Part-2 हिंदी भाषा एवं साहित्य का वास्तुंनिस्ट इतिहास बाय सरस्वती पांडे गोविंद पांडे बुक इन हिंदी (बुक, सरस्वती पांडे गोविंद पांडे)

हिन्दी व्युत्पत्ति और अर्थ 'हिन्दी' शब्द की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में निम्नलिखित मत प्रचलित है- (1) परम्परावादी संस्कृत पण्डितों के अनुसार, हिन्दी- हिन् (नष्ट करना) दु (दुष्ट)। अर्थात हिन्दु का अर्थ है जो दुष्टों का विनाश करे (हिनस्ति दुष्टान्। (2) शब्द कल्पद्रुम के अनुसार, 'हिन्दू' शब्द 'हीन दुषडु' से बना है जिसका अर्थ है 'होनों को दूषित करने वाला (हीन दूषयति)। (नौट ये दोनों मत कल्पना प्रसूत है।) डॉ० भोलानाथ तिवारी के अनुसार 'हिन्दु' शब्द का प्राचीनतम प्रयोग 7वीं सदी के अन्तिम चरण के ग्रन्य 'निशीथचूर्णि' में प्रथम बार मिला है। हिन्दु शब्द फारसी है जो संस्कृत शब्द सिन्धु का फारसी रूपान्तरण है। 'सिन्धु' शब्द का प्रथम प्रयोग ऋग्वेद में सामान्य रूप से नदी (सप्त सिंधवः) नदी विशेष तथा नदी के आस पास के प्रदेश के लिए हुआ है। प्रदेश ईरानी लोगों के हाथों में था। 500 ई० पू० के आस-पास दारा प्रथम के काल में सिन्धु नदी का स्थानीर संस्कृत के 'सिन्धु' का ईरानी में हिन्दु हो गया जो सिन्धु नदी के आस पास के प्रदेश के अर्थ में प्रयुक्त हुआ। कालान्तर में आर्थिक विकास के साथ 'हिन्दु' का अर्थ 'भारत' हो गया। इस 'इ' पर बलाघात के कारण अन्त्य 'उ' का लोप हो गया। (हिन्दु-हिन्द)। 'हिन्द' शब्द में विशेषणार्थक प्रत्यय 'ईक' जोड़ने से 'हिन्दीक' शब्द स जिसका अर्थ है 'हिन्द का'। कालान्तर में 'क' लुप्त हो जाने से 'हिन्दी' शब्द बना। 'हिन्दी' व्याकरण को दृष्टि से विशेषण है जिसका मूल अर्थ (सं०) सिन्धु (अवे०) हिन्दु हिन्द हिन्दीक हिन्दी। ग्रीक लोगों ने सिन्धु नदी को 'इन्दोस', यहाँ के निवासियों को 'इन्दोई' प्रदेश को 'इन्दिके' अथवा 'इन्दिका' नाम से सम्बोधित किया। 'इन्दिका' शब्द अंग्रेजी में 'इण्डिया' हो गया। किसी भी प्राचीन भारतीय आर्यभाषा में 'हिन्दी' का प्रयोग नहीं मिलता। केवल कालकाचार्य द्वारा लिखित जैन महाराष्ट्री में 'हिन्दुग' शब्द मिलता (जैसे- "सूरिणा भणियम् रामाणो जेण हिन्दुग देसम् बच्चामो")। भाषा के अर्थ में हिन्दी शब्द का प्रयोग व विकास भाषा के अर्थ में 'हिन्दी' का प्रयोग फारस और अरब से होता है। ईरान के बादशाह नौशेरवाँ (531-579 ई०) ने अपने दरबारी हकीम बक को भारतीय ग्रन्थ 'पंचतन्त्र' का अनुवाद करने के लिए नियुक्त किया। वाजरोया ने 'कर्म और दमनक' के आधार पर अपने अनुवाद का नाम 'कलीला व दिमना' रखा। 'कलीला व दिमना' की भूमिका नौशेरवाँ के मन्त्री बुजर्च मिहर ने लिखी। में कहा गया कि यह अनुवाद 'जबाने-हिन्दी' से किया गया है। अरबी-फारसी में 'जबाने-हिन्दी' शब्द का प्रयोग सम्भवतः भारत की भाषाओं संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश के लिए मिलता है। भारत के फारसी कवि ऑफी ने सर्वप्रथम सन् 1228 ई० में 'हिन्दवीं' का प्रयोग समस्त भारतीय भाषाओं के लिए न करके भारत की (सम्भवतः मध्यदेश देशी भाषाओं के लिए किया। तैमूरलंग के पोते शरफुद्दीन यज्दी ने सन् 1424 ई० में अपने ग्रन्थ 'जन में विदेशों में 'हिन्दी भाषा' के अर्थ में 'हिन्दी' शब्द का प्रथम प्रयोग किया। ☐ डॉ० धीरेन्द्र वर्मा द्वारा सम्पादित 'हिन्दी साहित्य कोश' (भाग-1 के *13-14वीं शती में देशी भाषा को 'हिन्दी' या 'हिन्दकी' या 'हिन्दई' नाम देने में ज हसन या अमीर खुसरो का नाम सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।" डॉ० भोलानाथ तिवारी एवं उदय नारायण तिवारी ने भाषा के अर्थ में खुसरो द्वारा प्रयुक्त 'हिन्दी' को संदिग्ध माना है। उक्त दोनों विद्वानों ने 'हिन्दी' शब्द के प्रयोग को 'भारतीय मुसलमान' के अर्थ में रेखांकित किया है। डॉ० भोलानाथ तिवारी ने लिखा है, 'खुसरो ने 'हिन्दी' शब्द का प्रयोग भारतीय मुसलमानों के लिए किया है और 'हिन्दवी' शब्द का 'मध्यदेशीय भाषा' के लिए यह 'हिन्दवी' शब्द वस्तुतः 'हिन्दुवी' या 'हिन्दुई' है। हिन्दूई अर्थात् हिन्दुओं की भाषा। 'हिन्दुवी' शब्द के प्रयोग के कुछ दिन बाद 'हिन्दी' (अर्थात् भारतीय मुसलमानों) की भाषा के लिए कदाचित 'हिन्दी' शब्द चल पड़ा।" हिन्दी कवि नूर मुहम्मद ने लिखा है- "हिन्दू मग पर पाँव न राखौं। का जो बहुतै हिन्दी भाख्यौं।।" 18वीं सदी तक 'हिन्दी' मुसलमानों की भाषा न रहकर हिन्दुओं की भाषा की ओर झुक रहा था। 19वीं सदी मध्य के पूर्व तक 'हिन्दी' का प्रयोग 'उर्दू' या 'रेख्ता' के समानार्थी रूप में चल रहा था। 'उर्दू' मूलतः तुर्की शब्द है जिसका अर्थ है 'शाही शिविर' या 'खेमा'। डॉ० ग्राहम बेल तथा डॉ० ताराचन्द आदि का कहना है कि 'उर्दू' का भाषा के निश्चित अर्थ में सबसे पुराना प्रयोग मुसह‌फ़ी में मिलता है- "खुदा रक्खे जबाँ हमने सुनी है, मीर-वो-मिरजा की, कहें किस मुँह से हम मुसहफी 'उर्दू' हमारी है।" प्रो० आजाद ने 'आबे हयात' में ब्रजभाषा से उर्दू का जन्म माना है 'रेख्ता' का फारसी में अर्थ 'गिरा हुआ' या 'गिराकर बनाया हुआ ढेर' है। भारत में 'रेख्ता' शब्द का प्रयोग पहले छंद और संगीत के क्षेत्र में हुआ। 'रेख्ता' नाम 18वीं सदी से प्रारम्भ होकर लगभग 19वीं सदी के मध्य तक उर्दू के लिए चलता रहा। हिन्दी का नवीन अर्थ में लिखित प्रयोग सर्वप्रथम कैप्टिन टेलन ने सन् 1812 ई० में फोर्ट विलियम कालेज के वार्षिक विवरण में किया। वर्तमान में 'हिन्दी' शब्द मुख्यतः निम्न अर्थों में प्रयुक्त हो रहा है- (1) हिन्दी साहित्य के इतिहास ग्रन्थों में 'हिन्दी' का अर्थ है- हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा बिहार की भाषा। इस पूरे क्षेत्र को 'हिन्दी प्रदेश' कहते है। (2) वर्तमान भारतीय साहित्य में 'हिन्दी' शब्द भारतीय संघ की राजभाषा (संघ की राजभाषा देवनागरी लिपि में हिन्दी होगी- भारतीय संविधान, अनुच्छेद 343) तथा राष्ट्रभाषा के नाम का द्योतक है। Ecay हिन्दी की बोलियाँ जा सकता है-हिन्दी और उसकी उपभाषाओं तथा बोलियों का वर्गीकरण निम्न ढंग से किय अपभ्रंश उपभाषा आकार बहुल- बोली कौरवी पश्चिमी हिन्दी- हरियाणी या बाँगरु दक्खिनी - ओकार बहुल- ब्रजभाषा बुन्देली नकुक शौरसेनी अपभ्रंश- - मारवाड़ी जयपुरी या ढूँढ़ाडी राजस्थानी हिन्दी-ट वर्ग बहुला मेवाती मालवी पेजमा मा पहाड़ी हिन्दी कुमाऊनी गढ़वाली अर्धमागधी पूर्वी हिन्दी अवधी बघेली छत्तीसगढ़ी छन्तीक मागधी बिहारी हिन्दी भोजपुरी मगही मैथिली मै म भो डॉ० भोलानाथ तिवारी ने पश्चिमी हिन्दी के अन्तर्गत दो अन्य बोलिय हिन्दी भाषा की प्रमुख बोलियों के अन्य नाम एवं उसकी उपबोलियाँ निम्नांकि ताजुब्बेकी तथा निमाड़ी को भी स्वीकार किया है। हैं- बोली अन्य नाम उपबोलियाँ हरियाणी बाँगरू, देसवाली जाटू, चमरवा ब्रजभाषा अन्तुर्वेदी भुक्सा, जादोवाटी, डांगी बुन्देली बुन्देलखण्डी पॉवरी, बनाफरी, लोधान्ती, निभट्ठा अवधी कोशली, बैसवाड़ी जोलहा, गहोरा, जूड़र कौरवी खड़ी बोली छत्तीसगढ़ी खुल्टाही, लरिया बघेली रीवाई निबट्ठा डिंगल भाटभाषा पिंगल नागभाषा हिन्दी की प्रमुख बोलियों के नामकरण कर्ता निम्नांकित हैं- बोली नामकरणकर्ता कौरवी राहुल सांकृत्यायन ब्रजबुली ईश्वरचन्द्र गुप्त राजस्थानी (भाषा) ग्रियर्सन डिंगल बाँकीदास बिहारी भोजपुरी ग्रियर्सन मैथिली रेमण्ड कोलब्रुक हिन्दी की प्रमुख बोलियों का क्षेत्र अग्रांकित है- विशिष्टता बोली बोली क्षेत्र (क) ओकारबहुला 1 ब्रजभाषा मथुरा, आगरा, अलीगढ़, बरेली, बदायूँ, एटा, मैनपुरी, गुड़गावाँ, भरतपुर, करौली। 2 बुंदेली उ० प्र० झाँसी, उरई, जालौन, हमीरपुर, म० प्र०- सागर, ओरछा, दतिया, होशंगाबाद। 3 कन्नौजी इटावा, फर्रुखाबाद, हरदोई, पीलीभीत, शाहजहाँपुर, कानपुर। 4 मारवाड़ी जांधपर, अजमेर, किशनगढ़, जैसलमेर। 5 कुमाऊनी नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़। 6 गढ़वाली टिहरी, गढ़वाल, चमोली, उत्तरकाशी। 7 मालवी उज्जैन, प्रतापगढ़, रतलाम, इन्दौर, देवास। (ख) आकार बहुला । कौरवी बिजनौर, रामपुर, मुरादाबाद, मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, दिल्ली, गाजियाबाद। 2 दक्खिनी । दक्षिण भारत (बीजापुर, गालकुण्डा, अहमद नम्र हैदराबाद)। (ग) उदासीन आकार बहुला 1 अवधी अयोध्या, लखीमपुर खीरी, बहराइच, गौ बाराबंकी, लखनऊ, सीतापुर उन्नाव सुल्तानपुर, रायबरेली, इलाहाबाद, जौनपुर, मिजानू, प्रतापगढ़। 2 बघेली रीवाँ, जबलपुर, मण्डला, मिर्जापुर। (घ) इकार बहुला । भोजपुरी भोजपुर, शाहाबाद, छपरा-चम्पारण, गोरखन देवरिया, गाजीपुर, बलिया, बनारस। महत्त हिन्दी की चार महत्वपूर्ण बोलियों की प्रमुख विशिष्टताएँ निम्न ढंग से प्रस्तुत की जा सकती हैं- ब्रजभाषा अवधी कौरवी भोजपुरी (1) शौरसेनी (2) पश्चिमी हिन्दी अर्धमागधी पूर्वी हिन्दी अकार बहुला शौरसेनी मागधी विहारी हिन्दी इकार बहुला (3) ओकार बहुला अतिह्रस्व अतिहस्व पश्चिमी हिन्दी आकार बहुला ह्रस्व दीर्घ अतिहस्व (4) स्वर- ह्रस्व दीर्घ स्वर हस्व स्वर ह्रस्व दीर्घ स्वर E (5) (6) ण व्यंजनांत बोली ण के बदले न व्यंजनांत बोली शब्द के मध्य 'र' का लोप (7) (8) श, ष स श, ष के बदले स्र ल के बदले र य/व के बदले ज/3 ल/ड्र श/स/ब ह 'ण' ध्वनि नहीं है। (9) य/व यथावत रहते हैं (10) ऐ, औ मूल ऐ, औ के बदले अइ, अठ स्वर है (11) 'अ' विवृत ध्वनि 'अ' संवृत ध्वनि है। 'अ' अर्धविवृत ध्वनि है 'ङ' स्वतन्त्र ध्वनि है। 'अ' अर्धविवृत ध्वनि लिपि पं० कामता प्रसाद गुरु के अनुसार, "लिखित भाषा में मूल ध्वनियों के लिए जो विह्न मान लिए गए हैं, वे भी वर्ण कहलाते हैं, पर जिस रूप में ये लिखे जाते हैं उसे लिपि कहते हैं।" लिपि विकास की मुख्यतः निम्न अवस्थाएँ मानी जाती है- चित्रलिपि ↓ प्रतीकलिपि ↓ भावलिपि ↓ ध्वनिलिपि ↓ वर्णात्मक (Alphabetic) अक्षरात्मक (Syllabic) (भारत की सारी लिपियाँ अक्षरात्मक है) (रोमन लिपि वर्णात्मक है) भारत में प्राचीन समय में तीन लिपियाँ प्रचलित थी-(1) सिन्धु घाटी लिपि, (2) खरोष्ठी लिपि और (3) नाह्मी लिपि। सिन्धु घाटी लिपि के प्रार्चानतम नमूने सिन्धु घाटी में मांटगोमरी जिले के हड़प्पा तथा सिन्ध के लरकाना जिले के मोहनजोदड़ों में प्राप्त सीलों पर मिले हैं। डिरिजर महोदय ने सिन्धु घाटी लिपि को 'ट्रांजिशनल स्क्रिप्ट' (भाव-ध्वनिमूलक लिपि) कहा है। सिन्धु घाटी लिपि की ध्वनि चिन्हों की संख्या को लेकर विद्वानों में मतभेद है, जो निम्न है- विद्वान ध्वनि-चिह्न संख्या हण्टर 253 लैग्डन 228 गंड एवं स्मिथ 396 खरोष्ठी लिपि का प्राचीनतम नमूना पश्चिमोत्तर भारत के शाहबाज गढ़ी (पंजाब का युसुफजई जिला) और मानसेरा (पंजाब का हजारा जिला) में अशोक के अभिलेखों में प्राप्त हुआ है। य एवं भाषा का वस्तुनि खरोष्ठी लिपि के नामकरण के सम्बन्ध में विद्वानों का अभिमत- विद्वान अभिमत चीनी कोश 'फा वान शु लीन' डॉ० राजबली पाण्डेय डॉ० सुनीति चटर्जी खरोष्ठ नामक व्यक्ति से खर (गदहे) के ओष्ठ के समान खरोशोथ में खरोष्टी बना है। खरोष्टी दाएँ से बाएँ लिखी जाती है। इसमे 37 वर्ण (5) स्वर 11 व्यंजन) ह है तथा इसमें संयुक्ताक्षरों का सर्वथा अभाव है। ब्राह्मी लिपि के प्राचीनतम नमूने बस्ती जिले में प्राप्त पिपराला के स्तूप में तथा अजमेर जिले के बड़ली गाँव के शिलालेख में मिले हैं। ब्राह्मी लिपि के नामकरण के सन्दर्भ प्रमुख मत निम्न है- (1) ब्रह्म द्वारा निर्मित लिपि ब्राह्मी कहलायी। (2) ब्रह्म (वेद या ज्ञान) की रक्षार्थ लिपि ब्राह्मी कहलायी। (3) ब्राह्मणों द्वारा निर्मित या प्रयुक्त लिपि ब्राह्मी कहलायी। (4) चीनी विश्वकोष 'फास्वान-शु लीन' (668 ई०) के अनुसार ब्रह्म नामक आचार्य के आधार पर ब्राह्मी कहलायी। ब्राह्मी लिपि की उत्पनि को लेकर मुख्यतः दो मत प्रचलित है- (1) या भारतीय-लिपि है, और (2) यह विदेशी लिपि है। ब्राह्मी लिपि की उत्पति भारत में हुई है. इस वर्ग में भी अनेक मत प्रचालित है, जो निम्न है- विद्वान (1) एडवर्ड थामस (2) जगत मोहन वर्मा (3) श्री आर० श्याम शास्त्री (4) डॉ० राजबलि पाण्डेय (5) डाउसन, कनिधम, लसन (6) डॉ० भोलानाथ तिवारी अभिमत मूल आविष्कारक द्रविड़ थे। वैदिक चित्र लिपि से व्युत्पन्न है। सांकेतिक चिह्नही से व्युत्पन्न है। सिन्धु घाटी लिपि में विकसित है। आर्यों की पुरानी चित्रलिपि से विकसित है। हड़प्पा, मोहनजोदड़ों की लिपि में विकसित है। ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति विदेश में हुई है. इस वर्ग में भी अनेक मत है जो निम्न है- विद्वान अभिमत (1) डॉ० अल्फ्राइमूलर, जैम्म पियेप, मेनार्ट (2) डॉ० बूलर, डॉ० डेविड डिरिजर (3) टेलर, डिके, कैनन (4) वेबर, बेनफे, जन्मेन यूनानी या फोनसी से उत्पन्न उ० सामी से उत्पन्न ८० सामी में उत्पन्न फोनेशीय से उत्पन्न प्रो०बूलर के अनुसार ब्रदी निधि में 4 अक्षर थे-9 म्वर और 32 व्यंजन। ब्राह्मी लिपि का विकास इस प्रकार दर्शाया जा सकता है दक्षिणी शैली (तेलगु, तमिल, कन्नड़, लिपियों का विकास) उतरी शैली गुप्त लिपि (4-5वीं सदी) सिद्धमात्रिका या कुटिल लिपि देवनागरी लिपि (9वीं सदी) शारदा लिपि (10वीं सदी) 3 सिद्ध मात्रिका लिपि को हॉ० बुल्ला ने न्यून कोणीय लिपि' नाम दिया है। यही लिपि कालान्तर में 'कुटिल लिपि' नाम से प्रसिद्ध हुई। सन्588-89 ई० का बोधगया का अभिलेख सिद्धमात्रिका-लिपि में ही है। देवनागरी लिपि ब्राह्मी की उत्तरी शैली से 45वी मदी में गुप्त लिपि तथा गुप्त लिपि से छठी सदी में कुटिल लिपि विकासित हुई है। इसी कुटिल लिपि से 9वीं सदी के लगभग नागरी के प्राचीन रूप का विकास हुआ, जिसे प्राबीन नागरी कहते है। देवनागरी लिपि के नाम के विषय में अनेक मत है, जो इस प्रकार है- (1) प्रसिद्ध बौद्धग्रन्थ 'ललित विस्तार' में वर्णित 'नागलिपि' से 'नागरी' नामकरण हुआ। (2) नगरों में प्रचलित होने से 'देवनागरी' नाम पड़ा। (3) पाटलिपुत्र को 'नागर' और चन्द्रगुप्त को 'देव' कहने के कारण 'देवनागरी' नामकरण किया गया। (4) श्री आर० श्याम शास्त्री के अनुसार, "देवताओं की प्रतिमाओं के बनने के पूर्व उनकी उपासना सांकेतिक चिह्नों द्वारा होती थी, जो कई प्रकार के त्रिकोणादि यन्त्रों के मध्य में लिखे जाते थे। वे यन्त्र 'देवनागर' कहलाते थे और उनके मध्य लिखे जाने वाले अनेक प्रकार के सांकेतिक चिह्न वर्ण माने जाने लगे। इसी से उनका नाम 'देवनागरी' हुआ।" (5) गुजरात के नागर ब्राह्मणों के नाम पर 'नागरी' नाम पड़ा। (6) डॉ० धीरेन्द्र वर्मा के अनुसार मध्य युग के स्थापत्य की एक शैली का नाम नागर होने से 'नागरी' नाम पड़ा। देवनागरी का सर्वप्रथम प्रयोग गुजरात के राजा जयभट्ट (7वीं-8वीं सदी ई०) के एक शिलालेख में हुआ है। देवनागरी लिपि का वैशिष्ट्य देवनागरी लिपि आक्षरिक है। देवनागरी में एक वर्ण के लिए ध्वनि है अर्थात् प्रत्येक अक्षर उच्च्चरित होते हैं। देवनागरी की वर्णमाला का वर्णक्रम वैज्ञानिकः है। सुधार सर्वप्रथम बालगंगाधर तिलक ने सन् 1904 ई० में अपने पत्र 'केसरी' के लिए 1926 टाइपों की छटाई करके 190 टाइपों का एक फाँट, जिसे 'तिलक फाँट' भी कहते हैं, बनाकर देवनागरी लिपि सुधार का आरम्भ किया। सर्वप्रथम महाराष्ट्र के सावरकर बन्धुओं ने 'अ' की बारह खड़ी तैयार की तया महात्मा गाँधी के 'हरिजन सेवक' में इसका प्रयोग हुआ। सर्वप्रथम डॉ० श्याम सुन्दर दास ने पंचमाक्षर (इ, ञ, ण, न, म्) के स्थान पर अनुस्वार () के प्रयोग का प्रस्ताव रखा। डॉ० गोरखप्रसाद ने मात्राओं को व्यंजन के बाद दाहिने तरफ लिखने का प्रस्ताव रखा। श्रीनिवास ने सुझाव दिया कि महाप्राण वर्णों के बदले अल्पप्राण वर्षों के नीचे कोई चिह्न लगा दिया जाए जिससे वर्णों की संख्या में कमी आएगी। हिन्दी साहित्य सम्मेलन के इन्दौर के 24वें अधिवेशन में सन् 1935 ई० में महात्मा गाँधी के सभापतित्व में 'नागरी लिपि सुधार समिति' का गठन किया गया। 'नागरी लिपि सुधार समिति' के संयोजक काका कालेलकर थे। सम्मेलन में कुल 4 सुझावों को स्वीकार किया गया था। नागरी प्रचारिणी सभा ने सन् 1945 ई० में नागरी लिपि सुधार हेतु एक समिति गठन किया। ☐ उत्तर प्रदेश सरकार ने 31 जुलाई, 1947 में आचार्य नरेन्द्र देव की अध्यक्षता में नागरी लिपि सुधार समिति का निर्माण किया। इस समिति की कुल 9 बैठकें हुई तथा समिति ने 25 मई, 1949 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। नरेन्द्र देव समिति की रिपोर्ट के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने 28-29 नवम्बर सन् 1953 ई० में नागरी लिपि सुधार सम्बन्धी सुझाओं पर विचार करने के लिए लखनऊ में लिपि सुधार-परिषद' का गठन किया और विभिन्न राज्यों के मन्त्रियों और विद्वानों को परिषद में आमन्त्रित किया। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित 'लिपि सुधार परिषद' की बैठक की अध्यक्षता तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने की थी। डॉ० सुनीति कुमार चटर्जी ने कतिपय परिवर्तनों के साथ देवनागरी लिपि के स्थान पर रोमन लिपि को स्वीकार कर लेने का सुझाव दिया था। राजभाषा 14 सितम्बर, 1949 ई० को भारत के संविधान में हिन्दी को राजभाषा (Official Language) की मान्यता प्रदान की गई। भारतीय संविधान के भाग-17 में अनुच्छेद 343-351 तक राजभाषा का संविधान में प्रावधान किया गया है तथा संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को मान्यता प्रदान की गई हैं। जो निम्न हैं- 1. असमिया 2. बंगला 3. बोडो 4. डोगरी 5. गुजराती 6. हिन्दी 7. कन्नड़ 8. कश्मीरी 9. कोंकणी 10. मैथिली 11. मलयालम 12. मणिपुरी 13. मराठी 14. नेपाली 15. उड़िया 16. पंजाबी 17. संस्कृत 18. सन्थाली 19. सिन्धी 20. तमिल 21. तेलगु 22. उर्दू। ☐ मूल संविधान में 14 भाषाएँ थीं। संविधान (21वाँ संशोधन) अधिनियम, 1 द्वारा सिन्धी के जोड़े जाने पर यह संख्या 15 हो गई थी। 71वें संशोधन अधिनिक 1992 से कोंकणी, नेपाली और मणिपूरी को सम्मिलित कर दिए जाने पर यह संख् हो गई है। 92वें संशोधन अधिनियम 2003 ने इसमें बोडो, डोगरी, मैथिली और सद को सम्मिलित कर दिया गया है। जिससे अब यह संख्या बढ़कर 22 हो गई है। संविधान में हिन्दी भाषा सम्बन्धी उपबन्ध अनुच्छेद 343-संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी तथा पा अंकों का रूप अंकों का अन्तर्राष्ट्रीय रूप होगा। किन्तु संविधान में अनुमति प्रदान की में कि 15 वर्ष की अवधि अर्थात् 1965 ई० तक अंग्रेजी का प्रयोग किया जाता रहेगा कर इस अवधि की समाप्ति के बाद भी संसद विधि द्वारा अंग्रेजी भाषा या अंकों के देक्लमं रूप का ऐसे प्रयोजनों के लिए प्रयोग कर सकेगी जो विधि में विनिर्दिष्ट किया जाय। अनुच्छेद 344 राष्ट्रपति पाँच वर्ष के बाद और उसके बाद हर 10 वर्ष की सरि पर राजभाषा आयोग का गठन करेगा। आयोग का कर्तव्य होगा कि वह राष्ट्रपति निम्नलिखित के बारे में सिफारिश करे- (1) शासकीय प्रयोजनों के लिए हिन्दी. का अधिकाधिक प्रयोग। (2) शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी के प्रयोग पर निर्बन्धन। (3) उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय की कार्यवाहियों में और संघ के और राज्य की अधिनियमितियों के उनके अधीन बनाए गए अधीनस्थ विधर के पाठों में प्रयोग की जाने वाली भाषा। (4) संघ के किसी एक या अधिक विनिर्दिष्ट प्रयोजनों के लिए प्रयोग किए ज वाले अंकों के रूप। (5) संघ की राजभाषा तथा संघ और किसी राज्य के बीच या एक राज्य औ दूसरे राज्य के बीच पत्रादि की भाषा। आयोग से यह अपेक्षा की गई कि वह भारत की औद्योगिक सांस्कृतिक और वैज्ञानिक उन्नति का और लोक सेवाओं के सम्बन्ध में अहिन्दी भाषी क्षेत्रों के व्यक्तियों के न्यायसंगत दावों और हितों का सम्यक ध्यान रखेगा। अनुच्छेद 345 किसी राज्य का विधान मण्डल, विधि द्वारा, उस राज्य में इस्तेमाल होने वाली भाषाओं में से किसी एक या अधिक भाषाओं को या हिन्दी को उस राज्य के किया जाता, अंग्रेजी का प्रयोग उसी प्रकार किया जाता रहेगा जिस प्रकार उससे ठीक अनुच्छेद 346-संघ में शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग किए जाने के लिए तत्समय प्राधिकृत भाषा अर्थात् अंग्रेजी एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच तथा किसी राज्य और संघ के बीच पत्रादि की भाषा होगी। यदि दो या अधिक राज्य यह करार करते हैं कि उन राज्यों के बीच पत्रादि की भाषा हिन्दी होगी तो ऐसे पत्रादि के लिए उस भाषा का प्रयोग किया जा सकेगा। अनुच्छेद 347-यदि किसी राज्य की जनसंख्या का पर्याप्त भाग यह माँग करे कि उसके द्वारा बोली जाने वाली भाषा को उस राज्य में दूसरी भाषा के रूप में मान्यता दी जाए तो राष्ट्रपति उस राज्य में सर्वत्र या उसके किसी भाग में शासकीय प्रयोजन के लिए उस भाषा को मान्यता देने का उपबन्ध कर सकता है। अनुच्छेद 348-जब तक संसद विधि द्वारा उपबन्ध न करे, तब तक उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों में सभी कार्यवाहियों अंग्रेजी भाषा में होगी। इसके अलावा संघ तथा राज्यों के स्तरों पर सभी विधेयकों, संशोधनों, अधिनियमों, अध्यादेशों, आदेशों, नियमों, विनियमों तथा उपनियमों के प्राधिकृत पाठ भी केवल अंग्रेजी में ही होंगे। लेकिन किसी राज्य का राज्यपाल राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से उस उच्च न्यायालय की कार्यवाहियों में हिन्दी भाषा के प्रयोग को या उस राज्य के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किसी भाषा के प्रयोग को प्राधिकृत कर सकेगा। लेकिन अनिवार्य है कि निर्णय डिक्रियाँ तथा आदेश अंग्रेजी में ही दिये जाते रहेंगे। अनुच्छेद 349-संविधान के प्रारम्भ से 15 वर्ष की अवधि के दौरान प्रयोग की जाने वाली भाषा के लिए उपबन्ध करने वाला कोई विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति, जोकि वह राजभाषा आयोग तथा भाषा समिति के प्रतिवेदन पर विचार करके देगा, के बाद ही संसद में प्रस्तुत किया जा सकता है। अनुच्छेद 350 - (i) प्रत्येक व्यक्ति किसी शिकायत को दूर करने के लिए संघ या राज्य के किसी अधिकारी या प्राधिकारी को, यथास्थिति, संघ में या राज्य में प्रयोग होने वाली किसी भाषा में अभ्यावेदन देने का हकदार होगा। (ii) किसी राज्य में भाषाई अल्पसंख्यक वर्गों के बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा के लिए उचित प्रबन्ध किया जाएगा। (iii) भाषाई अल्पसंख्यक वर्गों के लिए राष्ट्रपति एक विशेष अधिकारी नियुक्त करेगा। यह अधिकारी उस वर्ग के भाषायी हितों की रक्षोपायों से सम्बन्धित राष्ट्रपति को प्रतिवेदन देगा तथा राष्ट्रपति इसे संसद में रखवाएगा और सम्बन्धित राज्यों की सरकारों को भिजवाएगा। अनुच्छेद 351 संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिन्दी भाषा का प्रसार करे, उसका विकास करे ताकि वह भारत की मिली-जुली संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्ताक्षेप किए बिना आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं के प्रयुक्त रूप शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहाँ आवश्यक या वांछनीय हो, वहाँ उसके शब्द-भण्डार के लिए मुख्यतया संस्कृत से और गौणतया अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे। विधान मण्डलों की भाषा य एवं भाषा का वस्तुनिष्ठ इतिहा ☐ संविधान के भाग-5 के अनुच्छेद 120 में संसद की भाषा का उपबन्ध है। उसने कहा गया है कि संसद कार्य हिन्दी या अंग्रेजी में किया जाएगा। लेकिन यथास्थिति सदर का पीठासीन अधिकारी किसी सदस्य को उसकी मातृभाषा में सदन को सम्बोधित करते की अनुमति दे सकता है। संविधान के भाग-6 के अनुच्छेद 210 में राज्य विधान मण्डलों की भाषा क उपबन्ध है। राज्य के विधानमण्डल में कार्य राज्य की राजभाषा या हिन्दी अथवा अंग्रेवं में किया जाएगा। किसी सदन का पीठासीन अधिकारी किसी सदस्य को उसकी मातृ-भाष में सदन को सम्बोधित करने की अनुमति दे सकता है। सन् 1950 ई० के बाद हिन्दी की प्रगति राष्ट्रपति (राजेन्द्र प्रसाद) ने सन् 1955 ई० में बाल गंगाधर (बी० जी०) के की अध्यक्षता में 'राजभाषा आयोग' का गठन किया। इस आयोग में 21 सदस्य थे। 'राज्यभाषा आयोग' ने अपना प्रतिवेदन 1956 में दिया जो संसद के समक्ष 1957 में रखा गया। 'राजभाषा आयोग' की सिफारिशों की समीक्षा करने के लिए सन् 1957 ई० में गोविन्द्र बल्लभ पंत की अध्यक्षता में संयुक्त संसदीय राजभाषा समिति का गठन किय गया। संयुक्त संसदीय समिति में 30 सदस्य थे जिनमें लोक सभा के 20 तथा राज्ज सभा के 10 सदस्य थे। इसने अपना प्रतिवेदन 1959 ई० में दिया। संयुक्त संसदीय समिति के सुझावों पर ध्यान देते हुए राष्ट्रपति ने 'दो स्थायी आयोगों की स्थापना की। जो निम्न हैं- आयोग वर्ष मन्त्रालय राजभाषा (विधायी) आयोग 1961 विधि मन्त्रालय वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग 1961 शिक्षा मन्त्रालय सन् 1976 ई० में 'राजभाषा (विधायी) आयोग' को समाप्त कर दिया गया था। राजभाषा से सम्बन्धित महत्वपूर्ण अधिनियम निम्न हैं- अधिनियम वर्ष राजभाषा अधिनियम 1963 (1967 में संशोधित) राजभाषा संकल्प 1968 प्राधिकृत पाठ (केन्द्रीय विधि) अधिनियम 1973 राजभाषा नियम 1976 राजभाषा अधिनियम, 1963 में कुल 9 धाराएँ हैं। राजभाषा नियम, 1976 में कुल 12 नियम है। राजभाषा नियम, 1976 के अधीन केन्द्रीय सरकार के कार्यालयों को तीन वर्ग क्षेत्रों में विभाजित किया गया है, जो निम्न हैं- क-वर्ग के क्षेत्र ख-वर्ग के क्षेत्र ग-वर्ग के क्षेत्र (पत्र-व्यवहार हिन्दी में ही किये जाएँ) (पत्र-व्यवहार में द्विभाषिक नीति का पालन हो) (पत्र-व्यवहार अंग्रेजी में ही किए जाएँ।) उत्तर-प्रदेश पंजाब पश्चिम बंगाल मध्य प्रदेश (दुग गुजरात उड़ीसा राजस्थान महाराष्ट्र उत्तरपूर्वी क्षेत्र बिहार चण्डीगढ़ द्रविड़ भाषी क्षेत्र हिमाचल प्रदेश अण्डमान-निकोबार हरियाणा दिल्ली हिन्दी व्याकरण का इतिहास: एक परिचय सम्भवतः 1658 ई० में मिर्जा खाँ द्वारा रचित 'ब्रजभाषा व्याकरण' हिन्दी का सबसे प्राचीन व्याकरण है। खड़ी बोली का प्रथम व्याकरण सन् 1715 ई० के आस पास बोलचाल की भाषा को आधार बनाकर डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कर्मचारी जोहानस जोशुआ केटलर ने लिखा था। जार्ज ग्रियर्सन तथा सुनीति कुमार चाटुर्ज्या के अनुसार हिन्दी का प्रथम व्याकरण जान गिलक्राइस्ट द्वारा रचित 'हिन्दुस्तानी ग्रामर' (1790 ई०) है। 'हिन्दुस्तानी ग्रामर' अंग्रेजी पद्धति पर लिखा हिन्दी का प्रथम व्याकरण हैं। हिन्दी व्याकरण से सम्बन्धित कुछ प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित है- (1) जान फग्र्युसन ए डिक्शनरी ऑफ द हिन्दुस्तानी लैंग्वेज (2) जान बार्थनिक गिलक्राइस्ट (1) ए ग्रमर ऑफ द हिन्दुस्तानी लैंग्वेज, (2) द ओरिएण्टल लिंग्विस्ट। (3) एस० एच० केलाग ए ग्रामर ऑफ द हिन्दी लैंग्वेज (1875 ई०) (4) ई० ग्रीव्ज आधुनिक हिन्दी व्याकरण (1896 ई०) (5) हडले शार्ट ग्रामर ऑफ द मूर्स लैंग्वेज (1779 ई०) (6) लल्लू लाल हिन्दी कवायद (7) श्री लाल भाषा चन्द्रोदय (1853 ई०) (8) रामजतन भाषा-तत्व-बोधनी (1858 ई०) हिन्दी साहित्य एवं भाषा का वस्तुनिष् (9) नवीनचन्द्र राय नवीन चन्द्रोदय (1869 ई०) (10) राजा शिवप्रसाद 'सितारे हिन्द' हिन्दी व्याकरण (1870 ई०) (11) पं० हरिगोपाल भाषातत्व दीपिका (12) पादरी एथरिंगटन भाषा भास्कर (13) केशवराम भट्ट हिन्दी व्याकरण (14) ठाकुर रामचरण सिंह भाषा प्रभाकर (15) रामावतार शर्मा हिन्दी व्याकरण (16) विश्वेश्वर दत्त शर्मा भाषा तत्व प्रकाश (17) राम दहिन मिश्र प्रवेशिका हिन्दी व्याकरण (18) गोविन्द नारायण मिश्र विभक्ति विचार (19) अम्बिका प्रसाद वाजपेयी हिन्दी कौमुदी (20) कामता प्रसाद 'गुरु' हिन्दी व्याकरण (21) किशोरी दास वाजपेयी (1) ब्रजभाषा का व्याकरण (1943 ई०) (2) राष्ट्रभाषा का प्रथम व्याकरण (1949 ई०) (3) हिन्दी शब्दानुशासन (1957 ई०) (22) डॉ० धीरेन्द्र वर्मा ब्रजभाषा व्याकरण अम्बिका प्रसाद वाजपेयी ने सम्भवतः प्रथम बार हिन्दी व्याकरण को प्राकृत आधार पर लिखने या बनाने पर बल दिया। अम्बिका प्रसाद वाजपेयी ने किशोरी दास वाजपेयी के 'ब्रजभाषा का व्याकार को "हिन्दी के व्याकरणों का व्याकरण" कहा है। पण्डित कामता प्रसाद 'गुरु' को हिन्दी व्याकरण का 'पाणिनि' कहा जात पं० किशोरीदास वाजपेयी कृत 'हिन्दी शब्दानुशासन' भाषा विज्ञान से संबैला हिन्दी का व्याकरण है। हिन्दी के अन्य प्रमुख व्याकरण ग्रन्थ निम्न हैं- (1) आर्येन्द्र शर्मा आधुनिक हिन्दी का आधार व्याकरण (2) रामचन्द्र वर्मा अच्छी हिन्दी (3) शिवेन्द्र कुमार वर्मा हिन्दी व्याकरण का विधिवत विवरण (4) शिवपूजन सहाय व्याकरण-दर्पण (5) दीमशित्स हिन्दी व्याकरण की रूप रेखा (6) स्वामी निगमानन्द हिन्दी का मौलिक व्याकरण (7) रमाकान्त अग्निहोत्री हिन्दी एक मौलिक व्याकरण (8) बदरीनाथ कपूर परिष्कृत हिन्दी व्याकरण (9) हरदेव बाहरी व्यावहारिक हिन्दी व्याकरण तथा रचना (10) वचनदेव कुमार वृहद हिन्दी भाष्कर (11) वासुदेव नन्दन प्रसाद (12) हजारी प्रसाद द्विवेदी आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना हिन्दी भाषा का वृहद ऐतिहासिक व्याकरण मानक वस्तुनिष्ठ हिन्दी व्याकरण ध्वनि के लिखित रूप को वर्ण या अक्षर कहते हैं । हिन्दी में स्वर वर्णों की संख्या 11 तथा व्यंजन वर्णों की संख्या 33 स्वीकार किया जाता है। हिन्दी ध्वनियों का वर्गीकरण हिन्दी वर्णमाला में कुल 52 ध्वनियाँ है। वस्तुतः वर्णमाला में ध्वनियों की संख्या को लेकर काफी विवाद रहा है। कामता प्रसाद 'गुरु' ने 43 वर्ण माना है। मानक हिन्दी वर्णमाला स्वर (11) अ आ इ ई उ ऊ ऋ अंअः नहीं व्यंजन (उरु) क ख ग घ ङ ए ऐ ओ औ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न प य फ ब भ म र ल व श ष स ह संयुक्त व्यंजत, क्ष त्र ज्ञ श्र अयोगवाह (02) अं (अनुस्वर) अः (विसर्ग) द्विगुण व्यंजन (2) ढ़ अनुस्वर (अं) तथा विसर्ग (अः) का स्वर और व्यंजन के साथ योग न होने के कारण, इन ध्वनियों को 'अयोगवाह' कहते हैं। किशोरी दास वाजपेयी के अनुसार, 'अयोगवाह' स्वरों के ही अनन्तर आते हैं। स्वरों का वर्गीकरण उच्च्चवारण स्थान, मात्रा, जीभ की स्थिति, मुखविवर ओष्ठ की स्थिति आदि के आधार पर स्वरों का निम्न ढंग से वर्गीकरण किया जा सकता है- स्वर उच्चारण मात्रा जीभ की स्थिति मुख्य विवर भाषा का वस्तुनिष्ठ বিয়ে ओष्ठ की स्थि अ कण्ठ ह्रस्व मध्य अर्धविवृत उदासीन आ कण्ठ दीर्घ पश्च विवृत अवृत्तमुखी इ तालव्य ह्रस्व अग्र अर्धसंवृत अवृत्तमुखी ई तालव्य दीर्घ अग्र संवृत अवृत्तमुखी उ ओष्ठ्य ह्रस्व पश्च अर्ध संवृत वृत्तमुखी ऊ ओष्ठ्य दीर्घ पश्च संवृत वृत्तमुखी ए कंठ-तालव्य दीर्घ अग्र अर्धविवृत अवृत्तमुखी ऐ कंठ-तालव्य दीर्घ अग्र विवृत अवृत्तमुखी ओ कंठोष्ठ्य दीर्घ पश्च अर्धविवृत वृत्तमुखी औ कंठोष्ठ्य दीर्घ पश्च विवृत वृत्तमुखी स्वर वह ध्वनि है जिसके उच्चारण में हवा अबाध गति से मुख विवर के निकलती है। इसकी प्रमुख विशेषता निम्न है- (1) स्वरों का स्वतन्त्र उच्चारण किया जा सकता है। (2) सभी स्वर आक्षरिक (syllabic) होते हैं। (3) सभी स्वर अल्पप्राण होते हैं। (4) सभी स्वर घोष वर्ण होते हैं। व्यंजनों का वर्गीकरण व्यंजनों को दो आधारों पर वर्गीकृत किया जाता है- (1) उच्चारण-स्थान (2) प्रयत्न्-स्थान (1) उच्चारण-स्थान के आधार पर- कण्ठ्य (कण्ठ से) तालव्य (तालु से) मूर्धन्य (तालु के मूर्धाभाग से) दन्त्य (दाँतों के मूल से) वर्त्य (दन्तमूल से) न, स, र, ल ओष्ठ्य (दोनों होंठो से) दन्तोष्ठ्य (निचले होंठ और ऊपर के दाँतों से) स्वर यन्त्रीय (काकल्य) क, ख, ग, घ, ङ च, छ, ज, झ, ञ, दू ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध प, फ, ब, भ, म व, फ क (12) प्रयत्न के आधार पर प्रयत्न के आधार पर किया गया विभाजन भी दो ढंग का होता है- (क) आभ्यन्तर प्रयत्न, (ख) बाह्य प्रयत्न। (क) आभ्यंतर प्रयत्न- स्पर्श व्यंजन - क, ख, ग, घ, ङ क वर्ग च, छ, ज, झ, ञ च वर्ग ट, ठ, ड, ढ, ण ट वर्ग त, थ, द, थ, न त वर्ग प, फ, ब, भ, म प वर्ग अन्तःस्थ व्यंजन य, र, ल, व ऊष्म व्यंजन श, ष, स, ह अर्थ स्वर य, व पाश्विक ल लुण्ठित/प्रकंपितर अनुनासिक ङ, ञ, ण, न, म (ख) बाह्य प्रयत्न- प्रत्येक वर्ग का प्रथम व द्वितीय वर्ण (12) घोष २ अघोष 3 45 प्रत्येक वर्ग का तृतीय, चतुर्थ व पंचम वर्ण महाप्राण 24 प्रत्येक वर्ग का द्वितीय व चतुर्थ वर्ण (24) अल्पप्राण 35 प्रत्येक वर्ग का प्रथम, तृतीय व पंचम वर्ण शब्द भेद रूपान्तर के अनुसार शब्दों के दो भेद होते हैं- (क) विकारी (ख) अविकारी या अव्यय (i) संज्ञा (i) क्रियाविशेषण (ii) सर्वनाम (ii) सम्बन्ध सूचक (iii) विशेषण (iii) समुच्चय बोधक (iv) क्रिया (iv) विस्मयादि बोधक। रचना या बनावट के अनुसार शब्दों के तीन भेद है- (1) रूढ़, (2) यौगिक, (3) योग रूढ़। उत्पत्ति/इतिहास/विकास के अनुसार शब्दों के चार भेद होते हैं-(1) तत्सम, (2) तद्भव, (3) देसज, (4) आगत/विदेशी शब्द। वाक्य के प्रयोग के अनुसार शब्दों के 8 मेद होते हैं शब्द संज्ञा सर्वनाम विशेषण क्रिया क्रिया विशेषण समुच्चय बोधक विस्मयादि बोधक संज्ञा संज्ञा के मुख्यतः पाँच भेद होते हैं- संज्ञा-भेद व्यक्तिवाचक जाति वाचक समूह वाचक द्रव्यवाचक भाववाचक परिभाषा हिन्दी साहित्य एवं भाषा का वस्तुनिष्ट जिससे किसी वस्तु, भाव और जीव के नाम का बोध हो, के संज्ञा कहते हैं। संज्ञा के बदले आने वाले शब्द को सर्वनाम कहा जाता है। संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताने वाले शब्द को विशेषत कहते हैं। कहते हैं। जिससे किसी काम का करना होना समझा जाए, उसे किय जिससे क्रिया, विशेषण अथवा अन्य क्रियाविशेषण के विशेषता प्रकट हो, उसे क्रियाविशेषण कहते हैं। दो शब्दों या वाक्यों को मिलाने वाले शब्द को समुच्चय बेफ कहते हैं। मनोविकार को सूचित करने वाले शब्द को विस्मयादि बोषक कहते हैं। परिभाषा जिस संज्ञा से किसी एक ही वस्तु, पदार्थ अथवा व्यक्ति का बोध हो। जिस संज्ञा से किसी एक ही प्रकार की वस्तुओं, पदार्थों अवा व्यक्तियों का बोध हो। जिस संज्ञा से किसी वस्तु या व्यक्ति के समूह का बोध हो। जिस संज्ञा से माप तौल वाली वस्तु का बोध हो। जिस संज्ञा से पदार्थ में पाये जाने वाले धर्म या गुण, अवस्था अथवा व्यापार का बोध हो। । द्रव्य वाचक एवं भाव वाचक संज्ञा का प्रायः बहुवचन नहीं होता है। संज्ञा के रूपान्तर या विकार तीन कारणों से होते हैं- संज्ञा के रूपान्तर लिंग वचन कारक परिभाषा संज्ञा के जिस शब्द से स्त्री या पुरुष की जाति का बोध है। विकारी शब्दों के जिस रूप से संख्या का बोध हो। संज्ञा (या सर्वनाम) के जिस रूप से उसका सम्बन्ध वाक्य के किसी दूसरे शब्द के साथ प्रकाशित होता है उस रूप को कारक कहते हैं। हिन्दी में लिंग के दो भेद हैं- (1) पुलिंग और (2) स्त्रीलिंग। हिन्दी में वचन के दो भेद हैं- (1) एक वचन और (2) बहुवचन। हिन्दी में कारक के आठ भेद है, जो निम्न हैं- कारक विभक्ति/परसर्ग कर्ता कारक ने कर्म कारक को करण कारक से सम्प्रदान कारक को, के लिए अपादान कारक से सम्बन्ध कारक का, के, की, रा. रे, री अधिकरण कारक में, पर सम्बोधन कारक हे, अजी, अहो इत्यादि। सर्वनाम में केवल सात कारक होते हैं। इसमें सम्बोधन कारक नहीं होता। सर्वनाम प्रयोग के अनुसार सर्वनाम के 6 भेद हैं- सर्वनाम परिभाषा व उदाहरण पुरुष वाचक पुरुषों (वक्ता, श्रोता व अन्य) के नाम के बदले आने वाला शब्द, पुरुष वाचक कहलाता है। (मैं, तू, आप)। का निश्वाचक जिस सर्वनाम का प्रयोग स्वयं अपने लिए हो वह निज वाचक सर्वनाम कहलाता है। (आप- पुरुष वाचक 'आप' से भिन्न)। नथय निश्चय वाचक वक्ता के पास अथवा दूर की किसी वस्तु का बोध होता है। हो। अनिश्चय वाचक (यह, वह, से)। वस्था सम्बन्ध वाचक जिस सर्वनाम से किसी विशेष वस्तु का बोध नहीं होता। (कुछ, कोई)। प्रश्नवाचक जिससे वाक्य में किसी दूसरे सर्वनाम से सम्बन्ध स्थापित किया जाए। (सो)। प्रश्न करने के लिए जिन सर्वनामों का उपयोग होता है, उन्हें प्रश्नवाचक सर्वनाम कहते हैं। (कौन, क्या)। पुरुष वाचक सर्वनाम तीन प्रकार के होते हैं- (1) उत्तम, (2) मध्यम (3) अन्य हिन्दी में सब मिलाकर ग्यारह (11) सर्वनाम हैं- स्या के मांक एक वचन पको L 2. बहु वचन हम तुम 3. यह ये 4. वह से 5. सो आप 6. आप जो 7. जो कौन 8. कौन क्या 9. क्या कोई 10. कोई कुछ हिन्दी साहित्य एवं भाषा का वातु 11. कुछ सर्वनाम के रूपान्तर तीन कारणों से होते हैं- (1) पुरुष, (2) वचन एवं (3) कारक। सर्वनाम में लिंग के कारण रूपान्तर नहीं होता है। सर्वनाम में केवल सात कारक होते हैं। विशेषण है-कामता प्रसाद 'गुरु' के आधार पर विशेषण के भेद एवं उपभेद का रेखाचित्र निर विशेषण संख्यावाचक गुणवाच सार्वनामिक निश्चित संख्यावाचक अनिश्चित संख्या वाचक परिणाम बोधक मूल सार्वजानिक यौगिक सार्वजनिक गुणवाचक क्रमवाचक अरवृत्तिवाचक T समुदाय वाचक प्रत्येक बोधक पूर्णांक बोधक अपूर्णांकबोधक जो शब्द विशेषण शब्द की विशेषता बताए उसे 'प्रविशेषण' कहते हैं। ☐ विशेषण के रूपान्तर के सम्बन्ध में कामता प्रसाद 'गुरु' का मत सर्वमान्य है। जो निम्न हैं- "हिन्दी में आकारांत विशेषणों को छोड़कर दूसरे विशेषणों में कोई रूपान्तर नहीं होता, परन्तु सब विशेषणों का प्रयोग संज्ञाओं के समान होता है, इसलिए यह कह सकते हैं कि विशेषणों में परोक्ष रूप से लिंग, वचन और कारक होते हैं। इस प्रकार के विशेषणों का विकार संज्ञाओं के समान उनके 'अन्त' के अनुसार होता है।" हिन्दी में विशेषण की तीन तुलनावस्था मानी जाती है- (1) मूलावस्था (Positive Degree) (2) उत्तरावस्था (Comparative Degree) (3) उत्तमावस्था (Superlative Degree) क्रिया क्रिया के मूल को 'धातु' कहते हैं। व्युत्पत्ति की दृष्टि से 'धातु' के दो भेद होते हैं- (1) मूल धातु और (2) यौगिक धानु। यौगिक धातु तीन प्रकार से बनते हैं- (1) धातु में प्रत्यय जोड़ने से 'सकर्मक' तथा 'प्रेरणार्थक' धातु बनते हैं। (2) संज्ञा या विशेषण में प्रत्यय जोड़ने से 'नाम धातु' बनते हैं। (3) एक धातु में एक या दो धातु जोड़ने से 'संयुक्त धातु' बनते हैं। क्रिया के भेद रचना की दृष्टि से क्रिया के दो भेद हैं- (1) अकर्मक क्रिया एवं (2) सकर्मक क्रिया। क्रिया के रूपान्तर निम्नलिखित कारणों से होते हैं- क्रिया के रूपान्तर 1. वाच्य परिभाषा जिससे यह जाना जाता है कि वाक्य में कर्ता के विषय में विधान किया गया है या कर्म के विषय में अथवा भाव के विषय में। 2. काल जिससे क्रिया के व्यापार का समय तथा उसकी पूर्ण या अपूर्ण अवस्था का बोध हो। 3. अर्थ (भाव) क्रिया के जिस रूप से विधान करने की रीति या प्रयोजन का बोध होता है उसे 'अर्थ कहते हैं। 4. पुरुष 5. लिंग 6. वचन तीन पुरुष हैं। दो लिग हैं। दो वचन है। वाक्य में क्रिया के लिंग, वचन तथा पुरुष के निर्धारण करने को 'प्रयोग' कहा ता है। 'प्रयोग' तीन प्रकार के होते हैं- की वस्तुनिष्ठ इतिहास (1) कर्तरि प्रयोगकर्ता के लिग, वचन और पुरुष के अनुसार जिस क्रिया ग़न्तर होता है, उसे कर्तरि प्रयोग कहते हैं। (2) कर्मणि प्रयोग- जिस क्रिया के पुरुष, लिंग और वचन कर्म के पुरुष लिंग र वचन के अनुसार होते हैं, उसे कर्मणि प्रयोग कहते हैं। कर्ता या कर्म के अनुसर (3) भावे प्रयोग-जिस क्रिया के पुरुष, लिंग और वचन में होते, उसे भावे प्रयोग कहते हैं। कर्मणि प्रयोग के दो भेद होते हैं- (1) कर्तृवाच्य कर्मणि प्रयोग, (2) कर्मवाच्द र्मणि प्रयोग। भावे प्रयोग के तीन भेद होते हैं- (1) कर्तृवाच्य भावे प्रयोग, (2) कर्मवाच्च वे प्रयोग, और (3) भाववाचक भावे प्रयोग। वाच्य के तीन भेद होते हैं- (1) कर्तृवाच्य, (2) कर्मवाच्य, (3) भाववाच्या हिन्दी में क्रिया के कालों के मुख्यतः तीन भेद होते हैं जो निम्न है- वर्तमान काल भूत काल भविष्य काल सामान्य वर्तमान सामान्य भूत सामान्य भविष्य तात्कालिक वर्तमान आसन्न भूत सम्भाव्य भविष्य पूर्ण वर्तमान पूर्ण भूत हेतु हेतुमद् भविष्य संदिग्ध वर्तमान अपूर्ण भूत सम्भाव्य वर्तमान संदिग्ध भूत हेतु हेतुमद्भूत भाव या अर्थ की दृष्टि से क्रिया मुख्यतः 5 भेद हैं- (1) निश्चयार्थक, (2) सम्भावनार्थ, (3) सन्देहार्थ, (4) आज्ञार्थ और (5) संकेतार्थ। क्रिया के जिन रूपों का उपयोग संज्ञा, विशेषण, क्रियाविशेषण आदि शब्द मेदों के समान हो, उन्हें कृदन्त कहते हैं। रूप के अनुसार कृदन्त दो प्रकार के होते हैं- विकारी कृदन्त क्रियार्थक संज्ञा कर्तृवाचक संज्ञा वर्तमान कालिक कृदन्त भूतकालिक कृदन्त अविकारी या अव्यय कृदन्त पूर्वकालिक कृदन्त तात्कालिक कृदन्त अपूर्ण क्रियाद्योतक पूर्ण क्रियाद्योतक। क्रियाविशेषण प्रयोग के अनुसार क्रियाविशेषण के 3 भेद है- (1) साधारण, (2) संयोजक, (3) अनुबद्ध। रूप के अनुसार क्रिया विशेषण के तीन भेद हैं- (1) मूल या रूढ़, (2) यौगिक, (3) स्थानीय (इस भेद को हरदेव बाहरी नहीं स्वीकार करते हैं)। अर्थ की दृष्टि से क्रिया विशेषण के मुख्यतः दो भेद हैं- (1) रीति वाचक और (2) परिणाम वाचक। परिणाम वाचक क्रिया विशेषण के 5 भेद हैं- (1) अधिकता बोधक, (2) न्यूनता बोधक, (3) पर्याप्ति वाचक, (4) तुलनात्मक वाचक और (5) श्रेणि वाचक। सम्बन्ध सूचक अनुबद्ध। प्रयोग के अनुसार सम्बन्ध सूचक दो प्रकार के होते हैं- (1) सम्बद्ध, (2) यौगिक। व्युत्पत्ति के अनुसार सम्बन्ध सूचक दो प्रकार के होते हैं- (1) मूल और (2) समुच्चय बोधक व्यधिकरण। समुच्चय बोधक अव्ययों के मुख्य दो भेद हैं (1) समानाधिकरण, और (2) समानाधिकरण समुच्चय के मुख्यतः चार भेद हैं, जो अांकित है- भेद उदाहरण संयोजक और, व, एवं, तथा भी या, वा, अथवा किंवा, कि, या-या, क्या-क्या विभाजक विरोध दर्शक पर, परन्तु, किन्तु, लेकिन, मगर, वरन्, बल्कि परिणाम दर्शक इसलिए, सो, अतः अतएव । व्यधिकरण समुच्चय के मुख्यतः चार भेद हैं, जो निम्न हैं- भेद कारण वाचक उद्देश्य वाचक उदाहरण संकेत वाचक क्योंकि, जो कि, इसलिए। कि, जो, ताकि, इसलिए कि। जो-तो यदि-तो यद्यपि तथापि, चाहे-परन्तु। स्वरूप वाचक कि, जो, अर्थात् याने, मानों। निपात वे अव्यय शब्द 'निपात' कहलाते हैं जो संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण एवं क्रिया विशेषण के साथ प्रयुक्त होकर उस पर बल देने, उसे सीमित करने अथवा दूसरों के साथ मिलाने का काम करते हैं। निपात के मुख्यतः 9 भेद हैं, जो निम्न हैं- निपात उदाहरण स्वीकार्य हाँ, जी, नकारार्थक नहीं, जी नहीं निषेधात्मक मत प्रश्नबोधक क्या ? न विस्मयादि बोधक क्या, काश, काश कि बलदायक या सीमा बोधक तो, ही, तक, पर, सिर्फ, केवल तुलना बोधक सा अवधारण बोधक ठीक, लगभग, करीब आदर बोधक जी समास कामता प्रसाद गुरु के अनुसार, "दो या अधिक शब्दों का परस्पर सम्बन्ध बताने वाले शब्दों अथवा प्रत्ययों का लोप होने पर, उन दो या अधिक शब्दों से जो एक स्वतंत्र शब्द बनता है, उस शब्द को सामासिक शब्द कहते हैं और उन दो या अधिक शब्दों का जो संयोग होता है, वह समास कहलाता है।" हिन्दी में समास के मुख्यतः चार भेद माने जाते हैं, जो निम्न है- समास परिभाषा या लक्षण अव्ययीभाव अव्ययीभाव समास में पहला या पूर्व शब्द प्रधान होता है और सामासिक पद क्रियाविशेषण अव्यय हो जाता है। तत्पुरुष प्रधान होता है। इस समास में तत्पुरुष समास में अंतिम या दूसरा शब्द पहला शब्द बहुधा संज्ञा या विशेषण होता है। द्वन्द्व जिस समास में दोनों पद प्रधान होता है, वह द्वन्द्व कहलाता है। बहुव्रीहि जिस समास में कोई भी पद प्रधान नहीं होता और जो अपने पदों से भिन्न किसी संज्ञा का विशेषण होता है, उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं। तत्पुरुष समास के मुख्य दो भेद हैं- (1) व्यधिकरण तत्पुरुष और (2) रमानाधिकरण तत्पुरुष (कर्मधारय)। सामासिक शब्दों का सम्बन्ध व्यक्त कर दिखाने की रीति को 'विग्रह' कहते प्रमुख सामासिक पदों की सूची अग्रांकित है- अव्ययीभाव यथाशक्ति निधड़क बर्जिस यथाविधि भरपेट बखूबी यथासाध्य भरदौड़ नाहक प्रतिमान अनजाने हरघड़ी यथाक्रम व्यर्थ यथासंभव हररोज हरदिन प्रत्यक्ष बेकाम आजन्म हरसाल समक्ष बेखटके आमरण बेशक यावज्जीवन परोक्ष बेफायदा हाथोंहाथ प्रतिदिन निडर दिनानुदिन उपकूल निर्भय पलपल साल-दर-साल बीचोबीच बराबर आपादमस्तक तत्पुरुष स्वर्गप्राप्त जलपिपासु दुःखार्त तुलसीकृत गगन चुंबी आशातीत मदांध भक्तिवश चिड़ीमार देशागत देहचोर कष्टसाध्य गृहोगत कठखोदवा प्रेमसिक्त मुँहचोर गुणहीन जलसक्ति गिरहकट रसभरा मुँहमाँगा अकालपीड़ित शराहत मनमाना मुँहतोड़ रोगपीड़ित ईश्वरदत्त गुणभरा दईमारा कपड़छन दुगुना दस्तकारी प्यादामात हैदराबाद करुणापूर्ण कामचोर कृष्णार्पण विद्यागृह रोकड़बही मालगोदाम देशभक्ति रसोईघर राहखर्च लोकहितकारी बलिपशु रणनिमंत्रण घुड़वच शहरपनाह गोशाला ठकुरसुहाती कारवाँसराय विधानसभा जन्मांध भवतारण शाहजादह ईश्वरविमुख ऋणमुक्त देशनिकाला लोकोत्तर व्ययमुक्त पदच्युत जातिभ्रष्ट गुरुभाई कामचोर बलहीन प्रेमरिक्त माथारिक्त जलरिक्त धर्मविमुख नामसाख धर्मच्युत धनहीन राजपुत्र सेनानायक राजपूत रेतघड़ी प्रजापति लक्ष्मीपति लखपति अमचूर देवालय नरेश पितृगृह पनचक्की हुक्मनामा वनमानुष रामकहानी बंदरगाह पराधीन घुड़दौड़ मृगछौना नूरजहाँ तिद्याभ्यास बैलाली राजदरबार शकरपारा पस्तुनिष्ठ इति रामायण अमरस ग्रामोद्धार खरारि पुस्तकालय देशसेवा आनन्दाश्रम राष्ट्रपति चंद्रोदय चरित्रचित्रण हिमालय गंगाजल खग वाचस्पति नृप देशाटन कर्तरिप्रयोग जलधर प्रेमगमन आत्मनेपद पापहर मनमौजी ऊटपटाँग सर्वोत्तम आपबीती चूहेमार पुरुषोत्तम कानाफूसी ग्रंथकार ध्यानमग्न हरफनमौला तटस्थ लकड़फोड़ मनसिज जलद तिलचट्टा युधिष्ठिर डरम कनकटा खेचर कृतघ्न मुँहचीरा कलमतराश अयोग्य अधूरा चोपदार अनाचार अनजाना सौदागर अनिष्ट अटूट अधर्म अनबन अनगढ़ा अन्याय अनचाहा अकाज अनरीत अनहोनी नापसंद नाबालिग गैरहाजिर गैरवाजिब नपुंसक प्रतिध्वनि अतिक्रम उपदेव अतिवृष्टि प्रतिबिंब प्रगति दुर्गुण वशीकरण शुचीभाव नराधम क्षत्रियाधम कालीमिर्च कर्मधारय अथवा समानाधिकरण तत्पुरुष साढ़ेतीन शीतोष्ण मझधार खुशबू श्यामसुन्दर तलघर जवाँमर्द खड़ीबोली नौरोज शुद्धाशुद्ध सुन्दरलाल मृदुमंद जन्मान्तर पुच्छलतारा भलाबुरा प्रभुदयाल भलामानस ऊंचनीच शिवदीन कालापानी रामदहिन खट्टामिड्डा छुटभैया बड़ा छोटा लालपीला तिलचावला मोटाताजा चन्द्रमुख पाणिपल्लव गोबरगणेश घनश्याम गुरुदेव पर्णशाला जेबघड़ी वज्रदेह कर्मबंध छायातरु चितकबरा प्राणप्रिय पुरुषरत्न देवब्राह्मण चरणकमल धर्मसेतु पनकपड़ा दहीबड़ा गीदड़भभकी राजर्षि बुद्धिबल गुडंबा गुड़धानी साधुसमाजप्रयाग कृताकृत महाकाव्य द्विगु इसे 'संख्यापूर्व कर्मधारय' कहा है। जैसे कामता प्रसाद गुरु ने 'द्विगु' को कर्मधारय तत्पुरुष का एक भेद माना है और पंसेरी अठवाड़ा चतुर्वेद त्रिभुवन त्रैलोक्य दोपहर दुपट्टा पंचपात्र चतुष्दी चौबोला दुअन्न दुधारी पंचवटी चौमासा चवन्नी पंचप्रमाण त्रिकाल सतसई नवरत्न चहारदीवारी अष्टाध्यायी चौराहा षट्रस शतांश द्वंद्व माता-पिता बासनबर्तन खानपान घरद्वार गावबैल मारपीट घासफूस गोलाबारूद दालरोटी चमकदमक अन्नजल जंगलझाड़ी हुक्कापानी दीयाबत्ती जैसातैसा आगापीछा बेटाबेटी चालचलन बोलचाल देनदेन बहुव्रीहि अनंत प्राप्तकाम पीतांबर कृतकार्य उपहृतपशु चतुर्भज दीर्घबाहु चंद्रमौली निर्जन नीलकंठ राजीवलोचन प्राप्तोदक निर्विकार चक्रपाणि गजानन आरूढ़वानर विमल तपोधन कनफटा दत्तचित्त दशानन प्रतिव्रता दुधमुँहा धृतचाप बारहसिंहा सहस्त्रबाहु लंबकर्ण मिठबोला अनमोल प्रफुल्लकमल बदरंगा अद्वितीय स्वरांत शाकप्रिय अप्राप्य हँसमुख त्रिकोन नाट्यप्रिय अनाथ सिरकटा सतखंड पाषाणहृदय अकर्मक टुटपुँजिया पतझड़ शिवशब्द अनोमल बढ़भागी चौलड़ी यशोधन अजान 50 बहुरुपिया मंदबुद्धि तपोबल अथाह मनचला बड़ापेट कोकिलकंठा अचेत घुड़मुँहा लम्बोदर मृगनेत्रा अमान कमजोर लालकुर्ती अभिज्ञानशाकुंतलम अनगिनती बदनसीब लगातार मुद्राराक्षस एकरूप खुशदिल साफदिल हाथीपाँव पंचानन नेकनाम जबरदस्त नाक (स्वर्ग) पंजाब दुआब सितार सतलड़ी सफल सपुत्र सकर्मक सदेह सावधान सार्थक सबेरा सचेत साढ़े मुष्टामुष्टि हस्ताहस्ति दंडादंडी लठालठी मारामारी बदाबदी कहाकही धक्काधक्की घूसाधूसी मुक्कामुक्की निर्दय विफल विधवा कुरुप निर्धन सुडौल नोट- (1) कभी कभी एक ही समास का विग्रह अर्थ भेद से कई प्रकार का होता है। जैसे- 'सत्यव्रत' शब्द का विग्रह निम्न ढंग से हो सकता है- समास अर्थभेद तत्पुरुष सत्य का व्रत कर्मधारय सत्य ही व्रत द्वंद्व सत्य और व्रत बहुब्रीहि सत्य है व्रत जिसका (2) कभी-कभी बिना अर्थ भेद के एक ही समास के दो विग्रह हो सकते हैं। जैसे 'पीतांबर' शब्द कर्मधारय भी हो सकता है और बहुव्रीहि भी। तत्सम शब्द- भण्डार उत्पत्ति या विकास की दृष्टि से शब्दों के चार भेद हैं- परिभाषा तद्भव वे संस्कृत शब्द हैं. जो अपने असली स्वरूप में हिन्दी भाषा में प्रचलित है। देशज वे शब्द हैं जो या तो सीधे प्राकृत से हिन्दी भाषा में आ गए हैं या प्राकृत के द्वारा संस्कृत से निकले हैं। वे शब्द जिनकी व्युत्पत्ति का पता नहीं चलता उन्हें देशज कहते हैं। विदेशी विदेशी भाषा से हिन्दी में आए शब्दों को विदेशी या आगत शब्द कहते हैं। भाषा तत्सम तद्भव तत्सम तद्भव आखेट तद्भव अहेर तत्सम अँगरखा आँख अंगरक्षक अक्षि अँगीठी अग्निठिका अर्चि आँच अँगूठा आँत आँत्र अंगुष्ठ अँगूठी आँव अंगुष्ठका आमा अँगोछा अंगप्रौछा आँवला आमलक अन्धेरा अन्धकार आँसू अखरोट अश्रु अक्षोट अग्नि आग अक्षवाट अखाड़ा अग्रे आगे अग्रहायन अगहन आज अट्टालिका अटारी अद्य आठ अष्ट अत्यद्भुत अचम्भा आश्चर्य अचरज आद्यत्व आढ़त अष्टाविंशति अट्ठाईस अर्ध आधा आप अष्टादश अठारह आत्मा अर्धतृतीय अढ़ाई आम्र आम अर्धपूरक अधूरा आदर्शिका आरसी आवाँ अन्नाद्य अनाज आपाक अनुत्य अनूठा आशा आस आत्मन अपना आश्रय आसरा आपदहस्त अपाहज एकत्र इकट्ठा आम्रचूर्ण अमचूर इयत इतना अलवण अलोना आदित्यवार इतवार अम्लिका इमली कांस्यकार कसेरा एतस्य इस कर्षपट्टिका कसौटी इन्धन ईंधन कथानिका कहानी अंगुलि उंगली कर्त काट उद्गत उगना काष्ठ काठ उद्गलन उगलना क्वाथ काढ़ा उद्घाटन उघाड़ना कर्ण कान उज्ज्वल उजला कृष्ण कान्ह उत्तिष्ठ उठना कर्म काम उत्पद्यते उपजना कपाट किवाड़ उद्वर्तन उबटन कृषाण किसान एवं भाषा क तत्सम तद्भव तत्सम तद्भव उच्च ऊँचा कीटक कीड़ा इक्षु ऊख कुञ्चिका कुंजी उखल ऊखल कूप कुआँ ऊर्णा ऊन कश्चित् कुछ ईदृश ऐसा कुष्माण्ड कुम्हड़ा ऊखल ओखल कुंभकार कुम्हार उपाध्याय ओझा कूर्चिका कूची ओष्ठ ओंठ कूट कूड़ा अवर ओर कर्कट ककड़ा अवश्याय ओस केवर्त केवट अवमूर्ध औंधा कुक्षि कोख अपर और कोष्ठक कोठा कंकती कंघी कोष्ठागारिक कोठारी स्कन्ध कन्धा कुष्ठ कोढ़ कमल कँवल क्रोश कोस कति कई कदर्पिका कौड़ी कृत्यगृह कचहरी काक कौआ कच्छप कछुआ कवल कौर काष्ठगृह कटहरा केदारक क्यारा कंटफल कटहल खर्जूर खजूर कर्पास कपास स्कम्भ खम्भा कल्य कल खाति खाई खजू खाज चतुष्काष्ठ चौखट खट्वा खाट चमरी चौरी खर्जू खुजली शकट हरकड़ा क्षेत्र खेत छत्रक छाता क्षेत्रित खेती शकल छिलका क्षोदन खोदना क्षुरिका छुरी गर्दभ गधा छिद्र छेद गलन गलना छेदकी छेनी गभीर। गहरा क्षोड्न ग्रन्थि गाँठ छोड़ना जृम्भिका गीध जम्हाई गृध्र ज्वलन गेंद जलना कन्दुक जाग्रण गेरू जागना गैरिक जाड्य जाड़ा इतिहास तत्सम तद्भव जाना तद्भव याति गेहूँ जानना ज्ञान जीभ गोद जिह्वा घड़ा जूआ धूत जौ घिन यव घिसना जीर्ण झीना घी झूठा जुष्ट वृत घूँघट टंकशाला टकसाल गुंठन घोड़ा घोटक त्रुट्यते टूटना चबाना ठण्ढा चर्वापण स्तब्ध चमार डंक चर्मकार दंश चाँद डाँड़ चक्षते चाहे दण्ड चिक्कण चिकना अर्धतृतीय ढाई ढीठ चटिका चिड़िया धृष्ठ चित्रक चीता शिथिल ढीला अर्धपंच ढौंचा चिनोति चुनना चूर्ण चूना ताम्बूलिका तमोली ताँबा ताम्र चुम्बन चूमना चञ्चु चोंच तर्कन ताकना तालाब चौरिका चोरी तडाग पक्का तृण तिनका पक्व पड़ना तिरश्च तिरछा पतन त्रिभागिका तिहाई प्रतिपदा पड़िवा तीक्ष्ण तीखा प्रतिवेश्चमिक पड़ोसी तैल पत्थर तेल प्रस्तर तिथिवार त्योहार पण्यशालिका पनसारी स्तन थन परीक्षा परख परसों स्तम्भन थामना परश्व स्तोक थोड़ा पर्यक पलंग द्राक्षा पल्ला दाख पल्लव दधि दही प्रस्विन्न पसीना दंष्ट्रा प्रत्यभिज्ञान पहचान दाढ़ परिधान पहनना दाद पहला द्विसृत द्विवर प्रथिल दूसरा पहुँच देवर प्रभूत्य श्री का वस्तु तत्सम तद्भव तत्सम तदभव धनिका धनिया प्रापण पाना धूम धुआँ पृच्छ पूछना नग्न नंगा पुच्छ पूँछ ननांदृपति नन्दोई पुष्कर पोखरा नवति नब्बे पौत्र पोता अन्यपरश्व नरसों पादोन पौना नखहरण नहना पिपासा प्यास लंघन नाँधना स्फटिक फटकरी नापित नाई पदिर पैर नक्र नाक परशु फरुआ नृत्य नाच पाशिका फाँसी नप्तृक नाती स्फूर्ति फुरती नस्ता नाथ स्फोट फोड़ा नारिकेल नारियल वत्स बच्चा, बछड़ा निर्गलन निगलना वृत्तक बड़ा निम्ब नीम वर्धन बढ़ना ज्ञातिगृह नैहर वणिक बनिया पक्ष पंख वासगृह बसेरा भगिनी बहन वाष्प भाप वधिर बहिर भातृजाया भावज वक्र बाँका भिक्षाकारी भिखारी वन्ध्या बाँझ अपि भी वंश बाँस अभ्यन्तर भीतर वल्गा बाग बुभुक्षा व्याघ्र भूख बाघ बुष वाद्य भूसा बाजा भ्रमर वाटिका भौरा बाड़ी मार्जन वार्तानि बातें माँजना मण्डप वारिद बादल मण्डुआ विकार बिगाड़ मक्षिका मक्खी मत्सर वृश्चिक बिच्छू मच्छर मत्स्य विद्युत बिजली मछली मञ्जिष्ठ वेज्ञप्ति बिन्ती मृत्तिका मजीठ तृश्वसा बुआ मन्त्रकारी मिट्टी बीच मदारी श्मशान मसान भाषा तत्सम तद्भव महार्घ तद्भव महँगा तत्सम बुड्डा महावत महापात्र वृद्ध बूंद मधूक महुआ बिन्दु बूझना माँ बुध्यते माता बूटी माई वृत्तिक मातृ बैल बलीवर्द मार्ग माँग बोना माँगना वपन बौना मृक्षण वामन मस्तक माथा भण्डार भाण्डागार मिस्ट मीठा भ्राष्ट्रिका भट्ठी भतीजा मुख मुँह भातृव्य मृत मुआ विभूति भभूत भरोसा मुद्ग मूँग परवश्यता भला श्मश्रु मूँछ भद्रक भागिनेय्य भान्जा मुष्टि मूठ भाटक भाड़ा मौक्तिक मोती मोर भाद्रपद भादों मयूर मिष्टि मिठाई मुकुट मौर सर्प साँप साँचा सच्चक एष यह रक्तिका रत्ती श्यामल साँवला साँस रश्मि रस्सी श्वास अरघट्ट रहट शाक साक क्षार राख षष्ठि साठ रात्रि रात शाटी साड़ी राज्ञी रानी सार्द्ध साढ़े राशि रास सप्त सात ईर्ष्या रीस सार्थ साथ अरिष्ठ रीठा श्याल साला रिक्त रीता श्रावण सावन वृक्ष रुख श्वश्रृ सास रूक्ष शल्यकी साही रूठा रजनी रैन साधु साहू रोम रोआँ श्रृंगार सिंगार लिंगपट्ट लँगोट श्रृंखला सिकड़ी लगुड लकडी शृगाल सियार अहमक कब्र खयाल तरक्की अल्ला कसर गरीब तजुरबा आसार कमाल गैर दाखिल आखिर कर्ज जाहिल दिमाग आदमी किस्त जिस्म दवा आदत किस्मत जलसा दाबा इनाम किस्सा जनाब दावत इजलास किला जवाब दफ्तर इज्जत कसम जहाज दगा इमारत कीमत जालिम दुआ इस्तीफा कसरत जिक्र दफा इलाज कुर्सी तमाम जलेबी दल्लाल बाज मवाद लायक दुकान बहस मौसम वारिस दिक बाकी मौका वहम दुनिया मुहावरा मौलवी वकील दौलत मदद मुसाफिर शराब दान मुद्दई मशहूर हिम्मत दीन मरजी मजमून हैजा नतीजा माल मतलब हिसाब नशा मिसाल मानी हरामी नाल मजबूर मात हुक्म नकद मुन्सिफ यतीम हाजिर नकल मालूम राय हाल नहर मामूली लिहाज हाकिम फकीर मुकदमा लफ्ज हमला फायदा मुल्क लहजा फैसला हवालात मल्लाह लिफाफा हौसला (3) पुर्तगाली अलकतरा काजू परात अनन्नास किरानी मस्तूल पपीता प्रालपीन क्रिस्तान मेज पादरी नालमारी गमला लबादा पाव (रोटी) साया भाषा आया गिरजा पिस्तौल सागू इस्पात गोभी फर्मा इस्तिरी चाबी फीता कमीज तम्बाकू बम्बा कनस्टर तौलिया बाल्टी कमरा नीलाम बुताम (4) चीनी चाय, लीची (5) जापानी झम्पान, रिक्शा (6) फ्रेन्च अंग्रेज, कारतूस, कूपन, फ्रान्सीसी, रिपोर्ताज (7) रूसी वोदका, रूबल, स्पुतनिका आदि। (8) तुर्की उर्दू चेचक सराय तमगा कालीन तलाश सुराज तमंचा काबू तोप गलीचा बेग कैची तोशक सौगात खाँ कुली कुर्की दारोगा बीबी खातून चाकू बारुद कुर्ता आका चिक बहादुर मुगल नागा बेगम खच्चर चम्मच लफंगा चोगा चकमक लाश बख्शी (9) पोश्तो गटागट पटाखा रोहिला अचार गूँटरगूँ डेरा मटरगश्ती अटकल गुण्डा कुड़कुड़ाना लताड़ कलूटा टसमस नगाड़ा लुच्चा खचड़ा जमालगोटा तहस-नहस हमजोली खर्राटा पठान तड़ाक भड़ास (10) डच तुरूप, बम (टाँगे का) आदि। (11) ईरानी क्षत्रप, मिहिर, तीर, तूत आदि। अपील अस्पताल कोर्ट डाक्टर पेपर पुलिस आपरेशन कलक्टर गैस पेन्सिल अफसर पेन टेलीफोन लाइब्रेरी टिकट कालरा स्कूल ट्रेन कालेज फीस कोट आर्डर उड़द कुप्पी कज्जल घुण कच्चा चन्दन कटोरा चिकना काच चूड़ी काका झण्डा केड झूठ कुटी टंटा (13) अंग्रेजी टीम नर्स मशीन वोट मजिस्ट्रेट यूनियन टैक्स सिनेमा गार्ड पार्टी स्कूटर डायरी हिरो बस स्वेटर कार कैंसर कार्ड देशज (1) द्रविड़ भाषा से टोपी मीन ओसार केतकी ठेस मुकुट डंका लाही नीर लोटा पापड़ सूजी पिड इडली पेट सांभर भंगी डोसा माला पिल्ला (2) अनुकरणात्मक शब्द किलकारी, खटखटाना, किलकारी, खर्राटा, सनसनाहट आदि। कुछ विद्वानों ने विकास के अनुसार शब्द का पाँचवाँ भेद 'संकर शब्द' भी माना है। दो भाषाओं के तत्वों के मिश्रण से निर्मित शब्द को 'संकर शब्द' कहते हैं। जैसे वोटदाता, फैशन परस्त, मोटरगाड़ी आदि।

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