को 'सामंजस्यवादी कवि' कहा है।
मैथिलीशरण गुप्त को 'भारत-भारती' रचना की मूल प्रेरणा 'मुसद्दसे हाली' तथा ब्रजमोहन दत्तात्रेय कैफी कृत 'भारत दर्पण' पुस्तक से प्राप्त हुई।
मैथिलीशरण गुप्त ने स्वयं को 'कौटुंबिक कविमात्र' कहा है। इन्हें 'भारत भारती' लिखने पर महात्मा गाँधी ने राष्ट्रकवि को उपाधि दी।
मैथिलीशरण गुप्त द्वारा अनूदित काव्य निम्नांकित हैं-
(1) प्लासी का युद्ध;
(2) मेघनाथ वध,
(3) वृत्र संहार।
मैथिलीशरण गुप्त ने बांग्ला कवि माइकेल मधुसूदन दत्त की रचनाओं का 'मधुप' उपनाम से अनुवाद किया।
गुप्तजी ने मार्क्स की पुत्री 'जैनी' पर 'जयिनी' नामक काव्य लिखा है।
गुप्तजी को द्विवेदी काल में 'हरिगीतिका' छंद का बादशाह कहा जाता है।
द्विवेदी मंडल के अन्य कवि निम्न हैं-
कवि
जन्म-मृत्यु
जन्म स्थान
रचनाएँ
(ई०)
गिरिधर शर्मा 'नवरत्न' 1881-1961
झालरापाटन
(1) मातृवंदना (मौलिक कृति)
लोचन प्रसाद पाण्डेय 1886-1959
बालापुर (न (म०प्र०)
(1) प्रवासो, (2) मेवाड़ गाथा, (3) महानदी, (4) पद्म पुष्पांजलि, (5) मृगी दुःखमोचन ।
गिरिधर शर्मा ने गोल्डस्मिथ कृत 'हरमिट' का संस्कृत श्लोकों में अनुवाद किया।
सन् 1928 ई० में गिरिधर शर्मा ने माघ के 'शिशुपाल वध' के दो सगर्गों का 'हिन्दी माघ' नाम से अनुवाद किया।
लोचन प्रसाद पाण्डेय ने चित्तौड़ के भीमसेन के अपूर्व स्वत्व त्याग की कथा नंददास की रासपंचाध्यायी के ढंग पर लिखी है।
लोचन प्रसाद पाण्डेय कृत 'मृगीदुःखमोचन' में इनकी पशुओं तक पहुँचने वाली व्यापक और सर्वभूत दयापूर्ण काव्यदृष्टि का पता चलता है।
लीचन प्रसाद पाण्डेय को 'काव्य विनोद' तथा 'साहित्य-वाचस्पति' की उपाधि प्राप्त थी।
द्विवेदी मण्डल के बाहर के कवि कालक्रमानुसार
द्विवेदी मण्डल से बाहर के कवियों का विवरण निम्नांकित हैं-
कवि
जन्म-मृत्यु
जन्मस्थान
(ई०)
रचनाएँ
नाथूराम शर्मा' शंकर' 1859-1932 अलीगढ़
(1) अनुरागरत्न, (2) शंकर सरोज, (3) शंकर सर्वस्व (1951
बालमुकुन्द गुप्त लाला भगवानदीन
1865-1907 रोहतक
ई०), (4) गर्भरण्डा रहस्य।
1866-1930 फतेहपुर
(1) स्फुट कविता (1905 ई०)
(1) वीर क्षत्राणि, (2) वीर बालक (3) वौर पंचरत्न, (4) नवीन बीन।
राय देवीप्रसाद' पूर्ण'
1868-1915 जबलपुर
(1) धाराधर धावन (1902 ई०)
(2) स्वदेशी कुंडल (1910)
सैयद अमीर अली 'मीर' 1873-1937 सागर
कामता प्रसाद गुरु 1875-1947 सागर
गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' 1883-1972 उन्नाव
रूपनारायण पाण्डेय 1884 लखनऊ
रामनरेश त्रिपाठी
1889-1962 जौनपुर
ठाकुर गोपाल शरण सिंह 1891-1960 रीवा
मुकुटधर पाण्डेय
1895-1984 बालापुर
नाथूराम शर्मा समस्यापूर्ति और अतिशयोक्तिपूर्ण कविता करने में प्रवीण थे।
नाथूराम शमां 'शंकर' को 'कविता-कामिनी-कान्त', 'भारतेन्दु प्रज्ञा', 'साहित्य सुधाकर' आदि उपाधियाँ प्राप्त थीं।
नाथूराम शर्मा 'शंकर' कृत 'गर्भरण्डारहस्य' एक प्रबन्ध काव्य है जिसमें विधवाओं की बुरी स्थिति और देव मन्दिरों के अनाचार का वर्णन किया गया है।
रायदेवी प्रसाद 'पूर्ण' ने सन् 1902 ई० में कालिदास के 'मेघदूत' का ब्रजभाषा में 'धाराधर धावन' शीर्षक से अनुवाद किया।
राय देवी प्रसाद 'पूर्ण' की खड़ी बोली में रचित कविताएँ निम्न हैं- (1) अमलतास, (2) वसंत वियोग, (3) स्वदेशी कुण्डल, (4) नये सन् का स्वागत, (5) नवीन संवत्सर का स्वागत।
कामता प्रसाद गुरु के प्रसिद्धि का मूलाधार उनका 'हिन्दी व्याकरण' है। इन्हें हिन्दी भाषा का पाणिनी भी कहा जाता है।
कामता प्रसाद गुरु का 'भौमासुर वध' और 'विनय पचासा' ब्रजभाषा में है तथा 'पद्य पुष्पावली' खड़ी बोली में है।
ई०), (3) मृत्युंजय (1904 ई०), (4) राम-रावण विरोध (1906 ई०), (5) वसंत वियोग (1912 ई०), (6) पूर्ण संग्रह।
(1) उलाहना पंचक, (2) अन्योक्तिशतक।
(1) भौमासुर वध, (2) विनय पचासा, (3) पद्य पुष्पावली, (4) शिवाजी, (5) दासी रानी।
(1) कृषक क्रंदन, (2) प्रेम पचीसी, (3) राष्ट्रीय वीणा, (4) त्रिशूल तरंग, (5) करुणा कादम्बिनी।
(1) पराग (1924 ई०), (2) वन-वैभव ।
(1) मिलन (1917 ई०), (2) पथिक (1920 ई०), (3) मानसी (1927 ई०), (4) स्वप्न (1929 ई०), (5) कविता-कौमुदी।
(1) माधवी, (2) मानवी, (3) संचिता, (4) ज्योतिष्मती ।
(1) आँसू, (2) उद्गार, (3) (म०प्र०) पूजा फूल, (4) कानन कुसुम ।
गया प्रसाद शुक्ल श्रृंगारिक कविताएँ 'सुनेही' उपनाम से लिखते थे तथा राष्ट्रीय भावनाओं की कविताएँ 'त्रिशूल' उपनाम से लिखते थे।
गया प्रसाद शुक्ल 'सनेही' खड़ी बोली में कवित्त और सवैया छंदों का प्रयोग करने में प्रवीण थे।
रामनरेश त्रिपाठी स्वच्छन्दतावाद के दूसरे प्रसिद्ध कवि हैं।
रामनरेश त्रिपाठी ने 'मिलन', 'पथिक' और 'स्वप्न' शीर्षक से तीन काल्पनिक खण्डकाव्य लिखा।
रामनरेश त्रिपाठी कृत 'मानसी' इनकी फुटकर कविताओं का संग्रह है।
रामनरेश त्रिपाठी ने 'कविता कौमुदी' शीर्षक से आठ भागों में ग्राम-गीतों, उर्दू, बांग्ला एवं संस्कृत की कविताओं का संकलन एवं सम्पादन किया।
मुकुटधर पाण्डेय को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने छायावाद का प्रवर्तक स्वीकार किया है।
मुकटधर पाण्डेय लोचन प्रसाद पाण्डेय के अनुज थे। इन्हें पाण्डे बन्धु भी कहा जाता है।
मैथिलीशरण गुप्त और मुकुटधर पाण्डेय द्विवेदी युग के प्रसिद्ध प्रगीतकार माने जाते हैं।
द्विवेदी काल : ब्रजभाषा काव्य काल क्रमानुसार
जगनाथदास 'रत्नाकर' का संक्षिप्त जीवनवृत्त निम्न है-
मूलनाम
जन्म-मृत्यु (३०)
पिता
गुरु
उपनाम
जगन्नाथदास
1866-1932
पुरुषोत्तमदास
नवनीतलाल चतुर्वेदी
रत्नाकर
रत्नाकर उर्दू में 'जुकी' उपनाम से कविता करते थे।
रत्नाकर की प्रमुख काव्य कतियाँ निम्नांकित हैं-
(1) गंगावतरण (1927 ई०), (2) उद्धवशतक (1929 ई०), (3) हरिश्चन्द्र, (4) हिंडोला (1894 ई०), (5) श्रृंगार लहरी, (6) कलकाशी, (7) वीराष्टक।
रलाकर ने अंग्रेजी विद्वान पोप के 'एसे ऑन क्रिटिसिज्म' का रोला छंद में 'समालोचनादर्श' शीर्षक से अनुवाद किया।
सत्यनारायण 'कविरत्न' (1880-1918 ई०) की समस्त रचनाओं का संकलन बनारसीदास चुर्वेदी ने 'हृदय तरंग' शीर्षक से प्रकाशित कराया।
'कविरत्न' की प्रसिद्ध रचनाएँ हैं- (1) भ्रमरदूत, (2) प्रेमकली।
कविरत्न ने भवभूति के 'उत्तररामचरितम्' और 'मालतीमाधव' तथा लार्ड मैकाले के अंग्रेजी खण्डकाव्य 'होरेशस' का ब्रजभाषा में अनुवाद किया।
द्विवेदीयुगीन महत्त्वपूर्ण कवि एवं उनके महाकाव्य
कवि
द्वारका प्रसाद मिश्र
बलदेव प्रसाद मिश्र
उदयशंकर भट्ट
प्रताप नारायण पुरोहित
महाकाव्य
कृष्णायन (1943 ई०)
साकेत संत (1946 ई०)
तक्षशिला (1931 ई०)
नल नरेश (1933 ई०)
गुरु भक्त सिंह
(1) नूरजहाँ (1935 ई०), (2) विक्रमादित्य (1947 ई०)
अनूप शर्मा
(1) सिद्धार्थ (1937 ई०), (2) शर्वाणी (1948 ई०),
(3) वर्द्धमान (1951 ई०)
श्यामनारायण पाण्डेय
(1) हल्दीघाटी, (2) जौहर (1945 ई०)
मोहनलाल महतो
आर्यावर्त (1943 ई०)
हरदयालु सिंह
(1) दैत्यवंश (1940 ई०), (2) रावण (1952 ई०)
द्विवेदीयुगीन कवियों की महत्वपूर्ण काव्य पंक्तियाँ
(क) श्रीधर पाठक
(1) निज भाषा बोलहु लिखहु पढ़हु गुनहु सब लोग। करहु सकल विषयन विषै निज भाषा उपजोग ॥
(2) वंदनीय वह देश जहाँ के देशी निज अभिमानी हों। वन्धवता में बँधे परस्पर परता के अज्ञानी हो ॥
(3) जगत है सच्चा, तनिक न कच्चा समझो बच्चा इसका भेद।
(4) प्रकृति यहाँ एकान्त बैठि निज रूप सँवारति। पल-पल पलटति भेस छनिक छवि छिन छिन धारति ॥
(5) लिखो न करो लेखनी बंद। श्रीधर सम सब कवि स्वच्छन्द ।
(6) नाना कृपान निज पानि लिए, वपु नील वसन परिधान किए। गंभीर घोर अभिमान हिए, छकि पारिजात मधुपान किए।
(7) विजन वन प्रान्त था; प्रकृतिमुख शान्त था; अटन का समय था, रजनि का उदय था।
(8) कहीं पै स्वर्गीय कोई बाला सुमंजु वीणा बजा रही है। सुरों के संगीत की सी कैसी सुरीली गुंजार आ रही है।
(9) इस भारत में बन पावन तू ही तपस्वियों का तप-आश्रम था जग तत्त्व की खोज में लग्न जहाँ ऋषियों ने अभग्न किया श्रम था।
(ख) महावीर प्रसाद द्विवेदी
(1) सुरम्यरूपे, रसराशि-रंजिते, विचित्र वर्णाभरणे ! कहाँ गई ?
अलौकिकानन्द विधायनी महा
कवीन्द्रकांते, कविते! अहो कहाँ ?
मांगल्य मूलमय वारिद-वारि-वृष्टि ॥
(2) तुम्हीं अन्नदाता भारत के सचमुच बैलराज। महाराज ! बिना तुम्हारे हो जातें हम दाना-दाना को मोहताज ॥
(3) श्रीयुक्त नागरि विहारि दशा तिहारी। होवै विषाद मन मांहि अतीव भारी ॥
(4) भैंसि भवानी के तब सेवा लागे करन पढ़व गा छूटि। बटुवन दूध दुहा इन हाथन धार न कबहुँ दुहत माँ टूटि ॥
(5) सारी प्रजा निपढ़ दीन दुःखी जहाँ है, कर्त्तव्य क्या न कुछ भी तुझको वहा है ?
(ग) अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'
(1) दिवस का अवसान समीप था। गगन था कुछ लोहित हो चला ॥ तरु-शिखा पर थी अब राजती। कमलिनी कुल-वल्लभ की प्रभा ॥
(2) प्रिय पति, वह मेरा प्राण प्यारा कहा है? दुःख जलनिधि डूबी का सहारा कहाँ है ?
लख मुख जिसका मैं आज लौ जी सकी हूँ। वह हृदय हमारा नैन तारा कहाँ है।
(3) रूपोद्यान प्रफुल्लप्राय कलिका राकेंदुविचानना। तन्वंगी कलहासिनी सुरसिका क्रीड़ाकलापुत्तली।
(4) शोभा वारिधि की अमूल्य मणि सी लावण्यलीला मयी। श्री राधामृदुभाषिणी मृगदृगी माधुर्यसन्मूर्ति थी ॥
(5) धीरे-धीरे दिन गत हुआ पद्मिनीनाथ डूबे। आई दोषा फिर गत हुई, दूसरा वार आया ॥
(6) क्यों पले पीर कर किसी को तू? है बहुत पालिसी बुरी तेरी हम रहे चाहते पटाना ही पेट तुझसे पटी नहीं मेरी ॥
(7) चार डग हमने भरे तो क्या किया। है पड़ा मैदान कोसों का अभी ॥
(घ) मैथिलीशरणगुप्त (भारत भारती से)
(1) भू-लोक का गौरव प्रकृति का पुण्य लीला-स्थल कहाँ ? फैला मनोहर गिरि हिमालय और गंगाजल जहाँ। सम्पूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है ? उसका कि जो ऋषिभूमि है, वह कौन? भारतवर्ष है ॥
(2) हम कौन थे, क्या हो गये और क्या होंगे अभी। आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएँ सभी ॥
(3) केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए ॥
(4) क्षत्रिय ! सुनो अब तो कुयश की कालिमा को मेट दो। निज देश को जीवन सहित तन मन और धन भेंट दो। वैश्यो ! सुनो व्यापार सारा मिट चुका है देश का। सब धन विदेशी हर रहे हैं, पार है क्या क्लेश का ॥ साकेत से-
(5) राम, तुम मानव हो ? ईश्वर नहीं हो क्या ? विश्व में रमे हुए नहीं सभी कहीं हो क्या ?
तब मैं निरीश्वर हूँ, ईश्वर क्षमा करे, तुम न रमो तो मन तुममें रमा करे ॥
(6) भव में नव वैभव व्याप्त कराने आया, नर को ईश्वरता प्राप्त कराने आया। संदेश यहाँ मैं नहीं स्वर्ग का लाया, इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया ॥
(7) पहले आँखों में थे, मानस में कूद मग्न प्रिय अब थे। छींटे वही उड़े थे, बड़े-बड़े अश्रु वे कब थे ?
(8) सखि ! नील नभस्सर से उतरा यह हंस अहा! तरता तरता। अब तारक-मौक्तिक शेष नहीं, निकला जिनको चरता चरता।
(9) घटना हो चाहे घटा, उठ नीचे से नित्य। आती है ऊपर, सखी! छा कर चंद्रादित्य ॥
(10) वेदने ! तू भी भली बनी। पाई मैंने आज तुझी में अपनी चाह धनी ॥
(11) हा! मेरे कुंजों का कूजन रोकर, निराश होकर सोया। वह चन्द्रोदय उसका उड़ा रहा है धवल वसन-सा धोया ॥
(12) मेरे चपल यौवन-बाल ! अचल अंचल में पड़ा सो, मचल कर मत साल ॥
(13) सखि, निरख नदी की धारा। ढलमल ढलमल चंचल अंचल, झलमल झलमल तारा।
(14) ओ मेरे मानस के हास। खिलस सहस्रदल, सरस सुवास ॥
(15) सजनि, रोता है मेरा गान। प्रिय तक नहीं पहुँच पाती है उसकी कोई तान।
(16) बस इसी प्रिय-काननकुंज में, मिलन भाषण के स्मृतिपुंज में-अभय छोड़ मुझे तुम दीजियो, हासन रोदन से न पसीजियो। यशोधरा से-
(17) सखि वे मुझसे कहकर जाते।
(18) अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी।
पंचवटी से-
चारु चंद्र की चंचल किरणें खेल रही हैं जल थल में। स्वच्छ चाँदनी छिटक रही है अवनि और अम्बर तल में ॥
(ङ) नाथू राम शर्मा 'शंकर'
(1) देशभक्त वीरों, मरने से नेक नहीं डरना होगा। प्राणों का बलिदान देश की वेदी पर करना होगा।
(2) छड़ी धार छैल छबीले बनो, रंगीले, रसीले, फबीले बनो। न चूको भले भोग भोगी बनो, किसी बेड़नी के वियोगी बनो।
(3) भड़क भुला दो भूतकाल की सजिये वर्तमान के साज। फैसन फेर इंडिया भर के गोरे गॉड बनो ब्रजराज ॥
(4) शंकर नदी नद नदी सन के नीरन की, भाप बन अंबर ते ऊँची चढ़ जाएगी।
(च) रामनरेश त्रिपाठी
(1) गंध-विहीन फूल हैं जैसे चंद्र चंद्रिका-हीन। यों ही फीका है मनुष्य का जीवन प्रेम-विहीन ॥
(2) प्रेम स्वर्ग है, स्वर्ग-प्रेम है, प्रेम अशंक अशोक । ईश्वर का प्रतिबिम्ब प्रेम है, प्रेम हृदय आलोक ॥
(3) सच्चा प्रेम वही है जिसकी तृप्ति आत्म-बलि पर हो निर्भर। त्याग बिना निष्प्राण प्रेम है करो प्रेम पर प्राण निछावर ॥
(4) देश-प्रेम वह पुण्य-क्षेत्र है, अमल असीम त्याग से विलसित। आत्मा के विकास से जिसमें, मनुष्यता होती है विकसित ॥
(5) पराधीन रह कर अपना सुख शोक न कह सकता है। वह अपमान जगत में केवल पशु ही सह सकता है।
(छ) जगन्नाथदास 'रत्नाकर'
(1) नंद औ जसोमति के प्रेम-पगे पालन की, लाड़ भरे लालन की लालच लगावती।
(2) रूप रस पीवत अघात ना हुते जो तब सोइ अब आँसू है उबरि गिरिबौ करै ॥
(3) भेजे मन-भावन के उधव के आवन की, सुधि ब्रज-गावनि में पावन जबै लगीं।
(4) दीन दसा देखि ब्रज-बालनि की उधव की, गरिगो गुमान ग्यान गौरव गुठाने-से।
(5) कान्ह-दूत के धाँ ब्रह्म-दूत है पधारे आप। धारे प्रन फेरन कौ मति ब्रजबारी की ॥
(ज) सत्यनारायण 'कविरत्न'
(1) अलबेली कहु बेलि द्रुमन सों लिपटि सुहाई। धोए धोए पातन की अनुपम कमनाई ॥
(2) लखि वह सुषमा जाल लाल निज बिन नंदरानी। हरि सुधि उमड़ी घुमड़ी तन उर अति अकुलानी ॥
(3) कौने भेजों दूत, पूत सों बिथा सुनावे। बातन में बहराइ जाइ ताको यहँ लावै ॥
(4) नित नव परत अकाल, काल को चलत चक्र चहु। जीवन को आनंद न देख्यों जात यहाँ कहु ॥
(5) जे तजि मातृभूमि सों ममता होत प्रवासी। तिन्हें विदेसी तंग करत दै बिपदा खासी ॥
(6) पढ़ी न अच्छर एक, ग्यान सपनें ना पायौ। दूध दही चाटन में, सबरो जन्म गमायौ ॥
(7) नारी सिच्छा निरादरत जे लोग अनारी। ते स्वदेस-अवनति प्रचंड पातक अधिकारी ॥
छायावाद (सन् 1918 से 1936 ई०)
हिन्दी में सर्वप्रथम पं० मुकुटधर पाण्डेय ने जबलपुर से प्रकाशित पत्रिका में सन् 1920 ई० में 'हिन्दी में छायावाद' शीर्षक से चार किस्तों में एक लेख प्रकाशित करवाया।
मुकुटधर पाण्डेय को लिखित रूप में 'छायावाद' शब्द का प्रथम प्रयोक्ता स्वीकार किया जाता है।
सन् 1920 ई० में सुशील कुमार ने 'सरस्वती' में 'हिन्दी में छायावाद' शीर्षक से एक संवादात्मक लेख प्रकाशित करवाया। इस संवाद में चार लोगों ने भाग लिया है- (1) सुशीला देवी, (2) हरिकिशोर बाबू, (3) चित्रकार रामनरेश जोशी तथा
(4) सुमित्रानन्दन पंत ।
छायावाद की विभित्र परिभाषाएँ इस प्रकार हैं-
(1) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल- छायावाद शब्द का प्रयोग दो अर्थों में समझना चाहिए एक तो रहस्यवाद के अर्थ में, जहाँ इसका सम्बन्ध काव्यवस्तु से है, अर्थात् जहाँ कवि उस अनन्त और अज्ञात प्रियतम को आलम्बन बनाकर अत्यन्त चित्रमयी भाषा में प्रेम की अनेक प्रकार से व्यंजना करता है।... छायावाद शब्द का दूसरा प्रयोग काव्य शैली या पद्धति विशेष के व्यापक अर्थ में है।
(2) नंददुलारे वाजपेयी - मानव अथवा प्रकृति के सूक्ष्म, किन्तु व्यक्त सौन्दर्य में आध्यात्मिक छाया का भान मेरे विचार से छायावाद की सर्वमान्य व्याख्या हो सकती है।
(3) जयशंकर प्रसाद - जब वेदना के आधार पर स्वानुभूतिमयी अभिव्यक्ति होने लगी तब हिन्दी में उसे छायावाद के नाम से अभिहित किया गया। ध्वन्यात्मकता, लाक्षणिकता, सौन्दर्यमय प्रतीक विधान तथा उपचार-वक्रता के साथ स्वानुभूति की विवृति छायावाद की विशेषताएँ हैं।
(4) महादेवी वर्मा - छायावाद तत्त्वतः प्रकृति के बीच जीवन का उद्गीथ है L.. उसका मूल दर्शन सर्वात्मवाद है।
(5) डॉ० नगेन्द्र-छायावाद स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह है। वह एक विशेष प्रकार की भाव पद्धति है और जीवन के प्रति विशेष प्रकार का भावनात्मक दृष्टिकोण।
(6) डॉ० रामविलास शर्मा - छायावाद स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह नहीं रहा है, वरन् थोथी नैतिकता, रूढ़िवाद और सामन्ती साम्राज्यवादी बंधनों के प्रति विद्रोह रहा है। परन्तु यह विद्रोह मध्यवर्ग के तत्वावधान से हुआ था। इसलिए उसके साथ मध्यवर्गीय असंगति, पराजय और पलायन की भावना भी जुडी हुई है।
(7) डॉ० नामवर सिंह- छायावाद उस राष्ट्रीय जागरण की अभिव्यक्ति है, जो एक ओर पुरानी रूढ़ियों से मुक्ति चाहता था और दूसरी ओर विदेशी पराधीनता से।
(8) डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी- वह (छायावाद) मूलतः शक्ति काव्य है, पुनर्जागरण चेतना का व्यापक और सूक्ष्म रूप है और अपनी अर्थ-प्रक्रिया में मानव व्यक्तित्व को गहरे स्तरों पर समृद्ध करता है।
छायावाद के प्रवर्तक और प्रस्तोता निम्नलिखित हैं-
प्रस्तोता
प्रवर्तक
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
मैथिलीशरण गुप्त और मुकुटधर पाण्डेय
आचार्य नंददुलारे वाजपेयी
सुमित्रानन्दन पंत
प्रभाकर माचवे
माखनलाल चतुर्वेदी
इलांचन्द्र जोशी व अन्य विद्वान
जयशंकर प्रसाद
छायावादी कवि
छायावाद के कवि चतुष्टय में जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' तथा महादेवी वर्मा आती हैं।
छायावाद के बृहत्त्रयी तथा ब्रह्मा, विष्णु, महेश निम्न हैं-
ब्रह्मा
जयशंकर प्रसाद
विष्णु
सुमित्रानंदन पंत
महेश
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
छायावाद की लघुत्रयी में महादेवी वर्मा, रामकुमार वर्मा और भगवती चरण वर्मा, आते हैं।
जयशंकर प्रसाद का संक्षिप्त जीवन-वृत्त निम्नांकित है-
जन्म-मृत्यु (ई०)
माता-पिता
गुरु
बाल्यनाम/उपनाम
1889-1937
देवीप्रसाद-मुन्नीदेवी
मोहिनीलाल
झारखंडी/कलाधर
जयशंकर प्रसाद की महत्वपूर्ण काव्य कृतियाँ निम्नांकित हैं-(1) उर्वशी (1909 ई०), (2) वन मिलन (1909 ई०), (3) प्रेमराज्य (1909 ई०), (4) अयोध्या का उद्धार (1910 ई०), (5) शोकोच्छ्वास (1910 ई०), (6) वध्रुवाहन (1911 ई०), (7) कानन कुसुम (1913 ई०), (8) प्रेम पथिक (1914 ई०), (9) महाराणा का महत्व (1914 ई०), (10) चित्राधार (1918 ई०), (11) झरना (1918 ई०), (12) आँसू (1925 ई०), (13) लहर (1933 ई०), (14) कामायनी (1935 ई०)
जयशंकर प्रसाद की प्रथम कविता 'सावन-पंचक' सन् 1906 ई० में 'भारतेन्दु पत्रिका में कलाधर उपनाम से प्रकाशित हुई।
जयशंकर प्रसाद की प्रथम छायावादी कविता 'प्रथम प्रभात' सन् 1918 ई० में प्रकाशित हुई जो झरना में संकलित है।
जयशंकर प्रसाद की प्रथम पुस्तकाकार रचना 'उर्वशी' है। यह चंपूकाव्य है।
खड़ी बोली में जयशंकर प्रसाद का प्रथम काव्य संग्रह 'कानन-कुसुम' है।
भाषाका वस्तुनिष्ठ इतिहास
जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित 'झरना' को छायावाद की प्रथम रचना स्वीकार किया जाता है। इसको 'छायावाद की प्रथम प्रयोगशाला' भी कहा जाता है।
'आँसू' 133 छन्दों का विरह प्रधान स्मृति काव्य है। इसे जयशंकर प्रसाद कृत 'आँसू' 'हिन्दी का मेघदूत 'कहा जाता है।
जयशंकर प्रसाद कृत 'चित्राधार' में इनकी बृज में रचित कविताएँ संकलित हैं।
प्रसाद कृत 'प्रेम पथिक' प्रथमतः ब्रजभाषा में सन् 1909 में लिखा गया था जिसका इन्होंने खड़ी बोली में अनुवाद सन् 1914 में किया।
जयशंकर प्रसाद कृत 'कामायनी' महाकाव्य का संक्षिप्त विवरण निम्न है-
सर्ग
अंगीरस
दर्शन
मुख्य पात्र
मुख्य छंद
15 सर्ग
शांत (निर्वेद) रस
समरसतावाद-आनंदवाद
मनु, श्रद्धा, इड़ा, कुमार
ताटंक छंद
कामायनी के सर्ग (1) चिन्ता, (2) आशा, (3) श्रद्धा, (4) काम, (5) वासना, (6) लज्जा, (7) कर्म, (8) ईर्ष्या, (9) इडा (10) स्वप्न, (11) संघर्ष, (12) निर्वेद, (13) दर्शन, (14) रहस्य, (15) आनन्द
प्रतीक
पात्र
मन
मनु
हृदय
श्रद्धा
कामायनी के पात्र
बुद्धि
इड़ा
मानव
कुमार
आचार्य शांतिप्रिय द्विवेदी ने 'कामायनी' को छायावाद का उपनिषद कहा है।
जयशंकर प्रसाद को प्रेम और सौन्दर्य का कवि माना जाता है।
महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला का संक्षिप्त जीवनवृत्त निम्न है-
जन्म-मृत्यु (ई०)
जन्मस्थान
मृत्यु स्थान
पिता
पत्नी
पुत्री
1899-1961
महिषादल (मेदनीपुर)
इलाहाबाद
रामसहाय त्रिपाठी
मनोहरा देवी
सरोज
निराला की महत्वपूर्ण काव्य कृतियाँ निम्नांकित हैं-
(1) अनामिका (1923 ई०), (2) परिमल (1930 ई०), (3) गीतिका (1936 ई०), (4) तुलसीदास (1938 ई०), (5) कुकुरमुत्ता (1942 ई०), (6) अणिमा (1943 ई०), (7) वेला (1946 ई०), (8) नये पत्ते (1946 ई०), (9) अर्चना (1950 ई०), (10) आराधना (1953 ई०), (11) गीतगुंज (1954 ई०), (12)
सांध्यकाकली (1969 ई०) ।
निराला के काव्य संसार में प्रथम व अन्तिम तथ्य निम्नांकित है-
प्रथम संग्रह
अनामिका
अन्तिम संग्रह
सांध्यकाकली
प्रथम कविता
जूही की कली (1916 ई०)
अन्तिम कविता
पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ है
निराला कृत 'अनामिका' और परिमल में संकलित महत्वपूर्ण कविताएँ निम्न हैं-
सरोज स्मृति (1935 ई०)
अधिवास
- सप्नाट एडवर्ड के प्रति
जुही की कली
अनामिका (द्वितीय संस्करण, 1938)
प्रेयसी
बादल राग
राम की शक्तिपूजा (1936 ई०)
विधवा
रेखा
भिक्षुक-
तोड़ती पत्थर
संध्या सुन्दरी
सच है (1935 ई०)
पंचवटी प्रसंग
प्रिमल
छंद का प्रवर्तक माना जाता पण्डित सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' को हिन्दी में मुक्त है। कुछ आलोचक मुक्त छंद को 'रबर' या 'केंचुआ छंद' भी कहते हैं।
निराला ने 'कवित्त' को 'हिन्दी का जातीय छंद' कहा है।
'निराला ने 'परिमल' की भूमिका में लिखा है, "मनुष्यों की मुक्ति की तरह कविता की भी मुक्ति होती है।"
निराला कृत 'सरोज-स्मृति' को हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ तथा प्रथम शोकगीत माना जाता है।
निराला कृत 'राम की शक्तिपूजा' महाकाव्य का उपजीव्य बांग्ला ग्रन्थ 'कृतवास रामायण' है।
निराला कृत 'तुलसीदास' 101 छंदों में रचित एक खण्ड काव्य है।
निराला ओज, औदात्य और विद्रोह के कवि हैं।
निराला अकुंठ एवं वयस्क श्रृंगार-दृष्टि तथा तृप्ति के कवि हैं।
आचार्य शुक्ल के अनुसार, "बहुतस्तुस्पर्शिनी प्रतिभा निरालाजी में है।"
प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पंत का संक्षिप्त जीवन वृत्त निम्नांकित हैं-
जन्म-मृत्यु (ई०)
जन्मस्थान
मृत्यु स्थान
बाल्य नाम
प्रथम कविता
1900-1977
कौशानी (अल्मोड़ा)
इलाहाबाद
गुसाई दत्त
गिरजे का घंटा (1916 ई०)
सुमित्रानन्दन पंत के काव्य को विद्वानों ने चार चरणों में बाँटा है जो निम्न हैं-
छायावादी - उच्छ्वास (1920 ई०), ग्रंथि (1920 ई०), वीणा (1927 ई०), पल्लव (1928 ई०), गुंजन (1932 ई०)।
प्रगतिवादी - युगान्त (1936 ई०), युगवाणी (1939 ई०), ग्राम्या (1940 ई०)।
अन्तश्चेतनावादी - स्वर्ण किरण (1947 ई०), स्वर्ण धूलि (1947 ई०), युग पथ (1949 ई०)।
नवमानवतावादी-उत्तरा (1949 ई०), कला और बूढ़ा चाँद (1959 ई०), अतिमा (1955 ई०), लोकायतन (1964 ई०), चिदम्बरा ।
सुमित्रानन्दन की प्रथम छायावादी रचना 'उच्छ्वास' है तथा अन्तिम छायावादी रचना 'गुंजन' है।
सुमित्रानन्दन पंत ने 'लोकायतन' नामक महाकाव्य महात्मा गाँधी के जीवन पर लिखा है।
सुमित्रानन्दन की महत्वपूर्ण कविताओं का संकलन 'चिदम्बरा' शीर्षक से प्रकाशित है। इस पर इन्हें 'भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार' प्राप्त हुआ।
सुमित्रानंदन कृत 'पल्लव' की भूमिका को छायावाद का घोषणा पत्र (मेनीफेस्टो) कहा जाता है।
पंत जी को 'संवेदनशील इन्द्रिय बोध का कवि' कहा जाता है।
सुमित्रानन्दन पंत मूल रूप में अविन्द दर्शन से प्रभावित थे।
महादेवी वर्मा का संक्षिप्त जीवनवृत्त निम्नांकित है-
जन्म-मृत्यु (ई०)
जन्मस्थान
मृत्यु स्थान
पिता
उपाधि
1907-1987
फर्रुखाबाद
इलाहाबाद
गोविन्द प्रसाद
आधुनिक युग की मीरा
महादेवी वर्मा को 'हिन्दी के विशाल मन्दिर की वीणा पाणि' कहा जाता है।
महादेवी की महत्त्वपूर्ण काव्य कृतियाँ निम्नांकित हैं-
(1) नीहार (1930 ई०), (2) रश्मि (1932 ई०), (3) नीरजा (1935 ई०), (4) सांध्यगीत (1936 ई०), (5) यामा (1940 ई०), (6) दीपशिखा (1942
ई०), सप्तपर्णा (1960 ई०)।
महादेवी वर्मा कृत 'यामा' में उनके नीहार, रश्मि, नीरजा और सांध्यगीत के महत्वपूर्ण गीतों का संकलन किया गया है। 'यामा' पर महादेवी वर्मा को 'भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार' प्राप्त हुआ।
महादेवी वर्मा कृत 'सप्तपर्णा' में ऋग्वेद के मंत्रों का हिन्दी काव्यानुवाद संकलित है।
अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' ने महादेवी के प्रथम काव्य-संकलन 'नीहार' की भूमिका सन् 1930 ई० में लिखी थी।
महादेवी वर्मा की ब्रजभाषा और आरम्भिक खड़ी बोली की कविताओं का संकलन सन् 1984 ई० में 'प्रथम आयाम' शीर्षक से प्रकाशित हुआ।
महादेवी वर्मा को बौद्ध दर्शन से प्रभावित रहस्यवादी कवयित्री के रूप में स्वीकार किया जाता है। इनका सर्वाधिक प्रिय प्रतीक दीपक और बादल हैं।
छायावाद के अन्य कवि निम्नांकित हैं—
कवि
जन्म-मृत्यु
रचनाएँ
उदयशंकर भट्ट
1898-1966
राका, मानसी, विसर्जन, युगदीप, अमृत और विष, यथार्थ और कल्पना।
मोहनलाल महतो वियोगी
1899-1990
निर्माल्य (1926 ई०), एक तारा, कल्पना (1935 ई०)।
लक्ष्मीनारायण मिश्र
1903
अन्तर्जगत् ।
डॉ० रामकुमार वर्मा
1905-1990
रूपराशि (1931 ई०), निशोथ, चित्ररेखा (1935 ई०), आकाशगंगा। अनुभूति, अन्तर्ध्वनि।
जनार्दन प्रसाद झा 'द्विज'
गोपाल सिंह नेपाली
1913-1963
पंछी, रागिनी, उमंग (1934 ई०)।
केदारनाथ मिश्र
-1907-1984
चिर स्पर्श, सेतुबंध।
आरसी प्रसाद सिंह
1911
कलापो (1938 ई०), संचयिता
(1942 ई०), जीवन और यौवन (1944 ई०), नई दिशा (1944 ई०), पांचजन्य (1945 ई०), प्रेमगीत (1954 ई०)।
राष्ट्रीय सांस्कृतिक धारा के कवि काल क्रमानुसार
राष्ट्रीय सांस्कृतिक धारा के कवियों का कालक्रमानुसार विवरण निम्न है-
कवि
जन्म-मृत्यु
रचनाएँ
माखनलाल चतुर्वेदी
1889-1968
(1943 ई०), हिमतरंगिनी (1949 ई०), माता हिमकिरीटिनी (1951 ई०), समर्पण (1956 ई०)।
सियारामशरण गुप्त
1895-1963
मौर्य विजय (1914 ई०), अनाथ (1917 ई०), दूर्वादल (1924 ई०), विषाद (1925 ई०), आर्द्रा (1927 ई०), आत्मोत्सर्ग (1931 ई०), पाथेय (1933 ई०), मृण्मयी (1936 ई०), बापू (1937 ई०), उन्मुक्त (1940 ई०), दैनिकी (1942 ई०), नकुल (1946 ई०)।
बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'
1897-1960
कुंकुम (1939 ई०), रश्मि रेखा, अपलक, क्वासी, हम विषपायी जनम के, विनोबा स्तवन, ऊर्मिला।
सुभद्राकुमारी चौहान
1905-1948
त्रिधारा, मुकुल (1931 ई०)।
जगनाथ प्रसाद मिलिन्द
1907-1986
जीवन संगीत (1940 ई०), नवयुवक के गान। कांग्रेस-शतक।
महेशचन्द्र प्रसाद
माखनलाल चतुर्वेदी को 'एक भारतीय आत्मा' के नाम से भी जाना जाता है।
माखनलाल चतुर्वेदी की प्रसिद्ध कविता 'कैदी और कोकिला', 'पुष्प की अभिलाषा' आदि है।
सियारामशरण गुप्त राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के अनुज थे।
सियारामशरण गुप्त की प्रथम कविता 'इन्दु' में सन् 1910 ई० में प्रकाशित हुई।
बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' उपनाम से कविता लिखते थे। इनका प्रथम काव्य संग्रह 'कुंकुम' है।
सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म प्रयाग जिले के निहालपुर गाँव में हुआ था।
सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रसिद्ध कविताएँ निम्न हैं-
(1) झाँसी की रानी, (2) झण्डे की इज्जत में, (3) स्वदेश के प्रति, (4) जालियाँवाला बाग।
प्रेम और मस्ती का काव्य (व्यक्तिवादी कवि)
प्रेम और मस्ती के कवियों का विवरण निम्नांकित हैं-
कवि
जन्म-मृत्यु
रचनाएँ
भगवतीचरण शर्मा
1903-1981
मधुकण (1932 ई०), प्रेम-संगीत (1937 ई०), मानव (1940 ई०), एक दिन।
हृदयनारायण 'हृदयेश'
1905
स्फुट गीत।
हरिवंशराय बच्चन
1907-2003-
मधुशाला (1935 ई०), मधुबाला (1936 ई०), मधुकलश (1937 ई०), निशा निमंत्रण (1938 ई०), एकान्त संगीत (1939 ई०), आकुल अंतर (1943 ई०), सतरंगिनी (1945 ई०), बंगाल का अकाल (1946 ई०), हलाहल (1946 ई०), खादी के फूल (1948 ई०), मिलन यामिनी (1950 ई०)। अग्निगान, वन्दना के बोल, आँखों में,
हरिकृष्ण प्रेमी
1908
अनन्त के पथ पर।
नरेन्द्र शर्मा
1913-1991
प्रभातफेरी (1938 ई०), प्रवासी के गीत (1938 ई०), पलाश वन (1939 ई०), मिट्टी और फूल (1942 ई०), कामिनी (1942 ई०), हंसमाला (1946 ई०), रक्तचंदन (1949 ई०), अग्निशस्य (1951 ई०)।
रामेश्वर शुक्ल 'अंचल'
1915-1996
मधुलिका (1938 ई०), अपराजिता (1939 ई०), किरणवेला (1941 ई०), करील (1942 ई०), लाल चूनर (1944 ई०), वर्षान्त के बादल।
जानकी वल्लभ शास्त्री
1916
रूप-अरूप (1940 ई०), तीर तरंग (1944 ई०), शिप्रा (1945 ई०), मेघगीत (1950 ई०), अवन्तिका (1953 ई०)।
विद्यावती 'कोकिल'
सुमित्रा कुमारी सिन्हा
अंकुरिता, माँ, सुहागिन, पुनर्मिलन, आरती।
विहाग, आशा पर्व, पंथिनी, बोलों के देवता।
हरिवंश राय बुच्चन को हिन्दी साहित्य में 'हालावाद' का प्रवर्तक माना जाता है। इन पर उमर खैय्याम का प्रभाव सर्वाधिक पड़ा।
बच्चनजी को हिन्दी का 'बायरन' भी कहा जाता है।
रामेश्वर शुक्ल 'अंचल' को हिन्दी में मांसलवाद का प्रवर्तक माना जाता है।
छायावाद के हास्य-व्यंग्यकार कवि
छायावाद के प्रमुख हास्य व्यंग्यकार कवि निम्न हैं-
रचनाकार
रचनाएँ
ईश्वरी प्रसाद शर्मा
(1) चना चबेना (1924 ई०)
हरिशंकर शर्मा
(1) पिंजरापोल, (2) चिड़ियाघर
कान्तानाथ पाण्डेय 'चोंच'
(1) चोंच चालीसा, (2) पानी पांडे, (3)
शिवरत्न शुक्ल 'बलई'
महाकवि सांड।
(1) परिहास प्रमोद (1930 ई०)
चतुर्भुज चतुरेश
(1) हँसी का फव्वारा
ज्वालाराम नागर 'विलक्षण'
(1) छायापथ
हरिशंकर शर्मा कृत 'पिंजरा पोल' और 'चिड़ियाघर' गद्य-रचना है इसमें कुछ व्यंग्यात्मक कविताएँ संकलित हैं।
छायावाद : ब्रजभाषा काव्य- कालक्रमानुसार
कवि
जन्म-मृत्यु
रचनाएँ
रामनाथ ज्योतिषी
1874
(1) रामचन्द्रोदय काव्य (1936 ई०)
रामचन्द्र शुक्ल
1884-1941
(1) बुद्धचरित (1922 ई०)
रायकृष्णदास
1892
(1) ब्रजरण (1936 ई०)
दुलारेलाल भार्गव
1895
(1) दुलारे दोहावली
वियोगी हरि
1896-1988
(1) वीर सतसई (1927 ई०), (2)
किशोरीदास वाजपेयी 1898-1981
चरखा स्तोत्र
अनूप शर्मा
1900
(1) तरंगिणी (1936 ई०)
रामेश्वर करुण
1901
(1) फेरि मिलिबौ (1938 ई०), चम्पू काव्य
(1) करुण सतसई
म त्मा
रामचन्द्र शुक्ल ने एडविन अर्नाल्ड के काव्य 'लाइट ऑफ एशिया' का 'बुद्धचरित' शीर्षक से ब्रजभाषा में अनुवाद किया।
छायावादी कवियों की महत्वपूर्ण काव्य पंक्तियाँ
(क) जयशंकर प्रसाद (आँसू से)
(1) बाँधा था विधु को किसने इन काली जंजीरों से। मणि वाले फणियों का मुख क्यों भरा हुआ है हीरों से ॥
(2) विद्रुम-सीपी-संपुट में मोती के दाने कैसे ? है हंस न, पर शुक फिर क्यों चुगने के मुक्ता ऐसा ॥
(3) झंझा झकोर गर्जन है, बिजली है नीरद माला। पाकर इस शून्य हृदय को, सबने आ डेरा डाला ॥
(4) पतझड़ था, झाड़ खड़े थे सूखे से फुलवारी में। किसलयदल कुसुम बिछाकर आए तुम इस क्यारी में ॥
(5) इस करुणा कलित हृदय में अब विकल रागिनी बजती। क्यों हाहाकार स्वरों में वेदना असीम गरजती ?
(6) मानव जीवन वेदी पर परिणय हो विरह मिलन का। दुःख सुख दोनों नाचेंगे है खेल आँख का मन का ॥
(7) जल उठा स्नेह दीपक-सा, नवनीत हृदय था मेरा। अब शेष धूम रेखा से, चित्रित कर रहा अँधेरा ॥
(8) तेरे प्रकाश में चेतन संसार वेदना वाला। मेरे समीप होता है पाकर कुछ करुण उजाला ॥
(9) सबका निचोड़ लेकर तुम सुख से सूखे जीवन में। वरसो प्रभात हिमकन-सा आँसू इस विश्व सदन में ॥
लहर' से
(10) उठ उठ, गिर गिर, फिर फिर आती नर्तित पदचिह्न बना जाती; सिकता की रेखाएँ उभार भर जाती अपनी तरल सिहर।
(11) तुम हो कौन और मैं क्या? इसमें क्या है धरा सुनो। मानस जलधि रहे चिर चुंबित मेरे क्षितिज ! उदार बनो ॥
(12) ले चल वहाँ भुलावा देकर मेरे नाविक! धीरे धीरे। जिस निर्जन में सागर लहरी अंबर के कानों में गहरी निश्छल प्रेम कथा कहती हो तज कोलाहल की अवनी रे ॥
(13) श्रम विश्राम क्षितिज बेला से, जहाँ सृजन करते मेला से-अमर जागरण, उपा नयन से- बिखराती हो ज्योति घनी रे ॥
(14) बीती विभावरी जाग री ! अंवर पनघट में डुबो रही तारा घट उया नागरी। खगकुल 'कुल कुल' सा बोल रहा, किसलय का अंचल डोल रहा। लो, यह लतिका भी भर लाई, मधु मुकुल नवल रस गागरी ॥
(15) मेरा अनुराग फैलने दो, नभ के अभिनव कलरव में, जाकर सूनेपन के तम में, बन किरण कभी आ जाना।
(16) जग की सजल कालिमा रजनी में मुखचन्द्र दिखा जाओ; प्रेम वेणु की स्वर लहरी में जीवन गीत सुना जाओ।
मायनी' से
17) ओ चिन्ता की पहली रेखा, अरी विश्व वन की व्याली, ज्वालामुखी विस्फोट के भीषण प्रथम कंप-सी मतवाली ॥
18) बुद्धि, मनीषा, मति आशा, चिन्ता तेरे हैं कितने नाम ! अरी पाप है तू, जा, चल जा यहाँ नहीं कुछ तेरा काम !
(19)
सिन्धु सेज पर धरा वधू अब तनिक संकुचित बैठी सी, प्रलय निशा की हलचल स्मृति में मान किए सो ऐंठी-सी ॥
(20)
संवेदन का और हृदय का यह संघर्ष न हो सकता, फिर अभाव असफलताओं की गाथा कौन कहाँ वकता !
(21)
फटा हुआ था नील वसन क्या ओ यौवन की मतवाली ! देख अंकिचन जगत लूटता तेरी छवि भोली भाली !
(22)
हृदय की अनुकृति बाह्य उदार एक लंबी काया उन्मुक्त। मधु-पवन-क्रीड़ित ज्यों शिशु साल, सुशोभित हो सौरभ संयुक्त ॥
(23
) नील परिधान बीच सुकुमार खुल रहा मृदुल अधखुला अंग। खिला हो ज्यों बिजली का फूल मेघवन बीच गुलाबी रंग ॥
(24
) नित्य-यौवन छवि से ही दीप्त विश्व की करुण कामना मूर्ति। स्पर्श के आकर्षण से पूर्ण प्रकट करती ज्यों जड़ में स्फूर्ति ॥
(25)
कुसुम कानन अंचल में मंद-पवन प्रेरित सौरभ साकार, रचित-परमाणु-पराग-शरीर खड़ा हो, ले मधु का आधार ॥
(26
) काम-मंगल से मंडित श्रेय, सर्ग इच्छा का है परिणाम, तिरस्कृत कर उसको तुम भूल वनाते हो असफल भवधाम ॥
(
27) एक तुम, यह विस्तृत भू-खण्ड प्रकृति वैभव से भरा अमंद। कर्म का भोग, भोग का कर्म यही जड़ का चेतन आनन्द।
(28) शक्ति के विद्युत्कण जो व्यस्त विकल बिखरे हैं हो निरुपाय, समन्वय उसका करे समस्त विजयिनी मानवता हो जाए !
(
29) कोमल किसलय के अंचल में नन्हीं कलिका ज्यों छिपती-सी, गोधूली के धूमिल पट में दीपक के स्वर में दीपती-सी।
(30) मैं रति की प्रतिकृति लज्जा हूँ मैं शालीनता सिखाती हूँ। मतवाली सुन्दरता पग में नूपुर सी लिपट मनाती हूँ ॥
(31) नारी ! तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग पगतल में। पीयूष-स्रोत-सी बहा करो जीवन के सुन्दर समतल में ॥
(32) आँसू से भींगे अंचल पर मन का सब कुछ रखना होगा-तुमको अपनी स्मित रेखा से यह संधि पत्र लिखना होगा।
(33) तुम भूल गए पुरुषत्व-मोह में कुछ सत्ता है नारी की। समरसता है संबंध बनी अधिकार और अधिकारी की।
(
34) विखरी अलकें ज्यों तर्क जाल-यह विश्व मुकुट-सा उज्ज्वलतम शशिखण्ड सदृश था स्पष्ट भाल
(35) दो पद्म-पलाश चषक से दृग देते अनुराग विराग ढाल ॥
(36) जो बुद्धि कट्टे उनको न मानकर फिर किसकी नर शरण जाए।
(37) वह विज्ञानमयी अभिलापा, पंख लगाकर उड़ने की. जीवन की असीम आशाएँ कभी न नीचे मुड़ने की ॥
(38) प्रकृति-शक्ति तुमने यंत्रों से सबकी छीनी। शोषण कर जीवनी बना दी जर्जन झीनी।
(39) स्वप्न, स्वाप, जागरण भस्म हो इच्छा क्रिया ज्ञान मिल लय थे। दिव्य अनाहत पर-निनाद में श्रद्धायुत मनु बस तन्मय थे ॥
(40) समरस थे जड़ या चेतन सुन्दर साकार बना था, चेतनता एक विलसती आनन्द अखण्ड घना था।
(ख) सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ('राम की शक्ति पूजा' से)
(1) ऐसे क्षण अंधकार घन में जैसे विद्युत।
जागी पृथ्वी-तनया-कुमारिका-छवि, अच्युत ॥
(2) है अमा-निशा; उगलता गगन घन अन्धकार, खो रहा दिशा का ज्ञान; स्तब्ध है पवन चार।
(3) लख शंकाकुल हो गये अतुल-बल शेष-शयन, खिंच गये दृगों में सीता के राममय नयन।
(4) काँपते हुए किसलय-झरते पराग समुदय, गाते खग नव जीवन-परिचय, तरु मलय वलय, ज्योति प्रपात स्वर्गीय, ज्ञात छवि प्रथम स्वीय, जानकी-नयन-कमनीय प्रथम कंपन तुरीय।
(5) धिक् जीवन जो पाता ही आया है विरोध धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध।
(6) अन्याय जिधर, हैं उधर शक्ति। कहते छल-छल। हो गए नयन, कुछ बूँद पुनः ढलके दृगजल ॥
(7) शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन, छोड़ दो समर जब तक न सिद्धि हो, रघुनन्दन !
(8) होगी जय, होगी जय, है पुरुषोत्तम नवीन ! कह महाशक्ति राम के बदन में हुई लीन।
'सरोज स्मृति' से
(9) अशब्द अधरों का सुना भाष, मैं कवि हूँ, पाया है प्रकाश।
(10) धन्ये, मैं पिता निरर्थक था, कुछ भी तेरे हित न कर सका। जाना तो अर्थागमोपाय पर रहा सदा संकुचित-काय लखकर अनर्थ आर्थिक पथ पर हारता रहा मैं स्वार्थ समर।
(11) यह हिन्दी का स्नेहोपहार, यह नहीं हार मेरी, भास्वर यह रत्नहार-लोकोत्तर वर।
(12) एक साथ जब शत घातपूर्ण, आते थे मुझ पर तुले तूर्ण देखता रहा मैं खड़ा अपल, वह शर-क्षेप, वह रण कौशल।
(13) तब भी मैं इसी तरह समम्त, कवि-जीवन में व्यर्थ भी व्यस्त । लिखता अबाध-गति मुक्त, छंद, पर सम्पादकगण निरानंद ॥
(14) धीरे धीरे फिर बढ़ा चरण, बाल्य की केलियों का प्रांगण। कर पार, कुंज-तारुण्य सुधर आइ, लावण्य-भार थर-थर ॥
(15) क्या दृष्टि ! अतल की सिक्तधार ज्यों भोगावती उठी अपार, उमड़ता ऊर्ध्व को कल सलील जल टलमल करता नील नील। पर बँधा देह के दिव्य-बाँध, छलकता दृगों के साध-साध ॥
(16) ये कान्यकुब्ज-कुल-कुलांगार खाकर पत्तल में करें छेद, इनके कर कन्या, अर्थ खेद।
(17) देखा मैंने, वह मूर्ति-धीति मेरे वसंत की प्रथम गीति-श्रृंगार, रहा जो निराकार, रस कविता में उच्छ्वसित-धार गया स्वर्गीया-प्रिया-संग भरता प्राणों में राग रंग रति-रूप प्राप्त कर रहा वही आकाश बदलकर बना मही ॥
(18) दुःख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज जो नहीं कही।
'तुलसीदास' से
( 19) भारत के नभ का प्रभापूर्य
शीतलच्छाय सांस्कृतिक सूर्य अस्तमित आज रे-तमस्तूर्य दिमंडल उर के आसन पर शिरस्त्राण शासन करते हैं मुसलमान; है ऊर्मिल जल, निश्चलत्प्राण पर शतदल ।
(20) होगा फिर से दुर्धर्ष समर जड़ से चेतन का निशिवासर, कवि का प्रति छवि से जीवन हर, जीवन भर; भारती इधर, है उधर सकल जड़ जीवन के संचित कौशल; जय, इधर ईश, हैं उधर सबल माया-कर।
(21) जागो, जागो आया प्रभात, बीती वह बीती अंध रात, झरता भर ज्योतिर्मय प्रपात पूर्वाचल, बाँधो, बाँधो किरणें चेतन, तेजस्वी, है तमजिज्जीवन; आती भारत की ज्योतिर्धन महिमाबल ॥
'बादल राग' से (सं० रामविलास शर्मा)
(22) जागो फिर एक बार शेरों की माँद में आया है आज स्यार
(23) विजन वन वल्लरी पर
सोती थी सुहाग भरी स्नेह स्वप्न मग्न अमल कोमल तनु तरुणी, जुही की कली दृग बंद किए शिथिल पत्रांक में (जूही की कली)
(24) स्नेह निर्झर वह गया है। रेत ज्यों तन रह गया है।
(25) यौवन के तीर पर प्रथम था आया जब स्रोत सौन्दर्य का, वीचियों कलरव सुख चुंबित प्रणय का था मधुर आकर्षणमय मज्जनावेद मृदु फूटता सागर में ॥
(26) जीर्ण बाहु है शीर्ण शरीर तुझे बुलाता कृपक ए विप्लव के वीर ! अधीर
ग) सुमित्रानंदन पंत
(1) छोड़ द्रुमो की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया, बाले तेरे बाल जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन ?
(2) प्रथम रश्मि का आना रंगिणी! तूने कैसे पहचाना ? कहाँ कहाँ हे वाल विहंगिनी! पाया तूने यह गाना ?
(3) अरुण अधरों की पल्लव प्रात, मोतियों सा हिलता हिम हास।
(4) सैकत-शय्या पर दुग्ध धवल, तन्वंगी गंगा, ग्रीष्म, विरल, लेटी है श्रांत, क्लान्त निश्चल !
तापस-बाला गंगा निर्मल, शशि-मुख से दीपित मृदु करतल, लहरे उर पर कोमल कुंतल !
(5) इस धारा-सा ही जग का क्रम, शाश्वत इस जीवन का उद्गम,
शाश्वत है गति, शाश्वत संगम !
(6) तुम्हारे छूने में था प्राण, संग में पावन गंगा स्नान। तुम्हारी वाणी में कल्याणि त्रिवेणी की लहरों गान ॥
(7) धूम धुंआरे काजर कारे हम ही विकरारे बादर। मदनराज के वीर-बहादुर, पावस के उड़ते फणिधर ॥
(8) धूलि की ढेरी में अनजान छिपे हैं मेरे मधुमय गान।
(9) वियोगी होगा पहला कवि आह से उपजा होगा गान। निकलकर आँखों से चुपचाप वही होगी कविता अनजान ॥
(10) द्रुत झरों जगत के जीर्ण पत्र, हे त्रस्त ध्वस्त हे शुष्क शीर्ण। हिम ताप पीत मधुवात भीत, तुम वीतराग जड़ पुराचीन ॥
(11) लक्ष अलक्षित चरण तुम्हारे चिह्न निरन्तर। छोड़ रहे हैं जग के विक्षत वक्षस्थल पर ॥
(12) दूर उन खेतों के उस पार, जहाँ तक गई नील झंकार ॥
(13) तुम वहन कर सको जन मन में मेरे विचार। वाणी मेरी, चाहिए तुम्हें क्या अलंकार !
(14) भूतवाद उस धरा-स्वर्ग के लिए मात्र सोपान, जहाँ आत्मदर्शन अनादि से समासीन अम्लान ॥
(15) सुन्दर है विहग, सुमन सुन्दर मानव तुम सबसे सुन्दरतम् ।
(घ) महादेवी वर्मा
(1) मैं नीर भरी दुःख की बदली परिचय इतना इतिहास यही उमड़ी कल थी मिट आज चली ॥
(2) पर शेष नहीं होगी यह मेरे प्राणों की क्रीड़ा, तुमको पीड़ा में ढूँढा तुममे ढूँढूँगी पीड़ा।
(3) जो तुम आ जाते एक बार ! कितनी करुणा कितने संदेश पथ में बिछ जाते बन पराग, गाता प्राणों का तार-तार अनुराग भरा उन्माद राग।
(4) क्या पूजा क्या अर्चन रे ?
उस असीम का सुन्दर मन्दिर मेरा लघुतम जीवन रे।
(5) मधुर मधुर मेरे दीपक जल युग युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल प्रियतम का पथ आलोकित कर।
(6) मिलन का मत नाम लो में विरह में चिर हूँ।
(7) बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ। दूर हूँ तुमसे अखण्ड सुहागिनी भी हूँ ॥
(8) विश्व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन क्या डुबा देंगे तुझे यह फूल के दल ओस गीले ? तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना जाग तुझको दूर जाना ॥
(9) वे मुस्काते फूल नहीं जिनको आता है मुरझाना। वे तारों के दीप नही जिनको भाता है बुझ जाना ॥
(ङ) बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'
(1) ओ भिखमंगे, अरे पराजित, ओ मललूम, अरे चिरदोहित, तू अखण्ड भण्डार शक्ति, जाग अरे निद्रा सम्मोहित ।
(2) है बलिवेदी, सखे प्रज्ज्वलित माँग रही ईंधन क्षण-क्षण, आओ युवक, लगा दो तो तुम अपने यौवन का ईंधन ॥
(3) हम अनिकेतन, हम अनिकेतन, हम तो रमते राम हमारा क्या घर, कैसा वतन ?
(4) हो जाने दो ग़र्क नशे में, मत पड़ने दो फर्क नशे में ॥
(5) कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ, जिससे उथल-पुथल मच जाये।
विविध
छायावादी कवि चतुष्टय निम्नलिखित दर्शनों से प्रभावित थे-
कवि
दर्शन
जयशंकर प्रसाद
शैव दर्शन (आनन्दवाद)
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
अद्वैत वेदान्त
सुमित्रानंदन पंत
अरविन्द दर्शन
महादेवी वर्मा
बौद्ध दर्शन (दुःखवाद)
पण्डित सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' ने प्रगतिवादी चेतना से अनुप्राणित रचनाएँ भी लिखी, जो निम्नांकित हैं-
(1) कुकुरमुत्ता,
(2) गर्म पकौड़ी,
(3) मास्को डायलाग्स,
(4) नये पत्ते, (5)
खजीहरा,
(6) रानी और कानी।
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' को छायावाद का शलाका पुरुष भी कहा जाता है।
प्रसिद्ध राष्ट्रगीत 'झण्डा ऊँचा रहे हमारा' को रचना श्यामलाल पार्षद ने सन् 1924 में की। यह गीत सर्वप्रथम 1925 ई० में कानपुर कांग्रेस के ध्वजोत्तोलन के समव गाया गया।
छायावादोत्तर काल प्रगतिवाद (1936 से 1942 ई०)
लखनऊ में अप्रैल, 1936 ई० में 'प्रगतिशील लेखक संघ' की स्थापना और प्रथम अधिवेशन के समय से हिन्दी में प्रगतिवादी आन्दोलन की शुरुआत होती है। इस अधिवेशन के प्रथम अध्यक्ष मुंशी प्रेमचंद थे।
सन् 1934 ई० में गोर्की के नेतृत्व में रूस में 'सोवियत लेखक संघ' की स्थापना हुई। यह विश्व का पहला लेखक संगठन था।
सन् 1935 ई० में हेनरी बारबूस की पहल पर पेरिस में ई०एम० फोस्टर ने 'प्रगतिशील लेखक संघ' (Progressive Writer's Association) की स्थापना की।
मुल्कराज आनन्द, सज्जाद जहीर, ज्योति घोष, के०एम० भट्ट, हीरेन मुखर्जी, एस० सिन्हा और मोहम्मद्दीन तासीन ने भारत की तरफ से सर्वप्रथम इंग्लैण्ड में जुलाई 1935 ई० में 'भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ' का गठन किया।
प्रगतिवाद का सैद्धान्तिक आधार मार्क्स का द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद है। राजनीति के क्षेत्र में जो समाजवाद या साम्यवाद है, साहित्य के क्षेत्र में वही प्रगतिवाद है।
डॉ० बच्चन सिंह ने सुमित्रानन्दन पंत कृत 'युगवाणी' को खड़ी बोली का प्रथम प्रगतिवादी काव्य माना है।
डॉ० गणपतिचन्द्र गुप्त ने कालक्रम की दृष्टि से रामेश्वर 'करुण' कृत ब्रजभाषा काव्य 'करुण सतसई' को प्रथम प्रगतिवादी कवि और काव्य माना है।
प्रमुख कवि : कालक्रमानुसार
केदारनाथ अग्रवाल का संक्षिप्त जीवनवृत्त निम्नांकित है-
जन्म-मृत्यु (३०)
जन्मस्थान
माता-पिता
पत्नी
प्रथम संग्रह
1911-2000
कमासिन (बाँदा)
हनुमानप्रसाद घिसट्टो
पार्वती
युग की गंगा
केदारनाथ अग्रवाल अपनी काव्य-यात्रा के आरम्भिक दौर में 'बालेन्दु' उपनाम से रचनाएँ करते थे। तब वे ब्रजभाषा में कवित्त, सवैया छंद में लिखते थे।
केदारनाथ अग्रवाल ने देश-विदेश के तमाम कवियों की कविताओं का अनुवाद 'देश-विदेश की कविताएँ' शीर्षक से किया।
केदारनाथ अग्रवाल की रचनाओं की कालक्रमानुसार सूची निम्न है-
1. युग की गंगा (1947)
11. कहें केदार खरी-खरी (1983)
2. नींद के बादल (1947)
12. अपूर्वा (1984)
3. लोक और आलोक (1957)
13. जमुन जल तुम (1984)
4. फूल नहीं रंग बोलते हैं (1965)
14. बोले बोल अबोल (1985)
5. आग का आईना (1970)
15. जो शिलाएँ तोड़ते हैं (1985)
6. गुलमेंहदी (1978)
16. आत्मगंध (1988)
7. पंख और पतवार (1979)
17. अनहारी हरियाली (1990)
8. बंबई का रक्त स्नान (1981)
18. खुली आँखें: खुले हैने (1993)
9. हे मेरी तुम ((1981))
19. पुष्पदीप (1994)
10. मार प्यार की थापें (1981)
20. बसंत में हुई प्रसन्न पृथ्वी (1996)
नागार्जुन का संक्षिप्त जीवन-वृत्त निम्नांकित है-
जन्म-मृत्यु
जन्म स्थान
मूल नाम
माता-पिता
उपनाम
1911-1998
तरउनी (दरभंगा)
वैद्यनाथ मिश्र
गोकुल मिश्र उमा देवी
यात्री, नागार्जुन
नागार्जुन का पहला साहित्यिक उपनाम 'यात्री' था। संस्कृत और मैथिली में ये 'यात्री' नाम से कविताएँ लिखते थे।
नागार्जुन की खड़ी बोली में सर्वप्रथम प्रकाशित रचना 'राम के प्रति' है जो सन् 1935 ई० में लाहौर से निकलने वाली साप्ताहिक पत्रिका 'विश्वबन्धु' में छपी थी।
नागार्जुन की रचनाओं की कालक्रमानुसार सूची निम्न है-
1. युगधारा (1953)
6. खिचड़ी विप्लव देखा हमने (1980)
2. सतरंगे पंखों वाली (1959)
7. तुमने कहा था (1980)
3. प्यासी पथराई आँखें (1962)
8. हजार-हजार बाँहों वाली (1981)
4. भस्मांकुर (1971)
9. पुरानी जूतियों का कोरस (1983)
5. तालाब की मछलियाँ (1975)
नागार्जुन कृत 'भस्मांकुर' एक खण्डकाव्य है जो 'बरवै' छंद में है।
नागार्जुन ने मैथिली भाषा में 'पत्रहीन नग्न गाछ' शीर्षक से काव्य लिखा। इसमें 52 कविताएँ संकलित हैं। इस कृति पर उन्हें सन् 1968 ई० में 'साहित्य अकादमी' पुरस्कार मिला।
नागार्जुन ने अपनी कविता 'प्रतिहिसा ही स्थायी भाव है' के सन्दर्भ में लिखा है, "यह तो नागार्जुन-साहित्य का 'मेनिफेस्टो' है।"
डॉ० बच्चन सिंह ने नागार्जुन की कविताओं को 'नुक्कड़ कविता' को संज्ञा दी है।
नागार्जुन को राजनीतिक कवि के रूप में भी जाना जाता है। इनकी निम्नलिखित कविताएँ प्रसिद्ध हैं- (1) बादल को घिरते देखा है, (2) पाषाणी, (3) सिन्दूर तिलकित भाल, (4) तुम्हारी दंतुरित मुस्कान, (5) पाँच पूत भारत माता के, (6) कालिदास, (7) हरिजन गाथा, (8) अकाल और उसके बाद।
नागार्जुन को प्रगतिवाद का शलाका पुरुष कहा जाता है।
शिवमंगल सिंह 'सुमन' का संक्षिप्त जीवनवृत्त निम्नांकित है-
जन्म-मृत्यु (ई०)
जन्म स्थान
मूलनाम
उपनाम
प्रथम संग्रह
1915-2002
झगरपुर (उन्नाव)
शिवमंगल सिंह
सुमन
हिल्लोल (1939)
शिवमंगल सिंह की प्रमुख रचनाएँ निम्नांकित हैं-
(1) हिल्लोल, (2) जीवन के गान, (3) युग का मोल (1945), (4) प्रलय-सृजन (1950), (5) विश्वास बदलता ही गया, (6) विंध्य हिमालय (1960), (7) मिट्टी की बारात (1972), (8) वाणी की व्यथा (1980), (9) पर आँखें नहीं भरी, (10) हम पक्षी उन्मुक्त गगन के।
शिवमंगल सिंह 'सुमन' की प्रसिद्ध कविताएँ निम्न हैं- (1) गुनिया का यौवन, (2) कलकत्ते का अकाल, (3) चल रही कुदाली।
वासुदेव सिंह 'त्रिलोचन' का संक्षिप्त जीवनवृत्त निम्न है-
जन्म-मृत्यु (ई०
1917-2007
जन्म-स्थान
चिरानी पट्टी (सुल्तानपुर)
मूल नाम
वासुदेव सिह
उपनाम
त्रिलोचन
प्रथम संग्रह
धरती (1945 ई०)
गजानन माधव 'मुक्तिबोध' ने त्रिलोचन को 'अवध का किसान कवि' कहा है।
त्रिलोचन की रचनाओं की काल क्रमानुसार सूची निम्न है-
1. धरती (1945)
6. उस जनपद का कवि हूँ (1981)
2. गुलाब और बुलबुल (1956)
7. अरघान (1984)
3. दिगन्त (1957)
8. तुम्हें सौंपता हूँ (1985)
4. ताप के ताए हुए दिन (1980)
9. फूल नाम है एक (1985)
5. शब्द (1980)
10. अनकहनी भी कुछ कहनी है (1986)
'अमोला' त्रिलोचनजी की अवधी काव्य कृति है। 1990 में प्रकाशित इस कृति में 2700 बरवै संगृहीत हैं।
हिन्दी में सॉनेट लिखने के लिए त्रिलोचन शास्त्री प्रसिद्ध हैं।
रांगेय राघव (1923-1963 ई०) का मूलनाम त्र्यंबक वीर राघवाचार्य है।
रांगेय राघव ने तीन आख्यानात्मक काव्य लिखे हैं जो निम्न हैं- (1) अजेय खण्डहर (1944), (2) मेधावी (1947), (3) पांचाली (1955)।
'अजेय खण्डहर' में तीन शीर्षकों- झंकार, ललकार, हुंकार से स्तालिनग्राद युद्ध के कतिपय स्थलों का वर्णन किया गया है।
रांगेय राघव के दो अन्य मुक्तक काव्य हैं जो निम्न हैं- (1) पिघलते पत्थर (1946) और (2) राह के दीपक।
प्रगतिवादी कवियों की महत्वपूर्ण काव्य पंक्तियाँ
(क) केदारनाथ अग्रवाल
(1) धूप चमकती है चाँदी की साड़ी पहने मैके में आयी बेटी की तरह मगन है।
(2) एक बीते के बराबर, यह हरा ठिगना चना बांधे मुरैठा शीश पर छोटे गुलाबी फूल का।
(3) मैंने उसको जब-जब देखा, लोहा जैसे तपते देख, गलते देखा, ढलते देखा। मैंने उसको गोली जैसे चलते देखा ॥
(4) आज का लेखन आग के अँगूठे की क्रान्तिकारी कतार का बन्दूक मार लेखन है।
(5) कविता यों ही बन जाती है, बिना बनाए क्योंकि हृदय में, तड़प रही है याद तुम्हारी।
(6) माँझी न बजाओ वंशी मेरा प्रन टूटता मेरा प्रन टूटता है जैसे तन टूटता ॥
(7) बाप बेटा बेचता है भूख से बेहाल होकर,
धर्म, धीरज, प्राण खोकर।
(8) कांग्रेस की राज में आयो नहीं बसन्त अपत कँटीली डाल के गावत है गुनवंत ॥
(१) काटो काटो काटो करवी मारो मारो मारो हँसिया। हिंसा और अहिंसा क्या है। जीवन में बढ़ हिंसा क्या है?
(ख) नागार्जुन
(1) जन-जन में जो ऊर्जा भर दे, मैं उद्गाता हूं उस रवि का।
(2) याद आता मुझे अपना 'तरउनी' ग्राम याद आती लीचियाँ औ आम।
(3) कई दिनों तक चूल्हा रोया चक्की रही उदास कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उसके पास ।
(4) कालिदास, सच-सच बतलाना। इंदुमती के मृत्युशोक से अज रोया या तुम रोये थे ? कालिदास, सच-सच बतलाना।
(5) घून खाये शहतीरों पर बारह खड़ी विधाता बाँचे। फटी भीत है, छत चूती है, आले पर बिसतुइया नाचे।
(6) अमल धवल गिरि के शिखरों पर बादल को घिरते देखा है।
(7) पाँच पूत भारतमाता के दुश्मन था खूँखार। गोली खाकर एक मर गया बाकी रह गए 4 ॥
(ग) त्रिलोचन
(1) मुझे जगत जीवन का प्रेमी बना रहा है प्यार तुम्हारा।
(2) यों ही कुछ मुसकाकर तुमने परिचय की वह गाँठ लगा दी X X
वस्तुनिष्ठ इतिहान
जड़ता है जीवन की पीड़ा निस्तरंग पाषाणी क्रीड़ तुमने अनजाने वह पीड़ा छवि के सर से दूर भगा दी।
रामधारी सिंह 'दिनकर' (1908-1974 ई०)
रामधारी सिंह 'दिनकर' के काव्य में राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना तथा प्रगतिवादी चेतना दोनों विद्यमान है।
रामधारी सिंह 'दिनकर' को 'समय सूर्य' तथा 'अधैर्य का कवि' भी कहा जाता है।
दिनकर की प्रमुख कृतियाँ निम्नांकित हैं-
1. रेणुका (1935)
9. दिल्ली (1954)
2. हुंकार (1939)
10. उर्वशी (1961) (गीति नाट्य)
3. रसवंती (1940)
11. परशुराम की प्रतीक्षा (1963)
4. द्वन्द्वगीत (1940)
12. आत्मा की आँखें (1964)
5. कुरुक्षेत्र (1946) (प्रबन्ध काव्य)
13. हारे के हरिनाम
6. सामधेनी (1947)
14. धूप और धुआ (1951)
7. रश्मिरथी (1952) (खण्ड काव्य)
15. नीम के पत्ते
8. नील कुसुम (1954)
16. इतिहास के आँसू (1951)
दिनकर ने मैथिलीशरण गुप्त के सामने स्वयं को 'महज डिप्टी राष्ट्रकवि' ही माना है।
दिनकर को 'उर्वशी' महाकाव्य के लिए सन् 1972 में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। इसे 'गीति नाट्य' भी माना जाता है।
दिनकर की महत्वपूर्ण काव्य-पंक्तियाँ
(1) ओ द्विधाग्रस्त शार्दूल बोल।
(2) श्वानों को मिलता दूध-भात बच्चे भूखे अकुलाते हैं। माँ की हड्डी से ठिठुर चिपक जाड़े की रात बिताते हैं ॥
आधुनिक
(3) हटो व्योम के मेघ, पंथ से, स्वर्ग लूटने हम आते है, दूध-दूध ओ वत्स ! तुम्हारा दूध खोजने हम आते हैं।
(4) रे! रोक युधिष्ठिर को न यहाँ, जाने दे उनको स्वर्ग धौर। पर फिरा हमें गांडीव गदा, लौटा दे अर्जुन भीम वीर ॥
प्रयोगवाद और नयी कविता
प्रयोगवाद का आरम्भ सन् 1943 ई० में सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' के सम्पादकत्व में प्रकाशित 'वार सप्तक' से माना जाता है। 'तार सप्तक' में सात कवि संगृहीत हैं।
प्रयोगवाद' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग नंददुलारे वाजपेयी ने 'प्रयोगवादी रचनाएँ' शीर्षक निबन्ध में किया।
नंद दुलारे वाजपेयी ने प्रयोगवाद को 'बैठे ठाले का धंधा' कहा है।
'अज्ञेय' के सम्पादकत्व में चार सप्तक प्रकाशित हो चुका है, जो निम्न है- (1) तार सप्तक (1943 ई०), (2) दूसरा सप्तक (1951 ई०), (3) तीसरा सप्तक (1959 ई०), (4) चौथा सप्तक (1979 ई०)।
अज्ञेय ने 'तार सप्तक' की भूमिका में प्रयोगवादी कवियों को 'राहों के अन्वेषी' कहा है।
अज्ञेय ने 'दूसरा सप्तक' की भूमिका में लिखा है-
(1) प्रयोग का कोई वाद नहीं है। हम वादी नहीं रहे, नहीं है। न प्रयोग अपने-आप में इष्ट या साध्य है। ठीक इसी तरह कविता का भी कोई वाद नहीं है; कविता भी अपने-आप में इष्ट या साध्य नहीं है। अतः हमें 'प्रयोगवादी' कहना उतना ही सार्थक या निरर्थक है जितना हमें 'कवितावादी' कहना।
(2) प्रयोग अपने-आप में इष्ट नहीं है, वह साधन है और दोहरा साधन है क्योंकि एक तो वह उस सत्य को जानने का साधन है जिसे कवि प्रेषित करता है, दूसरे वह उस प्रेषण की क्रिया को और उसके साधनों को जानने का भी साधन है।
'तार सप्तक' (1943) में संकलित कवियों का कालक्रमानुसार विवरण निम्न है-
कवि अरण्यप्रनेगिभा आा
जन्म-मृत्यु (ई०)
जन्म स्थान
अज्ञेय
1911-1987
देवरिया
रामविलास शर्मा
1912-2000
उन्नाव
गजानन माधव मुक्तिबोध
1917-1964
ग्वालियर
प्रभाकर माचवे 'बलवंत'
1917-1991
ग्वालियर
नेमिचन्द्र जैन
1918
आगरा
गिरिजा कुमार माथुर
1918-1994
मध्य प्रदेश
भारतभूषण अग्रवाल
1919-1975
मथुरा
'दूसरा सप्तक' (1951) में संकलित कवियों का कालक्रमानुसार विवरण निम्नलिखित है-
कवि शुभशहन धर (रधनशभराE जन्म-मृत्यु (ई०)
शमशेर बहादुर सिंह
1911-1993
जन्म स्थान
भवानीप्रसाद मिश्र
1913-1985
इतिहास
देहरादून
शकुन्त माथुर
1922
होशंगाबाद
हरिनारायण घनश्याम व्यास
1923
दिल्ली
नरेश मेहता
1924
मध्य प्रदेश
धर्मवीर भारती
1926-1997
गुजरात
रघुवीर सहाय
1929-1990
इलाहाबाद
लखनऊ
'तीसरा सप्तक' (1959) में संकलित कवियों का काल क्रमानुसार विवरण प्र.म वि कुं स के की (कोड के कविसम)
निम्नलिखित है-
जन्म-मृत्यु (ई०)
कवि
1919
जन्म स्थान
प्रयागनारायण त्रिपाठी
1922
विजयदेव नारायण साही
रायबरेली
मदन वात्स्यायन
1924-1982
काशी
कुँवर नारायण
1927
फैजाबाद
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
1927-1983
बस्ती
केदारनाथ सिंह
1932
कीर्ति चौधरी
1935
उन्नाव
2T1319 그 'चौथा सप्तक' (1979) में संकलित कवि निम्न हैं- राजश्री सुनं स्वराज अवशे
(1) अवधेश कुमार, (2) राजकुमार कुंभज, (3) स्वदेश भारती, आचार्य, (5) सुमन राजे, (6) श्रीराम वर्मा, (7) राजेन्द्र किशोर।
(4) नंदकिशोर
प्रयोगवाद का प्रवर्तन करने का श्रेय सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' को दिया जाता है।
डॉ० रामविलास शर्मा ने लिखा है, "प्रयोगवादी कविता में युग से उत्पन्न अनास्था, शंका, घुटन, कुण्ठा, भग्नाशा में से एक नये पथ के अन्वेषण की व्याकुल भावना दिखायी पड़ती है। ये कवि एक नये मार्ग का अनुसंधान करने के लिए व्याकुल हैं।"
प्रयोगवाद की प्रमुख प्रवृत्तियाँ हैं- (1) अहंवादी प्रवृत्ति का प्राधान्य, (2) यथार्थवाद का आग्रह, (3) निराशावाद, (4) बौद्धिकता का प्राधान्य, (5) उपमानों की नवीनता,. (6) साधारण विषयों का निरूपण, (7) भाषा का प्रयोग। प्रयोगवाद फ्रायड के दर्शन से प्रभावित है।
प्रयोगवाद के सन्दर्भ में कुछ विद्वानों के मत इस प्रकार हैं-
(1) "प्रयोगवाद शैलीगत विद्रोह है।" डॉ० नगेन्द्र
(2) "प्रयोगवाद दृष्टिकोण का अनुसन्धान है।" - केशरी कुमार
(3) "प्रयोग कलात्मक अनुभव का क्षण है।"- रघुवीर सहाय
(4) "समाज के हित में जैसी क्रान्ति का सतत प्रक्रिया काम्य है, वैसे ही रचना के
हित में प्रयोग की।" - डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी
प्रपद्यवाद (1956 ई०)
प्रपद्यवाद का प्रवर्तन नलिन विलोचन शर्मा ने सन् 1956 में प्रकाशित 'नकेन के प्रपद्य' संकलन से किया।
प्रपद्यवाद को 'नुकेनवाद' भी कहा जाता है क्योंकि इसमें बिहार के तीन कवि नलिन विलोचन शर्मा, केशरी कुमार और फ्रेश के नाम के प्रथम अक्षरों को आधार मानकर 'नकेन' बनता है।
प्रपद्यवाद और प्रयोगवाद में मूल अंतर यह है कि प्रपद्यवाद 'प्रयोग' को साध्य मानता है जबकि प्रयोगवाद 'प्रयोग' को साधन मानता है।
आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने 'प्रवद्यवाद' के संबंध में लिखा है, "नकेनवाद जिसे उसके हिमायतियों ने प्रपद्यवाद भी कहा है, वास्तव में, प्रयोगशीलता का एक अतिवाद था। प्रयोगवाद के प्रवक्ताओं ने जो कुछ नया कहा था, उससे सन्तुष्ट न होकर उसे एक तार्किक सीमा तक पहुँचाने का कार्य नकेन-1, नकेन-2 नामक संग्रह की भूमिकाओं में दिखाई पड़ा था।"
सन 1952 में नरेश के सम्पादकत्व में प्रकाशित पत्रिका 'प्रकाश' में नकेनवादियों ने प्रपद्यवाद को तथाकथित 'प्रयोग दश सूली' घोषित किया।
नयी कविता (1954 ई०)
'नयी कविता' नाम अज्ञेय का दिया हुआ है। अपनी एक रेडियो वार्ता में उन्होंने इस पद का सर्वप्रथम प्रयोग किया था, जो बाद में 'नये पत्ते' के जनवरी-फरवरी, 1953 अंक में 'नयी कविता' शीर्षक से प्रकाशित हुई।
'नयी कविता' का आरम्भ सन् 1954 में जगदीश गुप्त द्वारा सम्पादित 'नयी कविता' पत्रिका के प्रकाशन से माना जाता है।
बच्चन सिंह 'नयी कविता' का आरम्भ सन् 1951 से मानते हैं। इनके अनुसार नयी कविता प्रयोगवादी कविता का परिष्कृत रूप है।
मुक्तिबोध ने लिखा है, "नयी कविता वैविध्यमय जीवन के प्रति आत्मचेतस् व्यक्ति की प्रतिक्रिया है। नयी कविता का स्वर एक नहीं विविध है।"
डॉ० धर्मवीर भारती ने लिखा है, "नयी कविता प्रथम बार समस्त जीवन को व्यक्ति या समाज इस प्रकार के तंग विभाजनों के आधार पर न मापकर मूल्यों की सापेक्ष स्थिति में व्यक्ति और समाज दोनों को मापने का प्रयास कर रही है।"
डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी ने लिखा है, "नयी कविता में समग्र मनुष्य की बात ही नहीं कही गई है, वरन् मनुष्य के समग्र अनुभव-खण्डों को संयोजित किया गया है।"
डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी ने 'भाषा-संवेदना और सर्जन' पुस्तक में नयी कविता के सन्दर्भ में लिखा है, "आज की कविता को जाँचने के लिए जो 'प्रास के रजत पाश' से मुक्त हो चुकी है, अलंकारों की उपयोगिता अस्वीकार हो चुकी है और छन्दों की पायले उतार चुकी हैं, काव्य भाषा का ही आधार शेष रह गया हैं क्योंकि कविता के संघटन में भाषा-प्रयोंग की मूल केन्द्रीय स्थिति है। "कविता उत्कृष्ट शब्दों का उत्कृष्ट क्रम है।"
विजयदेव नारायण साही ने 'नयी कविता' में 'लघु मानव' की प्रतिष्ठा की।
था का वस्तुनिष्ठ इतिहास
'नयी कविता' में दो प्रमुख तत्व हैं (1) अनुभूति को प्रामाणिकता और (2) बुद्धिमूलक यथार्थवादी दृष्टि।
नयी कविता में 'कैक्टसवाद' का जन्म होता है। नयी कविता में कैक्टस प्रतीक रूप में अपनाया गया है जो अदम्य उत्साह, जीवनाकांक्षा और अनगढ़ता का प्रतीक है।
प्रमुख कवि
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' का संक्षिप्त जीवन-वृत्त निम्न है-
जन्म-मृत्यु
माता-पिता
प्रथम काव्य संग्रह
अन्तिम काव्य संग्रह
1911-1987
हीरानंद-वयंती देवी
भग्नदूत
ऐसा कोई घर आपने देखा है
'अज्ञेय' के काव्य-संग्रह निम्नलिखित हैं-
1. भग्नदूत (1933)
10. सुनहले शैवाल (1966)
2. चिन्ता (1942)
11. कितनी नावों में कितनी बार (1967)
3. इत्यलम् (1946)
12. क्योंकि मैं उसे जानता हूँ (1969)
4. हरी घास पर क्षण भर (1949)
13. सागर मुद्रा (1970)
5. बावरा अहेरी (1954)
14. पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ (1973)
6. इंद्रधनुष रौंदे हुए ये (1957)
15. महावृक्ष के नीचे (1977)
7. अरी ओ करुणा प्रभामय (1959)
16. नदी की बाँक छाया (1981)
8. आँगन के पार द्वार (1961)
17. ऐसा कोई घर आपने देखा है (1986)
9. पूर्वा (1965)
अज्ञेय अस्तित्ववाद में आस्था रखने वाले कवि हैं।
अज्ञेय को प्रयोगवाद तथा नयी कविता का शलाका पुरुष भी कहा जाता है।
अज्ञेय की चर्चित कविताएँ निम्नांकित हैं- (1) असाध्य वीणा, (2) कलगी बाजरे को, (3) साँप, (4) नदी के द्वीप, (5) हरी घास पर क्षण भर, (6) जितना तुम्हारा सच, (7) शब्द और सत्य, (8) यह दीप अकेला।
'असाध्य वीणा' एक लम्बी कविता है। इसका मूल भाव 'अहं का विसर्जन' है।
मुक्तिबोध का पूरा नाम गजानन माधव था। इन्हें 'गहन अनुभूति और तीव्र इंद्रियबोध' का कवि भी कहा जाता है।
मुक्तिबोध की दो काव्य कृतियां प्रकाशित हैं- (1) चाँद का मुँह टेढ़ा है (1964) और (2) भूरि भूरि खाक धूल (1980 ई०)।
मुक्तिबोध की चर्चित कविताएँ निम्नांकित हैं- (1) अँधेरे में, (2) ब्रह्म राक्षस, (3) अंतःकरण का आयतन, (4) भूल गलती।
अँधेरे में' का पहला प्रकाशन 'कल्पना' में 1964 में 'आशंका के द्वीप अँधेरे में' नाम से हुआ।
रामस्वरूप चतुर्वेदी ने लिखा है- "मुक्तिबोध का काव्य-संकलन 'चाँद का मुँह टेढ़ा * है' एक बड़े कलाकार की 'स्कैच-बुक' लगता है।"
'अँधेरे में' एक लम्बी कविता है। विभिन्न आलोचकों ने इसे विभिन्न दृष्टिकोण से देखा है। जो निम्न हैं-
शमशेर बहादुर सिंह- "यह कविता देश के आधुनिक जन इतिहास का स्वतंत्रता
आधुनिक काल
पूर्व और पश्चात एक दहकता इस्पाती दस्तावेज है। इसमें अजब और अद्भुत रूप से. व्यक्ति और जन का एकीकरण है।"
रामविलास शर्मा - "अपराध भावना का अनुसन्धान"।
नामवर सिंह- "अस्मिता की खोज"।
इन्द्रनाथ मदान - "आत्म संशोधन का अनुसन्धान"।
निर्मला जैन - "अन्तस्थल का विप्लव"।
प्रभाकर माचवे - "लावा"।
रामविलास शर्मा - "अरक्षित जीवन की कविता"।
रामस्वरूप चतुर्वेदी- "अँधेरे में के लम्बे खण्डों में कवि की समस्या है समाज के उत्थान-पतन और आन्दोलन के बीच अपनी रचना के प्रेरक तत्त्वों का अभिज्ञान, रचना कैसे बाहर से अन्दर आती है और फिर कैसे बाहर दूर-दूर तक परिव्याप्त हो जाती है।"
मुक्तिबोध ने 'अँधेरे में' कविता की रचना फैंटेसी में की है।
मुक्तिबोध ने फैंटेसी को निम्न ढंग से परिभाषित किया है-
(1) "ज्ञान गर्भ फैंटेसी द्वारा, सार रूप में, जीवन की पुनर्रचना करता है।"
(2) "फैंटेसी के अन्तर्गत भाव पक्ष प्रधान और विभाव-पक्ष गौण और प्रच्छन्न तो होता ही है, साथ ही यह भाव-पक्ष कल्पना को उत्तेजित करके, बिम्बों की रचना करते हुए, एक ऐसा मूर्त विधान उपस्थित करता है कि जिस विधान में उस विधान ही के नियम होते हैं।"
शमशेर बहादुर सिंह प्रेम और सौन्दर्य के कवि हैं।
शमशेर बहादुर सिंह के प्रमुख काव्य-संग्रह निम्न हैं-
(1) कुछ कविताएँ (1959), (2) कुछ और कविताएँ (1961), (3) चुका भी हूँ नहीं मैं (1975), (4) इतने अपने पास (1980), (5) उदिता अभिव्यक्ति का संघर्ष (1980), (6) बात बोलेगी (1981), (7) काल तुमसे होड़ है मेरी (1988), (8)
कहीं बहुत दूर से सुन रहा हूँ (1995), (9) सुकून की तलाश (1998)।
शमशेर की कविताओं के सन्दर्भ में कुछ महत्वपूर्ण कथन निम्न हैं-
विद्वान
कथन
अज्ञेय - "शमशेर कवियों का कवि हैं।"
मलयज- "शमशेर 'मूड्स' के कवि हैं किसी विजन के नहीं।"
मुक्तिबोध - "शमशेर की आत्मा ने अपनी अभिव्यक्ति का एक प्रभावशाली भवन अपने हाथों तैयार किया है। उस भवन में जाने से डर लगता है-उसकी गम्भीर प्रयत्न साध्य पवित्रता के कारण।"
मुक्तिबोध "शमशेर की मूल मनोवृत्ति एक इंप्रेशनिस्टिक चित्रकार की है।"
मुक्तिबोध - "प्रणय जीवन का प्रसंगबद्ध रसवादी कवि।"
विष्णु खरे - "शमशेर की शमशेरियत"।
रामचन्द्र तिवारी- "शमशेर का गद्य हिन्दी का जातीय गद्य है।"
रामस्वरूप चतुर्वेदी- "भाषा में बोलचाल के गद्य का लहजा, और लय में संगीत का चरम अमूर्तन इन दो परस्पर प्रतिरोधी मनःस्थितियों को उनकी कला साधती है।"
इतिहास
शमशेर बहादुर सिंह ने लिखा है, "टेकनीक में एजरा पाउंड शायद मेरा सबसे बड़ा
आदर्श बन गया था।"
शमशेर का कथन है, "मैं उर्दू और हिन्दी का दोआब हूँ।"
शमशेर बहादुर सिंह की चर्चित कविताएँ निम्न हैं- (1) टूटी हुई बिखरी हुई, (2) अमन का राग (लम्बी कविता), (3) एक पीली शाम, (4) धूप कोठरी के आईने में खड़ी, (5) घिर गया है समय का रथ, (6) समय साम्यवादी।
कहानीकार उदय प्रकाश ने भवानीप्रसाद मित्र को 'कविता का गाँधी' कहा है लेकिन उन्होंने खुद को 'गाँधी का बेटा' कहा है।
भवानीप्रसाद मिश्र के काव्य-संग्रह निम्न हैं-
1. गीत फरोश (1953)
10. परिवर्तन जिये (1976)
2. चकित है दुःख (1968)
11. इद्म न मम् (1977)
3. अँधेरी कविताएँ (1968)
12. त्रिकाल संध्या (1978)
4. गाँधी पंचशती (1969)
13. शरीर कविता फसलें और फूल (1980)
5. बुनी हुई रस्सी (1971)
14. मानसरोवर दिन (1981)
6. खुशबू के शिलालेख (1973
) 15. सम्प्रति (1982)
7. व्यक्तिगत (1973)
16. नीली रेखा तक (1984)
8. अन्तर्गत (1979)
17. तूस की आग (1985)
9. अनाम तुम आते हो (1979)
18. कालजयी (1980) (खण्डकाव्य)
भवानी प्रसाद मिश्र को 'सहजता का कवि' कहा जाता है।
भवानी प्रसाद मिश्र की चर्चित कविताएँ निम्नांकित हैं- (1) कमल के फूल, (2) सतपुड़ा के जंगल, (3) वाणी की दीनता, (4) टूटने का सुख, (5) गीत फ़रोश।
नरेश मेहता नये कवियों में महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्न हैं-(क) काव्य संग्रह- (1) वन पाखी सुनो, (2) बोलने दो चीड़ को, (3) मेरा समर्पित एकांत, (4) चैत्या, (5) उत्सवा। (ख) प्रवन्ध काव्य- (1) संशय की एक रात, (2) महाप्रस्थान, (3) प्रवाद पर्व, (4) शबरी।
'समय देवता' शीर्षक कविता इनकी एक लम्बी कविता है जिसमें धरती के विभिन्न भागों की सांस्कृतिक-राजनीतिक स्थिति का 'सीनिरियो' प्रस्तुत किया गया है।
नरेश मेहता की अन्य चर्चित व महत्वपूर्ण रचनाएँ निम्न हैं-(1) उषस् (1, 2, 3, 4), (2) किरन धेनुएँ, (3) चाहता मन।
धर्मवीर भारती मूलतः प्रेम के कवि हैं। इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं- (1) ठण्डा लोहा (1952), (2) अंधा युग (1955), (3) कनुप्रिया (1959), (4) सात गीत वर्ष (1959), (5) देशान्तर ।
'कनुप्रिया' में राधा और कृष्ण के प्रेम का वर्णन है।
'देशान्तर' काव्य-संग्रह विदेशी कविताओं का संग्रह है।
'प्रेमथ्यु गाथा' एक लम्बी कविता है। प्रेमथ्यु' एक यूनानी पौराणिक पुरुष है।
मदन वात्स्यायन का मूल नाम लक्ष्मीनिवास सिंह है।
सर्वेश्वरदयाल सक्सेना नयी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर हैं। इनकी निम्नांकित कृतियाँ
प्रकाशित हैं-
(1) काठ की घण्टियाँ, (2) बाँस का पुल, (3) एक सूनी नाव, (4) गर्म हवाएँ, (5) कुआनो नदी, (6) कविताएँ-1, (7) कविताएँ-2, (8) जंगल का दर्द, (9)
खुटियों पर टंगे लोग।
सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की चर्चित कविताएँ निम्नांकित हैं-
(1) काफी हाउस में एक मेलोड्रामा, (2) अहं से मेरे बड़ी हो तुम, (3) विगत
प्यार, (4) लिपटा रजाई में, (5) मैंने कब कहा।
केदारनाथ सिंह नयी कविता में बिम्ब को बहुत महत्व देते हैं।
मृत्यु
केदारनाथ सिंह की महत्त्वपूर्ण काव्य कृतियाँ निम्नलिखित हैं-
19/2081
) अभी बिल्कुल अभी
(2 ) जमीन पक रही है. (3) यहाँ से देखो,
(4)
अकाल में सारस, (5) उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ, (6) बाघ (लम्बी कविता), (7) ताल्सताय और साइकिल ।
केदारनाथ सिंह की चर्चित कविताएँ निम्न हैं-
(1) बनारस,
(2) अनागत,
(3) फर्क नहीं पड़ता।
प्रयोगवाद के अन्य कवि और उनकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
कवि
रामविलास शर्मा
काव्य-संग्रह
(1) रूप तरंग (1956), (2) सदियों के सोए जाग उठे (1988), (3) बुद्ध वैराग्य तथा प्रारम्भिक कविताएँ (1997) 1
प्रभाकर माचवे
नेमिचन्द्र जैन
गिरिजा कुमार माथुर
(1) मेपल, (2) स्वप्न भंग, (3) अनुक्षण।
(1) अचानक हम फिर, (2) एकान्त।
(1) मंजीर (1941), (2) नाश और निर्माण (1946), (3) धूप के धान, (4) शिला पंख चमकीले, (5) छाया मत छूना, (6) भीतरी नदी की यात्रा (1975), (7) अभी कुछ और, (8) साक्षी रहे वर्तमान, (9) पृथ्वी कल्प।
भारतभूषण अग्रवाल
(1) छवि के बंधन, (2) जागते रहो, (3) मुक्ति मार्ग, (4) ओ अप्रस्तुत मन, (5) कागज के फूल, (6) एक उठा हुआ हाथ, (7) उतना वह सूरज है, (8) अनुपस्थित लोग।
शकुंत माधुर
(1) चाँदनी चूनर, (2) अभी और कुछ, (3) लहर नहीं टूटेगी।
हरिनारायण व्यास
(1) मृग और तृष्णा, (2) त्रिकोण पर सूर्योदय, (3) बरगद के चिकने पत्ते।
रघुवीर सहाय
(1) सीढ़ियों पर धूप में (1960), (2) आत्महत्या के विरुद्ध (1967), (3) हँसो हँसो जल्दी हँसो (1975), (4) लोग भूल गए हैं (1982), (5) कुछ पते कुछ चिट्ठियाँ (1989), (6) एक समय था।
विजयदेव नारायण साही
(1) साखी, (2) मछलीघर, (3) संवाद तुमसे।
कँवर नारायण
1 (1) चक्रव्यूह (1956), (2) परिवेश: हम तुम (1961).
(3) अपने सामने (1979), (4) कोई दूसरा नहीं (1993), (5) इन दिनों (2002), प्रबन्ध काव्य- (6) आत्मजयो (1965), (7) वाजश्रवा के बहाने (2008)।
साठोत्तरी कविता आन्दोलन
सातवें दशक के आरम्भ में सात कवियों का एक काव्य संग्रह इलाहाबाद से 'विद्रोही पीढ़ी' नाम से प्रकाशित हुआ।
सन् 1963 ई० में जगदीश चतुर्वेदी के सम्पादन में 14 कवियों का काव्य-संग्रह 'प्रारम्भ' शीर्षक से प्रकाशित हुआ जिसमें 'अभिनव काव्य' की स्थापना का दावा किया गया।
'प्रारम्भ' में संकलित 14 कवि निम्न हैं-
1. जगदीश चतुर्वेदी
8. विष्णु चन्द्र शर्मा
2. कैलाश वाजपेयी
9. श्याम मोहन श्रीवास्तव
3. नरेन्द्र धीर
10. मनमोहिनी
4. राजकमल चौधरी
11. रमेश गौड़
5. केशु
12. राजीव सक्सेना
6. ममता अग्रवाल
13. स्नेहमयी चौधरी
7. श्याम परमार
14. नर्मदा प्रसाद त्रिपाठी
जगदीश चतुर्वेदी ने सन् 1964 ई० में डॉ० इन्द्रनाथ मदान एवं रमेश कुन्तल 'मेघ' द्वारा सम्पादित 'अभिव्यक्ति' में 'अभिनव काव्य' को एक नया नाम 'एंटी पोइट्री' या 'अकविता' दिया।
सन् 1965 ई० में श्याम परमार ने 'अकविता' पत्रिका का प्रवर्तन किया। श्याम परमार ही 'अकविता' आन्दोलन के प्रवर्तक हैं।
श्याम परमार ने अकविता को निषेध काव्य से अलग मानते हुए लिखा है, "यह अन्तर्विरोधों को अन्वेषक, विभाजित व्यक्तित्व की शोधक और परिपक्व निर्वैयक्तिकता की द्योतक है।"
सन् 1973 ई० में जगदीश चतुर्वेदी ने 11 कवियों का एक नया काव्य-संकलन 'निधेष' शीर्षक से प्रकाशित करवाया।
'अस्वीकृत कविता' की स्थापना श्रीराम शुक्ल ने 'उत्कर्ष' (जुलाई, 1969) के माध्यम से की।
'बीट जैनरेशन' की स्थापना सर्वप्रथम सन् 1952 ई० में अमेरिका में हुई। इसके प्रवर्तक जैक कैरूआक एवं एलेन गिसवर्ग हैं।
गिसवर्ग की महत्वपूर्ण काव्य कृति 'हाउल' का प्रकाशन सन् 1954 में हुआ।
हिन्दी में 'बीट पीढ़ी' बंगाल की 'भूखी पीढ़ी' के माध्यम से आया। हिन्दी में 'बीट पोढ़ी' का प्रवर्तक राजकमल चौधरी को माना जाता है।
'युयुत्सावादी कविता' आन्दोलन का प्रवर्तन शलभ श्री रामसिंह ने सन् 1965 में कलकत्ता से प्रकाशित 'युयुत्सा' पत्रिका से किया।
'नव प्रगतिशील' काव्यान्दोलन का प्रवर्तन नवल किशोर ने किया।
सन् 1968 ई० में डॉ० रणजीत ने आठ कवियों की रचनाओं का संकलन 'प्रतिश्रुत पीढ़ी' शीर्षक से प्रकाशित करवाया।
'आज की कविता' आन्दोलन का प्रवर्तन हरीश मादानी ने किया।
'वाम कविता' या 'प्रतिवद्ध कविता' आन्दोलन का प्रवर्तन डॉ० परमानन्द श्रीवास्तव ने किया।
'सनातन सूर्योदयी' आन्दोलन का प्रवर्तन वीरेन्द्र कुमार जैन ने 'भारती पत्रिका' के माध्यम से मार्च 1962 में किया।
सन् 1967 में डॉ० रवीन्द्र भ्रमर द्वारा 'सहज कविता' आन्दोलन का प्रवर्तन किया गया।
'संचेतना' पत्रिका के जून 1973 के 'विचार कविता विशेषांक' के माध्यम से 'विचार कविता' आन्दोलन का प्रवर्तन हुआ। 'संचेतना' के तत्कालीन सम्पादक डॉ० महीप सिंह और डॉ० नरेन्द्र मोहन थे।
'साम्प्रतिक कविता' आन्दोलन का प्रवर्तन श्याम नारायण ने किया।
'निर्दिशायामी कविता' का प्रवर्तन सत्यदेव राजहंस ने किया।
'ताजी कविता' का प्रवर्तन लक्ष्मीकांत वर्मा ने किया।
'टटकी कविता' का प्रवर्तन रामवचन राय ने किया।
'समकालीन कविता' आन्दोलन का प्रवर्तन डॉ० विशम्भरनाथ उपाध्याय ने सन् 1976 में अपनी पुस्तक 'समकालीन कविता की भूमिका' के माध्यम से किया।
'कैप्सूल या सूत्र कविता' आन्दोलन का प्रवर्तन डॉ० ओंकारनाथ त्रिपाठी ने किया।
समकालीन कवि और काव्य संग्रह
कवि
काव्य-संग्रह
जगदीश गुप्त (1) नाव के पाँव, (2) शब्द-दंश, (3) हिम बिद्ध, (4) युग्म, (5) छंदशती, (6) आदिम एकांत। दुष्यंत कुमार- (1) सूर्य का स्वागत (1957), (2) आवाजों के घेरे (1963),
(3) जलते हुए वन का वसंत, (4) साये में धूप (1975)। श्रीकांत वर्मा (1) दिनारंभ (1967), (2) माया-दर्पण (1967), (3) जलसा घर (1973), मगध।
राजकमल चौधरी (1) कंकावती, (2) मुक्ति प्रसंग, (3) स्वर गंधा।
रामदरश मिश्र (1) बैरंग बेनाम चिट्ठियाँ, (2) पक गयी है धूप, (3) कंधे पर सूरज, (4) दिन एक नदी बन गया, (5) शब्द सेतु, (6) बारिश में भींगते हुए बच्चे।
सुदामा पाण्डे धूमिल (1) संसद से सड़क तक (1972), (2) कल सुनना मुझे (1976), (3) सुदामा पाण्डे का प्रजातंत्र (1984) 1
चंद्रकांत देवताले - (1) हड्डियों में छिपा ज्वर (1973), (2) दीवारों पर खून से (1975), (3) लकड़बग्धा हँस रहा है (1980), (4) रोशनी के मैदान की तरफ (1982), (5) भूखण्ड तप रहा है (1982), (6) आग हर चीज में बताई गई थी (1987), (7) पत्थर की बेंच (1996), (8) इतनी पत्थर रोशनी (2002), (9) नेगा मौदा (1995), (10) उजाड़ में संग्रहालय (2003), (11) हित्य एवं भाषा का वस्तुनिष्ठ इतिहास
जहाँ थोड़ा-सा सूर्योदय होगा (2008), (12) पत्थर फेंक रहा हूँ (2010)। विनोद कुमार शुक्ल (1) लगभग जयहिन्द (2) वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहिनकर विचार की तरह, (3) सब कुछ होना बचा रहेगा, (4) अतिरिक्त नहीं, (5) कविता से लम्बी कविता, (6) आकाश धरती को खटखटाता है।
भगवत रावत - (1) समुद्र के बारे में (1977), (2) दी हुई दुनिया (1981), (3) हुआ कुछ इस तरह (1988), (4) सुनो हीरामन (1991), (5) अथ रूप कुमार कथा (1992), (6) सच पूछो तो (1996), (7) विथा कथा (1997), (8) हमने उनके घर देखे (2001), (9) ऐसी कैसी नींद (2004), (10) निर्वाचित कविताएँ (2004), (11) कहते हैं कि दिल्ली की है कुछ आबोहवा और (2007), (12) अम्मा से बातें (2008), (13) देश एक राग है (2009)1
लक्ष्मीकांत वर्मा (1) अतुकान्त, (2) तीसरा पक्ष।
लीलाधर जगूड़ी (1) शंखमुखी शिखरों पर, (2) नाटक जारी है, (3) इस यात्रा में, (4) रात अब भी मौजूद है, (5) बची हुई पृथ्वी, (6) घबराए हुए शब्द, (7) भय भी शक्ति देता है, (8) अनुभव के आकाश में चाँद, (9) महाकाव्य के विना, (10) ईश्वर की अध्यक्षता में, (11) खबर का मुँह विज्ञापन से ढँका है।
अशोक वाजपेयी (1) शहर अब भी संभावना है (1966), (2) एक पतंग अनंत में (1984), (3) इतने से (1986), (4) तत्पुरुष (1989), (5) कहीं नहीं वहीं (1991), (6) बहुरि अकेला (1992), (7) थोड़ी-सी जगह (1994), (8) घास में दुबका आकाश (1994), (9) आबिन्यों (1995), (10) जो नहीं है (1996), (11) अभी कुछ और (1998)1
इब्बार रब्बी (1) खाँसती हुई नदी (1969), (2) घोषणा पत्र (1981), (3) लोग बाग (1985), (4) वर्षा में भींगकर (2000)1
लीलाधर मंडलोई- (1) घर-घर घूमा, (2) रात विरात, (3) मगर एक आवाज, (4) काल बाँका तिरछा, (5) देखा-अदेखो, (6) क्षमा याचना, (7) उपस्थित है समुद्र, (8) ये बदमस्ती तो होगी, (१) मन बेपरवाह, (10) लिक्खे में दुःख, (11) एक बहुत कोमल तान।
मलयज- (1) जख्म पर धूल।
कुमार विमल - (1) एक छोटी-सी लड़ाई (1980), (2) रंग खतरे में है (1982)।
विमल कुमार- (1) सपने में एक औरत से बातचीत, (2) यह मुखौटा किसका है, (3) पानी का दुखड़ा।
कैलाश वाजपेयी (1) संक्रांत, (2) देहान्त से हटकर, (3) तीसरा अँधेरा, (4) महास्वप्न का मध्यान्तर, (5) हवा में हस्ताक्षर।
सौमित्र मोहन - (1) लुकमन अली, (2) निषेध, (3) पहचान, (4) चाकू से खेलते हुए।
वीरेन डंगवाल (1) इसी दुनिया में (1991)1
राजेश जोशी (1) समरगाथा (लंबी कविता), (2) एक दिन बोलेंगे पेड़, (3) मिट्टी का चेहरा, (4) नेपथ्य में हँसी, (5) दो पंक्तियों के बीच, (6) चाँद की वर्तनी ।
मंगलेश डबराल (1) पहाड़ पर लालटेन, (2) घर का रास्ता, (3) हम जो देखते हैं, (4) आवाज भी एक जगह है, (5) मुझे दिखा एक मनुष्य।
नरेन्द्र जैन- (1) दरवाजा खुलता है, (2) तोता के लिए कविताएँ, (3) यह मैं हूँ पत्थर, (4) उदाहरण के लिए, (5) सराय में कुछ दिन, (6) काला सफेद में
प्रविष्ट होता है, (7) चौराहे पर लोहार। ऋतुराज - (1) एक मरणधर्मा और अन्य।
मदन कश्यप- (1) लेकिन उदास है पृथ्वी (1992), (2) नीम रोशनी में (2000), (3) कुरूज (2006)।
अरुण कमल (1) अपनी केवल धार (1980), (2) सबूत (1989), (3) नये इलाके में (1996), (4) पुतली में संसार (2001)1
ज्ञानेन्द्रपति (1) आँख हाथ बनते हुए (1970), (2) शब्द लिखने के लिए ही यह कागज बना है (1981), (3) गंगा तट (2000), (4) संशयात्मा (2004), (5) भिनसार (2006)1
कुमार अम्बुज (1) किवाड़ (1992), (2) क्रूरता (1996), (3) अनंतिम (1998), (4) अतिक्रमण (2002), (5) अमीरी रेखा (2011)1
स्वप्निल श्रीवास्तव (1) ईश्वर एक लाठी है, (2) ताख पर दियासलाई, (3) -मुझे दूसरी पृथ्वी चाहिए।
बद्रीनारायण (1) सच सुने कई दिन हुए, (2) शब्द पदीयम, (3) खुदाई में हिंसा।
निलय उपाध्याय (1) अकेला घर हुसैन का, (2) कटौती।
एकांत श्रीवास्तव (1) मिट्टी से कहूँगा धन्यवाद, (2) नागरिक व्यथा, (3) अन्न हैं मेरे शब्द।
बोधिसत्व (1) सिर्फ कवि नहीं (1991), (2) हम जो नदियों का संगम है (2000), (3) दुःख तन्त्र (2004), (4) खत्म नहीं होती बात (2010)।
उदय प्रकाश (1) सुनो कारीगर (1980), (2) अबूतर कबूतर (1984), (3) रात में हारमोनियम, (4) 'क' से कबूतर।
प्रयाग शुक्ल (1) यह लिखता हूँ, (2) बीते कितने वरस, (3) कविता 93
रमेशचन्द्र शाह- (1) कछुए की पीठ पर, (2) हरिश्चन्द्र आओ, (3) नदी भागती आयी, (4) प्यारे मुचकुन्द, (5) देखते हैं शब्द भी अपना समय
बलदेव वंशी (1) अँधेरे के बावजूद, (2) बच्चे की दुनिया, (3) कोई आवाज नहीं, (4) उपनगर में वापसी, (5) वाक गंगा।
आलोक धन्वा (1) दुनिया रोज बनती है।
श्रीराम वर्मा (1) कालपात्र।
प्रमुख समकालीन महिला कवयित्री
कवयित्री
काव्य-संग्रह
कात्यायनी (1) चेहरों पर आँच, (2) सात भाइयों के बीच चंपा, (3) इस इतिहास
पौरूष पूर्ण समय में, (4) जादू नहीं कविता, (5) राख अँधेरे को बारिश में, (6) फुटपाथ पर कुर्सी।
अनामिका (1) गलते पत्तों की चिट्ठी, (2) बीजाक्षर, (3) समय के शहर में, (4) अनुष्टुप, (5) कविता में औरत, (6) खुरदरी हथेलियाँ।
नीलेश रघुवंशी (1) घर निकासी (1997), (2) पानी का स्वाद।
इंदु जैन- (1) आँख से भी छोटी चिड़िया, (2) हमसे पहले भी लोग यहाँ थे, (3) हवा की मोहताज क्यूँ रहूँ?, (4) कौन तेरा कौन-सा, (5) कुछ न कुछ
टकराएगा जरूर।
मैत्रेयी पुष्पा (1) लकीरें।
गगन गिल - (1) एक दिन लौटेगी लड़की, (2) अँधेरे में बुड्ढा, (3) यह आकांक्षा समय नहीं, (4) थपक थपक दिल थपक-थपक।
अर्चना वर्मा - (1) कुछ दूर तक, (2) लौटा है विजेता।
पद्मा सचदेव (1) मेरी कविता मेरे गीत।
जया जादवानी (1) मैं शब्द हूँ. (2) अनन्त सम्भावनाओं के बाद भी।
गीताश्री (1) कविता जितना हक।
नीरजा माधव (1) प्रथम छंद से स्वप्न, (2) प्यार लौटाना चाहेगा, (3) प्रस्थानत्रयी।
वर्तिका नंदा (1) मरजानी।
प्रयोगवादी कवियों की महत्वपूर्ण काव्य पंक्तियाँ
(क) अज्ञेय
(1) वही परिचित दो आँखें ही चिर माध्यम हैं सब आँखों से सब दर्दो से मेरे लिए परिचय का।
(2) यह दीप अकेला स्नेह भरा, है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति दे दो।
(3) किन्तु हम हैं द्वीप।
हम धारा नहीं हैं।
स्थिर समर्पण है हमारा हम सदा से द्वीप हैं स्रोतस्विनी के।
(4) हम निहारते रूप,
काँच के पीछे
हाँफ रही है मछली
(5) साँप ! तुम सभ्य तो हुए नहीं-नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया।
तब कैसे सोखा हँसना-विष कहाँ पाया ?
(6) भोर का बावरा अहेरी पहले बिछाता है आलोक की लाल-लाल कनिया।
(7) मौन भी अभिव्यंजना है जितना तुम्हारा सच है उतना ही कहो।
(8) अगर मैं तुमको लजाती साँझ के नभ की अकेली तारिका अब नहीं कहता
ये उपमान मैले हो गये हैं। देवता इन प्रतीकों के कर गए हैं कूच !
(9) मूत्र सिचित मृत्तिका के वृत्त में तीन टाँगों पर खड़ा नतग्रीव धैर्यधन गदहा।
(10) यह अनुभव अद्वितीय जो केवल मैंने जिया सब तुम्हें दिया
(11) आह, मेरा श्वास है उत्तप्त धमनियों में उमड़ आयी है लहू की धार प्यार है अभिशप्त तुम कहाँ हो नारि।
(12) अहं! अन्तर्गुहा वासी! स्वरति ! क्या मैं चीन्हता कोई न दूजी राह ?
(13) वंचना है चाँदनी झूठ वह आकाश का निरवधि गहन विस्तार शिशिर की राका निशा की शान्ति है निस्सार !
(14) एक तीक्ष्ण अपांग से कविता उत्पन्न हो जाता है एक चुंबन में प्रणय फलीभूत हो जाता है पर मैं अखिल विश्व का प्रेम खोजता फिरता हूँ। क्योंकि मैं उसके असंख्य हृदयों का गाथाकार हूँ।
(ख) मुक्तिबोध
(1) हर एक छाती में आत्मा अधीरा है प्रत्येक सुस्मित में, विमल सदानीरा है मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक वाणी में महाकाव्य-पौड़ा है।
'अँधेरे में' से
(2) ओ मेरे आदर्शवादी मन. ओ मेरे सिद्धान्तवादी मन
उदरम्भरि अनात्म बन गये भूतों की शादी में कनात से तन गये।
(3) बहुत-बहुत ज्यादा लिया, दिया बहुत-बहुत कम मर गया देश, अरे, जीवित रह गए तुम !!
(4) अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे। तोड़ने होंगे मठ और गढ़ सभी।
(5) कविता में कहने की आदत नहीं है, पर कह दूँ वर्तमान समाज चल नहीं सकता। पूँजी से जुड़ा हुआ हृदय बदल नहीं सकता।
(6) खोजता हूँ पठार-पहाड़, समुन्दर जहाँ मिल सके मुझे मेरी वह खोयी हुई परम अभिव्यक्ति अनिवार आत्म-संभवा।
(ग) शमशेर बहादुर सिंह
(1) चूका भी हूँ मैं नहीं कहाँ किया मैंने प्रेम अभी जब करूँगा प्रेम पिघल उठेंगे युगों के भूधर उफन उठेंगे सात सागर किन्तु मैं हूँ मौन आज !
(2) एक पीली शाम पतझर का जरा अटका हुआ पत्ता X X अब गिरा अब गिरा वह अटका हुआ आँसू संध्या-तारक-सा अतल में।
(3) बात बोलेगी हम नहीं भेद खोलेगी बात ही।
(4) घिर गया है समय का रथ कहीं। लालिता से मढ़ गया है राग। भावना की तुंग लहरें पंथ अपना अन्त अपना जान रोलती हैं मुक्ति के उद्गार।
(5) हाँ, तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं... जिनमें वह फँसने नहीं आतीं, जैसे हवाएँ मेरे सीने से करती हैं जिसको वह गहराई तक दबा नहीं पातीं, तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मैं तुमसे करता हूँ।
(घ) भवानी प्रसाद मिश्र
(1) जी हाँ हजूर, मैं गीत बेचता हूँ, मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ।
(2) टूटने का सुख :
बहुत प्यारे बन्धनों को आज झटका लग रहा है, टूट जायेंगे कि मुझको आज खटका लग रहा है।
(3) सतपुड़ा के घने जंगल नींद में डूबे हुए से, उँघते अनमने जंगल।
(4) फूल लाया हूँ कमल के। क्या करूँ इनका ? पसारें आप आँचल, छोड़ दूँ; हो जाए जी हल्का !
(ङ) धर्मवीर भारती
(1) सृजन की थकन भूल जा देवता ! अभी तो पड़ी है धरा अधबनी।
(2) इन फ़ीरोज़ी होठों पर बरबाद मेरी जिन्दगी !
(3) अगर मैंने किसी के होठ के पाटल कभी चूमे अगर मैंने किसी के नैन के बादल कभी चूमे महज़ इससे किसी का प्यार मुझ पर पाप कैसे हो! महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो!
(च) रघुवीर सहाय
(1) राष्ट्रगीत में भला कौन वह भारत भाग्य विधाता है। फटा सुथन्ना पहने जिसका गुन हर चरना गाता है।
(2) मैं अपनी एक मूर्ति बनाता हूँ और एक ढहाता हूँ और आप कहते हैं कि कविता की है।
(3) कितना अच्छा था छायावादी
एक दुःख लेकर वह गान देता था
कितना कुशल था प्रगतिवादी
हर दुःख का कारण पहचान लेता था।
(छ) सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
(1
) लीक पर वे चलें जिनके चरण दुर्बल और हारे हैं हमें तो हमारी यात्रा से बने ऐसे अनिर्मित पंथ प्यारे हैं।
(2
) लोकतंत्र को जूते की तरह लाठी में लटकाए भागे जा रहे हैं सभी सीना फुलाए।
(3) मैं नया कवि हूँ-इसी से जानता हूँ सत्य की चोट बहुत गहरी होती है।
(ज) केदारनाथ सिंह
(1)
मैंने जब भी सोचा मुझे रामचंद्र शुक्ल की मूँछें याद आई।
(2) मैं पूरी ताकत के साथ शब्दों को फेंकना चाहता हूँ।
समकालीन कवियों की महत्वपूर्ण काव्य पंक्तियाँ
(क) दुष्यंत कुमार
(1) कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए, कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।
(2) हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
(
3) मत कहो आकाश में कुहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।
दामा पाण्डे 'धूमिल'
(1) यह जनतंत्र
जिसकी रोज सैकड़ों बार हत्या होती है और हर बार वह भेड़ियों की जुबान पर जिन्दा है
हास
आधु
(2)
अपने यहाँ संसद तेली की वह घानी है जिसमें आधा तेल है आधा पानी है।
(3)
भूख से रिरियाती हुई हथेली का नाम दया है
और भूख से तनी हुई मुट्ठी का नाम नक्सलवाड़ी है।
(4)
हाँ, हाँ, मैं कवि हूँ कवि-यानी भाषा में भदेस हूँ।
(5)
कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है।
(6)
भाषा उस तिकड़मी दरिन्दे की कौर है
जो सड़क पर और है।
(7)
क्रांति यहाँ के असंगत लोगों के लिए किसी अबोध बच्चे के हाथों की जूजी है।
(8)
एक सही कविता पहले एक सार्थक वक्तव्य होती है।
(9)
कविता शब्दों की अदालत में अपराधियों के कटघरे में खड़े एक निर्दोष आदमी का हलफनामा है।
(10)
अब उसे मालूम है कि कविता घेराव में किसी बौखलाए हुए आदमी का संक्षिप्त एकालाप है।
(11)
जिस पर कोई नहीं खाना चाहता आजादी एक जूठी थाली है।
(12)
नंगापन अंधापन होने के खिलाफ एक सख्त कार्यवाही है।
(13) दरअस्ल, अपने यहाँ जनतंत्र एक ऐसा तमाशा है जिसकी जान मदारी की भाषा है।
(14) मेरी निगाह में
न कोई छोटा है न बड़ा है मेरे लिए हर आदमी एक जोड़ी जूता है जो मेरे सामने मरम्मत के लिए खड़ा है।
नवगीत
हिन्दी में 'नवगीत' परम्परा का आरम्भ राजेन्द्र प्रसाद सिंह द्वारा सन् 1958 में सम्पादित 'गीतांगिनी' शीर्षक नवगीत संकलन से माना जाता है। डॉ० गणपतिचन्द्र गुप्त ने राजेन्द्र प्रसाद सिंह को हिन्दी नवगीत का प्रवर्तक माना है। विद्वानों की दृष्टि में 'नवगीत' का अर्थ इस प्रकार है-
विद्वान
नवगीत का अर्थ
वीरेन्द्र मिश्र - "नवगीत आस्थाशील अनुभूतियों का निर्बन्ध समवेत स्वर है।"
उमाकांत मालवीय - "नवगीत काव्य जगत में व्याप्त अराजकता के मध्य मर्यादा का जयघोष है।"
रवीन्द्र भ्रमर- "नवगीत रागात्मक चेतना का पर्याग है।"
माहेश्वर तिवारी-"नवगीत अपने समय की आधुनिकता बोध से सम्पन्न समाज संपृक्त छांदसिक रचना है।"
श्रीकृष्ण तिवारी - "नवगीत हिन्दी कचिता की खोई हुई अस्मिता की तलाश है।"
सोम ठाकुर- "नवगीत सामाजिक पलायन के विरुद्ध है। यह व्यवस्था में जूझता हुआ, भीड़ की तरह हर इकाई को सुनता है और उसकी आवाज पर पूरे दायित्व के साथ क्रियाशील रहता है।"
हेन्दी के प्रमुख नवगीतकार और उनका नवगीत-संकलन निम्न है-
विगीतकार
नवगीत-संकलन
डॉ० शम्भूनाथ सिंह- (1) रूप रश्मि, (2) छायालोक, (3) मन्यन्तर, (4) दयाचल (1946), (5) दिवालोक (1951), (6) समय की शिला पर 1968), (7) जहाँ दर्द नील है (1977)।
रिन्द्र मिश्र (1) गीतम, (2) लेखनी-बेला, (3) अविराम चल मधुवन्ति।
रज (1) संघर्ष (1944), (2) अन्तर्थान (1946), (3) विभावरी 1951), (4) प्राण-गीत (1954), (5) दर्द दिया है (1956), (6) बादर बरस वो (1958), (7) नीरज की पाती (1958), (8) नदी किनारे (1958), (9) गीत (1958), (10) आसावरी (1958), (11) लहर पुकारे (1959), (12) तकी (1960), (13) गीत भी अगीत भी।
रामनाथ अवस्थी (1) आग और फराना।
रामावतार त्यागी (1) नया खून (1953), (2) আসুন করল (1958) (3) गुलाव और बबूल बन (1973), (4) गाता हुआ (1994)
रामानंद दोषी (1) गीले पैख (1959)।
बालस्वरूप राही - (1) मे रवीन्द्र भ्रमर (1) रवीन्द्र प्रमर के गीद (2) मौन महनने मन कर्त।
(2) जो नितान्ना ने है
राजेन्द्र प्रसाद सिंह- (1) भूमिका (1950), (2) কিকত্ব (৩) কালীদ সর (1965), (4) आश्री खुली चार (1972), (5) भरी गरज आधी रात का (1981): पर (1990) (6)
उमार्कात मालवीय (1) पैदी और महावर (2) मुलाक
ठाकुर प्रसाद सिंह- (1) वंशी और मादल।
देवेन्द्र शर्मा 'ईद्र'- (1) पथरीले शोर में (2) पैसा (3) सुট प्रत्यंचा, (4) यात्रा में माथ-साथ।
कुँवर बेचैन (1) पिन बहुत सारे (1972), (2) तिरस्कल दौडल (1978), (3) शामियाने काँच के (1983), (4) मजाक (1983)
रमेश रंजक (1) किरनी के पाँव (2) गट কিসে রবনা, (৩) রনদল বাদী टूटेगा, (4) मिट्टी चोन्नती है (5) इतिहास दुभाग लिन्छ।
नईम-पथगई आँखें।
माहेश्वर तिवारी (1) हरसिंगार कोई ती ही।
नचिकेता (1) आदमकद खर्वी (2) सुलग फर्माने।
युद्धिनाथ मिश्र (1) जाल फैका रे मरे।
डॉ० शम्भूनाथ सिंह ने 'नवगीत दशक' (1, 2, 3) सीर्षक में विभित्र नतिकारों के गीतों का संकलन किया।
डॉ० चन्द्रदेव सिंह ने 'पाँच जोड़ बाँसुरी' शीर्षक नवगीत संकलन का साम्सदन किया।
छायावादोत्तरकालीन व्रजभाषा काव्य
कवि
अमृतलाल चतुर्वेदी
बलदेव प्रसाद मिश्र
काव्य
(1) श्याम संदेसी, (2) गालिथ अमृत।
(1) श्रृंगार शतक, (2) वैराग्य जतव्य (3) स्याम सताक
(1958)
४८० रसाल
(1) अजममोचन, (2) रमालमंजरी, (३) उद्धव मदक
हृषीकेश चतुर्वेदी
(1) रामकृष्ण काव्य (1943)
सेयकेन्द्र त्रिपा
(1) अजवर्तिका (1965)
लक्ष्मीनारायण सिंह 'ईश' (1) संकादहन (1950) (खण्डकाव्य)
गोपालप्रसाद व्यास
(1) रंग, जंग और वर्दग्य (1966)
अखिलेश त्रिवेदी
(1) गंगा सहरी (1947)
हिन्दी ग़ज़ल
गजल अरबी भाषा का स्त्रीलिंग शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है प्रेमी तथा प्रेयसी का वार्तालाप।
गजल की कुछ परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-
विद्वान
परिभाषा
हिन्दी साहित्य कोश- "ग़ज़ल का अर्थ नारियों से प्रेम की बात करना।"
फिराक गोरखपुरी- "ग़ज़ल असंबद्ध कविता है। ग़ज़ल का मिजाज मूलतः समर्पणवादी है।"
शमशेर बहादुर सिंह- "ग़ज़ल एक लिरिक विधा है जिसकी कुछ अपनी शर्ते हैं।
अपना प्रतीकवाद और जीवन्त परम्परा है।"
डॉ० रोहिताश्व अस्थाना ने अमीर खुसरो (1253-1325 ई०) को हिन्दी गजल का प्रवर्तक स्वीकार किया है। इनकी ग़ज़लों में आबद्ध शेर भाषा की दृष्टि से हिन्दी और फारसी का संगम प्रस्तुत करते हैं।
कुछ विद्वान कबीरदास को हिन्दी ग़ज़ल का आदि प्रवर्तक मानते हैं।
आधुनिक हिन्दी गजल का प्रवर्तक दुष्यंत कुमार (1933-1975) को माना जाता है।
दुष्यंत कुमार का मूलनाम दुष्यंत नारायण त्यागी था। प्रारम्भ में ये 'परदेशी' तथा 'अनुरागी' उपनाम से कविताएँ लिखते थे।
दुष्यंत कुमार को 'हिन्दी ग़ज़ल सम्राट' भी कहा जाता है।
हिन्दी के कुछ महत्त्वपूर्ण ग़ज़ल संग्रह निम्नांकित हैं-
गजलकार
संग्रह
रामेश्वर शुक्ल अंचल
(1) इन आवाजों को ठहरा लो
हरिकृष्ण प्रेमी
(1) रूप दर्शन, (2) रूपरेखा
शमशेरबहादुर सिंह
(1) सुकून की तलाश
त्रिलोचन शास्त्री
(1) गुलाब और बुलबुल
दुष्यंत कुमार
(1) साये में धूप
गोपालदास 'नीरज'
(1) नीरज की पाती
रामदरश मिश्र
(1) हँसी ओठ पर आँखें नम है, (2) बाजार को निकले हैं लोग।
कुँवर बेचैन
(1) शामियाने काँच के, (2) पत्थर की बाँसुरी, (3)
महावर इन्तजारों का, (4) रस्सियाँ पानी की।
रामकुमार कृषक
(1) नीम की पत्तियाँ
माधव मधुकर
(1) सूर्य का सवाल, (2) आग का राग
ज्ञान प्रकाश विवेक
(1) धूप के हस्ताक्षर
अदम गोण्डवी
(1) धरती की सतह पर, (2) समय से मुठभेड़
विज्ञानव्रत
(1) बाहर धूप खड़ी है, (2) चूप की आवाज, (3) जैसे
कोई लौटेगा।
1
सो
स
आधुनिक
महेश अश्क
(1) राख की जो पर्त अंगारों पर है।
राजेश रेड्डी
(1) उड़ान, (2) वुजूद, (3) आसमान से आगे
देवेन्द्र कुमार आर्य
(1) किताब के बाहर।
हिन्दी ग़ज़ल के चर्चित शेर
(क) अमीर खुसरो
(1) शबाने हिजरां दराज यू जुल्फ बरोजे वसला चू उम्र कोताह, सखी पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूं अँधेरो रतिया।
(ख) जयशंकर प्रसाद
(1) सरासर भूल करते हैं, उन्हें जो प्यार करते हैं, बुराई कर रहे हैं और अस्वीकार करते हैं। उन्हें अवकास ही इतना कहाँ है मुझसे मिलने का, किसी से पूछ लेते हैं यह उपकार करते हैं।
(ग) गोपालदास 'नीरज'
(1) समय ने जब अँधेरों से दोस्ती की है जला के अपना ही घर, हमने रोशनी की है।
(2) बदन पे जिसके शराफत का पैरहन देखा, वो आदमी भी यहाँ हमने बदचलन देखा ॥
(घ) रामदरश मिश्र
(1) बाजार को निकले हैं लोग बेच के घर को। क्या हो गया है जाने आज मेरे शहर को ॥
(ङ) कुँवर बेचैन
(1) अपने मन में ही अचानक यू सजल हो जायेंगे। क्या ख़बर थी आपसे मिलकर ग़ज़ल हो जायेंगे ॥
(2) जब तेरी याद ने सीने से लगाया मुझको। याद आकर भी कोई याद न आया मुझको ॥
दलित कविता का विकास
संत रैदास को हिन्दी का प्रथम दलित कवि माना जाता है।
आधुनिक युग के दलित कवियों में प्रथम नाम हीरा डोम और स्वामी अछूतानन्द का लिया जाता है।
७ वास्तव में, दलित विद्वानों ने सन् 1914 ई० में 'सरस्वती पत्रिका' में प्रकाशित हीरा डोम की कविता 'अछूत की शिकायत' को हिन्दी की प्रथम दलित कविता माना है।
हिन्दी में प्रकाशित अन्य दलित काव्य संग्रह और कवि निम्न हैं-
कवि
हौरा डोम
काव्य-संग्रह
अछूत की शिकायत (1914)
बिहारीलाल हरित
(1) अछूतों का पैगम्बर (1946), (2) चमार हूँ मैं
(1975)
गोपाल प्रसाद
डॉ० धर्मवीर
ओमप्रकाश वाल्मीकि
मंसाराम विद्रोही
मलखान सिंह
जयप्रकाश कर्दम
कर्मशील भारती
सुशीला टकभौरे
सोहनपाल सुमनाक्षर
श्यौराज सिंह बेचैन
कंवल भारती
एन० सिंह
कुसुम वियोगी
निर्मला पुतुल
पुरुषोत्तम सत्य प्रेमी
रजनी तिलक
दयानन्द बटोही
सी०बी० भारती
सुखवीर सिंह
लक्ष्मीनारायण सुधाकर
श्याम सिंह शशि
सूरजपाल चौहान
भीमसागर-एन०आर० सागर
सुदेश तनवर
ईश कुमार गंगानिया
चिरंजीलाल कटारिया
मनोज सोनकर
सूपर्णखा (1986) (खण्डकाव्य)
हीरामन (1987)
(1) सदियों का संताप (1989), (2) बस्स बहुत हो चुका! (1997), (3) अब और नहीं (2009)
(1) दलित पचासा (1989)
(1) सुनो ब्राह्मण (1995)
(1) गूँगा नहीं था मैं (1997)
(1) कलम को दर्द कहने दो (2000)
(1) स्वाति बूँद और खारे मोती (1993). (2) तुमने
उसे कब पहचाना
(1) सिन्धु घाटी बोल उठी
(1) नई फसल, (2) क्रौंच हूँ मैं
(1) तब तुम्हारी निष्ठा क्या होती
(1) दर्द के दस्तावेज, (2) मतह से उठते हुए
(1) टुकड़े-टुकड़े दंश. (2) व्यवस्था के विषधर
(1) अपने घर की तलाश (2004)
द्वार पर दस्तक
करोड़ों पद चाप हूँ
यातना की आँखें
आक्रोश
बयान बाहर
उत्पीड़न की यात्रा
एकलव्य और अन्य कविताएँ
(1) प्रयास, (2) क्यों विश्वास करूँ (2004)
(1) हम आजाद हैं
(1) रात के इस शहर में (1991), (2) नियति नहीं
यह मेरी (1999)
(1) हार नहीं मानूँगा
(1) शब्द थके जरूर हैं
(1) गजल गंध (2001)
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